सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

श्यामा : एक वैवाहिक विडंबना


पात्र:

अमरनाथ पुरी : आयु 30 वर्ष
श्यामा : मिसेज पुरी
अप्पी : मिस्टर पुरी का सहायक
मनोज : 19 वर्ष का लड़का
हीरा : अधेड़ बेयरा

( जॉर्ज टाउन में मिस्टर पुरी के भव्य बँगले का एक सुसज्जित कमरा। कमरे के दाहिनी ओर दीवार में एक द्वार है, जिस पर लाल साटिन का परदा पड़ा है, औरों में चिकें। सलीब पर चढ़ा हुआ ईसा का भव्य चित्र। बार्इं ओर, उसके नीचे ही उमर खय्याम की रुबाइयों के दो चित्र। दाहिनी ओर द्वार के इधर एक अर्द्ध अश्लील बेडरूम चित्र और कई इटालियन लैंडस्कोप शोभित हैं। समय नवंबर का एक मेघाच्छादित प्रातः और सूरज की कोई आवश्यकता नहीं। बीसवीं सदी का कोई दिन अंधकार में नहीं रह सकता। मिस्टर अमरनाथ पुरी, आयु लगभग तीस वर्ष, गोरे-चिट्टे, आँखों पर चश्मा, हाथों में चमड़े के ग्लब्स, आकृति में वैमनस्य, वाणी में रुचि वैचित्र्य। काला सर्ज का सूट पहने एक सोफे पर बैठे हुए निर्विकार रूप से हीटिंग स्टोव की ओर देख रहे हैं।)

मिस्टर पुरी : (सहसा) बेयरा! बेयरा! हीरा!

( हरी सर्ज की अचकन में शीत से काँपते हुए एक अधेड़ मनुष्य का प्रवेश। सिर पर साफा, पैर नग्न, पाजामे में उन्हें बराबर छिपाने की चेष्टा करता है)

हीरा : हुजूर

मिस्टर पुरी : बाहर भी इतनी सर्दी है?

हीरा : (मतलब न समझ कर) जी नहीं, हाँ पानी बरसने ही वाला है। मिस्टर पुरी : मेम साहब कहाँ हैं?

हीरा : (और भी अधिक नम्र हो कर) चाय पी रही हैं हुजूर, उन्हें मालूम है आप यहाँ हैं।

मिस्टर पुरी : (रुक कर) और वह बाबू, जो कल आए हैं?

हीरा : उन्हें बहू रानी ने अभी जगाया है।

( हँसने की चेष्टा करता है; पर मिस्टर पुरी की ओर देख कर सहसा गंभीर हो जाता है)

मिस्टर पुरी : हूँ।

हीरा : क्या उन्हें यहाँ भेज दूँ सरकार?

( मिस्टर पुरी एक अनिश्चित इंगित करके ध्यान-मग्न हो जाते हैं। हीरा दो क्षण रुक कर चला जाता है। मिस्टर पुरी उठ कर टहलने लगते हैं। मिस्टर अप्पी का प्रवेश। मिस्टर अप्पी चींटी-से मेहनती, कौवे-से चतुर, मृत्यु से भी अधिक व्यस्त और गंभीर देखने का प्रयत्न करते हैं)

मिस्टर अप्पी : आज राजा सरीलिया की अपील है।

मिस्टर पुरी : हूँ।

मिस्टर अप्पी : वह मर्डर अपील भी तो आज दाखिल होगी।

(मिस्टर पुरी हाथों से अनिश्तिता का इंगित करते हैं)

मिस्टर अप्पी : आज साँझ को...

मिस्टर पुरी : (सहसा उद्विग्न हो कर) आज साँझ को, कल साँझ को, परसों कभी मैं कुछ न कर सकूँगा।

मिस्टर अप्पी : (कुछ रुक कर और स्तंभित हो कर, मेसर्स शापुरजी के रुपए भेज दीजिए।

मिस्टर पुरी : मेम साहब को दे दीजिए।

( मिस्टर अपी कुछ कहना चाहते हैं; पर सहसा रुक जाते हैं और सहसा जैसे कोई उन्हें बाहर बुला रहा हो, चले जाते हैं। मिस्टर पुरी उसी अनिश्चित-अस्थिर भाव से टहलते हैं)

मिस्टर पुरी : हीरा!

हीरा : (बाहर से) हुजूर!

मिस्टर पुरी : कुछ नहीं

( लाल साटिन के परदेवाले द्वार से मिसेज पुरी का प्रवेश। गोल, हँसमुख, लापरवाह चेहरा; पर आँखों में विषाद की बुद्धिमत्ता। आयु प्राय, २३ वर्ष, अधरों पर विलास की सजीवता, खद्दर की साड़ी पारसी ढंग से पहने, ऊपर से एक काला ओवरकोट)

मिस्टर पुरी : (हँस कर) मनोज को तो देखिए! अभी मैंने उठाया, अब मुँह फुलाए बैठा है। कहता है, तुमने मेरा बड़ा सुंदर स्वप्न भंग कर दिया।

मिस्टर पुरी : (हँसने का प्रयत्न करते हैं : पर विफलता उनके अधरों पर अंकित हो जाती है) विचित्र पुरुष है।

( मिसेज पुरी कुछ कहना चाहती हैं; पर उसके पहले ही सरोवर-सी स्वच्छ हँसी हँस देती हैं)

मिस्टर पुरी : तुमने चाय पी ली शम्मी?

मिसेज पुरी : हाँ। तुम स्वस्थ तो हो (गंभीर आकृति से)! कैसा जाड़ा पड़ रहा है, तुम ओवरकोट भी नहीं पहनते। हीरा (उत्तर की प्रतीक्षा न करके) साहब का लंबा कोट ले आओ।

मिस्टर पुरी : मनोज को चाय पिलाओ।

मिसेज पुरी : वह नहीं पिएगा, उसे अपने स्वप्न का बड़ा शौक है। (इस बार वह तनिक भी नहीं हँसती हैं)

मिस्टर पुरी : (सूखी हँसी हँस कर) मुझे इसका बालकों के समान कोरी आँखों से एक क्षण में प्रफुल्लित और शोकान्वित होना, बहुत प्रिय लगता है।

मिसेज पुरी : और उसका क्रोध! अभी मुझसे बिगड़ रहा था, मैंने मुस्कराकर उसकी ओर देखा और बस, बालिकाओं-सा लजा गया।

मिस्टर पुरी : (दो क्षण गंभीर नीरवता रहती है सहसा -) आज क्या वह जाएगा?

मिसेज पुरी : हाँ, मैंने उससे कह दिया।

मिस्टर पुरी : क्यों?

मिसेज पुरी : क्यों? (उसकी आँखों में एकटक देख कर) क्योंकि तुम उससे ईर्ष्या रखते हो।

मिस्टर पुरी : (चकित हो कर) मैं उससे ईर्ष्या रखता हूँ? (उत्तेजना के साथ) उससे, उस अर्ध बालिका से, जो हर समय अपने पुरुष होने के लिए क्षमायाचना करती है। जो केवल एक रूपहली रात्रि के रूप की भाँति है, जो जीवन या प्रेम को इतना ही कम जानता है, जितना तुम मुझे - हूँ, मैं ईर्ष्यालु नहीं हूँ, शम्मी।

मिसेज पुरी : (दृढ़ भाव से) क्यों?

मिस्टर पुरी : (उसी तेज के साथ) क्योंकि मुझे तुम पर, तुम्हारे प्रेम पर विश्वास है।

मिसेज पुरी : आपको अपने गुणों पर गर्व है, आपको अपना इतना भरोसा है!

मिस्टर पुरी : (कृत्रिम भाव से) नहीं, मुझे तुम्हारी पवित्रता, तुम्हारी महत्ता का गर्व है, उसी का भरोसा है।

मिसेज पुरी : (निर्विकार भाव से) तब आप मुझे प्रेम नहीं करते।

मिस्टर पुरी : (धीमे स्वर से) यह मत कहो शम्मी, परमात्मा के लिए एक क्षण भर को भी ऐसी बात न सोचो।

मिसेज पुरी : तुम मुझसे प्रेम भी करते हो ओर उस पुरुष से दयालु भी नहीं हो, जिसको प्रेम करना किसी भी स्त्री के लिए इतना सरल और नैसर्गिक है, जैसे बसंत का आगमन या प्रातः समीर में कलिका का खिलना! क्या तुम्हारे हृदय की भावनाएँ और वासनाएँ शरीर से विलग हैं?

मिस्टर पुरी : (कुछ देर चुप रह कर) क्या मनोज तुम्हें प्यार करता है?

मिसेज पुरी : मैं किसी के हृदय की बात क्या जानूँ!

मिस्टर पुरी : (अपने अंतर के संघर्ष से विजय पा कर) और तु...

मिसेज पुरी : यह तुम मुझसे अधिक जानते हो। समाज के सम्मुख मैं तुम्हें प्यार करने के लिए उत्तरदायिनी हूँ। और विवाह करके यदि मैंने जीविका के लिए अपने आपको नहीं बेचा है - यदि इस कठिन सत्य का सामना तुम नहीं करना चाहते - तो मुझे प्रेम चाहिए।

मिस्टर पुरी : (जैसे स्वप्न देखते हो) मैं अपना प्रेम शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकता। तुम मेरे जीवन की उपक्रमणिका हो। तुम्हीं उसका उपसंहार हो।

मिसेज पुरी : यह सब कविता है, कोरी भावुकता है। इससे तो मुझे मनोज की उक्ति पसंद है। जब उसका नायक कहता है -

मैं उतरे मद का-सा खुमार,

तुम नयनों की मदिरा सी।'

मिस्टर पुरी : शम्मी, मेरा जीवन तुम्हारे हाथ है। मेरे पास शब्द नहीं हैं, मेरे पास उनकी आत्मा है। मेरे पास कविता नहीं; पर प्रेम में उसकी सजीवता है। तुम आज मेरे प्रेम की उपेक्षा कर सकती हो; पर एक दिन अवश्य तुम्हें उसकी आवश्यकता होगी।

मिसेज पुरी : हाँ, ठीक है, तुम्हें मेरी पवित्रता पर विश्वास नहीं है। तुम्हें अपनी महत्ता पर गर्व है। तुम्हें मनोज से ईर्ष्या नहीं है, मुझसे भय है।

मिस्टर पुरी : तुम क्या कह रही हो शम्मी, मैं एक शब्द भी नहीं समझता।

मिसेज पुरी : (अब वह मिस्टर पुरी के पास से आकर वनादी पर बैठी है। तुरंत)

तुम क्या समझ रहे हो, मैं वैसा तो एक शब्द भी नहीं कहती।

( हीरा का प्रवेश)

हीरा : मोटर तैयार है सरकार!

मिसेज पुरी : मनोज बाबू से पूछो, वह स्टेशन चलेंगे या (श्यामा की ओर देख कर) यदि तुम लोग न चाहो, तो न चलो।

मिसेज पुरी : (शंकित सी) मैं तो चलूँगी।

मिस्टर पुरी : (हीरा की ओर देख कर अपनी टाई सँभालते हुए) जाओ, मनोज बाबू को खबर कर दो।


दूसरा दृश्य

( दिन वही, समय मध्याह्न)

( मिस्टर पुरी के बँगले का दूसरा कमरा। दीवारें, सादी, कॉर्निस के ऊपर एक सुकुमार और मधुर युवक का चित्र रखा है और वैसा ही एक 19 वर्ष का युवक गले में रेशमी रूमाल लपेटे रेशमी पाजामा और कुर्ता पहने, रेशमी काले लहराते-से बालों को हाथ में समेटे, किसी की प्रतीक्षा में बैठा है।

उस युवक की दृष्टि में उन्माद, अस्थिरता और स्निग्धता का इतना विचित्र समावेश है कि कोई भी उसके प्रति आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता। उसमें बालिका-सी लज्जा और कविता-सी मधुरता है।

दाहिनी ओर के द्वार से - जो ठीक उससे पीछे है - मिस्टर पुरी का प्रवेश)

युवक : (कंपित कंठ से) रानी!

मिस्टर पुरी : (अपना मानसिक उद्वेग भरसक दबा कर) नहीं, मैं हूँ, मनोज, मैंने सोचा कि मैं भी तुम्हारे अप्रकाशित स्वप्न लोकों में से एक लोक छीन लाऊँ। क्या तुम वास्तव में हर समय स्वप्न ही देखा करते हो?

मनोज : (उसकी ओर देख कर) क्योंकि स्वप्न ही इस संसार की एकमात्र वास्तविकता है। यथार्थ जीवन में तो किसी रस, किसी की भावना की पुनरुक्ति असंभव है। मिस्टर पुरी, अपनी आत्मा को जान कर, मनुष्य स्वप्नों में ही रहना चाहता है (सहसा लज्जित हो कर) पर... आप बैठ जाइए।

( उठ कर खड़ा हो जाता है और पीछे एक मेज से टकरा जाता है। मिस्टर पुरी मुस्करा कर उसे सँभालते हैं और उसके कंधे पर हाथ रख कर प्रेमपूर्वक उसे अपने पास बैठा लेते हैं।)

मिस्टर पुरी : आज साँझ को मैं 'लेबर इंटेलिजेन्स ब्यूरो' में व्याख्या दूँगा, तुम चलोगे?

मनोज : (नतमस्तक) मैं व्याख्यानों में विश्वास नहीं करता।

मिस्टर पुरी : (हँस कर) मैं तुम्हारे विश्वासों में विश्वास नहीं करता।

मनोज : (सहसा उनकी ओर देख कर) यही आपकी एकमात्र सार्थकता है।

मिस्टर पुरी : (कृत्रिम प्रफुल्लता से) तो तुम व्याख्यानों में विश्वास नहीं करते?

मनोज : मैं व्याख्यानदाताओं में विश्वास नहीं करता। उनके लिए परिश्रम, तर्क, बुद्धि, ज्ञान, सामाजिक या वैयक्तिक किसी भी गुण की आवश्यकता नहीं है...

मिस्टर पुरी : (अप्रतिभ हो कर) हूँ।

( कुछ देर नीरवता रहती है)

मनोज : (सहसा) मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूँ।

(मिस्टर पुरी त्रस्त नेत्रों से उसकी ओर देखते हैं)

मनोज : (मानसिक विप्लव को भरसक दबा कर) मैं आपकी धर्मपत्नी से प्रेम करता हूँ।

मिस्टर पुरी : (जैसे उन्हें अपने ऊपर विश्वास न हो) ठीक है, उसको सभी प्रेम करते हैं, वह ऐसी सुंदरी है, उसकी आत्मा ऐसी अपूर्व है, वह ऐसी सुंदरी है, ठीक है।

मनोज : मैं हँसी नहीं कर रहा हूँ।

मिस्टर पुरी : तब तुम मुझ पर अन्याय कर रहे हो! यदि ऐसे कठिन और विकराल सत्य को तुम हँसी में नहीं कह रहे हो। यदि तुम इसे अपनी कविता की तरलता और सरलता नहीं दे सकते, तो तुम मुझ पर अन्याय कर रहे हो। मनोज, यह तुम्हारा अन्याय है!

मनोज : यह आपका भ्रम है मिस्टर पुरी, मैं आपके ही अंतर से यह बात आपसे कहना चाहता हूँ। मैं आपके अंतस्तल में प्रविष्ट हो कर आपसे कहना चाहता हूँ कि 'श्यामा' आपकी नहीं है, वह मेरी है।

मिस्टर पुरी : तुम्हारी! तुमने अभी भी उसे मेरी धर्मपत्नी कहा है, अधर्मी निर्लज्ज!

मनोज : (व्यवस्थित) तुम मुझे केवल कटु वचन कह सकते थे और अब तुम अप-वचन भी कह रहे हो। ...पर श्यामा तुम्हारी नहीं है।

मिस्टर पुरी : (उत्तेजित स्वर में) क्यों?

मनोज : क्योंकि समाज की एक हृदयहीन लौह-विधि ने ही उसे तुम्हारी बनाया है, तुमने उसे पाने के लिए क्या त्याग किए हैं, तुम्हारा उस पर क्या स्वत्व है?

मिस्टर पुरी : (एक शहीद के स्वर में) मैं उसे प्यार करता हूँ ।

मनोज : (हँस कर) तुम उसे प्यार करते हो और तुम इस विडंबना को अपने जीवन का अंग बनाए हुए हो।

मिस्टर पुरी : (विकंपित और उत्तेजित स्वर में) मैं उससे प्रेम करता हूँ।

मनोज : तुम, जिससे उसकी एक भावना भी नहीं मिलती। तुम, जो उसे एक निर्जीव लता के समान अपने अंग में लपेटे रहना चाहते हो। तुम, जो केवल अपनी शारीरिक वासनाओं को तृप्त करना चाहते हो। तुम उसे प्यार करते हो? तुम, जो अपने सर्वोत्तम रूप में भी उसके साधारण-से-साधारण त्याग से निकृष्ट हो।

मिस्टर पुरी : (अत्यधिक उत्तेजित हो कर) मैं उसे प्रेम करता हूँ।

मनोज : ठीक है, तुम उसे प्रेम करते हो, जिसकी आशाओं और अभिलाषाओं की बलि करके तुमने अपने इस जीवन को रस दिया है। तुममें और उसमें क्या समानता है, तुम किस प्रकार उसके योग्य हो?

मिस्टर पुरी : (क्रोध से काँपते हुए) निकल जा मेरे घर से, निर्लज्ज! (उसे मारने दौड़ते हैं)

मनोज : (चीख कर) देखो, मेरे पास मत आना! मिस्टर पुरी, मैं आत्मघात कर लूँगा, अगर तुमने मुझे छुआ। मैं अपने जीवन का अंत कर दूँगा!

मिस्टर पुरी : (तनिक शांत हो कर) कायर!

मनोज : (वैसा ही अव्यवस्थित) तुम मेरी हत्या कर सकते हो। तुम, तुम, कायर तुम हो।

मिस्टर पुरी : (शांत हो कर) अच्छा आओ, मैं तुमसे शांत भाव में बातें करना चाहता हूँ। मैं... मुझे क्षमा कर दो।

मनोज : (वैसे ही) नहीं, मैं रानी से कहूँगा, तुम मेरी हत्या कर सकते हो।

मिस्टर पुरी : नहीं, इससे क्या लाभ! यहाँ आओ, मैं देखता हूँ कि मेरा-तुम्हारा केवल सैद्धांतिक मतभेद है। आओ, हम स्थिरचित्त हो कर बातें करें।

मनोज : (वैसे ही) नहीं, मैं रानी से कहूँगा, तुम मेरी हत्या कर सकते हो।

( बाहर मिसेज पुरी का कंठ स्वर सुन पड़ता है। दोनों एकाग्र हो कर उसी ओर ध्यान देते हैं)

मिस्टर पुरी : (व्यग्र हो कर) नहीं मनोज, इससे कोई लाभ नहीं। क्या तुम उसकी सहानुभूति भी मुझसे छीनना चाहते हो? क्या तुम चाहते हो कि वह मुझे एक पतित ईर्ष्यालु मनुष्य समझे? मैं तुमसे विनय करता हूँ, इसमें कोई लाभ नहीं है मनोज।

मनोज : (सहसा स्वस्थ हो कर) तब वह तुम्हारी कभी नहीं हो सकती। आह! तुम उससे अपना यथार्थ स्वरूप छिपाते हो। मैंने तुम्हारा वास्तविक रूप देखा है, और मैं तुमसे सहानुभूति करता हूँ। वह उसे नहीं जानती और तुमसे घृणा करती है।

मिस्टर पुरी : (हताश हो कर) आह!

( सहसा मिसेज पुरी का एक श्वेत साड़ी में प्रवेश। उसके केश रूखे और बिखरे हुए हैं। उसकी आकृति चाँदनी के समान सरल है। उसके आते ही मिस्टर पुरी व्यस्त दीखने का प्रयत्न करते हैं और एक क्षण चित्र की ओर देख कर गुनगुनाते हैं। दूसरे क्षण रेलवे टाइमटेबिल उठा कर पढ़ने लगते हैं)

मिसेज पुरी : (मनोज की ओर देख कर) मैं तुम्हारी कब से प्रतीक्षा कर रही हूँ मनोज!

मनोज : रानी, मैं...

(मिस्टर पुरी एक क्षण में आग्नेय और दूसरे में विनयपूर्ण नेत्रों से देखते हैं।)

मिसेज पुरी : अच्छा, अच्छा, आओ बाग में चलो, पर मैं तुम्हें तितलियाँ न पकड़ने दूँगी!

( वह उसे बाँह पकड़ कर बाहर ले जाती है। मिस्टर पुरी उनकी ओर कातर दृष्टि से देखते हैं।)

मिसेज पुरी : (द्वार के पास सहसा मुड़ कर) आप आज साँझ कहाँ भोजन करेंगे, कपूर के रेस्त्राँ में? मैं मनोज को मिसेज कौल के यहाँ ले जाऊँगी।

मिस्टर पुरी : मैं आज भोजन न करूँगा।

मिसेज पुरी : (तनिक चिंतित हो कर) क्यों, तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है? (सहसा लौट पड़ती है और उसके पास जा कर) देखती हूँ, तुम्हें अपनी तनिक भी चिंता नहीं है।

(मिस्टर पुरी दूसरी ओर शून्य भाव से ताकते हैं)

मिसेज पुरी : अच्छा मनोज, तुम थोड़ी देर पार्क में हो आओ। एक सिगरेट, केवल एक सिगरेट पीना।

(मनोज गुनगुनाता हुआ चला जाता है। मिसेज पुरी, मिस्टर पुरी के पास बैठ कर, उनसे बातें करने की चेष्टा करती हैं)

                                                                                ---भुवनेश्वर---

नचनियाँ चोखेलाल


हमेशा महफिलों और प्रशंसकों की भीड़ में रहनेवाला चोखेलाल नचनियाँ अब बिल्कुल अकेला रह गया था। घरवाली तक छोड़ कर चली गई थी। उसके चले जाने के बाद उसने बहुत प्रयत्न किए, किसी ने उससे शादी करना स्वीकार नहीं किया। उसके कमरे में अगर अब भी साथ देने के लिए कोई मौजूद था तो वे थे उसके हारमोनियम, सारंगी, तबला, बाँसुरी, मजीरा और घुँघरू। कई बार उसे लगता था कि ये महज साज नहीं बल्कि उसके परिवार के सदस्य हैं। जब अकेलापन उसे काटने लगता और जिंदगी निस्सार लगने लगती तो उसकी उँगलियाँ हारमोनियम के कीबोर्ड पर दौड़ने लगती या फिर तबले पर थाप देने लगती या फिर बाँसुरी आ लगती उसके होठों से या फिर मजीरा उसके हाथों में आ कर मचलने लगता या फिर घुँघरू पैरों में बँध कर झनझना उठते। जैसे सबकी अपनी अपनी ध्वनि, अपने-अपने नाद... वैसे ही उन सबसे जुड़ी हुई स्मृतियाँ भी अलग-अलग। वे पाँचों ही साज मानो उसकी कहानी के सूत्रधार हों।

उन दिनों लौंडा नाच का खूब प्रचलन था। बारात में तो इसकी अत्यंत धूम रहती थी और बारातियों की शोभा का यह एक अनिवार्य हिस्सा बन गया था। जिस बारात में लौंडा नाच न हो उसे लोग शान और ठाटबाट की बारात नहीं मानते थे। चोखे ऐसे मौकों के लिए मानो मनोरंजन का विशेषज्ञ माना जाता था। शादी से संबंधित, भाँड़ी, फक्कड़, बधाई, विदाई, ताना-मसला, छेड़-छाड़, प्यार-मोहब्बतवाले सारे फिल्मी और गैरफिल्मी गीत उसके खजाने में भरे होते थे। वह सुननेवालों को लोटपोट कर देता था और खासखास लोगों को अँचरा ओढ़ा-ओढ़ा कर कायल बना देता था। एक बार किसी गाँव में एक ही दिन दो बारात आ गई। एक बारात में नाचनेवाला चोखेलाल था, जबकि दूसरी में एक खूबसूरत बाईजी थी। चोखेलाल मन ही मन भयभीत था कि आज उसका शो फ्लॉप हो कर रहेगा। मगर वह अचंभित रह गया कि उसके शामियाने में खचाखच भीड़ आ जुटी। लौंडा नाच का यह जलाल था, वह भी अगर चोखेलाल का हो तो लोग जैसे पागल ही हो उठते थे। उसने जब तान छेड़ा - पिया अब न सहल जाला राउर बिरहा... न अइब त छोड़ के भाग जाइब तोहरा... कुछ ही दूर पर बाईजी का शामियाना था, जो भी वहाँ सौ-दो सौ लोग थे, उनमें आधा इस स्वरलहरी को सुन कर इस तरफ आ गए।

बारात के अलावा भी कोई काज-परोज हो, छठियारी, घरहेली, मूड़न, जनेऊ, नौटंकी तो इलाके भर से सट्टा पाने के मामले में वह सबकी पहली पसंद था। कहते हैं एक बार जिसने भी उसके नाच का जादू देख लिया वह उसे भुला नहीं सकता था। लोग उसका लड़की के रूप में मेकअप देख हैरान रह जाते थे। अपनी कमनीयता और कशिश के कारण वह एक कँटीली, रसीली और सेक्सी औरत में तब्दील हो जाता था। रूप में जहाँ यह कयामत थी वहीं उसके गले में भी सरस्वती का निवास था। न सिर्फ वह सुरीला था बल्कि राग-रागिनियों की बारीक समझ भी उसे थी।

चोखेलाल के इन्हीं रूपगुणों पर छनौनवाले सातो सिंह फिदा हो गए। उसमें जो बात थी, उस पर मन ही मन फिदा हो जाना या रीझ जाना किसी के लिए भी स्वाभाविक था, शायद लोग रीझते भी रहे थे, भले ही उनके मन की लगी मन ही में बुझ जाती रही थी, लेकिन सातो सिंह में आशिकमिजाजी का आग्रह कुछ ज्यादा ही प्रबल था और वे अपने को रोक न सके थे। इलाके में जहाँ भी चोखे का प्रोग्राम होता वे उसमें जरूर हाजिर हो जाते। सबने इसे लक्ष्य कर लिया... चोखे भी भला अपने ऐसे घनघोर कद्रदान से बेपरवाह कैसे रहता। उसके भीतर भी कुछ नरम-गरम अँकुराने लगा।

एक दिन जब शो खत्म हो गया तो वह स्टेज के पीछेवाले दालान के कमरे में मेकअप उतारने की तैयारी कर रहा था। सातो सिंह कमरे के अंदर आ गए। कुछ देर तक मुग्धभाव से उसे देखते रहे और फिर कहा, 'हम छनौन गाँव के सातो सिंह हैं।'

'मुझे मालूम है, नाचते वक्त हमारे सामने भले ही सैकड़ों लोग होते हैं, जिनमें एकबारगी सबको पहचाना नहीं जा सकता, लेकिन उनमें कुछ ऐसे चेहरे, जिनकी आँखों में विशेष कद्र और उत्साह भरा एक लगाव समाया हो, वे एक बार में ही पहचान में आ जाते हैं। अगर वह चेहरा बारबार दिखे, फिर तो उससे अनजान कोई रह ही नहीं सकता।'

सातो की आँखों में कृत्तज्ञता की परछाई तैरने लगी। उन्होंने उसकी ओर एक पैकेट बढ़ाते हुए कहा, 'मैं तुम्हारे लिए अपनी पसंद के कुछ कपड़े लाया हूँ, अगली बार इसे पहन कर नाचना, और भी ज्यादा खिलोगे।'

बख्शीश लेने की उसकी आदत थी, वह मना न कर सका। कभी नाचते-गाते वक्त कुछ लोग मुग्ध हो कर, खुश हो कर, आकर्षित हो कर अपने-आप ही बख्शीश देते थे, कभी वह बख्शीश की चाह में स्टेज से नीचे उतर कर चुने हुए लोगों को अँचरा ओढ़ाने लगता था, वे न चाहते हुए भी लोक-लाज से कुछ देने के लिए विवश हो जाते थे। उसे कई बार लगता था कि इस नृत्यकर्म का अभिप्राय आजीविका चलाने से ज्यादा चाहनेवालों की अनंत खोज भी है। उसे लगता था कि प्रशंसा या वाहवाही उसे आगे बढ़ाते हैं, उसकी प्यास को नई तृप्ति देते हैं और तृप्ति को नई प्यास।

सातो सिंह के रूप में उसे अनायास एक नई तृप्ति और एक नई प्यास देनेवाला दीवाना मिल गया था। सातो ने कहा, 'मैंने कई लौंडों को नाचते हुए देखा है, लेकिन तुम उन सबमें बेमिसाल और अलग हो... सुर-ताल का, सुंदरता का और गले में मिठास का जो सामंजस्य तुममें है वह किसी में नहीं। तुम्हें देखते-सुनते हुए तो मेरा मन ही नहीं भरता। तुम अगर लड़की होते और नाचते तो शायद मैं तुम्हारा इतना प्रशंसक नहीं होता। शायद मैं तब भी तुम्हारा इतना प्रशंसक नहीं होता जब तुम पुरुष हो कर स्त्री की तरह मुकम्मल अदा और अंदाज नहीं देते... शायद मैं तब भी तुम्हारा प्रशंसक नहीं होता जब तुम कुछ भी होते, स्त्री या पुरुष और सुरताल का तुममें मणिकांचन संयोग न होता।'

'मेरा अहोभाग्य सातो सिंह जी कि आप संगीत के पारखी हैं और मुझे इतना पसंद करने लगे हैं। मुझे किसी ने बताया कि आपने उस्ताद इरशाद अली पिलानी से बजाब्ता गायिकी की तालीम ली हुई है और उनके साथ शागिर्दी भी की है। मौशिकी की इतनी बड़ी शख्सियत के साथ रहने का आपको मौका मिला, आप बड़े खुशनसीब हैं सातो सिंह जी।'

'क्या खुशनसीब हैं चोखे? तुम जिसे बड़ी शख्सियत कहते हो उसे इस इलाके में किसी ने दो कौड़ी का नहीं समझा। उनकी संगति में जाने को मेरे बाबू जी ने एक नालायकी की संज्ञा दी और फिर जबरन मुझे वहाँ से वापस बुला लिया। मैं संगीत की दुनिया में ही खुद को रखना चाहता था, लेकिन इसे घरवालों ने मुमकिन नहीं होने दिया।'

'नृत्य-संगीत की जिसे समझ न हो उनका ऐसा ही बर्ताव होता है सातो सिंह जी। लोग भले ही मेरे नाच-गाने का लुत्फ उठाते हैं, मजा लेते हैं लेकिन वे मेरे वजूद को हिकारत और उपहास की नजर से देखते हैं।'

'जानता हूँ चोखे... लौंडा नाच, मतलब उनके खयाल में एक निकृष्ट और गंदा काम। कुछ हद तक यह ठीक भी है कि ज्यादातर धंधेबाजों ने एक फूहड़ता और अश्लीलता के प्रदर्शन को ही लौंडानाच मान लिया है। लेकिन तुम इस पर ध्यान मत देना, मैं जानता हूँ कि तुम घर से भाग कर रामलीला पार्टी में कई साल रहे और नाचगाने की बारीकी को बहुत करीब से देखा... इसलिए तुझमें एक शालीनता, समझदारी और कलात्मकता है। तुम्हारी प्रस्तुति में वो बात है कि कोई लगातार अवलोकन करे तो उसकी रुचि परिष्कृत हो जाए।'

'सातो जी, मेरे नाच-गाने को इस गाँव-देहात में कोई इतना बड़ा अर्थ देनेवाला मिल जाएगा, मैंने इसकी कल्पना तक नहीं की थी। आपने तो मेरे अंदर जमा हो रहे हीन भावना के टीले को ही मानो ध्वस्त कर दिया।'

सातो सिंह ने उसे यों देखा जैसे टापू की नीरवता में अकेली लंबी भटकन के बाद कोई साथी मिल गया, 'तुम्हें समर्थन और प्रोत्साहन दे कर दरअसल मैं अपनी खुशी और अधूरी साध की लौ को प्रज्ज्वलित कर रहा हूँ। कला की लगातार गैरमौजूदगी के कारण जो मेरे भीतर एक मरुभूमि बन गई है वह तुम्हारे सान्निध्य में आ कर सिंचित हो सकेगी, इसलिए मुझे इजाजत दो चोखे कि मैं तुम्हें अपना कह सकूँ।'

'सातो जी, जहाँ सारे अपने पराए और विमुख हो रहे हों, वहाँ कोई पराया अपना होना चाहता है, यह जरूर प्रकृति का ही हिसाब-किताब है, जो हमेशा लेना-देना बराबर कर देता है। विभिन्न गाँवों में संपन्न पिछले दस-बारह आयोजनों में आपकी उपस्थिति को देखते हुए जहाँ मैंने आपके बारे में सब कुछ पता कर लिया था, वहीं आपके नजदीक आने की मुझे प्रतीक्षा भी रहने लगी थी। चलिए, आज प्रतीक्षा खत्म हुई... मैं आपको अपना कह सकूँ, यह परिस्थिति सदा बनी रहे, मैं इसका पूरा खयाल रखूँगा।'

दोनों के बीच अपनापन की गाँठ लगातार मजबूत होती गई। सभी लोग धीरे-धीरे जानने लगे कि सातो सिंह और चोखेलाल में गाढ़ी अंतरंगता है। जैसा कि फितरत है आदमी की, इसके कई अर्थ दिए जाने लगे, कई गंध सूँघी जाने लगी।

दोनों दो गाँव के रहनेवाले थे। दोनों एक दूसरे के गाँव जाते और घर में ठहरते। चोखे आता तो सातो अपने दालान में ही एक-दो घंटे के लिए नाच का प्रोग्राम रख देते। खुद हारमोनियम पर बैठ जाते और संगत के लिए गाँव के किसी ढोलकिया को बुला लेते। चोखे समाँ बाँध देता। सातो इस तरह खिल उठते जैसे कोई बेशकीमती खजाना मिल गया हो।

सातो सिंह जब उसके गाँव जाते तो अपने साथ मन-दो मन चावल, गेहूँ, आलू, प्याज या अपने खेतों में होनेवाली ऐसी ही दूसरी चीजें ले लेते। उनकी अच्छी खेती-बारी थी और इफरात उपज होती थी। वे जानते थे कि चोखे को हमेशा इन चीजों की जरूरत है। देख कर लोग हैरान रह जाते कि इतना तो कोई अपने सगे के लिए भी नहीं करता है। मतलब में कुछ और भी मतलब जुड़ जाता।

दोनों ही इस स्थिति को अच्छी तरह ताड़ गए कि उनके मिलने से आसपास एक खुसुर-फुसुर होने लगती है और लोगों की आँखों में एक संशय उतर आता है। सातो सिंह के बेटे ने एक बार उन्हें टोक दिया, 'बाउजी, यह अच्छा नहीं लगता कि नाती-पोतेवाली इस उम्र में आप चोखवा के लिए पगलाए रहते हैं। गाँववाले जब इस बारे में हमें कुरेद कर छेड़ते हैं तो शर्म से हमारी गर्दन झुक जाती है।'

सातो अपने बेटे को क्या स्पष्टीकरण दें, उन्हें समझ में नहीं आया। जानते थे कि कितना भी वे कह लें, लोग मानेंगे नहीं, वे अपने ही चश्मे से देखेंगे इस रिश्ते को। किसी तरह अपने बेटे को समझा भी लें तो उससे सबका मुँह बंद नहीं हो जाएगा। उन्होंने कहा, 'जिसे जो समझना है, समझते रहें, मुझे किसी को भी अपनी सफाई देने की जरूरत नहीं है। किसी के मुझे बुरा या भला मान लेने से न मुझे कुछ तमगा मिलता है और न कोई जागीर छिनती है, फिर हम इसकी परवाह क्यों करें? जब बाउजी की चलती थी तो वे इरशाद अली की देहरी से मुझे जबर्दस्ती घसीट लाए थे। अब जब फिर फन के जादू से मैं खिंच गया हूँ और अपनी नीरस होती उम्र में कुछ खुशियाँ जोह लेना चाहता हूँ तो अब तुम बेटे हो कर मुझे नियंत्रित कर रहे हो।'

बेटे ने कहा, 'बाउजी, जिसे इस समाज में रहना है उसे इसकी परवाह तो करनी ही होती है। लोगों की नजरों में गिरने के कई बुरे अंजाम होते हैं। आखिर उठना-बैठना, रिश्ता-नाता, मरना-जीना सब आपको इसी समाज में करना होता है। आप सबकी घृणा, उपेक्षा और अवमानना ले कर कैसे खुशहाल रह सकते हैं? सामाजिक लोकलाज ही तो वह नकेल है जो आदमी को मर्यादित और सीमित करती है।'

सातो सिंह को लगा कि आज उनके सामने एक बार फिर बेटे के रूप में वेश बदल कर उनके पिता बोलने लगे हैं। पिता जब उन्हें बरजते थे तो उनके समर्थन में पीछे माँ, चाचा-चाची और परिवार के ज्यादातर लोग खड़े दिखते थे। आज बेटा तलब कर रहा है तो इसके स्वर में खुद उनकी पत्नी, अन्य बेटे-बेटियाँ और परिवार के कई अन्य लोगों के स्वर भी शामिल हैं। उन्हें पहली बार लगा कि जब दुनिया आपके साथ न हो तो आप खुद को अपने बेटे के बाप के रूप में भी पेश नहीं कर सकते। उन्हें यह भी लगा कि फन के मामले में यह समाज पिता के समय जहाँ था आज बेटे के समय भी वहीं है।

अंततः अपनी मरजी और अपने घर का मालिक हो कर भी उन्हें यह तय करना पड़ा कि चोखे से मिलने के तरीके अब उन्हें बदलने होंगे।

इधर चोखे के घर-परिवार में भी ऐसी ही प्रतिक्रिया थी। जब वह भाग कर रामलीला में चला गया तो कई बरस बाद उसका बड़ा भाई ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उस तक पहुँचा और किरिया-कसम तथा सबके मोह-लगाव का वास्ता दे कर वापस ले आया। आते ही उसने शादी करवा दी कि दुनियादारी से बँध कर भागेगा नहीं। शादी करके उसे अच्छा लगा। रामलीला सिर्फ मर्दों की एकरस दुनिया थी, जहाँ मर्द ही औरत की भूमिका करते थे और इनके कृत्रिम औरताना आवभाव से मर्द अपने मन बहलाव का सिरा जोड़ना चाहते थे। यहाँ औरत का मौलिक साहचर्य पा कर उसके भीतर एक नया रससंचार होने लगा। उसके सामने एक अलग तरह की हसीन और मजेदार दुनिया उभरने लगी। मगर यह दुनिया ज्यादा लंबी नहीं खिंची। हारमोनियम, घुँघरू, नृत्यकला और औरताना किरदार निभाने की आदतें वह एक बहुमूल्य कमाई के रूप में अपने साथ ले कर आया था और वह इन्हें छोड़ नहीं सकता था। उसकी नई-नवेली औरत जमुनियाँ, जो अपने साथ अनेक मासूम हसरतें ले कर आई थी, अपने पति को शुद्ध मर्द के रूप में देखना चाहती थी, मगर उसने देखा कि इसे मर्द से ज्यादा औरत होने में मजा आता है। कोई आभूषण या प्रसाधन-सामग्री उसे पसंद आती तो वह खरीद कर अपने लिए रख लेता, कोई अच्छी साड़ी जँच जाती तो वह अपने लिए छाँट लेता।

जमुनियाँ को उसका औरत बन कर नाचना जरा-सा भी अच्छा नहीं लगा। औरत बन कर क्या, मर्द के वेश में भी वह नाचता यह भी उसे स्वीकार्य नहीं था। वह जिस संस्कार से आई थी उसमें किसी का भी नाचना एक आवारागर्दी और नालायकी का काम माना जाता था। मगर चोखे का जुनून ऐसा था जैसे वह सिर्फ और सिर्फ नाचने के लिए ही बना है। घुँघरू पैरों में नहीं बँधते और हारमोनियम-तबले की धुनें हृदय की गहराई में उतरे बिना कई दिन हो जाते तो उसे लगता मानो दुनिया बेसुरी हो कर एक ही जगह रुक गई है। वह मचल उठता नाचने के लिए। उसकी यह लगन ही थी कि उसका सिक्का चल निकला इलाके में और वह एक बहुआमंत्रित नचनियाँ बन गया। जमुनियाँ यहाँ तक तो झेल गई, मगर जब सातो सिंह चोखे के नजदीक आते-आते इतना नजदीक आ गए कि बीच में कोई खाली जगह नहीं रह गई तो उसे लगा कि उसकी निजी अंतरंगता और अधिकार का भी अतिक्रमण हो गया। उसने देखा कि चोखे के पुरुषत्व के लिए सबकी आँखें एक कठघरा बन गईं। उसके साथ चोखे के पतिवाले निर्वहनों के बारे में अपने घर-परिवारवाले भी उससे सवाल पूछने लगे। जमुनियाँ क्या कहती? पौरुष की कमी का एहसास तो उसे पहले दिन ही हो गया था। उसने महसूस किया कि किसी का मर्द जब ऐसा निकल आए तो औरत का कोई भी मान-सम्मान और वजन नहीं रह जाता। उसे यह भी महसूस हुआ कि पुरुषत्व और स्त्रीत्व के प्रदर्शन में जितना शारीरिक बनावट का महत्व है, उससे कहीं ज्यादा मानसिकता का है। जमुनियाँ इसे अच्छी तरह समझती चली गई कि कोई पुरुष हो कर भी लगातार स्त्री की धारणा में जिए तो उसकी प्रकृति और लक्षण लगभग नारीवादी ही हो जाता है।

सातो सिंह ने अब जरा मिलने-जुलने की शैली बदल दी। अनाज के बोरे भेजने होते तो जन-मजूर से भिजवा देते। अपने आते तो कोशिश करते किसी की नजरों पर न चढ़ें। मगर वे जमुनियाँ की नजरों से कैसे बचते? वह दोनों के बीच लाग-लपेट को और भी सघन होते देख कर आजिज आ गई और उसमें एक निराशा बढ़ती गई कि चोखे में मर्दपन लौटने की जगह औरतपन ही दिन व दिन बढ़ता जा रहा है। चोखे और सातो के बारे में जो चर्चा फैल गई थी, उस पर वह विश्वास नहीं करना चाहती थी, मगर अविश्वास करने की भी तो कोई ठोस वजह उसे नहीं मिल रही थी।

जैसे एक औरत प्रशंसा की चिरआकांक्षी होती है, उसी तरह यह चोखे भी अपने श्रृंगार की, सुंदरता की, नृत्य की एवं अपने गायन की वाहवाही सुनने के लिए सातो सिंह का एकदम मुरीद होता जा रहा था। जमुनियाँ को लगा कि कहीं वह कल सातो सिंह के एहसानों के बोझ से इतना न दब जाए कि उसे भी उपहार में परोस दे। उसकी ओर कुछ उँगलियाँ इस आशंका को सोच कर उठने भी लगी थीं। जिंदगी तो ऐसे ही बेरंगत हो गई है, ऐसी नौबत आ गई तब तो पूरा नर्क ही बन जाएगी। उसने तय किया कि अभी उसके सामने पूरा जीवन पड़ा है, इसके पहले कि और देर हो जाए, उसे रास्ता बदल लेना चाहिए... और वह चोखे को सदा-सदा के लिए छोड़ कर चली गई।

चोखे के लिए यह एक गहरा झटका था। वह घर में हर काम के लिए जमुनियाँ पर पूरी तरह आश्रित और अपने सारे क्रिया-कलाप में उसकी उपस्थिति का अभ्यस्त हो गया था। उसका अपनापन, उसकी मासूमियत, उसकी सहृदयता, उसके स्त्रियोचित व्यवहार और गृहिणीपन उसे उत्साहित और गतिशील रखने में बहुत मदद करते थे।

भाइयों ने बहुत पहले उसे तब अलग कर दिया था जब लाख मना करने पर भी न मानने के बाद उन्हें लगने लगा कि नचनियाँ-बजनियाँवाले काम के कारण समाज उन्हें दुरदुराहट की नजर से देखने लगा है। जमुनियाँ के रहने से भाइयों का अलग होना उसे कुछ खास नहीं अखरा था। मगर अब जब वह भी उसे ठुकरा गई, लगा कि जैसे किसी ने उससे उत्सव छीन कर हाथ में मातम पकड़ा दिया। सातो सिंह ने उसकी अधीरता को यों थामने की कोशिश की जैसे किसी धराशायी होनेवाली लतर को रसरी का सहारा मिल जाता है। उन्होंने कहा, 'तुम्हारा नहीं, उसका दुर्भाग्य था चोखे जो तुम्हारे जैसे हीरे को वह पहचान नहीं पाई। इस दुनिया में लड़कियों की कोई कमी नहीं है, बहुत ऐसे बाप मिल जाएँगे जो अपनी बेटी के लिए वर ढूँढ़ने में अपने तलवे घिस-घिस कर पस्त हो गए होंगे। देखना, तुम्हें जमुनियाँ से भी सुंदर और सुघड़ लड़की मिल जाएगी। तुम भरोसा रखो।'

चोखे ने भरोसा कर लिया... सातो सिंह जब कहते हैं तो वह निराधार हो ही नहीं सकता।

तलाश होने लगी... अच्छी, सुघड़, सुंदर... एक भी न मिली। चोखे का नाम-ग्राम सुनते ही काम वे जान जाते और उनके मुँह पर इनकार का कपाट लग जाता। इसके बाद थोड़ी कुरूप, कामचलाऊ और मंद बुद्धि पर भी सुलह कर लेने की राय बनी, इस पर भी कोई तैयार नहीं। कोई विकलांग लड़की मिल जाए तो चलो वह भी चलेगी... घर और चौका ही तो सँभालना है। अब भी कोई तैयार नहीं। सबका तात्पर्य यही था कि ऐसे आदमी से रिश्ता करने से क्या फायदा जो कोई काम नहीं करता, सिर्फ नाचता-गाता है और जो मर्द कम और औरत ज्यादा है।

अंततः चोखे इस फैसले पर पहुँच गया कि दुनिया में लड़कियों की कोई कमी नहीं है तो ऐसा भी नहीं है कि वह हर किसी के लिए आसानी से उपलब्ध है। ठीक वैसे ही जैसे दुनिया में दौलत की भी कोई कमी नहीं है, कुदरत ने बेइंतहा नियामतें बख्शी हैं, फिर भी ज्यादातर देश और ज्यादातर आदमी गरीब हैं और गिने-चुने देश एवं लोग ही दौलतमंद हैं।

चोखे को अब सातो सिंह के सान्निध्य की तलब और भी बढ़ गई थी। उसे अब घर में रहने का जरा भी मन नहीं होता और इच्छा होती कि बिना नागा उसे कार्यक्रम मिले जिसमें वह पूरी तरह खुद को खपा दे।

लौंडानाच का उम्र से और शरीर से सीधा ताल्लुक होता है। यौवन ज्योंही उतरने लगा कि चाहनेवालों की संख्या घटने लगी। उम्र जहाँ 28-30 तक हुई कि न वो तेजी रह गई और न वो चमक। चोखे ने देखा कि दाढ़ी बनाने के बाद भी उसका स्याहपन गाढ़े मेकअप के बावजूद छुप नहीं पाता। कपोलों की कसी हुई त्वचा भी ढीली हो गई और गले में भी जो एक खनक थी वो एक भारीपन में बदल गई। सातो सिंह पहले ही उसे सावधान कर चुके थे, 'एक नाचनेवाले के नाचने की मियाद ज्यादा से ज्यादा आठ-दस साल होती है, इसलिए जितना कुछ करना है चोखे, इसी बीच कर लो।'

उन्होंने आगे कहा था, 'जमाना भी बहुत तेजी से करवट ले रहा है, कल हो सकता है लोग नाच की जगह टीवी, वीडियो या सीडी चलाने को ज्यादा बेहतर समझने लगें।'

ठीक यही हुआ... गाँव में नौटंकी का प्रचलन दम तोड़ने लगा। पहले प्रायः गाँवों में साल में एक या दो बार तीन-चार रातों के लिए नौटंकी जरूरी होती थी और उसमें लौंडा नाच एक अनिवार्य फिलर के रूप में इस्तेमाल होता था। चोखे ने कुछ गाँवों में अपनी ऐसी जगह बना ली थी कि नौटंकी की तैयारी ढीली-ढाली भी हो तो अपने नृत्य से वह रात को यादगार बना देता था। उसे याद पड़ता है कि कई लड़के-लड़कियाँ इतने रीझ जाते थे उस पर कि अपना कुछ भी निछावर करने के लिए तैयार हो जाते थे। भीखू गाँव में मुखिया की एक लड़की थी। वह उसके इस गाने पर 'अँचरा भींज गइले नैना के नीर से, ना जाने कउना पीर से ना' इतना सम्मोहित हो गई थी कि अपने हाथ से सोने का कंगन उतार कर उसके हाथों में पहना दिया था। बिटरुआ गाँव के एक लड़के ने उसे एक जापानी कैमरा दे दिया था और कहा था, 'आप अपना हर प्रोग्राम का फोटो खिंचवाना और मुझे उसकी एक-एक कॉपी भिजवा देना। आप एक बहुत बड़ी हस्ती हो दोस्त। आनेवाले समय में आपके ये फोटो संग्रहालय में रखने लायक एक धरोहर बन जाएँगे।'

चोखे को अपने बारे में ऐसे ऊँचे ख्यालात पर हँसी आ गई थी। जहाँ इस काम को ही ज्यादातर लोग दोयम दर्जे का समझते हों, वहाँ लोग कल उसे याद करेंगे?

एक और सम्मान उसकी स्मृति में खुद गया था। जैतपुर गाँव में एक किसान ने उसे अपनी एक बाछी दे दी थी और कहा था, 'यह बाछी गाय बन कर तुम्हें वर्षों दूध पिलाए और तुम स्वस्थ रह कर सालों-साल अपने नाच-गाने के फन से हम किसानों के दुखदर्द को कम करते रहो।'

काश, ऐसा हो पाता और उसका क्रेज इसी तरह बना रहता। मगर एक तो देशकाल ने अपना नया अध्याय शुरू कर दिया... और दूसरा उम्र ने अपना जलवा दिखा दिया। आमंत्रण कम होता गया और उसकी अदाकारी फीकी होती गई। एक दौर ऐसा आ गया कि वह एकदम बेकाम हो गया। दर्शक गुम हो गए, साजिंदे चले गए... सिर्फ साज रह गए उसकी बेबसी पर मातमी धुन गाने के लिए। सातो सिंह से भी संपर्क विरल होता गया और दूरी बढ़ती गई। सातो एक बेअख्तियार पड़ाव पर आ गए थे। जब उनका अख्तियार था तो अपने मन की चला लेते थे। अब बेटों ने उन्हें अनुशासन के सख्त दायरों में रहने के लिए विवश कर दिया था।

चोखेलाल भी अब इतना असहाय हो गया कि उसे अपने भतीजों की शरण में जाना पड़ गया।

एक दिन बिटरुआ गाँव का वह लड़का, जिसने उसे कैमरा दिया था, चोखे को ढूँढ़ते हुए उसके गाँव आया। उसने कहा था कि उसके काम और नाम संग्रहालय में रखने की पात्रता प्राप्त करेंगे। उसने देखा कि चोखेलाल जीते जी एक हास्यास्पद म्यूजियम में बदल गया है। खेत में गेहूँ की कटनी चल रही थी। वह हँसुए से गेहूँ काट रहा था। थोड़ी ही देर में वह पसीने से तरबतर हो कर हाँफने लगा और पास ही में एक मेड़ पर स्थित पीपल की छाँव में आ कर बैठ गया। छाँव में बहुत लोग बैठे थे... कुछ राहगीर और कुछ आसपास के खेतों में काम करनेवाले बनिहार। कैमरावाले लड़के को एक ग्रामीण अपने साथ ले कर यहाँ आ गया था। उसने ही इशारे से बताया कि यही है चोखेलाल। देख कर वह हैरान रह गया, बिना बताए उसे पहचानना मुश्किल था। वह सिर्फ हडि्डयों का एक ढाँचा भर रह गया था। कहाँ तो उसकी देह से एक समय बिजलियाँ किलकती थीं और गदराए-कसे जिस्म का आकर्षण दूर से ही खींच लेता था।

उसे छाँव में आता देख उसका भतीजा उसे डाँटने लगा, 'एक घंटा भी आपसे काम नहीं होता। काम कहाँ से होगा जिंदगी भर तो आपने कमर डोला कर मउगागिरी की? तब हवा में उड़ते थे। मजा लेने के लिए कोई लौंडेबाज जरा पीठ सहला देता था, बस आपका मिजाज आसमान में चढ़ जाता था। भाँड़-भड़ैती के काम में कुछ नहीं रखा है, सब कुछ गँवा देने के बाद यह आपको अब जा कर मालूम हुआ। आज कोई आपकी तरफ झाँकने भी नहीं आता। अंत में अपना ही परिवार काम में आया, नहीं तो खाने के लिए भी तरस जाते। इस बात को जरा समझिए और काम में मन लगाइए।'

चोखे ने कोई जवाब नहीं दिया, जैसे उसके कंठ में कोई आवाज ही न हो। कैमरावाले लड़के को लगा कि वह उसकी इस हालत पर फूट-फूट कर रो पड़े। जिस आदमी के गले में इतनी आवाज थी कि चार-चार घंटे तक लगातार गाता रहता था और सामने बैठे सैकड़ों लोग चुपचाप सुनते रहते थे... देश, दुनिया और समाज की कितनी ही बुराइयों और विकृतियों को वह अपने गाने का विषय बना लेता था, आज वह अपना ही बचाव करने में असमर्थ हो गया है और अपने लिए भी दो लाइन बोलने के लायक नहीं रह गया है।

कैमरावाले लड़के से रहा न गया। उसने उसके भतीजे को संबोधित किया, 'सुनो भाई! चोखेलाल को चाहनेवालों की आज भी कमी नहीं है, देखो, मैं आया हूँ इन्हें देखने। तुम इन्हें जिस तरह कोस रहे हो वह न्यायोचित नहीं है। तुम्हें शायद मालूम न हो कि इनकी यह दशा इसीलिए हो गई कि तुम जैसे जाहिलों और गँवारों के बीच ये फँस कर रह गए। अनाड़ियों ने इन्हें कोयला समझ लिया और इनकी परख करने के लिए जौहरी इन्हें मिला नहीं। इनमें वो सिफत थी कि बड़े घर में पैदा होते तो बिरजू महाराज बन जाते, जिसे भारत सरकार पद्मश्री से सम्मानित करती और कई बड़े शहरों में इनकी नृत्यशालाएँ चलतीं। इन्हें पंडित जी कह कर पुकारा जाता और इनसे सीखनेवालों की लाइनें लगी रहतीं। लोग इनसे सीख-सीख कर धन्य-धन्य महसूस करते। टीवी पर इनका गुणगान और इंटरव्यू प्रसारित होता, अखबारों में आए दिन इनके बयान छपते, इनकी छींक-खाँसी भी खबर बन जाती। बड़े मंचों पर इनका गायन होता और 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' में इनके भी चेहरे दिखाए जाते। अवसर और पहुँच का नाम बिरजू महाराज, लता मंगेशकर और किशोर कुमार होता है दोस्त, वरना इस देश में हजारों बिरजू महाराज, लता मंगेशकर और किशोर कुमार विभिन्न गलियों में, झोपड़ियों में, खोलियों में इसी तरह तुम जैसे अपने सगे लोगों द्वारा प्रताड़ित हो कर बर्बाद हो जाते हैं।'

विशाल पीपल की परिधि में जितने लोग बैठे थे उनमें अधिकांश आसपास के गाँवों के ही खेतिहर थे और वे चोखे को अच्छी तरह जानते थे। वे रोज भतीजों द्वारा उसके नाच-गाने को निशाना बना कर की जानेवाली दुत्कार-फटकार सुनने के अभ्यस्त हो गए थे। आज चोखे के पक्ष में किसी को बोलते सुन उन सबका ध्यान बरबस ही इधर खिंच गया। सबको अच्छा लगा कि आज भी चोखे की तरफदारी करनेवाले कुछ लोग मौजूद हैं। चोखे का भतीजा भी अचंभित आँखों से कैमरेवाले अजनबी लड़के को देखता रह गया था। जो बातें कही गई थीं उसके प्रतिवाद की औकात उसमें नहीं थी। उसने ताड़ लिया कि जो आदमी यह बात कह रहा है वह कोई मामूली आदमी नहीं है। दरअसल कैमरावाला लड़का अब लड़का नहीं बल्कि एक अच्छी डीलडौल और वेशभूषा में एक भरापूरा रौबदार व्यक्ति था, जिसके व्यक्तित्व में भव्यता और शिष्टता का समावेश स्पष्टतः महसूस किया जा सकता था।

उसने बेहद श्रद्धा भरी नजरों से चोखेलाल को निहारा और कोमलता से पुकारा, 'चोखेलाल जी, आपने मुझे पहचाना नहीं होगा... कहाँ पहचानेंगे, अब तो आप अपने-आपको भी शायद नहीं पहचानते। मैं बिटरुआ गाँव का लोचन प्रसाद हूँ। हर साल मैं नौटंकी में पाठ करता था। आपका घनघोर प्रशंसक था और अगर आपको याद हो तो मैंने आपको एक कैमरा दिया था।'

कुछ देर अपनी सूनी आँखों से उसे अपलक देखता रहा चोखेलाल। अनायास आँखें आँसुओं से डबडबा गईं, 'मुझे सब कुछ याद है लोचन भैया, मुझे सब कुछ याद है। मुझे जो कुछ मिला था, सब बिक गया, लेकिन तुम यकीन नहीं करोगे, उस कैमरे को मैंने आज तक बचा कर रखा है, चूँकि उस कैमरे को देते वक्त तुमने अपनी कल्पना से मेरे भविष्य का एक चित्र खींचा था, वह चित्र मैं भुलाए नहीं भूलता। कहो, कैसे आना हुआ, लगता है तुम कोई बड़ा आदमी बन गए हो।'

'बड़ा आदमी तो क्या बनूँगा चोखेलाल जी, हाँ एक अच्छी नौकरी मिल गई है। प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित हो कर एक प्रखंड का अधिकारी हो गया हूँ। मेरी बड़ी हसरत थी कि अपनी शादी में बड़े धूमधाम से आपका नृत्य करवाऊँ। शादी तय हो गई है। मैं पहले सातो सिंह जी के पास पहुँचा। उन्हें निमंत्रण कार्ड दिया। वे बहुत बूढ़े हो गए हैं। बेटों ने उनके कहीं भी आने-जाने पर सख्ती कर दी है। फिर भी उन्होंने कहा है कि अगर चोखे हाँ कर दें तो वे किसी भी तरह जरूर पहुँच जाएँगे। मगर यहाँ आपकी अवस्था देख कर लगता है यह संभव नहीं है।'

दोनों के संवाद को सभी बड़े ध्यान से सुन रहे थे, उसका भतीजा भी। चोखेलाल कुछ देर सोचता रहा, फिर कहा, 'मैं तुम्हारी शादी में नाचूँगा लोचन, तुम मुझे इसी वक्त अपने साथ ले चलो।'

वहाँ उपस्थित सारी आँखें ताज्जुब से फैली रह गईं। उसका भतीजा तो जैसे एकदम फनफना उठा, 'चाचा, अगर तुम गए तो सोच लो, दोबारा तुम्हारे लिए मेरे घर में कोई जगह नहीं होगी। किसी भी मदद के लिए घिघियाते-रिरियाते रहोगे, फिर भी मुझे कोई दया नहीं आएगी। एक टुकड़ा रोटी के लिए मोहताज हो जाओगे।'

चोखे ने इसे एकदम अनसुना कर दिया, जबकि लोचन एक असमंजस में घिर गया। चोखे ने अपने पैरों में स्फूर्ति भर कर कहा, 'चलो लोचन, जरा घर से साज-श्रृंगार ले लें।'

चोखे ने अपनी ढही-ढनमनाई कुठरिया से लोचन की जीप में हारमोनियम, तबला तथा अपने मेकअप का बक्सा लदवाया। बक्से में घुँघरू और तहाई हुई साड़ियाँ आदि रखी थीं। आगे की सीट पर वह बैठ गया तो लोचन ने जीप स्टार्ट कर दी। धूल उड़ाती हुई जीप चल पड़ी, गाँव के सारे लोग उसे जाते हुए देखते रहे, उसका भतीजा भी।

                                                                               ---जयनंदन---

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

पुस्तक मेले के मजे


दिल्ली में किसी भी आयोजन के साथ 'विश्व' शब्द जुड़ने का असर ठीक वैसा ही होता है जैसा किसी फिल्म के साथ मलाईका अरोड़ा या याना गुप्ता अथवा मल्लिका शहरावत के डांस आइटम के जुड़ जाने का होता है। वयस्क और उम्रदराज, सभी बच्चों की तरह ललचते हुए लपक पड़ते हैं। भले ही यह 'विश्व' भारत की सीमा पार के दो चार छोटे-बड़े देशों तक ही सीमित हो।

इस बार भी यही हुआ। विश्व पुस्तक मेले के आयोजन की घोषणा होते ही सारा परिवार बड़े मनोयोग से मेले से जुड़ी छोटी-बड़ी खबरों और सूचनाओं का आपस में आदान-प्रदान और विचार-विमर्श करने में जुट गया। किताबों के पास तक भी नहीं फटकने वाली श्रीमती जी और कोर्स से बाहर की किताबें भी पढ़ते रहने के मेरे अनुरोध को सुना-अनसुना करने वाले छोटे-बड़े बच्चों तक ने घोषणा कर दी कि पुस्तक मेला तो अवश्य देखना है।

कुछ रिश्तेदारों ने भी सूचना दी कि वैसे तो वे दिल्ली किन्हीं और कामों से आने वाले थे परन्तु अब वे अपने पधारने से समय में कुछ फेर-बदल कर पुस्तक मेले के दिनों में ही सपरिवार आने की सोच रहे हैं। कहीं सभी मेहमान साथ न आ धमकें की चिंता के बावजूद लोगों के ऊपर पुस्तक-प्रेम का ऐसा प्रभाव सुखद भी लगा। चलो दुनिया रसातल में जाते-जाते बच गई। वैसे इस विषय में मेरे पिछले अनुभव कोई खास अच्छे नहीं थे।

दिल्ली की विकट से विकट होती आवास समस्या के चलते जब भी मकान बदलना पड़ा तो पुस्तकों के प्रति सारे परिवार की उपेक्षा अपमान की सीमा छूने लगती थी। सबसे पहले तो उन सारी पुस्तकों को 'मेरी किताबों' के खाते में डाल दिया जाता था जो भागवत, मानस, हनुमान चालीसा और अन्य पतली-पतली व्रत-कथाओं जैसी पवित्र पुस्तकों के साथ रखने के अयोग्य होतीं। टेलीफोन डायरेक्टरी से लेकर रेलवे टाइम टेबुल तक वो सारा कुछ जो बच्चों की पाठ्य-पुस्तकों के इतर होता 'मेरी किताबों' के खाते में आता। डैनियल स्टील, सिडनी शैल्डन या मिल्स एंड बून्स जैसी महान परम्पराओं में नहीं आने वाला सारा साहित्य भी 'मेरी किताबों' की संज्ञा से विभूषित कर दिया जाता। ऊपर से आते-जाते धमकी भी प्रसारित होती रहती, 'अपनी किताबें-सिताबें पहले ही सँभालकर रख लेना बेहतर होगा, बाद में इधर-उधर खोजने में परेशान होते रहने से।' मजदूरों तक को किताबों के गट्ठरों से ही सबसे ज्यादा परेशानी होती। 'देखने में छोटे लेकिन उठाने में कितने भारी' जैसी भुनभुनाहटों के बीच ये गट्ठर बेमन से उठाए और बेरहमी से पटके जाते रहे हैं। बीच-बीच में व्यंग्य बाण भी - 'ट्रक वाला पूछ रहा था, क्या रद्दी भी साथ चलेगी?' नए मकान में सब कुछ व्यस्थित ढंग से रखने के बाद बचे हुए खाली कोनों और कुछ भीतर की दीवारों को उदारतापूर्वक किताबों के लिए निर्धारित कर दिया जाता। खैर, यह सब तो इतिहास हो चुका है।

वर्तमान प्रसंग में सबसे पहला अहम प्रश्न था, पुस्तक मेला घूमने के लिए उचित दिन निर्धारित करना। पहला दिन तो इसलिए स्वीकार्य नहीं था कि अधिकतर स्टॉल, विशेषकर विदेशी स्टॉल, उस दिन तक ठीक से लगाए जा रहे होते हैं। दूसरा दिन श्रीमती जी को स्वीकार्य नहीं था क्योंकि बच्चों के मामा सपरिवार उस दिन शाम तक पधारने वाले थे। और बच्चे तीसरे दिन से ज्यादा प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं थे। पुस्तकों के प्रति उनकी यह उतावली मन को अच्छी लगी। यह रहस्य तो बाद में खुला कि इस उतावलेपन का कारण विदेशी स्टॉलों में किताबों के अलावा बिकने वाली अन्य आकर्षक चीजों के समाप्त होने का भय था। तो इस प्रकार तीसरा दिन सर्वसम्मति से चुन लिया गया और मेरे लिए निर्देश जारी कर दिए गए। निर्देशानुसार मुझे उस दिन पुस्तक मेले में केवल परिवार के लिए जाना था। अर्थात उनकी मर्जी के ही स्टॉलों पर घूमना था। ये नहीं कि अपनी पसंद के स्टॉल में घुसे और घंटों लगा दिए या मित्रों के मिलने पर उनसे गपियाने में मगन हो गए।

तीसरे दिन की सुबह आश्चर्यजनक ढंग से अनुशासित और स्फूर्ति से भरी सुबह थी। दस बार जगाने पर जगने वाले और नाश्ते में तरह-तरह के नखरे करने वाले बच्चे समय से जगकर ब्रेड-बटर के नाश्ते से संतुष्ट हो नौ बजते न बजते चलने के लिए प्रस्तुत थे। मामाजी का परिवार भी एकदम चाकचौबन्द नजर आ रहा था। अन्य दिनों विकट लगने वाली समस्याएँ, जैसे बस और मेट्रो की भयंकर भीड़, दूर तक पैदल चलना, टिकट की लंबी कतार आदि, परिवार के सदस्यों के उत्साह और उमंग के समक्ष वैसे ही तिरोहित हो गईं जैसे महँगाई की बाढ़ में किसी मध्यवित्त परिवार का बजट।

मेले में घुसते ही मानो किसी अदृश्य डोर से नियंत्रित सबके कदम अपने आप पुस्तक स्टॉलों की विपरीत दिशा में मुड़कर फूड कोर्ट की तरफ अग्रसर हो गए, जैसे यह सब पहले से तय हो। स्पष्ट था कि उपलब्ध खाद्य-सामग्री के विषय में बड़े मनोयोग से होम-वर्क किया गया था।

खाने के बाद घूमने की बारी आई। सभी एकमत थे विदेशी स्टॉलों को सबसे पहले देखने पर। करीब दो घंटे व्यतीत करने के बाद जब हम लोग बाहर निकले तो सबके हाथों में कुछ न कुछ था तो अवश्य पर वह निश्चित रूप से किताबों से इतर था। अब बच्चों का आग्रह उन स्टॉलों की तरफ चलने का था जहाँ तरह-तरह के गेमों और कॉमिकों की किताबें उपलब्ध थीं। उन्हें मेरे हवाले करते हुए श्रीमती जी अपने भाई-भाभी के साथ ज्योतिष शास्त्र वाले हॉल की तरफ रवाना हुईं। दो-ढाई घंटों के बाद जब दोनों दल मिले तो जहाँ बच्चों के हाथों में कॉमिकों की किताबें, तरह-तरह की रबर-पेंसिलें, पेन और गेम थे वहीं उनके मामा-मामी के पास कितनी तरह के ताबीज, गण्डे, बुरी नजर दूर करने के लिए घरों में इधर-उधर टाँगे-ठोंके जाने वाली खिलौनों से सामग्री और 'अपना भाग्य स्वयं जानें', 'घर को वास्तु के अनुसार कैसे सजाएँ' जैसे विषयों पर कुछ अमूल्य ग्रंथ थे। इस बीच सबकी भूख फिर चमक आई थी और तरह-तरह के खाद्य पदार्थ बेचती दुकानों की तरफ सबके कदमों का मुड़ना परम आवश्यक। भोजनोपरान्त कॉफी की आखिरी घूँट भरते हुए श्रीमती जी ने फरमाया, 'उफ, किताबें देखते-देखते तो मन भर गया, अब दूसरी तरफ चलते हैं।' दूसरी तरफ यानी कपड़े, नकली गहने, जूते, सैंडिल और तरह-तरह की श्रृंगार सामग्री से भरी दुकानें। इनमें घूमते-घूमते जब बच्चों ने संध्या में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों पर विचार विमर्श आरंभ किया तो हमें दिन बीत जाने का आभास हुआ।

और इस तरह सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अवलोकन और रात का भोजन भी मेले में करते हुए परम संतुष्टि के साथ मेरा पुस्तक प्रेमी परिवार विश्व पुस्तक मेले में पिकनिक मना घर लौटा।

                                                                                       ---उपेंद्र कुमार---

प्रायश्चित


जीवन वाटिका का वसंत, विचारों का अंधड़, भूलों का पर्वत, और ठोकरों का समूह है यौवन। इसी अवस्था में मनुष्य त्यागी, सदाचारी, देश-भक्त एवं समाज-भक्त भी बनते हैं, तथा अपने खून के जोश में वह काम कर दिखाते हैं, जिससे कि उनका नाम संसार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिख दिया जाता है, तथा इसी आयु में मनुष्य विलासी, लोलुपी और व्यभिचारी भी बन जाता है, और इस प्रकार अपने जीवन को दो कौड़ी का बनाकर पतन के खड्ड में गिर जाता है, अंत में पछताता है, प्रायश्चित करता है, परंतु प्रत्यंचा से निकाला हुआ बाण फिर वापस नहीं लौटता, खोई हुई सच्ची शांति फिर कहीं नहीं मिलती।

मणिधर सुन्दर युवक था। उसके पर्स (जेब) में पैसा था और पास में था नवीन उमंगों से पूरित हृदय। वह भोला-भाला सुशील युवक था। बेचारा सीधे मार्ग पर जा रहा था, यारों ने भटका दिया - दीन को पथ-हीन कर दिया। उसे नित्य-प्रति कोठों की सैर कराई, नई-नई परियों की बाँकी झाँकी दिखाई। उसके उच्चविचारों का उसकी महत्वकाक्षांओं का अत्यन्त निर्दयता के साथ गला घोंट डाला गया। बनावटी रूप के बाजार ने बेचारे मणिधर को भरमा दिया। पिता से पैसा माँगता था वह, अनाथालयों में चन्दा देने के बहाने और उसे आँखें बंद कर बहाता था, गंदी नालियों में, पाप की सरिता में, घृणित वेश्यालयों में।

ऐसी निराली थी उसकी लीला। पंडित जी वृद्ध थे। अनेक कन्याओं के शिक्षक थे। वात्सल्य प्रेम के अवतार थे। किसी भी बालिका के घर खाली हाथ न जाते थे। मिठाई, फल, किताब, नोटबुक आदि कुछ न कुछ ले कर ही जाते थे तथा नित्यप्रति पाठ सुनकर प्रत्येक को पारितोषिक प्रदान करते थे। बालिकाएँ भी उनसे अत्यन्त हिल-मिल गई थीं। उनके संरक्षकगण भी पंडित जी की वात्सल्यता देख गदगद हो जाते थे। घरवालों के बाद पंडित जी ही अपनी छात्राओं के निरीक्षक थे, संरक्षक थे। बालिकाएँ इनके घर जातीं, हारमोनियम बजाती, गाती, हँसती, खेलती, कूदती थीं। पंडितजी इससे गदगद हो जाते थे तथा बाहरवालों से प्रेमाश्रु ढरकाते हुआ कहा करते, ''इन्हीं लड़कियों के कारण मेरा बुढ़ापा कटता चला जा रहा है। अन्यथा अकेले तो इस संसार में मेरा एक दिवस भी काटना भारी पड़ जाता।'' समस्त संसार पंडितजी की एक मुँह से प्रशंसा करता था।

बाहरवालों को इस प्रकार ठाट दिखाकर पंडितजी दूसरे ही प्रकार का खेल खेला करते थे। वह अपनी नवयौवना सुन्दर छात्राओं को अन्य विषयों के साथ-साथ प्रेम का पाठ भी पढ़ाया करते थे, परन्तु वह प्रेम, विशुद्ध प्रेम नहीं, वरन प्रेम की आड़ में भोगलिप्सा की शिक्षा थी, सतीत्व विक्रय का पाठ था। काम-वासना का पाठ पढ़ाकर भोली-भाली बालिकाओं का जीवन नष्ट कराकर दलाली खाने की चाल थी, टट्टी की आड़ में शिकार खेला जाता था। पंडित जी के आस-पास युनिवर्सिटी तथा कालेज के छात्र इस प्रकार भिनभिनाया करते थे, जिस प्रकार कि गुड़ के आस पास मक्खियाँ। विचित्र थे पंडितजी और अद्भुत थी उनकी माया।

रायबहादुर डॉ. शंकरलाल अग्निहोत्री का स्थान समाज में बहुत ऊँचा था। सभा-सोसाइटी के हाकिम-हुक्काम में आदर की दृष्टि से देखे जाते थे वह। उनके थी एक कन्या - मुक्ता। वह हजारों में एक थी - सुन्दरता और सुशीलता दोनों में। दुर्भाग्यवश वृद्ध पंडितजी उसे पढ़ाने के लिए नियुक्त किए गए। भोली-भाली बालिका अपने आदर्श को भूलने लगी। पंडित जी ने उसके निर्मल हृदय में अपने कुत्सित महामंत्र का बीजारोपण कर दिया था। अन्य युवती छात्राओं की भाँति मुक्ता भी पंडित जी के यहां 'हारमोनियम' सीखने जाने लगी।

पंडितजी मुक्ता के रूप लावण्य को किराए पर उठाने के लिए कोई मनचला पैसे वाला ढूँढ़ने लगे। अंत में मणिधर को आपने अपना पात्र चुन लिया। नई-नई कलियों की खोज में भटकने वाला मिलिन्द इस अपूर्व कली का मदपान करने के लिए आकुलित हो उठा। इस अवसर पर पंडितजी की मुट्ठी गर्म हो गई। दूसरे ही दिवस मणिधर को पंडित जी के यहाँ जाना था। वह संध्या अत्यन्त ही रमणीक थी। मणि ने उसे बड़ी प्रतीक्षा करने के पश्चात पाया था। आज वह अत्यन्त प्रसन्न था। आज उसे पंडितजी के यहाँ जाना था।... वह लम्बे-लम्बे पग रखता हुआ चला जा रहा था पंडितजी के पापालय की ओर। आज उसे रुपयों की वेदी पर वासना-देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि चढ़ानी थी।

मुक्ता पंडितजी के यहाँ बैठी हारमोनियम पर उँगलियाँ नचा रही थी, और पंडितजी उसे पुलकित नेत्रों से निहार रहे थे। वह बाजा बजाने में व्यस्त थी। साहसा मणिधर के आ जाने से हारमोनियम बंद हो गया। लजीली मुक्ता कुर्सी छोड़कर एक ओर खड़ी हो गई। पंडितजी ने कितना ही समझाया, ''बेटी ! इनसे लज्जा न कर, यह तो अपने ही हैं। जा, बजा, बाजा बजा। अभ्यागत सज्जन के स्वागत में एक गीत गा।'' परन्तु मुक्ता को अभी लज्जा ने न छोड़ा था। वह अपने स्थान पर अविचल खड़ी थी, उसके सुकोमल मनोहारी गाल लज्जावश 'अंगूरी' की भाँति लाल हो रहे थे, अलकें आ-आकर उसका एक मधुर चुम्बन लेने की चेष्टा कर रही थीं। मणिधर उस पर मर मिटा था। वह उस समय बाह्य संसार में नहीं रह गया था। यह सब देख पंडितजी खिसक गए। अब उस प्रकोष्ठ में केवल दो ही थे।

मणिधर ने मुक्ता का हाथ पकड़कर कहा, ''आइए, खड़ी क्यों हैं। मेरे समीप बैठ जाइए।'' मणिधर धृष्ट होता चला जा रहा था। मुक्ता झिझक रही थी, परन्तु फिर भी मौन थी। मणिधर ने कहा - ''क्या पंडितजी ने इस प्रकार आतिथ्य सत्कार करना सिखलाया है कि घर पर कोई पाहुन आवे और घरवाला चुपचाप खड़ा रहे... शुभे, मेरे समीप बैठ जाइये।'' प्रेम की विद्युत कला दोनों के शरीर में प्रवेश कर चुकी थी। मुक्ता इस बार कुछ न बोली। वह मंत्र-मुग्ध-सी मणि के पीछे-पीछे चली आई तथा उससे कुछ हटकर पलंग पर बैठ गई। ''आपका शुभ नाम ?'' मणि ने जरा मुक्ता के निकट आते हुए कहा। ''मुक्ता।'' लजीली मुक्ता ने धीमे स्वर में कहा।

बातों का प्रवाह बढ़ा, धीरे-धीरे समस्त हिचक जाती रही। और.. और !! थोड़ी देर के पश्चात मुक्ता नीरस हो गई, उसकी आब उतर गई थी।

''हिजाबे नौं उरुमा रहबरे शौहर नबी मानद, अगर मानद शबे-मानद शबे दीगर नबीं मानद।''

हिचक खुल गई थी। मणि और मुक्ता का प्रेम क्रमशः बढ़ने लगा था। मणि मिलिन्द था, पुष्प पर उसका प्रेम तभी ही ठहर सकता है, जब तक उसमें मद है, परन्तु मुक्ता का प्रेम निर्मल और निष्कलंक था। वह पाप की सरिता को पवित्र प्रेम की गंगा समझकर बेरोक-टोक बहती ही चली जा रही थी। अचानक ठोकर लगी। उसके नेत्र खुल गए। एक दिन उसने तथा समस्त संसार ने देखा कि वह गर्भ से थी।

समाज में हलचल मच गई। शंकरलाल जी की नाक तो कट ही गई। वह किसी को मुँह दिखाने के योग्य न रह गए थे - ऐसा ही लोगों का विचार था। अस्तु। जाति-बिरादरी जुटी, पंच-सरपंच आए। पंचायत का कार्य आरम्भ हुआ। मुक्ता के बयान लिए गए। उसने आँसुओं के बीच सिसकियों के साथ-साथ समाज के सामने सम्पूर्ण घटना आद्योपांत सुना डाली - पंडितजी का उसके भोले-भाले स्वच्छ हृदय में काम-वासना का बीजारोपण करना, तत्पश्चात उसका मणिधर से परिचय कराना आदि समस्त घटना उसने सुना डाली। पंडितजी ने गिड़गिड़ाते अपनी सफाई पेश की तथा मुक्ता से अपनी वृद्धावस्था पर तरस खाने की प्रार्थना की। परंतु मणिधर शान्त भाव से बैठा रहा।

पंचों ने सलाह दी। बूढ़ों ने हाँ में हाँ मिला दिया। सरपंच महोदय ने अपना निर्णय सुना डाला। सारा दोष मुक्ता के माथे मढ़ा गया। वह जातिच्युत कर दी गई। रायबहादुर के पिता की भी वही राय थी, जो पंचों की थी। मणिधर और पंडितजी को सच्चरित्रता का सर्टिफिकेट दे निर्दोषी करार दे दिया गया। केवल 'अबला' मुक्ता ही दुख की धधकती हुई अग्नि में झुलसने के लिए छोड़ दी गई। अन्त में अत्यन्त कातर भाव से निस्सहाय मुक्ता ने सरपंच की दोहाई दी - उसके चरणों में गिर पड़ी। सरपंच घबराए। हाय, भ्रष्टा ने उन्हें स्पर्श कर लिया था। क्रोधित हो उन्होंने उस गर्भिणी, निस्सहाय, आश्रय-हीना युवती को धक्के मार कर निकाल देने की अनुमति दे दी। उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए हिन्दू समाज को वास्तव में पतन के खड्ड में गिराने वाले, नरराक्षस, खुशामदी टट्टू 'पीर बवर्ची, भिस्ती, खर' की कहावत को चरितार्थ करने वाले इस कलंक के सच्चे अपराधी पंडितजी तत्क्षण उठे, उसे धक्का मारकर निकालने ही वाले थे - अचानक आवाज आई - "ठहरो। अन्याय की सीमा भी परिमित होती है। तुम लोगों ने उसका भी उल्लंघन कर डाला है।'' लोगों ने नेत्र घुमाकर देखा, तो मणिधर उत्तेजित हो निश्चल भाव से खड़ा कह रहा था, ''हिन्दू समाज अंधा है, अत्याचारी है एवं उसके सर्वेसर्वा अर्थात हमारे 'माननीय' पंचगण अनपढ़ हैं, गँवार हैं, और मूर्ख हैं। जिन्हें खरे एवं खोटे, सत्य और असत्य की परख नहीं वह क्या तो न्याय कर सकते हैं और क्या जाति-उपकार ? इसका वास्तविक अपराधी तो मैं हूँ। इसका दण्ड तो मुझे भोगना चाहिए। इस सुशील बाला का सतीत्व तो मैंने नष्ट किया है और मुझसे भी अधिक नीच है यह बगुला भगत बना हुआ नीच पंडित। इस दुराचारी ने अपने स्वार्थ के लिए न मालूम कितनी बालाओं का जीवन नष्ट कराया है - उन्हें पथभ्रष्ट कर दिया है। जिस आदरणीय दृष्टि से इस नीच को समाज में देखा जाता है वास्तव में यह नीच उसके योग्य नहीं, वरन यह नर पशु है, लोलुपी है, लम्पट है। सिंह की खाल ओढ़े हुए तुच्छ गीदड़ है-रँगा सियार है।''

सब लोग मणिधर के ओजस्वी मुखमंडल को निहार रहे थे। मणिधर अब मुक्ता को सम्बोधित कर कहने लगा, ''मैंने भी पाप किया है। समाज द्वारा दंडित होने का वास्तविक अधिकारी मैं हूँ। मैं भी समाज एवं लक्ष्मी का परित्याग कर तुम्हारे साथ चलूँगा। तुम्हें सर्वदा अपनी धर्मपत्नी मानता हुआ अपने इस घोर पाप का प्रायश्चित करूँगा। भद्रे, चलो अब इस अन्यायी एवं नीच समाज में एक क्षण भी रहना मुझे पसंद नहीं... चलो।'' मणिधर मुक्ता का कर पकड़कर एक ओर चल दिया, और जनता जादूगर के अचरज भरे तमाशे की नाई इस दृश्य को देखती रह गई।

                                                                           ---अमृतलाल नागर---

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

समय के दो भाई


पता नहीं कौन से समय की बात है कि उसके दो भाई थे। पहले का पुकार नाम बड़े था और दूसरे का - बहुत बड़े। दोनों अमीरजादे, ख्याली, शराबी और आलसी थे। इसलिए चिंतक भी। ये दोनों भाई शराब की ही नींद उठते थे। सुबह का कुल्ला बीयर से और निबटान आदि का काम सस्ती शराब से करते। स्नान करते हुए शराब की बाल्टी में दो बूँद डेटॉल डालना कभी जो भूले हों। किसी स्त्री को चूमते, हालाँकि ऐसे मौके जाहिलों की जिंदगी में कम ही आते हैं, तो उसके होठों या अन्य जगहों पर शराब की धार रख कर ही चूमते थे। पढ़ना लिखना इसलिए नहीं सीखा क्योंकि स्याही शराब नहीं थी।

दोनों के बोलते ख्यालों से संघातियों, पड़ोसियों के कान घायल हो चुके थे। पीने की कामना सँजोए लोग आते, पीते और इनकी खाम ख्यालियों से चोटिल होते। पहला घूँट अंदर जाते ही बहुत बड़े की आँखें मुँद जाती और ‘बड़े’ कागज, कलम, इंचटेप, रंगीन पेंसिल लेकर बैठ जाता। इनके पैसे से पीने वाले चापलूस इनकी मटमैली करतूत देखते।

इन दोनों लखेरों को बिरसे में इतनी जमीन मिली हुई थी कि हर दिन पीने के बाद नए नए कारखाने और उद्योग धंधे लगाते। योजनाओं की लकीर खींचने में माहिर हो चुके थे। पिनक में ‘बहुत बड़े’ कारोबार सुझाता और बड़े उसका नक्शा खींच कर दिखा देता। कारखाना लगाने के बाद मजदूरों के लिए घर बनाता। उन घरों को सस्ते ब्याज पर अपने ही मजदूरों को बेचता। बाद के दिनों में कारखाने से नजदीक ही बड़े बड़े फ्लैट भी बनाए। उनके आजू बाजू जो तरणताल बनाए। उसमें हंस, बत्तख और दुनिया की सभी रंगीन मछलियाँ भी रख आए। इससे जो मुनाफा हुआ उससे उन्होने खूब सारी शराब खरीदी। वो शराब उन साथियों को पिलाई जो वहाँ बैठे उनका ख्यालनामा सुन रहे थे।

शराब की लत तो धर्म जैसी ही बुरी होती है।

धीरे धीरे शराब ने अपना रंग दिखाया। इनके लिए वो कम पड़नी शुरु हुई। पीने का आलम यह था कि अपना पैमाना भर लेने के बाद दूसरे पैमानों पर नजर रखते। जैसे ही कोई अंजान या दुखियारा अपनी ग्लास नीचे रखता, दोनों भाई उसे गटक जाते। दुखियारा अपना सा मुँह भी नहीं रख पाता था।

वो हर सुबह सोचते, किसी तीसरे पियाक को आमंत्रित नहीं करेंगे। तैयारी करते, आज से सारा काम खुद ही करना है। शाम होते न होते दोनों कुछ घूँट से गला खंगाल कर सोचते, सलाद कौन काटेगा? चखना कौन बनाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण यह कि किसिम किसिम के पैग कौन बनाएगा? इसलिए, शराब कम पड़ जाने की कीमत पर भी लालची शराबियों को जमा कर लेते और फिर शराब और ख्याली पुलावों का दौर शुरु होता।

जब से उनकी शराब कम पड़नी शुरु हुई उन्होने हर बार शराब के कारखाने सँजोए। नक्शा अलग होता और उससे बनने वाली शराब भी। बीच बीच में मजे लेने के लिए साथी पियक्कड़ भी दो चार राय उड़ेल देते। दीवाल शराब के रंग की होनी चाहिए। शराब की टंकियाँ अलमुनियम के नल से जुड़ी हों तो कितना अच्छा रहे। या ऐसी ही कोई सलाह। दोनों भाई साथियों के सलाह तब तक मन से सुनते जब तक शराब बची रहती।

ऐसा ही कोई अनगढ़ दिन रहा होगा कि इनके शराबी साथियों के साथ एक नया आदमी चला आया था। नौउम्र ही था और इनकी कारस्तानियों से नावाकिफ था। दौर शुरु हुआ। पहले या दूसरे पैग के बाद जहाँ दोनों भाइयों ने शराब का कारखाना लगाना शुरु किया वह इस नए आदमी की बस्ती से सटे हुए मैदान पर था। उसे यह सारा जतन अजूबा अजूबा लगा। शराब के कारखाने की बात से उसे आश्चर्य कम हँसी अधिक आ रही थी। चूँकि नया नया था इसलिए दोनों भाइयों की बातों के चक्कर में उसे सारा कुछ सच में तब्दील होता लगा। लगा कि शराब के कारखाने से उसकी बस्ती न उजड़े तो बाकी चीजें बर्दाश्त की जा सकती हैं। इन ख्यालों में खोने से पीने की उसकी गति कम हो गई थी।

इधर दोनों भाइयों ने शराब का कारखाना लगा तो लिया था पर वहाँ तक पहुँचने के रास्ते में बस्ती आ रही थी। गटागट पीते हुए बहुत बड़े ने सुझाया, अगर बस्ती वालों को कारखाने की मजदूरी दे दें तो वो शायद जमीन छोड़ दें। यह सलाह सबको पसंद आई, सबने इशारे से हुँकारी भर दी। मुँह किसी ने नहीं खोला। वजह? पीने का क्रम रुक जाता। घूँट रोककर बोलना पड़ता और इतनी देर में मौजूद पियाक लोग सारी शराब खाली कर देते। नए साथी के साथ यह दिक्कत नहीं थी। उसने कुछ कहने के लिए ग्लास नीचे रखा तब तक बहुत बड़े ने व्यंग्य बाण छेड़ दिए, क्यों साहब, जो पीने में इतना धीरे हो वो जीवन में कितना होगा?

अपमानित नया साथी बोल पड़ा, जी, मैं पीकर आया हूँ। इस जवाब से चकित हो सबने एक स्वर में पूछा, कहाँ? कहाँ पी आए? नए साथी ने अपना समय लिया, घूँट भरकर बड़े की ओर इशारा करते हुए कहा, इनकी फैक्ट्री से। बहुत बड़े को इस जवाब पर यकीन नहीं हुआ। अपने को होश में लाने के लिए शराब से मुँह धोया और उसके ही छींटे मारे, पूछा, कब? नया आदमी का जवाब, शाम ही को तो।

उस रात दोनों भाइयों की नींद कहीं बह गई थी। बेचैन। करवट-करवट। आधी रात के वक्त बहुत बड़े ने कहा, अब? बड़े गुमसुम था। दो चार पहर बाद जो कुछ बोला उसे सुन कर बहुत बड़े जान गया कि यह उसके ही सवाल का जबाव था। बड़े ने कहा था, इधर हम प्यासे रहते आए और हमारे ही कारखाने से शराब चोरी होती रही। बहुत बड़े ने फिर पूछा, तब? तब क्या? दोनों ने एक साथ जवाब सोचा, इस तरह तो ये बस्ती वाले एक दिन सारी शराब पी जाएँगे।

दोनों आलसी भाइयों में जाने कहाँ से ऊर्जा भर गई थी। उन्होने पुलिस वालों को किराए पर उठाया और बस्ती को आग के हवाले कर दिया। बस्ती वाले नींद के सताए हुए थे, आग की मार कहाँ झेल पाते। भगदड़ - भगदड़। पल भर में आठों दिशाएँ लोगों से भर गई और बाकी बची दो दिशाएँ उनके शोर से। अगलगी के मुहाने से बाहर निकलते ही उन पर पुलिस की लाठियाँ पड़ रही थीं। बड़े और बहुत बड़े ने भी मोर्चा सँभाल रखा था। लोगों को पीट पीट कर पूछ रहे थे : और पियोगे शराब? चोर सब। और शराब पियो, सालों। पैर तो रखो कारखाने में, काट दिया जाएगा।

किसी ने अपने अंतर्मन में इस घटना या इन दो बदमाशों ‘बेचारों’ का समर्थन नहीं किया। सैकड़ों लोग जले थे। गरीबों के जीवन में बमुश्किल जुटे संसाधनों का भयानक नुकसान हुआ था। मीडिया के भले लाचार गुस्से में आकंठ डूबे हुए थे। वो तो दुनियादारी के तकाजे थे वरना सभी अखबार और मीडिया वालों ने इनकी इस जली हुई करतूत के खिलाफ मोर्चा कस लिया होता। इसलिए इस खबर को लिखने के बाद शहर का सबसे नामी पत्रकार दो मिनट अपने झूठ पर उदास हुआ, फिर यह सोच कर खुश हुआ कि जब वह इतना सफेद झूठ बोल सकता है तब वह अपनी किस्मत साहित्य में क्यों नहीं आजमाता। उसने खबर यह बनाई थी : दैवीय चमत्कार - काल्पनिक शराब फैक्ट्री में लगी आग से बस्ती स्वाहा।

सुनने में आया, कोतवाल साहब उन दोनों पर सख्त नाराज हैं और उन्हें बंद करना चाहते हैं पर वो क्या करें। बेचारे वचन से बँधे हुए हैं। वो दोनों बच्चे कोतवाल को मामा कह कर पुकारते हैं। हकीकत यह है, कोतवालिन ने बहुत बड़े की निगाहों में छुपे चोर का जिक्र नहीं किया कि जब वो कोतवालिन को मामी कहता है तो उसके ऐंठे हुए शब्दों से और निगाहों से कैसी दुर्गंध उठती है।

न्यायाधीश के गुस्से का भी पारावार नहीं था और वह खरा गुस्सा था। वो तो जैसे सचमुच उसी आग में जल आए थे। आज कहने वाले जो भी कहें पर न्यायाधीश साहब जानते हैं कि उनके मन में जल चुके लोगों के लिए क्षोभ और दया का भाव था। वो उन लोगों के लिए कुछ करना चाहते थे पर नहीं कर सके। जान पहिचान का दु:ख उन्हें साल रहा था, काश वो सारे अमीर उमरा अपरिचित होते तो सजा सुनाई जा सकती थी।

                                                                             ---चंदन पांडेय---

आप भी ‘ओ’ हैं


अनाज की पैदावार बढ़ी या नहीं यह तो ईश्‍वर जाने या मंहगाई, मगर हाकिमों की पैदावार का क्‍या कहना है। कोई ए.ओ., बी.ओ., सी.ओ. हैं तो कोई ए.बी.ओ., बी.सी.ओ, सी.डी.ओ. और न जाने कितने 'ओ' हैं कि अंग्रेजी की वर्णमाला के भी होश गुम हैं कि अब 'ओ' के साथ कौन-कौन-से अक्षर जोड़े जाएं। उस पर उसे यह भी परेशानी है कि सुनने वाले किस 'ओ' परिवार का कौन-सा मतलब निकालेंगे। जैसे एम.ओ. ही को ले लीजिए। इससे मेडिकल ऑफिसर भी हो सकता है और म्‍यूनिसिपल आफिसर, मलेरिया आफिसर, और मारकेटिंग आफिसर भी और घाते में मनीआर्डर भी समझना चाहें तो मजे में समझ सकते हैं।

खैर, समझने वाले जो चाहें समझा करें। इसकी फिक्र मिस्‍टर सी.एम गादुर को न थी जिन्‍हें लोग अपनी आसानी के मारे मिस्‍टर चिमगादर ही कहते थे।

वे थे तो वकील मगर जिस दिन से वे 'ओथ आफिसर' (शपथनामा अफसर) बना दिए गए, वे अपने नाम के आगे एक 'ओ' नहीं, डबल 'ओ' अर्थात 'ओ.ओ.' निहायत शान से लिखने लगे।

एक 'ओ' का नशा तो संभालना मुश्किल होता है तब भला डबल 'ओ' का नशा, जिसके आगे 'डबल एक्‍स' भी पानी-पानी हो जाता है, भला कैसे संभाला जा सकता है?

इसका नशा जो चढ़ा तो हजरत की आंखें ऐसी चढ़ गईं कि वह दुनिया अछूत बनकर इनकी निगाह में रसातल से भी नीचे गिर गई।

जब दुनिया ही नहीं तब मनुष्‍य कहां? इसलिए वे अब अपने को उस जाति का समझने लगे जो मनुष्‍यों से पृथक कभी देवताओं की थी और आकाश में रहती थी।

इनके लिए आकाश में रहना तो असंभव था इसलिए वे अपने दिमाग को आसमान में पहुंचाकर अपनी उच्‍च जातीयता का परिचय देने लगे। इस उच्‍चता को बनाए रखने के लिए मनुष्‍यों के सारे गुणों से - जैसे संवेदना, सहानुभूति, आत्‍मीयता, मधुरता, कोमलता, मिलनसारी, हंसना-बोलना, सबसे बुरी तरह घृणा करने लगे ताकि ऐसा न हो कि भूल से भी इन्‍हें कोई मनुष्‍य समझ ले। सलाम करना तो एकदम भूल गए। मगर सलाम लेना नहीं। क्‍योंकि यह तो उनका जातीय अधिकार था। चेहरे पर गंभीरता की इतनी मोटी पलस्‍तर चढ़ा ली कि कोशिश करने पर शायद जानवर भी हंस दें, मगर इनके मुंह पर हंसने के लिए सिकुड़न पड़ना बिलकुल असंभव था।

इसकी ट्रेनिंग की ये सब तपस्‍याएं झेल चुकने पर भी जिस किसी के पास अपनी बिरादरी का सदस्‍य समझकर वे बड़े उत्‍साह से लपकते थे वह इन्‍हें मुंह नहीं लगाता था। इस तरह वे न घर के रहे न घाट के। बस सचमुच चिमगादर ही बनकर रह गए।

इस साल एक नेताजी का लड़का वकालत पास किया था। नेताजी दुनिया को चराना खूब जानते थे। अपने लड़के को तुरंत ऊपर उछाल देने के लिए उन्होंने नगर के बड़े-बड़े लोगों की चाय-पार्टी कर दी जिसमें अधिकतर अफसरान ही थे।

मिस्‍टर सी.एम. गादुर अपने 'ओ ओ' के रक्षार्थ बिना बुलाए ही फटक पड़े और लगे नेताजी से शिकायत करने, 'वाह नेताजी! जब आपने सब अफसरों को निमंत्रित किया तब आप मुझे कैसे भूल गए? शायद आप नहीं जानते कि मैं ही अकेला इस नगर का 'ओ.ओ.' हूं।'

नेताजी रंग ताड़ते ही तपाक से बोले, 'अरे! वाह साहब, वह‍ कुर्सी देखिए, मैंने खास तौर से आप ही के लिए लगवा रखी है। यह और बात है कि निमंत्रण बांटने वाले को आप न मिले हों।'

खैर, बात बन गई। मान न मान मैं तेरा मेहमान बनकर वे अपनी बिरादरी में शामिल हो गए।

पार्टी में इनके साथी दो-चार वकील भी थे। मगर उन लोगों ने मेहमानों की खातिरदारी का भार ले रखा था। दौड़-दौड़कर सब मेजों पर सामग्री की कमी पूरी करते थे। मिस्‍टर सी.एम. गादुर अपनी उच्‍चता का प्रदर्शन करने के लिए उन्‍हें 'ए मिस्‍टर' कह कर कोई तश्‍तरी लाने को कहते थे जैसे वे उन्‍हें पहचानते ही न थे।

चाय-पानी की समाप्ति पर नेताजी अपने लड़के को साथ लिए एक-एक से इस तरह मिलाने लगे, 'देखो बेटा, आपका आशीर्वाद लो। आप एस.ओ. हैं - सप्‍लाई अफसर। आप ही की कृपा से दो सौ बोरी सीमेंट नसीब हुई थी। जिससे तुम्‍हारा वकालतखाना बना सका। आपका आशीर्वाद लो। आप एफ.ओ. हैं - फारेस्‍ट आफिसर। आप ही की कोशिशों से दस दरख्‍त शीशम के मिले थे जिनसे तुम्‍हारे फर्नीचर बनवाए हैं। आपका आशीर्वाद लो। आप सी.ओ. हैं - चकबंदी अफसर। आपका इजलास हर वक्‍त गर्म रहता है, आधी रात को भी चाहो मुकदमा करो...'

मिस्‍टर सी.एम गादुर बार-बार अपनी गर्दन उठा-उठाकर टाई ठीक करते हुए नेता जी को घूरते ही रहे। मगर सारे मेहमानों से मिलाने पर भी उनकी नजर इन पर न पड़ सकी। तब तो इनसे न रहा गया। कुर्सी खड़बड़ाकर इस तरह उठ खड़े हुए मानो जाने की तैयारी कर रहे हैं।

नेताजी ने चौंककर उनकी तरफ देखा और वहीं से बोले, 'अरे! आप कहां छिपे थे? मैं आप ही को ढूंढ़ रहा था। देखो बेटा, आप भी 'ओ' हैं।'

मिस्‍टर सी.एम. गादुर खड़े तो थे ही, जोरों से बोल उठे ताकि सब लोग सुन सकें, 'मैं खाली 'ओ' नहीं, मैं 'ओ.ओ.ओ.' हूं। इस नगर का आनली ओथ आफिसर (एकमात्र शपथनामा हाकिम)।'

कहीं से आवाज आई, 'अख्‍खा आप तीन हर्फ वाले हैं।' इसी के साथ एक प्रश्‍न भी गूंज उठा, 'तीन हर्फ कौन?'

जब तक कुछ स्‍कूली लड़के हाते के बाहर रुककर यह तमाशा देख रहे थे, एकाएक चिल्‍ला उठे, 'अरे! वही चे गैन दाल - चुगद।'

पार्टी इतने जोरों से खिलखिलाकर हंस पड़ी कि मिस्‍टर गादुर को मुंह छिपाकर वहां से भागने ही में कुशलता दिखाई पड़ी।

                                                                              ---जी.पी. श्रीवास्तव---

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

नमक का दारोगा


जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वरप्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड-छोडकर लोग इस विभाग की बरकंदाजी करते थे। इसके दारोगा पद के लिए तो वकीलों का भी जी ललचाता था।

यह वह समय था जब अंगरेजी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक ही वस्तु समझते थे। फारसी का प्राबल्य था। प्रेम की कथाएँ और शृंगार रस के काव्य पढकर फारसीदाँ लोग सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हो जाया करते थे।

मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लडाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्व की बातें समझते हुए रोजगार की खोज में निकले।

उनके पिता एक अनुभवी पुरुष थे। समझाने लगे, 'बेटा! घर की दुर्दशा देख रहे हो। ॠण के बोझ से दबे हुए हैं। लडकियाँ हैं, वे घास-फूस की तरह बढती चली जाती हैं। मैं कगारे पर का वृक्ष हो रहा हूँ, न मालूम कब गिर पडूँ! अब तुम्हीं घर के मालिक-मुख्तार हो।

'नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृध्दि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती हैं, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ।

'इस विषय में विवेक की बडी आवश्यकता है। मनुष्य को देखो, उसकी आवश्यकता को देखो और अवसर को देखो, उसके उपरांत जो उचित समझो, करो। गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ ही लाभ है। लेकिन बेगरज को दाँव पर पाना जरा कठिन है। इन बातों को निगाह में बाँध लो यह मेरी जन्म भर की कमाई है।

इस उपदेश के बाद पिताजी ने आशीर्वाद दिया। वंशीधर आज्ञाकारी पुत्र थे। ये बातें ध्यान से सुनीं और तब घर से चल खडे हुए। इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र, बुध्दि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलम्बन ही अपना सहायक था। लेकिन अच्छे शकुन से चले थे, जाते ही जाते नमक विभाग के दारोगा पद पर प्रतिष्ठित हो गए। वेतन अच्छा और ऊपरी आय का तो ठिकाना ही न था। वृध्द मुंशीजी को सुख-संवाद मिला तो फूले न समाए। महाजन कुछ नरम पडे, कलवार की आशालता लहलहाई। पडोसियों के हृदय में शूल उठने लगे।

जाडे के दिन थे और रात का समय। नमक के सिपाही, चौकीदार नशे में मस्त थे। मुंशी वंशीधर को यहाँ आए अभी छह महीनों से अधिक न हुए थे, लेकिन इस थोडे समय में ही उन्होंने अपनी कार्यकुशलता और उत्तम आचार से अफसरों को मोहित कर लिया था। अफसर लोग उन पर बहुत विश्वास करने लगे।

नमक के दफ्तर से एक मील पूर्व की ओर जमुना बहती थी, उस पर नावों का एक पुल बना हुआ था। दारोगाजी किवाड बंद किए मीठी नींद सो रहे थे। अचानक ऑंख खुली तो नदी के प्रवाह की जगह गाडियों की गडगडाहट तथा मल्लाहों का कोलाहल सुनाई दिया। उठ बैठे।

इतनी रात गए गाडियाँ क्यों नदी के पार जाती हैं? अवश्य कुछ न कुछ गोलमाल है। तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया। वरदी पहनी, तमंचा जेब में रखा और बात की बात में घोडा बढाए हुए पुल पर आ पहुँचे। गाडियों की एक लम्बी कतार पुल के पार जाती देखी। डाँटकर पूछा, 'किसकी गाडियाँ हैं।

थोडी देर तक सन्नाटा रहा। आदमियों में कुछ कानाफूसी हुई तब आगे वाले ने कहा-'पंडित अलोपीदीन की।

'कौन पंडित अलोपीदीन?

'दातागंज के।

मुंशी वंशीधर चौंके। पंडित अलोपीदीन इस इलाके के सबसे प्रतिष्ठित जमींदार थे। लाखों रुपए का लेन-देन करते थे, इधर छोटे से बडे कौन ऐसे थे जो उनके ॠणी न हों। व्यापार भी बडा लम्बा-चौडा था। बडे चलते-पुरजे आदमी थे। ऍंगरेज अफसर उनके इलाके में शिकार खेलने आते और उनके मेहमान होते। बारहों मास सदाव्रत चलता था।

मुंशी ने पूछा, 'गाडियाँ कहाँ जाएँगी? उत्तर मिला, 'कानपुर । लेकिन इस प्रश्न पर कि इनमें क्या है, सन्नाटा छा गया। दारोगा साहब का संदेह और भी बढा। कुछ देर तक उत्तर की बाट देखकर वह जोर से बोले, 'क्या तुम सब गूँगे हो गए हो? हम पूछते हैं इनमें क्या लदा है?

जब इस बार भी कोई उत्तर न मिला तो उन्होंने घोडे को एक गाडी से मिलाकर बोरे को टटोला। भ्रम दूर हो गया। यह नमक के डेले थे।

पंडित अलोपीदीन अपने सजीले रथ पर सवार, कुछ सोते, कुछ जागते चले आते थे। अचानक कई गाडीवानों ने घबराए हुए आकर जगाया और बोले-'महाराज! दारोगा ने गाडियाँ रोक दी हैं और घाट पर खडे आपको बुलाते हैं।

पंडित अलोपीदीन का लक्ष्मीजी पर अखंड विश्वास था। वह कहा करते थे कि संसार का तो कहना ही क्या, स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है। उनका यह कहना यथार्थ ही था। न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं नचाती हैं। लेटे ही लेटे गर्व से बोले, चलो हम आते हैं। यह कहकर पंडितजी ने बडी निश्ंचितता से पान के बीडे लगाकर खाए। फिर लिहाफ ओढे हुए दारोगा के पास आकर बोले, 'बाबूजी आशीर्वाद! कहिए, हमसे ऐसा कौन सा अपराध हुआ कि गाडियाँ रोक दी गईं। हम ब्राह्मणों पर तो आपकी कृपा-दृष्टि रहनी चाहिए।

वंशीधर रुखाई से बोले, 'सरकारी हुक्म।

पं. अलोपीदीन ने हँसकर कहा, 'हम सरकारी हुक्म को नहीं जानते और न सरकार को। हमारे सरकार तो आप ही हैं। हमारा और आपका तो घर का मामला है, हम कभी आपसे बाहर हो सकते हैं? आपने व्यर्थ का कष्ट उठाया। यह हो नहीं सकता कि इधर से जाएँ और इस घाट के देवता को भेंट न चढावें। मैं तो आपकी सेवा में स्वयं ही आ रहा था। वंशीधर पर ऐश्वर्य की मोहिनी वंशी का कुछ प्रभाव न पडा। ईमानदारी की नई उमंग थी। कडककर बोले, 'हम उन नमकहरामों में नहीं है जो कौडियों पर अपना ईमान बेचते फिरते हैं। आप इस समय हिरासत में हैं। आपको कायदे के अनुसार चालान होगा। बस, मुझे अधिक बातों की फुर्सत नहीं है। जमादार बदलूसिंह! तुम इन्हें हिरासत में ले चलो, मैं हुक्म देता हूँ।

पं. अलोपीदीन स्तम्भित हो गए। गाडीवानों में हलचल मच गई। पंडितजी के जीवन में कदाचित यह पहला ही अवसर था कि पंडितजी को ऐसी कठोर बातें सुननी पडीं। बदलूसिंह आगे बढा, किन्तु रोब के मारे यह साहस न हुआ कि उनका हाथ पकड सके। पंडितजी ने धर्म को धन का ऐसा निरादर करते कभी न देखा था। विचार किया कि यह अभी उद्दंड लडका है। माया-मोह के जाल में अभी नहीं पडा। अल्हड है, झिझकता है। बहुत दीनभाव से बोले, 'बाबू साहब, ऐसा न कीजिए, हम मिट जाएँगे। इज्जत धूल में मिल जाएगी। हमारा अपमान करने से आपके हाथ क्या आएगा। हम किसी तरह आपसे बाहर थोडे ही हैं।

वंशीधर ने कठोर स्वर में कहा, 'हम ऐसी बातें नहीं सुनना चाहते।

अलोपीदीन ने जिस सहारे को चट्टान समझ रखा था, वह पैरों के नीचे खिसकता हुआ मालूम हुआ। स्वाभिमान और धन-ऐश्वर्य की कडी चोट लगी। किन्तु अभी तक धन की सांख्यिक शक्ति का पूरा भरोसा था। अपने मुख्तार से बोले, 'लालाजी, एक हजार के नोट बाबू साहब की भेंट करो, आप इस समय भूखे सिंह हो रहे हैं।

वंशीधर ने गरम होकर कहा, 'एक हजार नहीं, एक लाख भी मुझे सच्चे मार्ग से नहीं हटा सकते।

धर्म की इस बुध्दिहीन दृढता और देव-दुर्लभ त्याग पर मन बहुत झुँझलाया। अब दोनों शक्तियों में संग्राम होने लगा। धन ने उछल-उछलकर आक्रमण करने शुरू किए। एक से पाँच, पाँच से दस, दस से पंद्रह और पंद्रह से बीस हजार तक नौबत पहुँची, किन्तु धर्म अलौकिक वीरता के साथ बहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पर्वत की भाँति अटल, अविचलित खडा था।

अलोपीदीन निराश होकर बोले, 'अब इससे अधिक मेरा साहस नहीं। आगे आपको अधिकार है।

वंशीधर ने अपने जमादार को ललकारा। बदलूसिंह मन में दारोगाजी को गालियाँ देता हुआ पंडित अलोपीदीन की ओर बढा। पंडितजी घबडाकर दो-तीन कदम पीछे हट गए। अत्यंत दीनता से बोले, 'बाबू साहब, ईश्वर के लिए मुझ पर दया कीजिए, मैं पच्चीस हजार पर निपटारा करने का तैयार हूँ।

'असम्भव बात है।

'तीस हजार पर?

'किसी तरह भी सम्भव नहीं।

'क्या चालीस हजार पर भी नहीं।

'चालीस हजार नहीं, चालीस लाख पर भी असम्भव है।

'बदलूसिंह, इस आदमी को हिरासत में ले लो। अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता।

धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला। अलोपीदीन ने एक हृष्ट-पुष्ट मनुष्य को हथकडियाँ लिए हुए अपनी तरफ आते देखा। चारों ओर निराश और कातर दृष्टि से देखने लगे। इसके बाद मूर्छित होकर गिर पडे।

दुनिया सोती थी पर दुनिया की जीभ जागती थी। सवेरे देखिए तो बालक-वृध्द सबके मुहँ से यही बात सुनाई देती थी। जिसे देखिए वही पंडितजी के इस व्यवहार पर टीका-टिप्पणी कर रहा था, निंदा की बौछारें हो रही थीं, मानो संसार से अब पापी का पाप कट गया।

पानी को दूध के नाम से बेचने वाला ग्वाला, कल्पित रोजनामचे भरने वाले अधिकारी वर्ग, रेल में बिना टिकट सफर करने वाले बाबू लोग, जाली दस्तावेज बनाने वाले सेठ और साकार यह सब के सब देवताओं की भाँति गर्दनें चला रहे थे।

जब दूसरे दिन पंडित अलोपीदीन अभियुक्त होकर कांस्टेबलों के साथ, हाथों में हथकडियाँ, हृदय में ग्लानि और क्षोभ भरे, लज्जा से गर्दन झुकाए अदालत की तरफ चले तो सारे शहर में हलचल मच गई। मेलों में कदाचित ऑंखें इतनी व्यग्र न होती होंगी। भीड के मारे छत और दीवार में कोई भेद न रहा।

किंतु अदालत में पहुँचने की देर थी। पं. अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे। अधिकारी वर्ग उनके भक्त, अमले उनके सेवक, वकील-मुख्तार उनके आज्ञा पालक और अरदली, चपरासी तथा चौकीदार तो उनके बिना मोल के गुलाम थे।

उन्हें देखते ही लोग चारों तरफ से दौडे। सभी लोग विस्मित हो रहे थे। इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने यह कर्म किया, बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए? ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करने वाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानून के पंजे में आए? प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था।

बडी तत्परता से इस आक्रमण को रोकने के निमित्त वकीलों की एक सेना तैयार की गई। न्याय के मैदान में धर्म और धन में यध्द ठन गया। वंशीधर चुपचाप खडे थे। उनके पास सत्य के सिवा न कोई बल था, न स्पष्ट भाषण के अतिरिक्त कोई शस्त्र। गवाह थे, किंतु लोभ से डाँवाडोल।

यहाँ तक कि मुंशीजी को न्याय भी अपनी ओर कुछ खिंचा हुआ दीख पडता था। वह न्याय का दरबार था, परंतु उसके कर्मचारियों पर पक्षपात का नशा छाया हुआ था। किंतु पक्षपात और न्याय का क्या मेल? जहाँ पक्षपात हो, वहाँ न्याय की कल्पना नहीं की जा सकती। मुकदमा शीघ्र ही समाप्त हो गया।

डिप्टी मजिस्ट्रेट ने अपनी तजवीज में लिखा, पं. अलोपीदीन के विरुध्द दिए गए प्रमाण निर्मूल और भ्रमात्मक हैं। वह एक बडे भारी आदमी हैं। यह बात कल्पना के बाहर है कि उन्होंने थोडे लाभ के लिए ऐसा दुस्साहस किया हो। यद्यपि नमक के दरोगा मुंशी वंशीधर का अधिक दोष नहीं है, लेकिन यह बडे खेद की बात है कि उसकी उद्दंडता और विचारहीनता के कारण एक भलेमानुस को कष्ट झेलना पडा। हम प्रसन्न हैं कि वह अपने काम में सजग और सचेत रहता है, किंतु नमक के मुकदमे की बढी हुई नमक से हलाली ने उसके विवेक और बुध्दि को भ्रष्ट कर दिया। भविष्य में उसे होशियार रहना चाहिए।

वकीलों ने यह फैसला सुना और उछल पडे। पं. अलोपीदीन मुस्कुराते हुए बाहर निकले। स्वजन बाँधवों ने रुपए की लूट की। उदारता का सागर उमड पडा। उसकी लहरों ने अदालत की नींव तक हिला दी।

जब वंशीधर बाहर निकले तो चारों ओर उनके ऊपर व्यंग्यबाणों की वर्षा होने लगी। चपरासियों ने झुक-झुककर सलाम किए। किंतु इस समय एक कटु वाक्य, एक-एक संकेत उनकी गर्वाग्नि को प्रज्ज्वलित कर रहा था।

कदाचित इस मुकदमे में सफल होकर वह इस तरह अकडते हुए न चलते। आज उन्हें संसार का एक खेदजनक विचित्र अनुभव हुआ। न्याय और विद्वत्ता, लंबी-चौडी उपाधियाँ, बडी-बडी दाढियाँ, ढीले चोगे एक भी सच्चे आदर का पात्र नहीं है।

वंशीधर ने धन से बैर मोल लिया था, उसका मूल्य चुकाना अनिवार्य था। कठिनता से एक सप्ताह बीता होगा कि मुअत्तली का परवाना आ पहुँचा। कार्य-परायणता का दंड मिला। बेचारे भग्न हृदय, शोक और खेद से व्यथित घर को चले। बूढे मुंशीजी तो पहले ही से कुडबुडा रहे थे कि चलते-चलते इस लडके को समझाया था, लेकिन इसने एक न सुनी। सब मनमानी करता है। हम तो कलवार और कसाई के तगादे सहें, बुढापे में भगत बनकर बैठें और वहाँ बस वही सूखी तनख्वाह! हमने भी तो नौकरी की है और कोई ओहदेदार नहीं थे। लेकिन काम किया, दिल खोलकर किया और आप ईमानदार बनने चले हैं। घर में चाहे ऍंधेरा हो, मस्जिद में अवश्य दिया जलाएँगे। खेद ऐसी समझ पर! पढना-लिखना सब अकारथ गया।

इसके थोडे ही दिनों बाद, जब मुंशी वंशीधर इस दुरावस्था में घर पहुँचे और बूढे पिताजी ने समाचार सुना तो सिर पीट लिया। बोले- 'जी चाहता है कि तुम्हारा और अपना सिर फोड लूँ। बहुत देर तक पछता-पछताकर हाथ मलते रहे। क्रोध में कुछ कठोर बातें भी कहीं और यदि वंशीधर वहाँ से टल न जाता तो अवश्य ही यह क्रोध विकट रूप धारण करता। वृध्द माता को भी दु:ख हुआ। जगन्नाथ और रामेश्वर यात्रा की कामनाएँ मिट्टी में मिल गईं। पत्नी ने कई दिनों तक सीधे मुँह बात तक नहीं की।

इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया। सांध्य का समय था। बूढे मुंशीजी बैठे-बैठे राम नाम की माला जप रहे थे। इसी समय उनके द्वार पर सजा हुआ रथ आकर रुका। हरे और गुलाबी परदे, पछहिए बैलों की जोडी, उनकी गर्दन में नीले धागे, सींग पीतल से जडे हुए। कई नौकर लाठियाँ कंधों पर रखे साथ थे।

मुंशीजी अगवानी को दौडे देखा तो पंडित अलोपीदीन हैं। झुककर दंडवत् की और लल्लो-चप्पो की बातें करने लगे- 'हमारा भाग्य उदय हुआ, जो आपके चरण इस द्वार पर आए। आप हमारे पूज्य देवता हैं, आपको कौन सा मुँह दिखावें, मुँह में तो कालिख लगी हुई है। किंतु क्या करें, लडका अभागा कपूत है, नहीं तो आपसे क्या मुँह छिपाना पडता? ईश्वर निस्संतान चाहे रक्खे पर ऐसी संतान न दे।

अलोपीदीन ने कहा- 'नहीं भाई साहब, ऐसा न कहिए।

मुंशीजी ने चकित होकर कहा- 'ऐसी संतान को और क्या कँ?

अलोपीदीन ने वात्सल्यपूर्ण स्वर में कहा- 'कुलतिलक और पुरुखों की कीर्ति उज्ज्वल करने वाले संसार में ऐसे कितने धर्मपरायण मनुष्य हैं जो धर्म पर अपना सब कुछ अर्पण कर सकें!

पं. अलोपीदीन ने वंशीधर से कहा- 'दरोगाजी, इसे खुशामद न समझिए, खुशामद करने के लिए मुझे इतना कष्ट उठाने की जरूरत न थी। उस रात को आपने अपने अधिकार-बल से अपनी हिरासत में लिया था, किंतु आज मैं स्वेच्छा से आपकी हिरासत में आया हूँ। मैंने हजारों रईस और अमीर देखे, हजारों उच्च पदाधिकारियों से काम पडा किंतु परास्त किया तो आपने। मैंने सबको अपना और अपने धन का गुलाम बनाकर छोड दिया। मुझे आज्ञा दीजिए कि आपसे कुछ विनय करूँ।

वंशीधर ने अलोपीदीन को आते देखा तो उठकर सत्कार किया, किंतु स्वाभिमान सहित। समझ गए कि यह महाशय मुझे लज्जित करने और जलाने आए हैं। क्षमा-प्रार्थना की चेष्टा नहीं की, वरन् उन्हें अपने पिता की यह ठकुरसुहाती की बात असह्य सी प्रतीत हुई। पर पंडितजी की बातें सुनी तो मन की मैल मिट गई।

पंडितजी की ओर उडती हुई दृष्टि से देखा। सद्भाव झलक रहा था। गर्व ने अब लज्जा के सामने सिर झुका दिया। शर्माते हुए बोले- 'यह आपकी उदारता है जो ऐसा कहते हैं। मुझसे जो कुछ अविनय हुई है, उसे क्षमा कीजिए। मैं धर्म की बेडी में जकडा हुआ था, नहीं तो वैसे मैं आपका दास हूँ। जो आज्ञा होगी वह मेरे सिर-माथे पर।

अलोपीदीन ने विनीत भाव से कहा- 'नदी तट पर आपने मेरी प्रार्थना नहीं स्वीकार की थी, किंतु आज स्वीकार करनी पडेगी।

वंशीधर बोले- 'मैं किस योग्य हूँ, किंतु जो कुछ सेवा मुझसे हो सकती है, उसमें त्रुटि न होगी।

अलोपीदीन ने एक स्टाम्प लगा हुआ पत्र निकाला और उसे वंशीधर के सामने रखकर बोले- 'इस पद को स्वीकार कीजिए और अपने हस्ताक्षर कर दीजिए। मैं ब्राह्मण हूँ, जब तक यह सवाल पूरा न कीजिएगा, द्वार से न हटूँगा।

मुंशी वंशीधर ने उस कागज को पढा तो कृतज्ञता से ऑंखों में ऑंसू भर आए। पं. अलोपीदीन ने उनको अपनी सारी जायदाद का स्थायी मैनेजर नियत किया था। छह हजार वाषक वेतन के अतिरिक्त रोजाना खर्च अलग, सवारी के लिए घोडा, रहने को बँगला, नौकर-चाकर मुफ्त। कम्पित स्वर में बोले- 'पंडितजी मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं है कि आपकी उदारता की प्रशंसा कर सकूँ! किंतु ऐसे उच्च पद के योग्य नहीं हूँ।

अलोपीदीन हँसकर बोले- 'मुझे इस समय एक अयोग्य मनुष्य की ही जरूरत है।

वंशीधर ने गंभीर भाव से कहा- 'यों मैं आपका दास हूँ। आप जैसे कीर्तिवान, सज्जन पुरुष की सेवा करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। किंतु मुझमें न विद्या है, न बुध्दि, न वह स्वभाव जो इन त्रुटियों की पूर्ति कर देता है। ऐसे महान कार्य के लिए एक बडे मर्मज्ञ अनुभवी मनुष्य की जरूरत है।

अलोपीदीन ने कलमदान से कलम निकाली और उसे वंशीधर के हाथ में देकर बोले- 'न मुझे विद्वत्ता की चाह है, न अनुभव की, न मर्मज्ञता की, न कार्यकुशलता की। इन गुणों के महत्व को खूब पा चुका हूँ। अब सौभाग्य और सुअवसर ने मुझे वह मोती दे दिया जिसके सामने योग्यता और विद्वत्ता की चमक फीकी पड जाती है। यह कलम लीजिए, अधिक सोच-विचार न कीजिए, दस्तखत कर दीजिए। परमात्मा से यही प्रार्थना है कि वह आपको सदैव वही नदी के किनारे वाला, बेमुरौवत, उद्दंड, कठोर परंतु धर्मनिष्ठ दारोगा बनाए रखे।

वंशीधर की ऑंखें डबडबा आईं। हृदय के संकुचित पात्र में इतना एहसान न समा सका। एक बार फिर पंडितजी की ओर भक्ति और श्रध्दा की दृष्टि से देखा और काँपते हुए हाथ से मैनेजरी के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।

अलोपीदीन ने प्रफुल्लित होकर उन्हें गले लगा लिया।

                                                                                        ---प्रेमचन्द---