सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

ग्रीटिंग कार्ड और राशन कार्ड


मेरी टेबिल पर दो कार्ड पड़े हैं - इसी डाक से आया दिवाली ग्रीटिंग कार्ड और दुकान से लौटा राशन कार्ड। ग्रीटिंग कार्ड में किसी ने शुभेच्छा प्रगट की है कि मैं सुख और समृद्धि प्राप्त करूँ। अभी अपने शुभचिंतक बने हुए हैं जो सुख दिए बिना चैन नहीं लेंगे। दिवाली पर कम से कम उन्हें याद तो आती है कि इस आदमी का सुखी होना अभी बकाया है। वे कार्ड भेज देते हैं कि हम तो सुखी हैं ही, अगर तुम भी हो जाओ, तो हमें फिलहाल कोई एतराज नहीं।

मेरा ग्रीटिंग कार्ड मेरे सुख की कामना कर रहा है। मगर राशन कार्ड बताता है कि इस हफ्ते से गेहूँ की मात्रा आधी हो गई है। राशन कार्ड मे ग्रीटिंग कार्ड को काट दिया। ऐसा तमाचा मारा कि खूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड जी के कोमल कपोल रक्तिम हो गए। शुरु से ही राशन कार्ड इस ग्रीटिंग कार्ड की ओर गुर्राकर देख रहा था। जैसे ही मैं ग्रीटिंग कार्ड पढ़कर खुश हुआ, राशन कार्ड ने उसकी गर्दन दबाकर कहा - क्यों बे साले, ग्रीटिंग कार्ड के बच्चे, तू इस आदमी को सुखी करना चाहता है? जा, इसका गेहूँ आधा कर दिया गया। बाकी काला-बाजार से खरीदे या भूखा रहे।

बेचारा ग्रीटिंग कार्ड दीनता से मेरी ओर देख रहा है। मैं क्या करूँ? झूठों की रक्षा का ठेका मुझे थोड़े ही मिला है। जिन्हें मिला है उनके सामने हाथ जोड़ो। मेरे राशन कार्ड को तेरी झूठ बर्दाश्त नहीं हुई। इन हालात में सुख का झूठी आशा लेकर तू क्यों आया? ग्रीटिंग कार्ड राष्ट्रसंघ के शांति प्रस्तावों की तरह सुंदर पर प्रभावहीन है। राशन कार्ड खुरदरा और बदसूरत है, पर इसमें अनाज है। मेरे लिए यही सत्य है। और इस रंगीन चिकनाहट में सत्यहीन औपचारिक शुभेच्छा है। ग्रीटिंग कार्ड सत्य होता अगर इसके साथ एक राशन कार्ड भी भेजा गया होता और लिखा होता - हम चाहते हैं कि तुम सुख प्राप्त करो। इस हेतु हम एक मरे हुए आदमी के नाम से जाली राशन कार्ड बनवाकर भेज रहे हैं। जब तक धाँधली चले सस्ता अनाज लेते जाना और सुखी रहना। पकड़े जाने पर हमारा नाम मत बताना। संकट के वक्त शुभचिंतक का नाम भूल जाना चाहिए।

मित्रों से तो मैं कहना चाहता हूँ कि ये कार्ड न भेजें। शुभकामना इस देश में कारगर नहीं हो रही हैं। यहाँ गोरक्षा का जुलूस सात लाख का होता है और मनुष्य रक्षा का सिर्फ एक लाख का। दुनिया भर में शुभकामना बोझ हो गई है। पोप की शुभकामना से एक बम कम नहीं गिरता। मित्रों की ही इच्छा से कोई सफल, सुखी और समृद्ध कैसे हो जाएगा? सफलता के महल का प्रवेश द्वार बंद है। इसमें पीछे के नाबदान से ही घुसा जा सकता है। जिन्हें घुसना है नाक पर रूमाल रखकर घुस जाते हैं। पास ही इत्र सने रूमालों के ठेले खड़े हैं। रूमाल खरीदो, नाक पर रखो और नाबदान में से घुस जाओ सफलता और सुख के महल में। एक आदमी खड़ा देख रहा है। कोई पूछता है - घुसते क्यों नहीं? वह कहता है - एक नाक होती तो घुस जाते। हमारा तो हर रोम एक नाक है। कहाँ-कहाँ रूमाल लपेटें।

एक डर भी है। सफलता, सुख और समृद्धि प्राप्त भी हो जाए, तो पता नहीं कितने लोग बुरा मान जाएँ। संकट में तो शत्रु भी मदद कर देते हैं। मित्रता की सच्ची परीक्षा संकट में नहीं, उत्कर्ष में होती है। जो मित्र के उत्कर्ष को बर्दाश्त कर सके, वही सच्चा मित्र होता है। संकट में तपी हुई मित्रता उत्कर्ष में खोटी निकलती मैंने देखी है। एक बेचारे की चार कविताएँ छप गईं, तो चार मित्र टूट गए। आठ छपने पर पूरे आठ टूट गए। दो कवि सम्मेलनों में जमने से एक स्थानीय कवि के कवि-मित्र रूठ गए। तीसरे कवि सम्मेलन में जब वह 'हूट' हुआ, तब जाकर मित्रता अपनी जगह लौटी।

ग्रीटिंग कार्डों पर अपना भरोसा नहीं। 20 सालों से इस देश को ग्रीटिंग कार्डों के सहारे चलाया गया है। अंबार लग गए हैं। हर त्योहार पर देशवासियों को ग्रीटिंग कार्ड दिए जाते हैं - 15 अगस्त और 26 जनवरी पर, संसद के अधिवेशन पर, पार्टी के सम्मेलन पर। बढ़िया सुनहले रंगों के मीठे शब्दों के ग्रीटिंग्स - देशवासियों, बस इस साल तुम सुखी और समृद्ध हो जाओ। ग्रीटिंग कार्डों के ढेर लगे हैं, मगर राशन कार्ड छोटा होता जाता है।

                                                                ---हरिशंकर परसाई---

चूहा और मैं

चाहता तो लेख का शीर्षक ''मैं और चूहा'' रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्‍य आदमी नहीं कर पाता, वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया।

इस घर में एक मोटा चूहा है। जब छोटे भाई की पत्‍नी थी, तब घर में खाना बनता था। इस बीच पारिवारिक दुर्घटनाओं-बहनोई की मृत्‍यु आदि के कारण हम लोग बाहर रहे।

इस चूहे ने अपना अधिकार मान लिया था कि मुझे खाने को इसी घर में मिलेगा। ऐसा अधिकार आदमी भी अभी तक नहीं मान पाया। चूहे ने मान लिया है।

लगभग पैंतालिस दिन घर बन्‍द रहा। मैं तब अकेला लौटा। घर खोला, तो देखा कि चूहे ने काफी क्रॉकरी फर्श पर गिराकर फोड़ डाली है। वह खाने की तलाश में भड़भड़ाता होगा। क्रॉकरी और डिब्‍बों में खाना तलाशता होगा। उसे खाना नहीं मिलता होगा, तो वह पड़ोस में कहीं कुछ खा लेता होगा और जीवित रहता होगा। पर घर उसने नहीं छोड़ा। उसने इसी घर को अपना घर मान लिया था।

जब मैं घर में घुसा, बिजली जलाई तो मैंने देखा कि वह खुशी से चहकता हुआ यहाँ से वहाँ दौड़ रहा है। वह शायद समझ गया कि अब इस घर में खाना बनेगा, डिब्‍बे खुलेंगे और उसकी खुराक उसे मिलेगी।

दिन-भर वह आनन्‍द से सारे घर में घूमता रहा। मैं देख रहा था। उसके उल्‍लास से मुझे अच्‍छा ही लगा।

पर घर में खाना बनना शुरू नहीं हुआ। मैं अकेला था। बहन के यहाँ जो पास में ही रहती है, दोपहर को भोजन कर लेता। रात को देर से खाता हूँ, तो बहन डब्‍बा भेज देती। खाकर मैं डब्‍बा बन्‍द करके रख देता। चूहाराम निराश हो रहे थे। सोचते होंगे यह कैसा घर है। आदमी आ गया है। रोशनी भी है। पर खाना नहीं बनता। खाना बनता तो कुछ बिखरे दाने या रोटी के टुकड़े उसे मिल जाते।

मुझे एक नया अनुभव हुआ। रात को चूहा बार-बार आता और सिर की तरफ मच्‍छरदानी पर चढ़कर कुलबुलाता। रात में कई बार मेरी नींद टूटती मैं उसे भगाता। पर थोड़ी देर बाद वह फिर आ जाता और सिर के पास हलचल करने लगता।

वह भूखा था। मगर उसे सिर और पाँव की समझ कैसे आई? वह मेरे पाँवों की तरफ गड़बड़ नहीं करता था। सीधे सिर की तरफ आता और हलचल करने लगता। एक दिन वह मच्‍छरदानी में घुस गया।

मैं बड़ा परेशान। क्‍या करूँ? इसे मारूँ और यह किसी अलमारी के नीचे मर गया, तो सड़ेगा और सारा घर दुर्गन्‍ध से भर जाएगा। फिर भारी अलमारी हटाकर इसे निकालना पड़ेगा।

चूहा दिन-भर भड़भड़ाता और रात को मुझे तंग करता। मुझे नींद आती, मगर चूहाराम मेरे सिर के पास भड़भड़ाने लगते।

आखिर एक दिन मुझे समझ में आया कि चूहे को खाना चाहिए। उसने इस घर को अपना घर मान लिया है। वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत है। वह रात को मेरे सिरहाने आकर शायद यह कहता है - ''क्‍यों, बे, तू आ गया है। भर-पेट खा रहा है, मगर मैं भूखा मर रहा हूँ मैं इस घर का सदस्‍य हूँ। मेरा भी हक है। मैं तेरी नींद हराम कर दूँगा। तब मैंने उसकी माँग पूरी करने की तरकीब‍ निकाली।''

रात को मैंने भोजन का डब्‍बा खोला, तो पापड़ के कुछ टुकड़े यहाँ-वहाँ डाल दिए। चूहा कहीं से निकला और एक टुकड़ा उठाकर अलमारी के नीचे बैठकर खाने लगा। भोजन पूरा करने के बाद मैंने रोटी के कुछ टुकड़े फर्श पर बिखरा दिए। सुबह देखा कि वह सब खा गया है।

एक‍ दिन बहन ने चावल के पापड़ भेजे। मैंने तीन-चार टुकड़े फर्श पर डाल दिए। चूहा आया, सूँघा और लौट गया। उसे चावल के पापड़ पसन्‍द नहीं। मैं चूहे की पसन्‍द से चमत्‍कृत रह गया। मैंने रोटी के कुछ टुकड़े डाल दिए। वह एक के बाद एक टुकड़ा लेकर जाने लगा।

अब यह रोजमर्रा का काम हो गया। मैं डब्‍बा खोला, तो चूहा निकलकर देखने लगता। मैं एक-दो टुकड़े डाल देता। वह उठाकर ले जाता। पर इतने से उसकी भूख शान्‍त नहीं होती थी। मैं भोजन करके रोटी के टुकड़े फर्श पर डाल देता। वह रात को उन्‍हें खा लेता और सो जाता।

इधर मैं भी चैन की नींद सोता। चूहा मेरे सिर के पास गड़बड़ नहीं करता।

फिर वह कहीं से अपने एक भाई को ले आया। कहा होगा, ''चल रे, मेरे साथ उस घर में। मैंने उस रोटीवाले को तंग करके, डरा के, खाना निकलवा लिया है। चल दोनों खाएँगे। उसका बाप हमें खाने को देगा। वरना हम उसकी नींद हराम कर देंगे। हमारा हक है।''

अब दोनों चूहाराम मजें में खा रहे हैं।

मगर मैं सोचता हूँ - आदमी क्‍या चूहे से भी बद्तर हो गया है? चूहा तो अपनी रोटी के हक के लिए मेरे सिर पर चढ़ जाता है, मेरी नींद हराम कर देता है।

इस देश का आदमी कब चूहे की तरह आचरण करेगा?

(यह कहानी अँग्रेजी लेखक स्‍टीन बेक के लघु उपन्‍यास ऑफ मैन एण्‍ड माउस से अलग है।)

                                                           ---हरिशंकर परसाई---

दंत-कथा

एक जमाना था जब दाँतों के बारे में हम हिंदुस्तानियों का जनरल नॉलेज बड़ा सीमित हुआ करता था। तब हम इतना ही जानते थे कि इनसान के बत्तीस दाँत होते हैं और इन्हें साफ-सुथरा रखने के लिए किसी काले, धोले या मुफ्तिया (राख या बबूल के पेड़ की टहनी) मंजन का इस्तेमाल करना चाहिए और यदि कोई तकलीफ हो तो किसी चीनी डॉक्टर से चवन्नी की काड़ी फिरवा लेनी चाहिए। लेकिन भला हो, दिल्ली से निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिकाओं और शहर के सिनेमा थियेटरों के मालिकों का, जिनकी प्रेरणा से हमें क्रमशः पत्रिका पढ़ने के बाद और फिल्म देखने से पहले कुछ सीधे-सादे विज्ञापन देखने को मिले, जिनकी बदौलत हमने जाना कि अच्छे बच्चे बड़ों का कहना मानते हैं और रात को ब्रश करके ही सोते हैं या कुदरत द्वारा बख्शी गई नेमतों में से एक को हमें इतना सहेज कर रखना है कि बुढ़ापे में साबूत अखरोट भी तोड़ सकें और किसी को झट लौंग का तेल न मलना पड़े। तभी से हिंदुस्तानी मिडिल क्लास के घरों में टूथपेस्ट सुबह के अखबार और शाम के टीवी की तरह अपरिहार्य है।

दाँतों की रक्षा का यह फलसफा भले ही विदेशी हो, लेकिन इसका कार्यान्वयन निहायत देशी स्टाइल में होता है। हिंदुस्तानी बड़े पराक्रमी और जल्दी हार न मानने वालों में गिने जाते हैं। ऐसा नहीं कि पेस्ट खत्म हुआ, तो दूसरा ले आए। हम उसे अपने पास ज्यादा से ज्यादा समय तक के लिए रखना चाहते हैं। लिहाजा जब तक ट्यूब में से पेस्ट निकलता रहे, तब तक तो ठीक, लेकिन जब निकलना बंद हो जाए, तो हम उसके पैरों में दबाव बनाते हुए धीरे-धीरे मुँह तक आते हैं और इस प्रकार हम पाते हैं दो अतिरिक्त दिन का पेस्ट। फिर तीसरे दिन हम चटनी पीसने का पत्थर उठा लाते हैं, जो अब मिक्सर के कारण यूँ भी किसी काम का नहीं रह गया है। उस पत्थर की मदद से पेस्ट निकाला जाता है। चौथे दिन पत्थर चलाने पर वह म्यूनिसपल्टी की पाइप लाइन की तरह जर्जर होकर बीच के इलाकों से पेस्ट के कतरे सप्लाय करने लगता है। हम बड़े इत्मिनान से वे कतरे उठा-उठा कर ब्रश पर लगाते हैं। भले ही उस कवर के कुछ कोने हमारी अँगुली में खरोच पैदा कर दें। हिम्मते डिसोजा मददे जिसोजा। खरोंच के लिए डेटॉल हाजिर है, जो बाथरूम में इसीलिए ही रखा जाता है। डेटॉल मलो और सेप्टिक की चिंता से मुक्ति पाओ। वैसे यदि डेटॉल में जान होती, तो वह जरूर हँसता, क्योंकि हर दवा की कोई एक्सपायरी डेट होती है और आमतौर पर यह डेटॉल तभी का होता है, जिस दिन हम इस घर में शिफ्ट हुए थे।

अब जब पेस्ट का आलम यह है, तब ब्रश का तो कहना ही क्या? जिस तरह आदमी कर्जों के दम पर चालीस लाख का फ्लैट खरीदने की हिम्मत तो जुटा लेता है, लेकिन किचन में एक्जास्ट फेन लगाने में उसकी नानी मरती है; उधार में कार खुशी-खुशी ले आए, लेकिन सीटों पर कुशन लगाने के लिए वह अगले ऐरियर का इंतजार करता है, उसी प्रकार पेस्ट तो महीने के सामान के साथ ले आता है, लेकिन ब्रश खरीदने की हिम्मत वह इतनी जल्दी नहीं जुटा पाता। यह क्या, पेस्ट अट्ठाइस रुपए का और ब्रश छप्पन रुपए का। सोने से घड़ावन महँगी। वह ब्रशों के झुंड में से आदतन सबसे सस्ता ब्रश खरीदता है, जिसकी यह विशेषता होती है कि वह तीन दिन में ही इतना चपटा हो जाता है कि कमजोर नजर वाले को संपट ही न पड़े कि वह आखिर ब्रश करे तो कहाँ से करे? तब उसे इसका कारण समझ में आ जाता है कि यह तो सॉफ्ट ब्रश था, इसलिए ऐसा हुआ। वह हार्ड ब्रश लेता है, जिसको सात दिन बाद भी उसी रूप में पाकर उसका चेहरा खिल उठता है, टूथपेस्टी मुस्कान से नहीं विजयी मुस्कान से। वह इससे मुहब्बत करने लगता है, इतनी कि बदलने की इच्छा ही नहीं होती। अंत में वह दिन आता है जब घर का कोई सदस्य गलती से उससे ऐड़ियाँ रगड़ लेता है और इसकी घोषणा भी कर देता है। तब जाकर ब्रश बदला जाता है।

अब तो ब्रश के साथ टंग क्लीनर का भी चलन हो गया है। टंग क्लीनर की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि यह बहुत सस्ता होता है। आपको तय करना है कि तीन रुपए वाला धारदार क्लीनर लीजिएगा कि पाँच रुपए वाला बोठा क्लीनर। धारदारवाला लेंगे तो आह के साथ कराह भी निकल सकती है। इसीलिए कहते हैं कि सस्ता रोए बार-बार महँगा रोए एक बार। वैसे काम तो दोनों एक ही करेंगे। घर भर के लोगों और यदि फ्लैट सिस्टम हुआ तो ऊपर-नीचे की दो-दो मंजिलों के लोगों को "अई-अई या सुकू-सुकू" शैली में यह बताने का काम कि आप उठ चुके हैं और नित्य कर्मों से निवृत होना चाह रहे हैं।

दाँतों की रक्षा नामक इस सीडी का दूसरा पार्ट वॉश बेसिन में नहीं बल्कि राह चलते या बैठे-ठाले बजता है। इसके अंतर्गत भोजन या नाश्ते या पान-गुटखे के बाद दाँतों को कुरेदा जाता है। हालाँकि फैशन वालों ने इसके लिए भी खास मार्क की कुरेदनियाँ बनाई हैं, लेकिन ऐसी लक्जरी हमें रेस्तराओं में ही सुलभ होती हैं, जिन्हें हम हम बिल अदा करते हुए टिप देने या न देने का निर्णय करने से पहले ही झपट्टा मार कर ले आते हैं। लेकिन पुरानी बचत की तरह इनका स्टॉक भी जल्द खत्म हो जाता है और हम मौलिक तरीके ढूँढ़ने लगते हैं। माचिस की तीली का जला हुआ हिस्सा तोड़ कर या अगरबत्ती के ठुड्डे से। ऑफिस में तो आलपिन हैं ही। कुछ भाई लोग तो इतनी इंजीनियरी जानते हैं कि आलपिन खत्म होने पर यू पिन को मोड़ कर उसका आई-पिन बनाते हैं और उसी से काम चलाते हैं। फिर इस दुःसाहस में जब पिन कहीं इधर-उधर घुस जाती है तो डॉक्टर साहब के यहाँ दौड़ लगाते हैं, जो मय अपनी एक्स-रे मशीन के आपका हार्दिक स्वागत करते हैं।

                                                                   ---शशांक दुबे---