सोमवार, 18 मार्च 2013

सुरखाब के पंख

शिकार की बात रात में ही तय हो गई थी। सो, लल्लन सुबह दफ्तर गए और हाजिरी मार कर चले आए। आते ही उन्होंने अपनी दोनाली बंदूक साफ की। कारतूसों का डिब्बा निकाला और उसमें से एक-एक कारतूस निकाल कर पेटी में सजाने लगे। मोटे कागज के लाल-लाल कारतूसों का ढक्कन पीतल का था। इसी पीतल के बीच में एक छोटा सा हिस्सा उभरा हुआ। यहीं पर घोड़े की चोट पड़ते ही गोली चलती है। बंदूक की नाल में जंग सी लगने लगी थी। पहले एक ब्रश से फिर थोड़ा सरसों का तेल लगा कर ब्रश के ऊपर लपेट कर उसे नली के अंदर घुसाया गया। नली साफ हो गई। पिछले साल दीपावली के बाद से बंदूक का इस्तेमाल नहीं हुआ था। आज इसे शिकार में आजमाया जानेवाला था।

जितनी देर में बंदूक की साफ-सफाई हुई, उतने में ही शिकार पर जानेवाले अन्य साथी भी तैयार हो गए। मक्खन नेता और टिड्डी मुन्ना के पास एकनाली बंदूकें थीं। अपनी कमर में कारतूसों की पेटी बाँध कर वे भी तैयार थे। इसके अलावा तेलिया रोशन, पेड़की दादा, परभू भी शिकार पर जानेवाले थे। चलते समय लल्लन का एक बेटा धीरज चुपचाप उनके पीछे लग लिया। जबकि, लल्लन के दूसरे बेटे अंची ने शिकार पर जाने के लिए एक दिन पहले ही बुकिंग करा ली थी।

दशहरे के दो दिन बाद एक त्योहार पड़ता है। ढेढ़िया। इस दिन घर की बच्चियाँ बड़ों के सिर पर से शनीचर उतारती हैं। एक जालीदार मिट्टी की गगरी को ढेढ़िया कहते हैं। इसमें नीचे थोड़ा सा चिवड़ा और रेवड़ी रख कर, उसके ऊपर एक दिया जला कर रख दिया जाता है। जालीदार गगरी से दिए की रोशनी छन-छन कर बाहर आने लगती है और उसकी रोशनियों के निशान पूरी दीवारों पर पड़ने लगते हैं। रोशनी के अद्भुत डिजाइन चारों ओर छपने लगते हैं। इस ढेढ़िया को अपने बड़ों के सिरों पर सात बार चक्कर लगाते हुए छुआया जाता है। माना तो यह जाता कि इससे बड़ों के सिर पर चढ़ा हुआ शनीचर उतर जाता है। रक्षाबंधन और भइयादूइज से काफी मिलते-जुलते इस त्योहार में बच्चियों को ढेढ़िया उतारने के बदले में कुछ पैसे नेग में दिए जाते हैं।

लेकिन, जहाँ तक बात शनीचर उतरने की है, इसके बाद शनीचर को और प्रबल होते ही देखा गया। ढेढ़िया के बाद दीपावली आने में मुश्किल से पंद्रह दिन का वक्त रह जाता है। ढेढ़ियावाले दिन से ले कर दीपावली तक लोगों पर जुए का नशा सा चढ़ जाता है। रात-रात भर जुआ चलने लगता है। यहाँ तक भी कहा जाता है कि ढेढ़िया के दिए में जलने वाली बाती जिसके पास होती है जुए में उसके जीतने के चांस कई गुना बढ़ जाते हैं। इसके चलते जब ढेढ़िया फोड़ी जाती है तो कई लोग उसकी बाती लूटने की फिराक में रहते हैं। ये कहावत अंची ने भी सुन रखी थी। इस बार उसने भी ढेढ़िया की बाती लूटने की कोशिश की, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली।

लल्लन के यहाँ भी रात में जुआ चला था। बिना दारू के जुआ कैसे होता। इसलिए हर बाजी में से पाँच-पाँच रुपए निकाल कर शराब भी मँगाई गई थी, हार-जीत की बिना परवाह के सभी ने जम कर शराब पी। कुछ ऐसे भी थे जो पैसे तो हार गए थे और अब केवल पीने के लिए ही वहाँ बैठे हुए थे।

अंची आम तौर पर इसी कमरे में सोता था। जुए की भीड़-भाड़ में उसके लिए सोना मुश्किल था। वह जाग कर पत्तों का खेल देख रहा था। टी-टी। एक-एक कर सभी को नौ-नौ पत्ते बाँटे गए। इनमें से तीन-तीन पत्तों के हाथ यानी सेट तैयार करने होते। पत्तों के तीनों सेट को एक-एक करके चला जाता। इन तीन बाजियों में से दो जिसने जीत लिया, दाँव पर लगाए गए पैसे उसके हो गए। दाँव पर हर बार दस रुपए की चाल रखी जाती। पाँच आदमी खेलते, इसलिए हर बार आम तौर पर पचास रुपए का दाँव होता। अगर किसी ने दो हाथ नहीं जीते, तो फिर फैसला अगली बाजी पर होगा। इससे दाँव पर लगे पैसे बढ़ भी जाते। रात मक्खन नेता की जोरदार थी। पत्तों ने तो जैसे उनके हाथों को पहचाना हुआ था। बाजी पर बाजी उसके हाथ लग रही थी। अब दूसरे लोगों ने पत्तों को अपनी तरफ खींचने के लिए टोटके आजमाने शुरू किए। टिड्डी मुन्ना को विश्वास था कि अगर उनकी एक चप्पल उलट के रख दी जाए तो पत्ते उनके पास लौट-लौट कर आने लगेंगे। जबकि, परभू कुछ इस अदा से पत्तों को छिप-छिप कर खोलते थे जैसे एकबारगी सामना होने से पत्ते घबरा जाएँगे। लल्लन भी जब कई बाजी लगातार हार गए तो उन्होंने अंची को अपने पास बैठा लिया। अगली बार उन्होंने अंची से पत्ते उठाने के लिए कहा। मक्खन भाई ने पत्ते बाँटे। एक-एक करके सभी को नौ-नौ पत्ते। अपने पापा के पत्ते अंची ने उठा। सचमुच पत्ते अच्छे आ गए। लल्लन ने बाजी जीत ली। अंची भी गर्व से भर उठा। इसके बाद तो जैसे पत्ते उठाने की जिम्मेदारी ही उसकी बन गई।

मेरे हाथ में आनेवाले पत्तों में जादू का जोर है, यह एहसास ही अंची को उत्साह से भर देने के लिए काफी था। रात भारी होने लगी, लेकिन जुआ चलता रहा। अंची की आँखें लाल होने लगीं। नींद से भर उठीं। वह चुपचाप उठा और जा कर बिस्तर पर लेट गया। उसे नींद आई और वह सो गया। लेकिन, कुछ ही देर बाद लल्लन लगातार पाँच-छह बाजियाँ हार गए तो वे फिर से अंची को उठा लाए। उन्होंने उसे अपने पास बैठा लिया और पत्ते उठाने को कहा। अब तक अंची के गर्व पर नींद हावी हो चुकी थी। वह उनींदे-उनींदे ही पत्ते उठाता और उनके हाथ में दे कर सो जाता। पत्तों की तरफ पूरी आँख भर कर वह देखता भी नहीं था। खैर, जो भी हो जुआ चलता रहा। और इसी जुए के बीच में ही अगले दिन शिकार पर जाने की बात तय हो गई थी। अंची ने रात भर अपने पापा के पत्ते उठाए थे, इसलिए शिकार पर जाने की उसकी बुकिंग पहले ही पक्की हो चुकी थी।

सभी ने अपनी-अपनी बंदूकें कंधे पर टाँग लीं। गंगा की तरफ चल पड़े। नवंबर की शुरुआत हो रही थी। धूप का दम टूटने लगा था। सूरज अब दिन में आँखें चमकाता हुआ अपना क्रोध प्रगट नहीं करता। अब तो जैसे वह दिन भर प्यार और दुलार की नियामत बरसाने लगा था। धूप में बैठ कर सुख मिलता। दिन के बारह बज रहे थे। लेकिन, गंगा के कछार में दूर-दूर तक हल्की धुंध सी छाई हुई थी। सर्दियों के आने के साथ ही गंगा का पानी कम होने लगता है। हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार कम हो जाती है। बल्कि रुक सी जाती है। इसके चलते नदियाँ सिर्फ जगह-जगह फूटनेवाले सोतों से निकले पानी पर ही आश्रित हो जाती हैं। यह सर्दियों का सूखा था। गंगा में जगह-जगह पर रेत के टापू निकल आते हैं। इन टापुओं में से कई तो एकदम पानी से भीगे रहते हैं, बस जरा सा खोदो और पानी चुहचुहाने लगेगा। जबकि, कुछ सूख जाते हैं। इन पर लहरों के चलने के निशान बने होते हैं। इसलिए रेत कुछ-कुछ घुँघराले से फर्शवाली हो जाती है।

मक्खन ने इसी साल नई नाव बनवाई थी। लेकिन, नाव के डाँड़ खुद मक्खन सँभालते, इससे पहले ही आगे बढ़ कर तेलिया रोशन ने नाव की बागडोर अपने हाथ में ले ली। खुद वह नाव पर सबसे पहले चढ़ गया। उसने एक-एक कर सबको नाव पर चढ़ने दिया। सब के लिए जगह खाली की। चप्पलें एक जगह उतरवाईं और नाव पर प्लास्टिक की बोरियों को जोड़ कर बनाई गई दरी पर सबको बैठा दिया। इसके बाद लंगर उठा कर उसने नाव में रख दिया। एक डाँड़ से उसने किनारे की रेत में जोर लगाया और तेजी से नाव को ठेल दिया। नाव हल्के झटके के साथ पानी की सतह पर तैरने लगी। उसने जल्दी-जल्दी डाँड़ मारते हुए नाव खेना शुरू कर दिया। ऐसा नहीं करने पर नाव के बहाव के साथ बह जाने का खतरा था। गंगा और जमुना के बहाव में अंतर होता है। इलाहाबाद में दोनों बहती हैं। गंगा का बहाव तेज होता है। गंगा अपना रास्ता बदलती रहती हैं और दूर-दूर तक कछार बनाती हुई चलती हैं। यमुना ज्यादा शांत, धीर गंभीर हो कर चलती है। यहाँ तक कि दूर से देखने पर धारा का पता भी नहीं चलता। जमीन को गहरा करते, एक ही रास्ते पर सदियों से चलते हुए। यमुना का हरा, धानी रंग। जबकि, गंगा का रंग कुछ-कुछ मटियाला हरा, या फिर सफेदपन लिए हुए मटमैला। संगम पर इन दोनों नदियों के बीच का फर्क साफ देखा जा सकता है।

तेलिया रोशन ने नाव का एक बड़ा चक्कर लेना शुरू किया। ताकि नाव को तेजी से खेते हुए उस पार ले जाया जा सके। अपना लक्ष्य उसने उस पार की रेत में एक जगह को बना रखा था। नाव को उसी जगह पर पहुँचाना था। उसके हाथ में डाँड़ तेजी से चल रहे थे। इसी बीच परभू को भी जोश आ गया। उसने कहा, लाव हम चलाई। उसने नाव में पड़ा हुआ बाँस निकाल लिया। केतना पाई होई हियाँ। रोशन ने कहा, हियाँ न चली बाँस, हियाँ दुई हाथी का डुबाव होई। पानी की गहराई नापने का अनोखा मापदंड है हाथी।

परभू ने जब बाँस को गहरे में गड़ा कर देखा तो सचमुच पूरा बाँस अंदर चला गया और सतह नहीं मिली। उसने कोशिश छोड़ दी। बाँस को ऊपर कर लिया। लेकिन, बाँस गीला हो गया था। उससे पानी चू रहा था। अब बाँस नाव में रखता तो पूरी नाव गीली हो जाती। सो वह बाँस को पानी में बहाता हुआ सा पकड़े हुए चलता रहा। डाँड़ खेने की मेहनत रोशन के चेहरे पर दिखने लगी। उसके माथे पर हल्के पसीने की बूँदें चुहचुहा आईं। उसने कमीज उतार दी। बनियान में उसकी काली लंबी बाँहें चमकने लगीं। जब डाँड़ उठा कर वह पानी को ठेलता तो बाजू की मछलियाँ चमकने लगतीं। अंची ध्यान से गंगा के पानी को देख रहा था। नाव के पीछे कतार बाँध कर कुछ कीड़े तैर रहे थे। पानी में कहीं-कहीं मटियाले रंग का फेन तैर रहा था। जब डाँड़ का चप्पू उठा कर पीछे रख कर पानी को ठेला जाता तो पानी में छोटे-छोटे भँवर से बनने लगते। नाव से थोड़ी दूर पर ऐसा लग रहा था जैसे पानी उबल रहा हो। नीचे का पानी ऊपर आता और ऐसे भँवर बनाता जैसे उसे नीचे से खौलाया जा रहा हो। यहाँ पर पानी बहुत गहरा होगा, मीर को लगा।

गंगा के किनारे बसा हुआ यह एक गाँव था। गाँव भी क्या कहिए, अब तो यह शहर के एक मोहल्ले में तब्दील हो चुका है। मल्लाहों की पूरी बस्ती। कुछ अन्य जातियों के मकान। और अब तो बाहर से आ कर बसे हुए लोगों की भी इफरात। लेकिन, मोहल्ले के पुराने बांशिंदों के बीच अभी-भी खास ही रिश्ते थे। लल्लन परिवार से खेतिहर थे। लेकिन, खेती की जमीनें बाद में हुए विकास की भेंट चढ़ गईं। लोगों को रहने के लिए मकानों की जरूरत पड़ी तो आवास-विकास ने परिवार की ज्यादातर जमीनें अधिग्रहीत कर लीं।

खेती करना तब भी लल्लन के खून में तो था लेकिन स्वभाव में नहीं। लेकिन, खेत जाने के बाद तो जैसे हाथ-पैर ही कट गए। कुछ पैसे मुआवजे में मिले। लेकिन, उन रुपयों के हाथ-पैर कहाँ उगे, वे कहाँ चले गए, कुछ पता नहीं चला। कभी बिजली मिस्त्री का काम किया तो कभी किराए पर टैक्सी चलाने का। लेकिन बात बनी नहीं। भाग्य अच्छा था कि सरकारी अस्पताल में ड्राइवर की नौकरी मिल गई। काम ज्यादा नहीं था। दिन भर बस आफिस में ही बैठना होता था। डाक्टर साहब को अगर कहीं जाना हो तो उनकी गाड़ी ले कर जाओ। नहीं तो बैठे रहो आफिस में। हाँ, कभी-कभी जब डाक्टर साहब दौरे पर निकलते तो सुबह पाँच बजे से ही ड्यूटी लग जाती। माघ मेले के समय भी ड्यूटी कठिन थी। लेकिन, डाक्टरों के साथ रहते-रहते लल्लन की पहचान भी बहुत हो गई। उस समय लोग इतनी दूरियाँ बना कर नहीं रखते थे। इसलिए जब किसी मरीज को दिखाने के लिए लल्लन अपने डाक्टर के पास ले जाते थे वह कुछ-कुछ हँसी-मजाक करता हुआ देख ही लेता था और दवा भी देता था। सामान्य तौर पर किसी डाक्टर के पास अस्पताल में जा कर दिखाना एक टेढ़ी खीर थी। लेकिन, लल्लन फटाक से अस्पताल की पर्ची बनवा देते और डाक्टर भी मरीज को देखने में काफी समय लगाता। इसके चलते मोहल्ले में भी उनकी धाक सी जमी हुई थी।

नाव तेजी से तैर रही थी। तेलिया रोशन ने उसे एक किनारे की तरफ से काटना शुरू कर दिया। मोहल्ले में हर एक के कई-कई नाम थे। एक तो माँ-बाप ने दिया था। दूसरा मोहल्ले-पड़ोस ने। और कई बार तो लोगों ने अपनी सुविधा के हिसाब से भी नाम रख लिए थे। तेलिया रोशन का नाम तो रोशन ही था। लेकिन मोहल्ले में कई माँ-बापों को अपने बच्चे से नाम रोशन की उम्मीद थी। इसलिए रोशन नाम रखनेवालों की भी भारी तादाद थी। ऐसे में कोई कन्फ्यूजन न रहे। इसलिए बचपन में सिर पर सरसों का तेल चुपड़ने की आदत का पीछा करते हुए लोगों ने उनके नाम रोशन के आगे तेलिया का उपसर्ग जोड़ दिया। मोहल्ले के एक दूसरे रोशन अपने बाप के नाम से जाने जाते थे। उनके नाम के पीछे महाराज का उपसर्ग लगाया गया था। इसी तरह टिड्डी मुन्ना भी थे। मोहल्ले में कई लोगों के बच्चों के नाम मुन्ना थे। इसलिए समान आयु के मुन्नाओं की पहचान गड़बड़ाने लगती थी। बचपन में दुबली-पतली कद-काठी के चलते उन्हें टिड्डी मुन्ना कहा जाने लगा। दरअसल, टिट्डहा मोहल्ले की भाषा में एक चिढ़ानेवाला शब्द था। जबकि, दूसरे मुन्ना का नाम मुन्ना पहलवान था। समझ ही सकते हैं कि यह नाम भी उनकी कद-काठी के चलते ही पड़ा होगा। नाम की महिमा तो मोहल्ले में अजीब ही है। बंगाली परिवार के पिंकी दादा का नाम तो माता-पिता ने कुछ सोच कर ही पिंकी रखा होगा। लेकिन, यहाँ तो पिंकी पेड़की में तब्दील हो गया। सब उन्हें पेड़की दादा ही बुलाते। उनके बड़े भाई खोक्खन का असली नाम क्या होगा, यह समझ पाना तो बेहद मुश्किल ही है। भगवान यादव का नाम भी सोच-समझ कर ही रखा गया होगा, लेकिन हर कोई उन्हें परभू कह कर बुलाता।

नाम की तो महिमा ही अपरंपार है। मोहल्ले के एक बड़े ही सशक्त महानुभाव है। गाय-गोरू से घर-परिवार भरा हुआ है। उनके माँ-बाप ने तो उनका नाम बड़ा चुन कर फूलचंद रखा। लेकिन, अपने बच्चों के मामले वे ज्यादा सृजनशील साबित नहीं हुए। बड़े बेटे का नाम रखा मुन्ना, उसके बाद फिर लड़का हुआ तो नाम रखा बच्चा, फिर लड़का हुआ नाम पड़ा मँझिलका बच्चा, फिर लड़का हुआ नाम पड़ा ननका बच्चा, इसके बाद फिर भगवान ने मेहरबानी की और लड़का हुआ तो नाम पड़ा ननका। यानी नामों का एक अंतहीन सिलसिला। यहीं पर छुटकारा नहीं। मुन्ना के यहाँ जब पहली किलकारी गूँजी और लड़का हुआ तो नाम उन्होंने रखा गोजर, दूसरा हुआ तो गोरई। नामों का यही सिलसिला आगे बढ़ता रहा। नाम रखना इतना कठिन भी नहीं। पहले तो नामों को सुन कर उनकी उत्पत्ति के बारे में अनुमान करना भी मुश्किल हो जाता था। बद्दों के बाप टिर्रा हैं तो माँ डिलिआइन। कहाँ से निकला होगा यह नाम। वे दिल्ली की हैं। दिल्ली से ब्याह कर आई हैं। तो नाम पड़ गया डिलीआइन। सुरसतिया का असली नाम क्या होगा, यह सोच-सोच कर हर कोई हैरान रह जाता था। सुरसति या सूरसति से तो अर्थ बैठता नहीं। बाद में पता चला कि असली नाम है सरस्वती। एक भाई का नाम गब्बर रखा तो दूसरे का रख दिया ट्रैक्टर। एक बाप ने थोड़ा खोजबीन कर अपने बेटे का नाम कुछ अलग सा रखने की कोशिश की तो उसने उसका नाम रख दिया त्रिमूर्ति। अब सब उसे तिनमुढ़हा, तिनमुढ़हा कहते हैं। यानी तीन सिरोंवाला। माँ-बाप ने नाम रखा चतुरानन, मोहल्लेवालों ने अपनी सुविधा के लिए कर दिया चौमुहा।

मनोज दो थे। एक मनोज पेंटर थे। तो दूसरा लिप्टहा मनोज। नाम से ही समझ सकते हैं। पेंटर मनोज तो दीवारों पर कंपनियों के विज्ञापन लिखने का काम करते थे। जबकि, लिप्टहा मनोज के हाथ में बचपन में ही गुड़ लिपट गया था। नाम की कहानी का तो कोई ओर-छोर नहीं है। क्योंकि, यहाँ पर पगलाइन, कंजा, लिल्लिल, पकीपोल और न जाने कितने नाम हैं। इनमें से कुछ की व्युत्पत्ति को समझना तो आसान है तो कुछ ऐसे हैं जिनका लाख सिर भिड़ा लो, ओर-छोर समझना मुश्किल होगा। ये जरूर है कि नाम से कई बार यह अंदाजा लगाना जरा भी मुश्किल नहीं रहता कि ये कई लोग आपस में भाई-बहन हैं।

नाम की बात चल रही है तो एक मजेदार किस्सा और याद आ रहा है। दिवाली के बारह दिन बाद एक त्यौहार पड़ता है डिठवन। महिलाएँ एकादशी का व्रत करती हैं। बच्चे दीपावली के बचे हुए पटाखे बजाते हैं। घर के काम-काज में इस्तेमाल किया जानेवाला एक जरूरी उपकरण है सूप। चावल और गेहूँ पछोरने से ले कर उसके तमाम काम है। सूप के बिना तो शादी-ब्याह की भी कल्पना नहीं की जा सकती। कबीर ने भी सूप की महिमा जानते हुए साधुओं को सूप जैसा स्वभाव धारण करने की शिक्षा दी। यानी सार को अपने पास रख लो। थोथे को फेंक दो। तो डिठवन में इस सूप का बहुत बड़ा काम था। दरअसल इस दिन सूप बदला जाता था। पुराने सूप को रात भर खपरैल पर रख दिया जाता था। तड़के घर की महिला उठ कर इस सूप को गन्ने की फुनगी से पीटती थी। सूप से निकली धप-धप की आवाज के साथ ही नारा लगाया जाता है, ईश्वर आवै, दलिद्दर जावै। ईश्वर आए, दलिद्दर जाए। सूप को थपथपाते हुए इस नारे को लगाते हुए पूरे घर भर की परिक्रमा जरूरी थी। इससे होता यह था कि घर में ईश्वर आ जाते थे और दलिद्दर भाग जाते थे। घर के एक-एक कोने से उन्हें सूप पीट कर भगा दिया जाता था। बाद में इस सूप को आग के हवाले कर दिया जाता था। इसकी लपटों से निकली सेंक सबको लेनी पड़ती थी। इससे भी सिर पर चढ़ा दलिद्दर भाग जाता है। लेकिन, अगर कोई रात के समय जब सूप खपरैल पर रखा रहता है, उस समय उसे चुरा ले और उसकी लपट से अपना बदन सेंक ले तो साल भर तक उसके सामने टिकने की औकात दलिद्दर भाई साहब की नहीं रहती। और जुए के खेल में तो उसकी पौ बारह हो जाती है। पत्ते बार-बार घूम कर उसके पास ही चले आते हैं।

अब समझ ही सकते हैं कि इस मान्यता के चलते मोहल्ले में कितनी रार पैदा होती थी। डिठवन की सुबह होती नहीं कि अपनी खपरैल पर रखा सूप गायब देख कर किसी की मेहरारू किसी को गरियाती हुई दिखाई पड़ती, तो किसी दूसरे की मेहरारू किसी दूसरे को। इस मान्यता का साइड इफेक्ट यह था कि सूप तो चोरी हो गया, अब दलिद्दर को साल भर तक टिकने का बहाना मिल गया और ईश्वर को साल भर तक नहीं आने का। कई बार तो ऐसे भी वाकए हुए कि किसी की मेहरारू घर भर में सूप पीट कर ईश्वर के आने और दलिद्दर के भागने का नारा लगा ही रही थी कि उसी समय चादर ओढ़ कर आया कोई दलिद्दर उसके हाथ से सूप छीन कर ही भाग जाता। तड़के चार बजे वह अपना सूप छीने जाने पर रोती-चिल्लाती-कलपती और सौ-सौ गालियाँ देती। लेकिन, सूप तो तब तक हवन हो चुका रहता।

डिठवन के दिन ईश्वरचंद की मेहरारू के सामने गंभीर मुश्किल आन खड़ी होती। जब सब लोग ईश्वर आवै दलिद्दर जावै, कहते रहते तो उसके मुँह से बोल नहीं फूटते। ईश्वर तो पति का नाम है। पति का नाम कैसे लें। तो उसने अनोखा तरीका निकाला। सूप पीटते समय उसका नारा सबसे जुदा था। दूर से अलग ही उसकी आवाज सुनाई पड़ती। ओनहीं आवैं, दलिद्दर जाए। ओनहीं आवैं, दलिद्दर जाए। अब ईश्वर तो खैर घर में ही थे। बाहर से कहाँ आते, लेकिन यह है कि दलिद्दर भाग रहा था। हर दो साल में बच्चों की संख्या में इजाफा हो रहा था। इसी के साथ ही गाय-भैंस भी बढ़ रही थी। और ईश्वर को बच्चों के बढ़ने से ज्यादा खुशी गाय-भैंस के बढ़ने से ही होती थी। पूरे मोहल्ले में गाय या भैंस की खीस पहुँचाई जाती। उबालने के बाद गाढ़े थक्के में जमने वाली खीस, गुड़ या चीनी डाल कर जब पेश की जाती तो किसी नेमत से कम नहीं लगती। किताब पढ़ने से बच्चे बिगड़ सकते हैं इसलिए ईश्वर के किसी बच्चे ने स्कूल नहीं देखा। गाय-भैंस बढ़ती गई, उन्हें चराने और सानी-पानी करनेवालों के हाथ बढ़ते गए। उन्हें बाँधने के नाम पर ज्यादा से ज्यादा जगह घेरी जाती रही। और घर से दलिद्दर भागता रहा। ईश्वर को अपनी गाय-भैंस बच्चों से भी ज्यादा प्यारी थी। लड़की की शादी हुई तो बारात में एक बाराती ने शराब पी कर हंगामा कर दिया। फिर क्या था। पूरी बारात को बाँध दिया गया। दूल्हे और उसके बाप ने चूँ-चपड़ की कोशिश की तो उन्हें भी आँखें तरेर कर चुप कराया गया। बंदूकों के साए में सात फेरे हुए। दूल्हे ने अपनी जान बचाने के लिए जैसे-तैसे फेरे पूरे किए। अगले दिन सुबह विदाई हो गई। ईश्वर को सात फेरों और मंत्रों की शक्ति पर बहुत यकीन था। एक बार बेटी विदा हो गई, फिर तो वो ससुराल की हो गई। अब उससे क्या। अब तो वह पराई हो गई। गर्दन पर बंदूक रख कर जिस बेटी का विवाह किया, उसने अपने ससुराल में क्या-क्या भोगा, मोहल्ले में कम ही लोग इसके बारे में जान पाए। हालाँकि, उस गाँव में एक-दो घरों की बेटियाँ और थीं, जिनसे किस्से पता चलते रहते थे। लेकिन, ईश्वर के लिए यह कोई मुद्दा नहीं था। क्योंकि, बेटी तो पराई हो गई। अब तो जो उसका भाग्य। लेकिन, डिठवन के दिन उनकी पत्नी सूप पीट कर ओनहीं आवैं, दलिद्दर जाए की गुहार लगाते हुए जरूर दिखती। और सचमुच दलिद्दर भाग रहा था। गाय-गोरू बढ़ रहे थे। हालाँकि, कछार में मटर काटने को ले कर हुई मारपीट में एक बेटा शहीद हो गया और उसका बदला लेने की जिद में दूसरा बेटा गुंडा। उसे भी जेल में ही आश्रय मिला। लेकिन, कुल मिला कर देखा जाए तो ईश्वर की संपन्नता बढ़ रही थी। क्योंकि, बच्चे चाहे कितने कम हो जाएँ, गाय-भैंस बढ़ रही थी। असली दुख तो उन्हें तब होता जब गाय-भैंस कम हो जाती। गोबर की खुशबू ही उनके जीवन का सबसे बड़ा प्राप्य था।

आसमान के भी रंग बदलते रहते हैं। मई-जून में निचाट और धूसर सा लगनेवाला आसमान जुलाई-अगस्त में नीला हो जाता है। नीले आसमान में भाप से भरे चटक सफेद, चाँदी जैसे और पानी से भरे काले बादलों की रेस लगी रहती है। बादल आसमान को ढँक लेते हैं। लेकिन, बादल हटते हैं, तो आसमान धुला-धुला सा लगता है। बारिश के साथ ही धूल-धुआँ सब जमीन में बैठ जाता है और आसमान एकदम नीला हो जाता है। शाम को जब कछार में सूरज सिर छिपाने की जगह ढूँढ़ने लगता है तो पूरी शाम ही साँवली और सुरमई हो जाती है, बादलों के छोटे-छोटे गुच्छे गुलमोहरों की तरह सूरज की किरणों का पीछा करते हुए उसके आसपास जुट जाते हैं। सितंबर-अक्टूबर में भी आसमान का नीला रंग काफी हद तक बरकरार रहता है। लेकिन, नवंबर-दिसंबर में आसमान के नीले रंग पर धूसर रंग फिर हावी होने लगता है। दिसंबर और जनवरी के दो महीनों में तो खैर आसमान के दर्शन भी कई बार नहीं हो पाते। क्योंकि, कोहरे और ओस से आसमान ढँका रहता है। सूरज दिन भर कोहरे की चादर को चीरने की कोशिश करते, श्रीहीन हो कर कहीं एकांत में जा कर सिर छिपा कर बैठ जाता है। कब सूर्योदय हुआ, कब सूर्यास्त, पता ही नहीं चलता। ये कोहरे के दिन जैसे जीवन को ही अपने में समेट लेते थे।

लेकिन, अभी कोहरे के आने में देर थी। ये नवंबर का मौसम था। कोहरे की हल्की चादर अलग ही छटा का निर्माण कर रही थी। बाढ़ के बाद नदी ने एक बड़ा सा पाट छोड़ा था। अगस्त में आम तौर पर बाढ़ उतरने लगती है। इस मौसम में दूर-दूर तक नदी के पानी में सड़नेवाली वनस्पतियों की गंध फैली रहती है। यह बाढ़ के गंध जैसी लगती है। लेकिन, नवंबर तक सड़ी हुई वनस्पतियाँ, मिट्टी, कीचड़ सब सूख जाता है। बाढ़ की गंध खतम हो जाती है। टखने के बराबर पानी में बगुले एकटक मछली के अपने पास आने के इंतजार में एकटक खड़े रहते हैं। एक पैर को आराम देने के लिए एक पैर पर खड़े रह कर वे अपने दूसरे पैर को ऊपर पंखों के बीच छिपा लेते हैं। अंची ने देखा, नदी की धारा के ऊपर एक पक्षी काफी देर से मँडराता रहा। अचानक ही अपने पंख फड़फड़ाते हुए वह हवा में ही एक जगह पर रुक गया। उसने नदी की सतह पर मछली की चमक देख ली। पानी के अंदर मछली पर सूरज की एक किरण पड़ी और मछली के शल्कों से वह किरण वैसे ही टकरा कर लौटी जैसी शीशे से टकरा कर लौटती है। पक्षी ने उस लौटती हुई किरण को देखा और एकटक हवा में पंख फड़फड़ाते हुए लटकते-लटकते अचानक ही अपने को छोड़ दिया। जैसे आसमान में टँगी कोई चीज जमीन पर गिरने लगी। पक्षी की चोंच पानी की तरफ थी। उसने झट से डुबकी लगाई, मछली को अपनी चोंच में दबाया, और पलक झपकने जैसी डुबकी के बाद ऊपर निकल आई। मछली उसकी चोंच में झटके मार रही थी। ये गंगा की जलपाखी है। किंगफिशर के जैसे। ये पाउड किंगफिशर है।

अंची एकटक इस खेल को देख रहा था। नदी पर उड़ते जलपाखी। अचानक एक जगह टँग कर आसमान में पंख फड़फड़ाना और नदी के पानी में सीधे गिर पड़ना। पानी में डुबकी मार कर मछली पकड़ना और उसे दबाए हुए दोबारा हवा में।

गंगा जीवनदायिनी है। जीवन और कुदरत के इस तरह के खेल यहाँ पर दिन भर चलते रहते। सदियों से ही। गंगाजी की ही आस पर पूरा मोहल्ला जीवित था। मल्लाहों का तो पूरा जीवन ही नदी के इर्द-गिर्द ही बीतता था। नदी में मछलियों की भरमार थी। टेंगरा, सेवरी, माँगुर, गेगरा, बैकरी, पड़िह्ना जैसी तमाम मछलियों की बहुतायत। रात के समय जाल लगाना और तड़के जाल निकालना और फँसी हुई मछलियों को ले कर बाजार में बेचना दिनचर्या का एक बड़ा हिस्सा था। इसके अलावा गंगा नहाने आनेवालों को नाव से गंगा स्नान कराने के लिए उस पार ले कर जाना भी बहुतों के रोजगार का हिस्सा था। बरसात बीतने के बाद जब बाढ़ का पानी उतर जाता था तो दूर-दूर तक कछार निकलने लगते थे। इन कछारों पर बाढ़ के साथ लाई गई उपजाऊ मिट्टी की मोटी परत चढ़ी रहती। इस पर तरबूज, खरबूज, खीरा, ककड़ी, लौकी, नेनुआ, कोंहड़ा जैसी तमाम चीजें उगाई जाती थीं। एक खास किस्म का चावल लुचुई भी मल्लाह बड़े शौक से उगाते थे। धान की अन्य किस्मों से छोटे, हल्की लाल आभा लिए हुए इस चावल को बेहद गुणकारी माना जाता। कछार की जमीन हर साल भागती-बदलती रहती है। इसलिए हर साल जमीन का बँटवारा एक बड़े ही सामाजिक तरीके से किया जाता।

मल्लाह बिरादरी के हर चूल्हे के हिसाब से कछार के छोटे-छोटे टुकड़ों का बँटवारा कर दिया जाता था। इसी हिसाब से उस पर खेती होती थी। इसके अलावा आमदनी का एक बड़ा साधन श्मशानघाट भी था। यहाँ का श्मशानघाट पूरे शहर में ही प्रसिद्ध था। मान्यता थी की कि यहाँ पर दाह संस्कार के बाद मृतक को सीधे स्वर्ग में एंट्री मिलती है। इसके चलते यहाँ पर दाह संस्कार से जुड़ा हुआ भी एक पूरा कारोबार था। इसका बड़ा हिस्सा दाह संस्कार की लकड़ियों का था। मल्लाह बिरादरी के हर परिवार की पारी बँधी हुई थी। इसी पारी के हिसाब से सभी को बारी-बारी से दाह संस्कार के लिए लकड़ियाँ बेचने का मौका मिलता था। यह कारोबार भी फायदे के कामों में शामिल था। इसके अलावा जमुना की बालू सप्लाई करने का काम भी एक मुख्य काम था। गंगा की बालू का इस्तेमाल निर्माण सामग्री के तौर पर खास नहीं। लेकिन, जमुना की बालू निकालने के लिए हजारों लोग जुटे रहते हैं। यमुना की बालू एक खास मोटाई की होती है। जिसे सीमेंट में मिला कर चिनाई और पलस्तर आदि के काम किए जाते हैं। बालू के इस कारोबार पर भी ज्यादातर मल्लाहों का ही कब्जा था।

अब नदी के इस पार और उस पार में बिंधे जीवन में गंगा की महिमा का बखान तो शामिल ही था। नाव तैर रही थी। तेलिया रोशन अपने दोनों हाथों में डाँड़ के सिरे पकड़े हुए थे। वह हाथों को कंधे के पीछे तक पूरी गोलाई में ले जाता और डाँड़ के अगले हिस्से में लगे चप्पू को नदी की सतह में एक जगह से उठा कर दूसरी जगह रखता और पूरी ताकत से पानी काटता। नाव आगे बढ़ती जाती।

नदी के पानी में हाथ डाल कर मक्खन ने कहा, पानी ठंडा होइगा है।

टिड्डी मुन्ना ने भी हामी भरी, हाँ, कमौ होइगा।

गंगा के पानी में कमी भी एक प्रकार से जाड़े का ही संकेत है। क्योंकि, बरसात में विशाल आकार ग्रहण कर लेनेवाली गंगा जाड़े में काफी सिकुड़ सी जाती थी। और दूर-दूर तक कछार निकल आते थे।

गंगा और शिकार से जुड़े रोचक किस्से शुरू हो गए। पहले गंगा में आई बाढ़ की चर्चा शुरू हुई। पहली शिकायत तो यही प्रकट की गई कि अब गंगा में कहाँ वह बाढ़ आती है जो पहले आती थी। एक बार की बाढ़ में तो गंगा किनारे बने हनुमान जी के मंदिर के ऊपर लगे पाँचों कलश डूब गए थे। लेकिन, मंदिर की महिमा भी कम नहीं। कलश के सब से ऊपर त्रिशूल नहीं डूबा था। अगर यह त्रिशूल भी डूब जाता तो फिर तो दुनिया में प्रलय आ जाती। खास बात यह भी रही कि इसी त्रिशूल पर पानी में बह कर आए किसी नाग ने भी शरण ले ली थी। बाढ़ में मंदिर के पास जाने की सामर्थ्य तो हर किसी के पास नहीं थी लेकिन दूर से भी लोग मंदिर के त्रिशूल और उस पर बैठे साँप को देखने आते रहते। कहनेवाले तो यहाँ तक कहते कि पानी जितना बढ़ता जाता त्रिशूल भी उतना ही ऊपर उठता जाता। त्रिशूल को कोई बाढ़ डुबा नहीं सकती। त्रिशूल अगर डूब गया तो पूरी दुनिया में प्रलय आ जाएगी।

बाढ़ शिकार के मौके भी आसान कर देती है। बाढ़ के समय कछार में बिल बना कर रहनेवाले खरहे अपने बिलों को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं। कई बार तो उन्हें तैर कर भी दूरी पार करनी पड़ती है। ऐसे मौकों पर उनका शिकार आसान हो जाता है। यूँ तो खरहों की झलक मिलना भी आसान नहीं होता। लेकिन, बाढ़ में तैरते समय उनका शिकार लाठी की चोट से भी आसानी से किया जा सकता है। फिर शुरू हुआ सुईस का किस्सा। सुईस मीठे पानी की डॉल्फिन है। लेकिन, यहाँ उसे इस नाम से कोई नहीं जानता। मक्खन किस्सा सुनाने लगे। बाढ़ के समय एक बार जाल लगाया गया था। उसमें बछड़े के बराबर सुईस फँस गई। जब जाल निकालने लगे तो पता चला कि अरे ई तो बहुत भारी है। बाहर लाए तो पता चला कि सुईस फँसी है और छटपटा रही है। लेकिन, गंगा मइया की महिमा है, हमने सुईस को हाथ नहीं लगाया। जाल से निकाल कर उसे दोबारा पानी में छोड़ दिया गया। लेकिन, इससे भी ज्यादा रोचक किस्सा एक बार जाल में फँसे घड़ियाल का था। नदी में घड़ियाल नहीं थे। लेकिन, बाढ़ के समय घड़ियाल के कहीं से बह कर आने के किस्से कई लोगों के पास थे। गंगा के पानी में घड़ियाल की बात सुनते ही अंची ने तुरंत ही पानी में से अपना हाथ बाहर कर लिया।

बाढ़ की बात छोड़ो, इस समय कछार में मिलेगा क्या-क्या। लल्लन शिकार की बात पर वापस लौटते हुए बोले।

बागडोर सँभाली परभू ने, चाहा के तो कई झुंड आए हैं चचा। दिन भर कछार में ही घूमते रहते हैं। इसके अलावा सुरखाब भी दिख रहे हैं। बस एक-दो हाथ लग जाएँ।

बाढ़ से उबरी जमीन पर हक जमाने के लिए तमाम जगहों के परिंदे भी इकट्ठे होने लगते थे। चाहा और सुरखाब इनमें से सबसे ज्यादा सामान्य हैं। सुरखाब ऐसे पक्षियों में शामिल हैं जिन्होंने दुनिया की सीमाओं में बँधना नहीं सीखा है। अमेरिका, अफ्रीका से मध्य एशिया और साउथ एशिया में इनके झुंड के झुंड उड़ा करते हैं। सुरखाब यानी सुनहरे पंखोंवाला। मौसम के हिसाब से ये अपने आशियाने तलाशते हैं। सर्दी के मौसम में सुरखाब के कई झुंड उत्तरी भारत के मैदानों में भी प्रवास करते हैं। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के अलावा कई देशों में ये जीवन के हिस्से में किसी न किसी तरह से शामिल हैं। अफगानिस्तान में सुरखाब के नाम पर एक नदी का भी नाम है। जबकि, पाकिस्तान में सुरखाब बेहद पसंदीदा टाइटलों में शामिल है। भारत में कहीं इन्हें चकवा-चकवी कहा जाता है तो कहीं इसे ब्राह्मणी बत्तख। बाकी दुनिया इसे रडी शेल्डक के नाम से जानती है। सुरखाब का नाम ही है सुनहरे पंखोंवाला। सुरखाब के पंख कभी नवाबों की पगड़ी की शान हुआ करते थे। अब दूल्हे के सेहरे में भी सुरखाब के पर लगाए जाते हैं। दुर्गा पूजा के दौरान भी सुरखाब के परों की कलँगी का इस्तेमाल किया जाता है।

टिड्डी मुन्ना ने जानकारी में इजाफा किया, सुरखाब हमेशा जोड़े में रहत है, एक मर गा, तो समझ लेओ की दूसरे की जान भी न बची।

सुरखाब का नाम सुनते ही अंची के कान खड़े हो गए। धीर अंची से चार साल बड़ा था। दोनों भाइयों के बीच एक बहन भी थी जो पैदा होने के डेढ़ साल बाद सही ढंग से इलाज नहीं कराए जाने के कारण मर गई। बीमारी उसकी बढ़ गई थी। लेकिन, इलाज उसका गाँव के ही झोलाछाप डा. अतहर करते रहे। लल्लन की अस्पताल की नौकरी, डाक्टरों से जान-पहचान, इस सबका कुछ भी प्रयोग नहीं किया गया। बेटी जैसे आई थी चुपचाप वैसे ही चली गई। अपनी माँ की गोद में जब उसने आखिरी हिचकी ली, उस समय अंची माँ के पैट में लात मारने लगे थे। एक बच्चा कोख में पल रहा था। और गोद के बच्चे की मौत हो गई। माँ के दुख की क्या गिनती।

धीरज जब पैदा हुए थे, बहुत दुर्बल थे। उनके भी बचने की उम्मीद कम थी। साँस चलती थी। रात में साँस साँय-साँय करने लगती। माँ घबरा जाती। रात भर जाग कर कड़ुवा तेल गरम कर शरीर की मालिश की जाती। तलवे में ब्रांडी लगाई। न जाने कितने लोगों से बीमारी झड़वाई। मजार पर सिर झुकाया। प्रसाद की मनौतियाँ मानीं। सत्यनारायण भगवान की कथा सुनी। धीर की जान बच गई। लेकिन, वे रह गए कमजोर और दुर्बल। थोड़ा बड़ा होते ही उन्होंने दुनिया को अपने नजरिए से देखने की शुरुआत कर दी। छह साल के हुए तो घर के बगलवाले नगर महापालिका के स्कूल में एडमीशन करा दिया। नर्सरी, एलकेजी, यूकेजी की तो बात ही छोड़ दीजिए। यहाँ पर पहली कक्षा गदहिया गोल से शुरू होती थी। यानी जिसको कुछ नहीं आता। धीर इसी में पढ़ने लगे। मास्टर जी पढ़ाई के बीच-बीच में एक शीशी से कुछ निकाल कर पिया करते थे। एक दिन मास्टर जी की निगाह चूकी तो धीर ने उनके झोले से निकाल कर पूरी शीशी गटक ली। कुछ ही देर में उनकी आँखें उलटने लगीं। जब मास्टरजी ने पूछा कि क्या हुआ तो दूसरे बच्चों ने बताया कि शीशी उलट ली। हंगामा खड़ा हो गया। मास्टर जी ने पहली धार की देशी शराब की शीशी रखी हुई थी। उनका कहना था कि बच्चे की तबियत खराब है इसलिए उसकी मालिश के लिए उन्होंने शीशी खरीदी थी। धीर बेहोश।

पानी डाला गया। दवाएँ खिलाई गईं। उल्टियाँ शुरू हुईं। चार-पाँच दिन बाद किसी तरह से तबीयत कुछ काबू में आई। दुनिया को कुछ इसी नजरिए से देखने की आदत धीर की पड़ गई। हाथ में गुलेल लिए दिन भर पक्षियों का पीछा करते। निशाना भी अचूक। खंबे पर बैठी गौरैया को काँच की गोली गुलेल में साध कर एसी मारी कि सीधे जा कर उसे लगी। गौरैया जमीन पर। चोंच से जीभ बाहर निकलने लगती। उसकी गर्दन काट कर उसका खून गुलेल को पिला दिया। इससे निशाना पक्का होता है। गुलेल बनाने के लिए सही डाल की तलाश करने के लिए नीम की टुन्नी पर चढ़ जाते। गंगा में तैरने जाते थे तो एैसा तैरते थे कि तैरने और जमीन पर दौड़ने में फर्क ही नहीं रहता। मल्लाहों जैसे ही पानी के कीड़े। मछली मारने में भी उस्तादी। लेकिन, एक बार स्कूल में घटी घटना के बाद उन्होंने स्कूल से तौबा कर ली। समय कटे कैसे तो गुलेल और मछली का जाल था ही।

अंची का स्वभाव अलग था। धीर और अंची के बीच में पैदा हुई बहन ने काफी अंतर कर दिया। अंची जब पैदा हुए तब तक उनकी माँ अपनी बेटी की मौत के सदमे से काफी कुछ उबर गई थीं। हालाँकि, ज्यादा वक्त नहीं हुआ था। क्या कोई एक सदमा झेलने के बाद दोबारा सदमे के पहले जैसा हो सकता है। बेटी की मौत के तीन महीने बाद ही अंची पैदा हुए। बेटी के मरने पर वे ठीक से रो भी नहीं पाईं। क्योंकि, बार-बार कोख में पलती जान की परवाह सामने आ जाती थी। माँ की इस उदासी ने अंची को भी घेरा हुआ था। पैदा होने के बाद जब वे अपने पैरों पर दौड़ने लायक हो गए, उस समय भी आम तौर पर वे गुमखयाल और संजीदा ही दिखते। जरा सी बात पर आँखें भर आतीं। कहें किससे। कहें या न कहें, हमेशा एक संकोच में रहते। लेकिन, इस संजीदगी ने उन्हें किताबों की दुनिया में धकेल दिया। वास्तविक दुनिया में उन्हें जो चीज नहीं मिली, उसकी तलाश उन्होंने कहानियों में करनी शुरू कर दी। एक तरह की खब्तुलहवासी छाई रहती। कई बार तो नजदीक खड़ा हो कर कोई पुकारता रहता और वे सुन भी नहीं पाते। एक बार तो डाक्टर से उनके कानों की जाँच भी कराई गई। लेकिन कमी कोई नहीं पाई गई। माँ बताती, तुम्हारी एक बहन भी थी। तुम्हारे पैदा होने के तीन महीने पहले ही उसकी मौत हो गई थी।

फिर माँ अपनी बेटी में खो जाती। बिटिया गोरी थी। चंचल थी। अपनी आँखों से टुकुर-टुकुर ताकती रहती थी। जब दूध पिलाती तो दूध चूसते हुए एकटक माँ को देखती रहती थी। माँ काम में लगी रहे तो धीरे से अम्माँ-अम्माँ कह कर पुकारने भी लगती थी। और रात में तो सीने से चिपक कर सो जाती थी। सोते समय भी उसके हाथ दूध पर टिके रहते थे। जब उसकी मौत हुई तो जैसे आँचल ही सूख गया।

अंची तीसरी कक्षा में पहुँच चुके थे। चौथी कक्षा में भी पास हो जाने की उन्हें पूरी उम्मीद थी। नीलकंठ दिख जाना शुभ होता है। बच्चों की पढ़ाई का भी वे सटीक अनुमान वे देते हैं। कुछ दिनों पहले एक पेड़ पर नीलकंठ बैठा हुआ था। अपने अन्य सहपाठियों की तरह ही अंची ने भी नीलकंठ से पूछा था, नीलकंठ-नीलकंठ, फेल होना बैठे रहना, पास होना उड़ जाना। उनके पूछने पर नीलकंठ उड़ गया था। यानी अगली कक्षा में उड़ कर उनके पहुँचने के पूरे चांस हैं। कक्षा में सभी बच्चे इसी तरह से अपने फेल-पास का अनुमान पहले ही लगा लेते थे।

इसके बाद, अंची ने अपनी किताब में विद्या का पेड़ भी रखा हुआ था। सरो वृक्षों से मिलती जुलती यह एक खास प्रजाति थी। मोरपंखी। इसकी सिरेनुमा पत्तियाँ आगे घूम कर गोल आकार लेती हुई लगतीं। कुछ इसे मोरपंख कहते तो कुछ इसे विद्या का पेड़ कहते थे। यह विद्या का पेड़ उन्होंने अपनी कापी में रखा हुआ था। इसके अलावा उन्होंने नीलकंठ का पंख भी जमा कर रखा था। नीलकंठ भगवान शिव का दूत है। नीलंकठ अगर चाह ले तो शिव की खास कृपा हो सकती है। नीलकंठ ही कक्षा में फेल या पास करा सकता है। इसलिए नीलकंठ का पंख अंची ने खास सँभाल कर रखा हुआ था।

अब सुरखाब का नाम सुन कर उनके कान खड़े हो गए। तुम्हारे अंदर क्या सुरखाब के पंख लगे हुए हैं। यानी सुरखाब का पंख कुछ खास है। अंची ने सोचा कि वह सुरखाब का भी एक पंख अपने पास जमा कर लेगा। जब लोग सुरखाब का शिकार कर लेंगे, वह चुपचाप वहाँ जाएगा और चुपके से सुरखाब का एक पंख नोंच लेगा। जैसे एक बार गुड़िया के बाल बनाने के लिए उसने घोड़े के पूँछ के बाल नोच लिए थे। घोड़े से लात मारने का खतरा भी था। लेकिन, सुरखाब कुछ नहीं करेगा। अंची चुपचाप उसके पंख चुरा लेगा।

इसी सुरखाब के लिए शिकारियों का यह दल नाव से गंगा पार निकल आया था। गंगा की कछार में भी सामने की ओर घाट था। यहाँ पर सुबह के समय नहाने के लिए बड़ी संख्या में लोग आते थे। लेकिन, दिन भर सन्नाटा रहता था। इसके बावजूद सुबह के समय होनेवाली चहल-पहल के चलते यहाँ पर पक्षियों की आमद कम ही होती। इसलिए नाव को यहाँ से काफी आगे दूर लगाया जाना था। नाव नदी के जिस किनारे से चली थी वहाँ से बहाव काटते हुए भी वह घाट से ज्यादा दूर नहीं जा पाई। इसलिए किनारे लगने पर अब रोशन नाव से उतरा। उसने अपनी पैंट घुटनों के ऊपर तक मोड़ ली और नाव को एक रस्सी के सहारे खींचने लगा। थोड़ी ही देर में परभू भी इसमें शामिल हो गया। अंची के लिए यह बेहद हैरानी भरी बात थी। दो आदमी मिल कर इतने लोगों से भरी नाव को खींचे ले जा रहे थे। नदी की धारा तेज थी। कई-कई जगह पर सफेद मटमैले रंग का फेन उतरा रहा था। नाव के पानी के साथ कुछ दूरी तक खिंच कर पानी में छोटे-छोटे भँवर भी बन रहे थे। नाव को घाट से दूर खींच लाया गया। यहाँ पर लंगर डाल दिया गया। शिकारियों के दल ने अपनी कंधों पर बंदूकों को सीधा किया। लाल-लाल रंग के कारतूसों की पेटी अपनी कमर पर बाँध ली और नाव से उतर पड़े।

कछार के खेत की बँटाई का काम हो चुका था। दूर-दूर तक खेतों को अलगाने के लिए सरपत की दीवार खड़ी की जा चुकी थी। सरपत की इन दीवारों से दो फायदे थे। एक तो खेत की सीमा का पता चल जाता था; दूसरे, रेत उड़ कर खेत की मिट्टी को नहीं ढँक पाती थी। खेतोंवाले हिस्से को पार करने के बाद दूर-दूर तक फैला कछार शुरू हो गया। यहाँ पर दूर-दूर तक खाली मैदान था। रेत और मिट्टी से भरा हुआ। कुछ जगहों पर सरपत के झुरमुट खड़े थे तो कुछ जगहों पर कुछ अन्य झाड़ियों के। यहीं पर खड़े हो कर सब लोग आभास लेने लगे। अब तक ज्यादातर जगहों पर बगुले ही दिखाई पड़े थे। लेकिन, यहाँ पर चाहा का एक झुंड दिखाई पड़ा। सरपत के एक झुरमुट की आड़ ले कर लल्लन, मक्खन और टिड्डी मुन्ना ने अपनी-अपनी बंदूकों में कारतूस भर लिया। 12 बोर की इस कारतूस से बारूद और छर्रे पिचकारी से छोड़े गए पानी की तरह निकलते हैं। यानी आगे की तरफ वे ज्यादा से ज्यादा चीजों को अपनी चपेट में लेते हैं। जबकि, रायफल की कारतूस एक सीध में चलती है। उसकी गोली घातक तो होती है लेकिन निशाना चूकने की संभावना भी ज्यादा होती है। फिर किसी पक्षी को रायफल की गोली लगने से उसके चीथड़े उड़ जाने की संभावना ज्यादा है।

तीनों ने अपनी बंदूकों से झुंड का निशाना साध लिया। पहले लल्लन ने अपनी दोनाली बंदूक से फायर किया। एक और दो। इसके साथ ही मक्खन और टिड्डी मुन्ना की बंदूक भी गरज उठी। पहली गोली की आवाज सुनते ही चाहा के झुंड में खलबली मच गई और वे उड़ चले, लेकिन उड़ते-उड़ते ही लगातार चली तीन और गोलियों ने कुछ को अपनी जद में ले लिया। उड़ने का प्रयास करते दो पक्षी वहीं पर गिर पड़े और तड़फड़ाने लगे। परभू भाग कर उनके पास पहुँचा और इन्हें अपने कब्जे में कर लिया। इस बीच दोनों पक्षियों ने दम तोड़ दिया। जबकि, थोड़ी ऊँचाई पर उड़ने के बाद एक और पक्षी तड़फड़ाता हुआ नीचे गिर पड़ा। उसे भी कब्जे में कर लिया गया। जबकि, एक अन्य पक्षी का पंख घायल हो गया था। उसे पकड़ने के लिए रोशन उसकी तरफ भागा। पक्षी के पंख उड़ने के काबिल नहीं रहे। लेकिन, अपनी लंबी-लंबी टाँगों पर वह जान ले कर भागा। रोशन उसके पीछे भागा। लेकिन, जैसे ही रोशन झुक कर उसे पकड़ने को होता वह गोल चक्कर ले कर, पैंतरा बदल कर दूसरी दिशा में भागने लगा। रोशन हाँफने लगा। अब चाहा को पकड़ने के लिए परभू और धीर भी नीचे उतर गए। तीन तरफ से घेर कर उसे कब्जे में कर लिया गया। चाहा के दोनों पंख एक-दूसरे में फँसा कर बाँध दिए गए। पक्षी की चोंच से जीभ बाहर आ गई। और वह तेज-तेज हाँफने लगा। कुछ ही देरी में उसके मुँह से लार गिरने लगी और उसने अपनी अंतिम साँसें ले लीं।

गोलियों की आवाज पूरे कछार में गूँज उठी थी। तड़ातड़। कगार की ऊँची-ऊँची दीवारों में सुराग करके घोंसला बनाने वाले मैना तेज आवाज करके आकाश में मँडराने लगे। चाहा को समेटने के बाद शिकारियों ने देखा कि दूर कहीं कुछ लोग भाग रहे हैं। वहाँ पर से उठता हुआ हल्का धुआँ भी दीखने लगा। जिसे बुझाया जा रहा था। चाहा के झुंड में से चार पक्षियों की बलि इस शिकारी दल ने ले ली थी। इस बीच कछार की हलचलों को देख कर सब उसी तरफ चल पड़े। यह समझने में किसी को भी देर नहीं लगी कि वहाँ पर क्या हो सकता है।

दरअसल, जिस एक धंधे का जिक्र ऊपर नहीं किया जा सका था वह था कच्ची शराब। कच्ची शराब नदी की सतह पर तैरते हुए चलनेवाले इस जीवन का उल्लास था तो यही उनके दुखों का कारण भी। अंग्रेजी शराब महँगी थी। देशी मसालेदार शराब पीना भी हर किसी के बस की बात नहीं थी। इसलिए कच्ची शराब सबके लिए सुलभ थी। कछार में जगह-जगह उसकी भट्टियाँ लगी हुई थीं। बेहद आसान तरीके से कच्ची शराब बनाई जाती थी।

सरसों का तेल टिन के कनस्तर में आता है। तेल खाली करने के बाद भी इस कनस्तर का इस्तेमाल बहुतेरा है। कनस्तर के किनारे बने एक छोटे सुराख से तेल निकाल लिया जाता है। इसी कनस्तर को साफ करके इसके अंदर गुड़, महुआ, अंगूर, अन्य प्रकार के फल आदि सभी सड़ा दिए जाते हैं। तीन चार दिन रखने के बाद इनमें से एक खास प्रकार की बदबू सी उठने लगती है। इसके बाद इस कनस्तर को आग की भट्टी पर चढ़ा दिया जाता है। कनस्तर के तेल निकालनेवाले गोल सुराग से एक पाइप जोड़ दिया जाता है। सुराख के मुहाने पर पाइप लगाने के बाद अच्छी तरह से आटे से बंद कर दिया जाता था ताकि भाप वहाँ से न निकले। भट्टी पर चढ़े कनस्तर को खौलाया जाता। इसके बाद भाप धीरे-धीरे पाइप के जरिए बाहर आने लगती। पाइप के एक सिरे में बोतल लगा दी जाती। भाप यहाँ पर आ कर बूँद-बूँद करके टपकने लगती। पहली बोतल होती पहली धार की, दूसरी बोतल दूसरी धार की। पहली धार की शराब सबसे तेज। थोड़ा सा जमीन पर गिरा कर माचिस दिखा दो, भक्क से आग पकड़ लेगी।

शराब की ऐसी ही भट्टी होने की भनक उन्हें वहाँ लग गई थी। दरअसल, कछार में जगह-जगह बन रही भट्टियों के चलते वहाँ पर आबकारी विभाग का छापा भी अक्सर ही पड़ता रहता था। आबकारीवाले नाव पर चढ़ कर तो कभी कछार की दूसरी ओर से वहाँ आते थे और भट्टियों को नष्ट कर देते थे। शराब बनानेवालों को पकड़ ले जाते थे। उन्हें जेल हो जाती थी। हालाँकि, जेल से आने के बाद वे फिर से उसी धंधे में लग जाते। लेकिन, इस बीच भी कछार में भट्टियों की संख्या कम नहीं थी।

कई बार शराब बनानेवालों और आबकारीवालों के बीच झड़प भी हो जाती थी। ऐसे मौकों पर कछार गोलियों से गूँजने लगता था। इस शिकारी दल के कंधे पर टँगी बंदूकों और गोलियों की तड़ातड़ से भट्टीवालों ने सोचा कि आबकारी का छापा पड़ा है। इसलिए वे जल्दी से भट्टियों को बुझा कर और माल को छुपा कर वहाँ से भाग खड़े हुए। लगभग दौड़ते हुए ये शिकारी भी वहाँ पहुँच गए। वहाँ पर कुछ भी नहीं था। जानेवाले भट्टी बुझाने के साथ ही अपने साथ माल ले कर भी चले गए थे।

लेकिन, परभू की नाक बहुत तेज थी। उसने बालू को ही सूँघना शुरू किया। जहाँ भट्टी थी, जहाँ राख गिराई गई थी, उन जगहों पर बारीकी से निगाह डाली, फिर एक किनारे जा कर हाथ से ही बालू खोदने लगा। थोड़ा सा खोदने पर ही पतले कनस्तर की दीवार दिखाई पड़ने लगी। कनस्तर देख कर तो उसका उत्साह दोगुना हो गया। खोक्खन, रोशन, परभू ने मिल कर कनस्तर के चारों ओर की बालू हटानी शुरू की। कुछ ही देर में पूरा एक कनस्तर उनके हाथ में था। देसी शराब से भरा। परभू ने कनस्तर सूँघा। एकदम ताजी शराब है। पहली धार की। इसकी जाँच कैसे हो, कनस्तर में से शराब की कुछ बूँदें रेत पर गिराई गईं। माचिस की तीली दिखाते ही शराब ने भक्क से आग पकड़ ली। एकदम पहली धार की है। बस, पूरा कनस्तर कब्जे में। शिकार का मजा दोगुना हो गया। चार चाहा हाथ में आ ही चुके थे, इसके बाद एक पूरी कनस्तर भर शराब भी हाथ लग गई। इससे बढ़ कर क्या हो सकता है। शिकार में अब कइयों की रुचि खतम हो गई। लेकिन, अभी दिन काफी बचा हुआ था। फिर चाहा में ज्यादा मांस होता नहीं, इसलिए चार चाहा तो दावत के लिए कुछ नहीं है। कछार का एक चक्कर मार लेना ही ठीक है।

शराब का कनस्तर नाव में रख दिया गया। सब लोग फिर से शिकार की तलाश में आगे निकल पड़े। बालू थोड़ा पक्की होती जा रही थी। बाढ़ के साथ लाई गई मिट्टी की मात्रा यहाँ की रेत में ज्यादा थी। बीच-बीच में सरपत के झुरमुट भी उगे हुए थे। यहाँ से वहाँ तक, कछार का विस्तार दूर-दूर तक फैला हुआ था। शिकारी दल को देख कर एक टिटिहरी तेजी से टिट्-टिट् करने लगी। वो तेजी से उड़ते हुए आती और रेत में एक जगह को लगभग छूती हुई तेजी से ऊपर उड़ने लगती। इसके साथ ही तेजी से टिट्कार करती, टिट्-टिट्। टिटिहरी यूँ तो शिकार किए जानेवाले पक्षियों में शामिल नहीं थी। और टिटिहरी का मांस कोई खाता भी नहीं, इसके बावजूद शिकारियों की उत्सुकता उसकी तरफ जाग गई। जरूर वहाँ पर कोई टिटिहरी का घोंसला है। उसी की रक्षा के लिए वो इतना टिटकार करने लगी है। रोशन और खोक्खन तेजी से उस ओर भागे। काफी देर तक वे रेत में कहीं पर टिटिहरी का घोंसला तलाशते रहे। लेकिन, घोंसला हाथ नहीं लगा। टिटिहरी अपनी चाल में कामयाब हो गई। उसने रेत में ही एक जगह छोटे-छोटे कंकड़ों को घेर कर घोंसला बनाया हुआ था। जैसे उसने अपने घोंसले के नजदीक शिकारियों को आते देखा। वो तुरंत ही घोसले के एकदम विपरीत दिशा में जा कर टिटकार करने लगी। शिकारियों ने सोचा कि उसका घोंसला यहाँ होगा और वे वहाँ चले गए। टिटिहरी की यही चाल तो है जिसे वह हरदम तब अपनाती है जब कोई उसके नजदीक चला आता है। वह घोंसले के नजदीक आनेवाले को कन्फ्यूज कर देती है। यहाँ तक कि कई बार तो कुत्ते और सियार भी उसकी चाल से कन्फ्यूज हो कर घोसले से काफी दूर चले जाते हैं।

वैसे भी शिकारियों को टिटिहरी के घोंसले से कुछ खास हासिल नहीं होता। यह तो बस घोंसला देखने की उत्सुकता ही थी। इसलिए थोड़ी ही देर में उनकी दिलचस्पी खतम हो गई। और सभी लोग आगे बढ़ने लगे। कुछ ही दूरी पर जा कर सरपत के झुंड थोड़े घने हो गए थे। ऐसा लग रहा था कि वहाँ से कुछ दूरी पर पानी का कोई तालाब सा बन गया है। ऐसे तालाबों में मछलियों की भरमार हो जाती है। दरअसल जब बाढ़ का पानी उतरने लगता है तो कई जगह से रेत उभरने लगती है। लेकिन, कुछ जगहें जो ज्यादा नीची होती हैं, वहाँ पर पानी भरा रह जाता है। ये ही कछार में एक प्रकार के तालाब हो जाते हैं। ऐसे तालाब में मछलियाँ होती हैं, इसलिए पक्षी भी होते हैं।

शिकारी धीरे-धीरे चलने लगे। उनकी साँसें तेज हो गईं। लेकिन आपस में बोल-चाल बंद हो गई। उन्होंने वहाँ पर सुरखाब के दो जोड़े देखे। पंख एकदम सुनहरे। गर्दन किसी बत्तख जैसी ही शानदार और सुडौल। कुछ देर तो वे सुरखाब को देखते ही रह गए। शिकारियों ने अपनी बंदूक की बट को कंधे पर अच्छी तरह से गड़ा दिया। नाक को बंदूक की नाल से एकदम सीध में कर लिया। एक आँख मींच ली। दोनाली बंदूक के बीच में लगी छोटी सी मक्खी को बिलकुल सुरखाब के निशाने पर किया। वहाँ पर चार सुरखाब थे। लेकिन, वे सारे एक साथ नहीं थे। सुरखाब हमेशा जोड़े में रहते हैं। इसका मतलब है वे दो जोड़े थे। सुरखाबों पर शिकारियों का निशाना सध चुका था। बंदूक की बट को कंधे पर ठोस सहारा देते, नाक को नाल से सटाते और एक आँख को मींचते हुए पहली गोली चली। इसके बाद एक-एक कर तीन और फायर हुए। बारूद की एक फुहार सी पक्षियों के ऊपर टूट पड़ी। लेकिन, इससे पहले कि गोलियों के छर्रे उनके ऊपर गिरते, उनकी आवाज पक्षियों के पास पहुँच गई। अपने भारी पंखों को फैला कर उन्होंने तुरंत ही हवा में छलाँग लगा दी। वे उड़ने लगे। लेकिन, एक सुरखाब पहली ही छलाँग के बाद गिर पड़ा। उसका एक पंख टूट गया था। उसकी गर्दन में भी एक छर्रा लगा था। वो नीचे गिर कर तड़पने लगा। तेजी से उसने फिर उठने की कोशिश की। फिर से हवा में छलाँग लगाने की कोशिश। लेकिन इस बार वह मुँह के बल गिरा। उसकी गर्दन बालू में लिथड़ती चली गई। उसकी चोंच में ढेर सारा बालू भर गया। एक बार तो वह जमीन पर पीठ के बल लोट गया। फिर उछलने की कोशिश की। फिर छलाँग लगाने की कोशिश की। लेकिन, उसकी परवाज थम चुकी थी। थोड़ी देर तक छिटकने के बाद उसने दम तोड़ दिया।

जब शिकारी उसके पास पहुँचे तो उसमें प्राण नहीं थे। वह मर चुका था। सुनहरे रंग के उसके पंख जो किसी कलँगी की शोभा बनते, बालू और रेत से सने हुए थे। शिकारियों ने उसे कब्जे में किया। सुरखाब काफी वजनी था। उसके वजन और सेहत को देख कर तो यही लगता था अब तक उसकी जिंदगी काफी अच्छी बीती थी और उसे बहुत पर्याप्त मात्रा में मछलियाँ, घोंघे और कीड़े आदि मिलते रहे होंगे। अब ज्यादा शिकार करने की जरूरत नहीं थी।

चार चाहा और एक सुरखाब मिला कर कुल पाँच पक्षी शिकार में मिल गए थे। बालू में गड़ा मिला अमृतघट का कनस्तर भी शिकार की ही उपलब्धि रहा है। अब और क्या चाहिए। अब तो बस इसकी दावत का इंतजाम किया जाए। बस अब लौट चला जाए।

कनस्तर पहले ही नाव में रखा जा चुका था। रोशन और खोक्खन ने अपने दोनों हाथों में चाहा लटका रखे थे। चाहा के पैर पकड़े हुए थे। इससे वे उलटे लटके हुए थे। ठीक इसी तरह परभू ने सुरखाब लटका रखा था। सुरखाब की लंबी गर्दन और चोंच कई बार रेत में लिथड़ने लगती तो भगवान उसे थोड़ा सा ऊपर कर देता। नाव पर ला कर एक कोने में पक्षियों को भी रख दिया गया। नाव को अब किनारे की तरफ खेना है। रोशन ने फिर डाँड़ सँभाली। इसके बाद चप्पू धीरे-धीरे चलाने लगा।

कुछ ही दूरी पर उमरसिंह और किरीचंद अपना जाल समेट रहे थे। पानी में ही लंगर डाल कर उन्होंने नाव खड़ी की हुई थी। दोनों नाव के एक किनारे बैठ कर जाल उठा रहे थे। जाल में फँसी मछलियों को बीन-बीन कर वे एक तरफ रखते जा रहे थे। नाव में ही एक तरफ तसले में उन्होंने कुछ कंडे जलाए हुए थे और उस पर एक भगौना रखा हुआ था। इस भगौने में मछलियाँ पक रही थीं।

शिकारियों को देख कर उन लोगों ने दूर से पूछना शुरू कर दिया। अरे चचा कुछ हाथ लगा कि नहीं। रोशन ने ही थोड़ा गर्व भरी मुद्रा में आँखों से उन लोगों को पक्षियों की ओर इशारा किया। लेकिन, इससे भी बड़ा माल तो कनस्तर में था। उमरसिंह और किरीचंद ने जब शराब की कनस्तर की बात सुनी तो उनकी भी बाँछें खिल गईं। दोनों नावें करीब लगा ली गईं। दोनों दिन भर और कई बार तो रात-रात भर मछली मारते रहते थे। इसके चलते उन्होंने नाव के तसले में ही मछली पकाने की व्यवस्था भी कर रखी थी। तसले में भगौना चढ़ा कर मछली पकाई जाती। खाने के लिए दो थालियाँ भी थीं। गंगा के पानी से तुरंत ही थाली धो ली गई। इसके साथ ही दोनों थालियों में मछलियाँ परोस दी गईं। नाव में पीने के लिए गिलास तो थे नहीं। लेकिन, नाव से पानी उलीचने के लिए उसमें कुछ छोटे-छोटे डिब्बे जरूर रखे हुए थे। इन्हीं डिब्बों में कनस्तर की शराब ढाली जाने लगी। इसमें गंगा का पानी मिला कर जाम चढ़ाया जाने लगा। लल्लन ने भी एक जाम चढ़ाया। मक्खन ने भी। इसके बाद दूसरे की बारी आई। रोशन ने पहले खाली डिब्बे में गंगा का पानी भरा, उसके बाद उसमें शराब उड़ेल दी। लल्लन ने शराब का एक तगड़ा घूँट भरा, इसी बीच उमरसिंह का जाल देखने के लिए वे उठे तो अपना जाम धीर को पकड़ाते गए। धीर ने भी आव-देखा न ताव जाम चढ़ा लिया। इसी तरह की गफलत में उसने दो और जाम चढ़ा लिया। कुछ ही देर में वो शिथिल हो गया। जम कर पी कर और भगोने में पकी मछलियाँ खा कर शिकारियों की नाव फिर घाट की तरफ चल पड़ी।

लेकिन, घर पहुँचते-पहुँचते ही धीर की हालत खराब हो गई। घर के दरवाजे पर ही वह बेहोश हो कर गिर पड़ा। शिकारी भी टुन्न थे। जब वह बेहोश हो कर गिरा तो लल्लन को कुछ होश आया। ऐसी हालत कैसे हो गई। इसके कारण तलाशे जाने लगे। अब ये बात सामने आई कि धीर ने तीन डिब्बे पिए थे। यह भी होने लगा कि उसे पीने के लिए तो कहा नहीं था फिर उसने क्यों पी। उसे तो केवल पकड़ने के लिए कहा था।

धीर की साँसें जोर-जोर से चलने लगीं। कुछ लोगों ने बताया कि देर तक पानी डालने से नशा उतरने लगता है। उसका शरीर शिथिल पड़ने लगा। उसे पानी से नहलाया जाने लगा। उसका सारा शरीर भीगा हुआ था। माँ दौड़ कर आई। उसने धीर का माथा सहलाना शुरू किया। मोहल्ले भर के लोगों की भीड़ लगने लगी। सब इकट्ठा हो गए। एक तरफ चार चाहा और एक सुरखाब पड़े हुए थे। सुरखाब की गर्दन बालू में लिपटी हुई थी। उसकी चोंच से अभी भी लार निकल रही थी। दूसरी तरफ, धीर को उल्टियाँ शुरू हो गईं। भीड़ और कोलाहल में किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या किया जाए। घर में रोना-पीटना मचने लगा।

धीर को उल्टियाँ करते हुए देख कर अचानक ही अंची ने पलट कर सुरखाब की तरफ देखा। मुँह की लार मुँह में ही सूखने लगी थी। उसके शानदार सुनहरे पंखों में गीली बालू जगह-जगह चिपकी हुई थी। कुछेक पंख खून से भी भीगे हुए थे। उसने सुना हुआ था कि सुरखाब हमेशा जोड़े में रहते हैं। तो क्या इस सुरखाब को गोली लगने के बाद इसका जोड़ा वहाँ वापस आया होगा। हाँ, जरूर आया होगा। लौटने पर उसे अपना सुरखाब नहीं मिला होगा। जमीन पर बस उसके घिसटने के निशान बने हुए हैं... खून की कुछ बूँदें पड़ी हुईं हैं... यहीं पर उसके सुरखाब की चोंच घिसड़ी थी... यहीं पर उसकी लार गिरी थी... यहीं पर अपनी चकवी को याद करते हुए चकवे ने प्राण त्याग दिए थे। अब चकवी क्या करेगी। अंची की कल्पना में बालू में चीत्कार करती एक सुरखाब का चित्र सजीव हो उठा। सुरखाब हर तरफ उसे खोज रही है। उसकी तलाश कर रही है। इस उम्मीद में कि कहीं उसका सुरखाब किसी सरपत के झुंड में न छुप गया हो, वह वहाँ भी तलाशती है। उसे बार-बार आवाज देती है। लेकिन, सुरखाब नहीं है। सुरखाब अपनी चोंच बालू में घसीट रही है। लथोड़ रही है। उसके पंख पर गीली बालू चिपटने लगी है। उसके मुँह से भी लार बहने लगी है। क्या अपने चकवे की याद में चकवी ने ऐसे ही दम तोड़ दिया होगा? और जिन पंखों को नोच कर अपनी किताबों में सजाने की कल्पना अंची ने कर रखी थी, वे पंख पानी में भीग कर, बालू में लिथड़ कर अपनी सुंदरता खो चुके थे। बड़े भाई की हालत देख कर छोटे की आँखें भीग गईं।

                                                                            ---कबीर संजय---

रविवार, 10 मार्च 2013

एक कुत्ते की डायरी


शुनिचैव श्‍वापाके च पंडित: समदर्शिन:। (गीता)

मेरा नाम 'टाइगर' है, गो शक्‍ल-सूरत और रंग-रूप में मेरा किसी भी शेर या 'सिंह' से कोई साम्‍य नहीं। मैं दानवीर लाला अमुक-अमुक का प्रिय सेवक हूँ; यद्यपि वे मुझे प्रेम से कभी-कभी थपथपाते हुए अपना मित्र और प्रियतम भी कह देते हैं। वैसे मैं किस लायक हूँ? मतलब यह है कि लालाजी का मुझ पर पुत्रवत प्रेम है। नीचे मैं अपने एक दिन के कार्यक्रम का ब्‍यौरा आपके मनोरंजनार्थ उपस्थित करता हूँ -

6 बजे सवेरे - घर की महरी बहुत बदमाश हो गई है। मेरी पूँछ पर पैर रख कर चली गई। अंधी हो गई क्‍या? और ऊपर से कहती है - अँधेरा था। किसी दिन काट खाऊँगा। गुर्र-गुर्र... अच्‍छा-चंगा हड्डीदार सपना देख रहा था और यह महरी आ गई - इसने मेरे सपने के स्‍वर्ण-संसार पर पानी फेर दिया। विचार-श्रृंखला टूट गई। बात यह है कि मैं एक शाकाहारी घर में पल रहा हूँ। अत: कभी-कभी मांसाहार का सपना आ जाना पाप नहीं! यह मेरी अतृप्‍त वासना है, ऐसा परसों मालिक से मिलने को आए एक बड़े मनोवैज्ञानिकजी कह रहे थे।... फिर सो गया।

7 बजे - कोई कम्‍बख्‍त आ ही गया। नवागन्‍तुक दिखाई देता है। बहुत भूँका - पर नहीं माना। जरूर परिचित होगा। जाने दो - अपने बाबा का क्‍या जाता है? डेढ़ सौ वर्षों से ब्रिटिश नौकरशाही ने हमें यही सिखाया है - किसी की सॉरी, किसी का सर, अपने से क्‍या? हम तो भुस में आग लगा कर दूर खड़े हैं तापते!

8 बजे - नाश्‍ता-पानी। आज ब्रेकफास्‍ट की चाय पर बहुत गर्मागर्म बहस हो रही है! क्‍या कारण है? मालिक कह रहे हैं कि इन मजदूरों ने आजकल जहाँ देखो वहाँ सिर उठा रखा है। कुचलना होगा इन्‍हें! जान पड़ता है - मजदूर कोई साँप है। मालिक के मित्र बतला रहे थे कि उत्‍पादन में कमी हो रही है। हड़तालों के मारे तबाही मची हुई है। ऐसा कहते हुए उन्‍होंने अपनी नई 'सुपरफाइन' धोती से चश्‍मे की काँच पोंछ कर साफ की थी। मालिक की लड़की कुछ उद्धत जान पड़ती है; बाप से मतभेद रखती है। यही तो कुत्तों की जाति और मानव-जाति में अंतर है - कुत्ता सदा वफादार रहता है; आदमी, ये अहसान-फरामोश हो जाते हैं!

9 बजे - बगीचे में मालिक के छोटे लड़के (और आया उनके साथ) सैर के लिए आए। फूलों के विषय में आया कुछ भिन्‍न मत रखती है; मालिक के लड़के का कुछ और मत है। मेरी दृष्टि से तो ये सब काट-तराश बेकार-सी चीज है - मगर नहीं - मैं अपना मत नहीं दूँगा - पहले मैं यह जान लूँ कि फूलों के बारे में मालिक का क्‍या मत है? तभी अपना मत देना कुछ 'सेफ' होगा।

10 बजे - एक नए ढंग के जानवर से मुलाकात हो गई। यह 'फट् फट् फट्' आवाज बहुत करता है, नथुनों से धुआँ उगलता मालिक चाहता है तब रुकता है, चाहता है तब सरपट दौड़ता है। बड़ी चमकीली आँख है उसकी। मैंने भरसक उसकी नकल में भूँकने और दौड़ने की कोशिश की - मगर यह किसी विदेश से आया हुआ प्राणी जान पड़ता है। जाने दो, अपने को विदेशियों से क्या पड़ी है? अपने राम तो 'स्‍वदेशी' के पुरस्‍कर्ता हैं - चाहे नाम ही स्‍वदेशी हो और बनाने के यंत्र सब विदेश से आते हों।

11 बजे - भोजन। इस संबंध में इतना ही कहना पर्याप्‍त होगा कि अच्‍छे-अच्‍छे तनखावाले बाबुओं को जो नसीब न होगा, ऐसा उम्‍दा पकवान हमें मिल जाता है। सब भगवान की लीला है। जब वह खाता हूँ तो भूल जाता हूँ कि मेरे गले में कोई पट्टा भी है या मुझे भी कभी मालिक ठोकर मारता है। मुझे स्‍वामी की ठोकर अतिशय प्रिय पुचकार की भाँति जान पड़ती है।

12 बजे से 3 बजे तक - विश्रांति।

3 बजे - सहसा किसी का स्‍वर। निश्‍चय ही वह मालिक की बड़ी लड़की का मुलाकाती, भूरे-भूरे बालोंवाला तरुण है! वह मखमल की पैंट पहनता है, पहले मैंने उसे किसी चितकबरी बिल्‍ली का बदन ही समझा - वह गरीबों की बात बहुत करता है! आज उसने जो चर्चा की उसमें कला का भी बहुत उल्‍लेख था। जान पड़ता है कि शिकारी कुत्ते को जैसे एक खास काम के लिए पाल कर बड़ा किया जाता है; वैसे ही यह कलाकार नाम का प्राणी भी समाज में किसी खास हेतु से बढ़ाया जाता है।

4 बजे - शाम की चाय के वक्‍त बहुत मंडली जुटी थी। घर खास चाय घर बन गया था। आज 'हिंदुत्‍व', हिंदू-सभा, 'हिंदू-वीर', 'हिंदू-दर्शन' आदि विषयों पर बड़ी बहस हुई। कई लोग थे जो इस बारे में उदासीन थे कि वे अपने को हिंदू कहें या अहिंदू। दो-चार नौजवान इस बारे में बहुत 'टची' थे। जैसे कुत्ते की थूथड़ी पर कोई बेंत मारे तो वह तिलमिला उठता है; वैसे ही उनके हिंदुत्‍व पर चोट करने से ऐसा जान पड़ता था कि उनके सतीत्‍व पर चोट हो रही है। मैं जानना चाहता हूँ कि हिंदू क्‍या चीज है? यह किस चिड़िया का नाम है? मेरा पुराना मालिक ईरानी था - और तब भी मैं सुखी था - अब भी हूँ। गुलाम का कोई धर्म नहीं होता - कहते हैं अब यहाँ के आदमी आजाद हो गए हैं - मगर पैसे की गुलामी तो अभी बाकी ही है। जैसे प्रसन्‍न हो कर मेरी जाति के प्राणी अपनी पूँछ हिलाने लगते हैं; वैसे मैंने कई विद्वान, चरित्रवान, निष्‍ठावान, धर्मवान (माने जानेवाले) महानुभावों को पैसे की सत्ता के आगे पिघलते हुए देखा है। हिंदुत्‍व बड़ा है या पूँजीत्‍व?

5 बजे - बाहर फिर घूमने के लिए चला। मालकिन मेमसाहिबा खास कपड़े पहने, ऊँची एड़ी के जूते, रंगीन साड़ी वगैरह के साथ थीं। मेरी भी चेन खास ढंग की थी। यह तभी पहनाई जाती है जब मालकिन किसी उत्‍सव-विशेष या बाइस्‍कोप वगैरह में शामिल होती हैं। आज भी कुछ भीड़ देखने को मिलेगी। मेरी दृष्टि में सभा-समाजों की भीड़ और सिनेमा-थिएटर की भीड़ में खास अंतर नहीं।

6 से 8.30 बजे तक - एक सफेद पर्दे पर हिलती-बोलती तस्‍वीरें देखीं। अरे, तो यह आदमी जो अपने आपको बहुत सभ्‍य समझता है सो कुछ नहीं है। जैसे हम लोगों में प्रेमातुरता होती है, वैसे ही इनके चलचित्रों की नायक-नायिकाएँ दिखाती हैं। कोई खास अंतर लड़ने-भिड़ने में भी नहीं - जैसे दो श्‍वान एक हड्डी के लिए लड़ते हैं, दो मानव एक मानवी के लिए या मत के लिए या पराए देश के लिए। अच्‍छा हुआ मैंने यह दृश्‍य देख लिया, जिसे हजारों मानव चुप बैठे हुए आँखों के सहारे निगल रहे थे। मेरा स्‍वप्‍न भंग हो गया। मानव जाति को मैं बड़ा आदर्श समझता था - परंतु वैसी कोई विशेष बात नहीं।

9 बजे - सोया। क्‍योंकि फिर सवेरे जागना है, वही पूँछ हिलाना है - तब डबलरोटी का टुकड़ा शायद मिले; और ज्‍यादा खुशामद करने पर दूध भी मिल सकता है!

अच्‍छा भु: भु: (मानवों की भाषा में अनुवाद : अच्‍छा तो राम-राम!)

                                                                    ---प्रभाकर माचवे---

घुन


किर्र...किर्र...किर्र...किर्र...

लकड़ी के दीवान के भीतर घुन अपना काम किए जा रहा था और साहिब सिंह की नींद छिटक कर कोसों दूर जा चुकी थी।

आज उसने तय कर रखा था कि कम-से-कम सात घंटे बेहोशी की हद तक, नींद में डूब जाएगा, और इसका उसने बाकायदा इंतजाम भी किया था। तली मछली, बासमती चावल का वेज पुलाव, दाल तड़का, बटर चिकन और ह्विस्की का क्वार्टर... यानी नींद को घेरने की मजबूत नाकेबंदी। हर पेग के बाद साहिब ने सिगरेट के लंबे-लंबे कश लिए। निकोटिन शराब के नशे को बढ़ा देती है, वह जानता था। उसके बाद आदत के विरुद्ध भारी खाना। नशा बढ़िया हुआ। पलकें डूब रही थीं। नींद की छुअन को वह महसूस कर रहा था। नींद से भारी हुए कदमों को घसीटता हुआ वह बेडरूम में घुसा। बत्ती बंद की। बस नींद के नीले, गुनगुने जल में वह गोता लगाने ही वाला था कि किर्र...किर्र...किर्र...किर्र...

साहिब ने पहलू बदला। गोल तकिए को पैरों के बीच दबाया। ध्यान बँटाने के लिए कई तरह की फैंटेसियों के दरवाजे खटखटाए, लेकिन कोई दरवाजा नहीं खुला। शराब अपना काम कर रही थी, यानी पूरे शरीर को बंधन-मुक्त बनाए दे रही थी, लेकिन नींद थी कि कमबख्त किर्र-किर्र के डर से भागती गई, भागती गई और अंततः ओझल हो गई। साहिब ने एक भद्दी-सी गाली दी और लाइट ऑन कर दी। शराब अब उसके सिर पर चढ़ कर दर्द की गाँठें खोलने लगी थी।

नींद से हार की यह तीसरी रात थी। पिछली तीन रातों से घुन दीवान को ही नहीं, उसके दिमाग को भी चबाए जा रहा था।

उसके पास अपने दिल और दिमाग को बचाने का कोई उपाय नहीं था। यह उपाय तो उसे बताया ही नहीं गया था। उपायों को तलाशने की उसे मोहलत ही नहीं मिली थी। बस अचानक आक्रमण और फिर लगातार आक्रमण...।

साहिब सिंह ने अनमने ढंग से अपना लेपटॉप खोला और दुनिया की चुनिंदा विज्ञापन फिल्मों को देखने लगा। बीस सेकंड से ले कर एक-डेढ़ मिनट की ये फिल्में अपने दर्शकों को उपभोक्ता में बदल देने की काबिलियत रखती थीं। एक कार की फिल्म पर उसकी नजर थम गई। ग्राफिक्स का इतना बेहतरीन इस्तेमाल कम ही फिल्मों में हुआ है। फिल्म में एक कार अचानक एक रोबोट में तब्दील हो कर तेज धुन में थिरकने लगती है और धीरे-धीरे उसका नृत्य उन्माद के चरम पर पहुँच जाता है। ऐसी फिल्में यदि नए उपभोक्ताओं को खींच लाती हैं तो ये तो उनका अधिकार है... अपने काम के पक्ष में साहिब सिंह ने अपना बयान दिया। बिना ऐसे विश्वासपूर्ण बयान के वह अपने काम को खूबसूरती से अंजाम भी नहीं दे सकता था क्योंकि वह भी तो इसी दुनिया का एक चमकता नाम था।

बस, उसे खल रही थी तो एक ही बात, कि नींद उसके साथ क्यों बेवफाई कर रही है? आखिरकार उसने नींद का क्या बिगाड़ा था? नींद की याद आते ही उसकी बेचैनी फिर बढ़ गई।

केवल तीन साल में इतनी तरक्की... विज्ञापन की दुनिया का एक जरूरी नाम... कई तरह के कलाकारों से उत्पाद के अनुसार काम लेनेवाला... एक पॉश इलाके में डबल बेडरूम का बेहतरीन फ्लैट... लेकिन फिलवक्त एक छोटी-सी नींद से बेदखल... नींद क्यों नहीं आती रात भर!

                                                                           ---बसंत त्रिपाठी---

बुधवार, 6 मार्च 2013

अपनी शक़्ल


आपका गाँव?’’

गुज़राँवाला।’’

वह तो शहर है। रहने वाले कहाँ के हो?’’

अलीपुर का, जिसे अकालगढ़ भी कहते थे।’’

कोई जात भी होगी आपकी?’’

जी हाँ, शेख।’’

शेख...कश्मीरी, गल्ले जई, खोजे, कानूनगो, या मल्लीन?’’

कानूनगो।’’

और आपके बाप-दादा?’’

बाप-दादा? वे हिन्दू थे?’’

किसी बड़े-बूढ़े का नाम याद है?’’

जी हाँ, बख्तमल...यह मुग़लों के वक़्त में दीवान था। फिर मुसलमान हो गया।’’

उसके कोई बहन-भाई भी थे?’’

जी हाँ, एक भाई था उसका नाम था—तख्तमल। वह अपने तख़्त पर ही बैठा रहा। मुसलमान नहीं हुआ।’’

अगर मैं तख़्तमल को गाली दूँ, तो आपको लगेगी?’’

गाली देके तो देखिए...मैं आपका मुँह तोड़ दूँगा!’’

आप बुरा मान रहे हैं, तो मैं माफी माँगता हूँ।’’

और यह साहब कहाँ से आये है?’’

कहते हैं यू.पी. से आये हैं हिजरत करके। बेचारे अपना सब कुछ वहीं छोड़ आये हैं...ज़मीनें, मकान, मकानों के सेहन और सेहन में उगा हुआ इमली का पेड़...’’

कोई क्लेम भी दाख़िला किया है?’’
नहीं। कहते हैं, हमें कोई क्लेम नहीं करना। मैंने कहा, आप एक बार क्लेम दाख़िल तो करवाएँ, तो चिढ़-से जाते हैं और कहते हैं, मेरा क्लेम आपको महँगा पड़ेगा और बहुत ही इसरार है, तो फिर मेरे क्लेम में ताजमहल, लालकिला और इमली का पेड़ है। सैटलमेंट वालों से पूछ लीजिए, वे इन तीनों में से कोई एक चीज़ भी नहीं दे सकते हैं।’’

तो आपने इसका क्या जवाब दिया?’’

मैंने कहा, जाने भी दीजिए अब ताजमहल को। ताजमहल तो अब तस्वीरों के अन्दर हमारे घर-घर में मौजूद है...और लाल किला हमारे सीनों में आबाद है...और इमली खट्टी होती है। लडक़ों-बालों के खाने की शै है और आप तो अब बड़े हो गये हैं। यह एक बात और कहते हैं। कहते हैं कि जंगे-बदर और कर्बला की जंग मैंने लड़ी है...’’

तो पानीपत की लड़ाई में इनके बड़े-बूढ़े किस ओर से लड़े थ? यह अरब से आये हुए हैं, या यू.पी. के हैं?’’

मैंने जब पूछा, तो फरमाने लगे कि मैं दोनों जगहों से आया हूँ और फिर कहने लगे, कृष्ण का पुजारी हूँ, अली का बन्दा हूँ।’’

यह क्या बात हुई?’’

यह आप ही इनसे पूछें, मैं नहीं पूछता।’’

और यह साहब, जो आपके पास बैठे हुए हैं?’’

यह गुज़रात के हैं, जात के कश्मीरी हैं। अरसा हुआ, इनके बड़े-बूढ़े कश्मीर से पंजाब में आ गये और गुज़रात में आबाद हो गये।’’

क्या कहा आपने? जात के कश्मीरी?’’

आप तो चौंक पड़े! हर नस्ल में जहाँ कुछ बुरे होते हैं, वहाँ कुछ अच्छे भी होते हैं यह बड़े अहले-दर्द हैं। नानक, कबीर, सूरदास, मीराबाई, शाह हुसैन और ख्वाजा फरीदा के मानने वाले में से हैं।’’

कबीर और नानक से इनका क्या रिश्ता है? वे क्या कश्मीर से आये थे?’’

सब कहीं-न-कहीं से आये हुए हैं। कबीर भी कहीं से आये थे।’’

फिर तो यह नानक और कबीर के आदमी हुए!’’

कबीर इनमें से हुए और यह कबीर में से...मैं रांझे विच रांझा मैं विच हीर न आखो कोई।’’

जात समझ में नहीं आती।’’

जात को पहचानने की कभी कोशिश की है?’’

कई बार मैंने सोचा है कि मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ? कहाँ से चला था? आगे कहाँ जाना है...?’’

आप तो ख्वाहमख्वाह चक्करों में पड़ गये। जहाँ कहीं से भी चले थे, ठीक है, लेकिन इस वक्त हम पाकिस्तान में हैं।’’

आप तो जैसे ख़बर सुना रहे हैं। मुझे खबरों से दिलचस्पी नहीं। मैं अख़बार नहीं पढ़ा करता।’’

तो फिर क्या पढ़ते हैं?’’

अपने आपको। जब कभी यहाँ से फुरसत हुई, तो अखबार भी देख लेंगे।’’

छोडि़ए, और कोई बात करें। यह बताइए, आजकल डेरे कहाँ लगा रखे हैं?’’

बूढ़े रावी के किनारे, जो कभी जवान था। किले और शाही मसजिद के नीचे से दीवानावार झाग उड़ाता बहा करता था।’’

दरिया बूढ़े भी हो जाते हैं?’’

हाँ, दरिया बूढ़े भी हो जाते हैं।’’

वह कैसे?’’

यह बात आपकी समझ में नहीं आ सकती। जाने दीजिए।’’

लेकिन बूढ़ा रावी...रावी किस तरफ से है? अब तो यह बूढ़ा है न रावी!’’

हाँ, अब तो यह बूढ़ा है न रावी! इसे दोनों ओर से बन्द कर दिया गया है। अब इसमें पानी नहीं बहता।’’

आप तो इसका ज़िक्र ऐसे कर रहे हैं, जैसे आपकी इससे कोई रिश्तेदारी हो।’’

दरिया से मेरी पुरानी रिश्तेदारी है। इसने हमारी धरती को पानी दिया और इसके अन्दर से हम पैदा हुए। इसका पानी पी-पी कर हम बूढ़े हुए हैं। इसके पानी से हमारे अन्दर मुहब्बत की जोत जगी है। अब इसने मुँह दूसरी ओर को फेर लिया है! शहर से परे-ही-परे गुजर जाता है। वह शहर में रूठ गया है...तुसी जाओ सइयो नी, मेरे रांझेय नूं लियो मोड़ के।’’

दरिया आपकी माँ की जगह है, या बाप का जगह?’’

यह हमारा बाप है। धरती को पानी देता है और धरती हरी हो जाती है।’’

आप फादरलैंड के कायल लगते हैं?’’

मैं सिर्फ दरिया का कायल हूँ। इसके किनारे मेरा घर है, जिसके खुले सेहन की धूप में हम नहाते हैं, इस सेहन में एक पेड़ है। हर सुबह इसकी टहनियों पर चिडिय़ाँ चहचहाती हैं। घर के अन्दर खालिस घी के तडक़े की खुशबू फैली होती है। हम बड़े सुखी हैं।’’

हटाइए, मिट्टी डालिए इस बात पर!’’

हाँ, रहने दीजिए...गोली मारिए!’’

यह हम कहाँ आ गये हैं? यहाँ तो मैं पहली बार आया हूँ।’’

आप दर्रा $खैबर के नज़दीक खड़े हैं। यह क़बायली इला$का है जिसे गैर इलाका भी कहते हैं। वह सडक़ के नीचे अलीमसजिद है। इसमें हज़रत अली के पंजे का निशान है।’’

यह हजरत अली के खैबर-शिकन का पंजा है?’’

जी, कहते हैं कि हजरत अली ने इस पत्थर को हाथ से रोका था और उनके पंजे का निशाना इस पर लग गया। लोग इस पंजे को चूमते हैं...आँखों से लगाते हैं। फूल चढ़ाते हैं। चिराग जलाते हैं।’’

हज़रत अली यहाँ कहाँ आ गये थे?’’

ऐसी बातों को तारीख़ के हवालों से नहीं देखा करते और न ही इनमें लम्बी-चौड़ी जाँच पड़ताल की जरूरत होती है। यह अकीदत (श्रद्धा) की बात है। अकीदत बड़ी ज़रूरी चीज़ है, बहुत बड़ी ताक़त है। अ$कीदत के बिना सीना खाली रहता है।’’

ठीक कहा है आपने। मुझे यों लगता है कि हमारे सीने इससे खाली होते जा रहे हैं।’’

शायद इसीलिए हम रोज-ब-रोज अन्दर से खाली हो रहे हैं। हमारे दिल वीरान कुओं की तरह होते जा रहे हैं।’’

कभी आप पागलखाने गये हैं?’’

हाँ, एब बार, मेरा एक दोस्त पागल हो गया था उसकी ख़र-ख़बर पूछने गया था।’’

आपका दोस्त पागल कैसे हो गया था?’’

वह मेरे साथ ही पढ़ा करता था। मेरा हम उम्र था। क्लास में हमेशा फस्र्ट आया करता। उसके प्रोफेसर उससे कहा करते—मियाँ, तुम इतना कुछ जानते हो कि तुम्हें क्लास में आने की ज़रूरत नहीं, हम तुम्हारी हाजिरी लगा दिया करेंगे। लडक़ा क्या था, सोना था। बहुत ही सभ्य, सुसंस्कृत। बात सदा सोच-समझकर करता था। वे लोग पूर्वी पंजाब से हिजरत करके लाहौर आये थे। घर में सभी बहन-भाई पढ़े-लिखे थे। माँ भी बड़ी समझदार, सुघड़ और पढ़ी-लिखी थी। अपने बच्चों के साथ बात-चीत हमेशा उर्दू में करती। मेरा दोस्त मुझे बताया करता कि बचपन में उसने गली के लडक़ों से ठेठ पंजाबी में एक शब्द सुन लिया और माँ के सामने बोल दिया। माँ उसे रसोईघर में ले गयी और चिमटे में एक दहकता हुआ कोयला पकड़ कर बोली, ‘बोलो, फिर यह शब्द कभी मुँह से निकालोगे?’ उसने तोबा की कानों को पकडक़र हाथ जोड़े और वादा किया कि आइन्दा कभी यह शब्द उसके मुँह से सुने तो उसकी जबान पर कोयला रख दें। उसके बाद उसके मुँह से किसी ने पंजाबी का एक फिकरा न सुना। हमेशा अँग्रे$जी या उर्दू में ही बात किया करता था।’’

फिर क्या हुआ?’’

उसने एम. ए. पास किया। उसकी बड़ी इच्छा थी कि वह किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में लेक्चरर लग जाएे, मगर उसकी यह इच्छा पूरी न हो सकी और व किसी फर्म की अकाउंट्स ब्राँच में ऊँची तनख्वाह वाली नौकरी पर चला गया। फर्म वालों ने उसके काम से खुश होकर उसे प्रशिक्षण के लिए अमरीका भेज दिया। जब वह वहाँ पहुँचा, तो महीने के अन्दर-अन्दर न जाने उसे क्या हुआ कि उसका दिमाग चल गया। वहाँ की यूनिवर्सिटी ने उसे वापस भेज दिया। अब गुमसुम-सा रहता। पी.आई.ए. की अब इत्तिफाक से नज़र आ जाए, तो कहता है—लारी भेजी है। कहते हैं, इस मुल्क से बाहर निकल...’’

बेचारी माँ ने तो रो-रोकर बुरा हाल कर रखा होगा?’’

माँ का हाल वाकई बहुत बुरा है। कहती है—अमरीका में एक मेम के घर गूंगा बच्चा पैदा हुआ था और उसने टोना करके फेंका हुआ था। उस टोने पर मेरे बच्चे का पाँव आ गया। उस दिन से यह कोई बात नहीं करता। एक दिन मुझे चौक में मिल गया। सीने से लगाकर उसने मुझे जोर भींचा, फिर बोला,

यार, मैं आजकल बेकार हूँ कोई पंजाबी ड्रामा करवाओ, उसमें हीरो का पार्ट मैं करूँगा।’’ उसे पागलखाने में दाखिल करवाया गया। वहाँ पढ़े-लिखे पागलों के अनपढ़ पागलों से अलग रखा जाता है। हम पहले अनपढ़ पागलों की ओर गये। पागलखाने का डॉक्टर मेरे साथ था। अनपढ़ पागल मुझे देखकर तरह-तरह के इशारे करने लगे। कोई चीखें मारने लगा, तो कोई हँस पड़ा। एक-आध ने हमें देखकर ताली बजायी। और जब हम पढ़े-लिखे पागलों की ओर गये, तो जिस पागल से भी सामना हुआ, वह अँग्रे$जी बोलने लगा—ओ यू गुड मैन दि लालटन...बुड ऐनक एण्ड ए टाई...वाट बिजनेस हैव यू हेयर...हम सब डैमफूल का बच्चा है...ही ही ही ही...और उस समय मुझे खयाल आया, हमारे शहर में अलीगढ़ का ग्रेजुएट काजी करीम जब पागल हो गया था, तो हर एक के साथ अँग्रे$जी में ही उलटी-सीधी हाँकता रहता था।’’

यह तो आपने बड़ी अजीब बात सुनायी! ये हमारी ओर के पागल इतनी $ज्यादा अँग्रे$जी क्यों बोलने लगते हैं?’’

मुझे तो यों लगता है कि हमारे अन्दर दूर किसी घुप अँधेरी कोठरी में एक अँग्रेज़ छुपा बैठा है और जब वह देखता है कि अब राह साफ है, तो अपनी दोनाली बन्दूक निकालकर बाहर निकल आता है?’’

कभी आपने कोई अँग्रेज़ पागल भी देखा?’’

जी हाँ, एक देखा था।’’

वह कौन-सी भाषा बोलता था?’’

वह तो अँग्रे$जी ही बोलता था।’’

अँग्रेज़ पागल हो जाए, तो भी अँग्रेज़ ही रहता है।’’

मुझे तो यों लग रहा है, जैसे आप मेरी बातें सुनकर परेशान हो रहे हैं...आपका रंग क्यों उड़ा-उड़ा-सा है?’’

रंग उडऩे की बात तो है! समझ में नहीं आ रहा, हम कौन हैं? कहाँ से आये हैं? कहाँ से चले थे? कहाँ जाना है? हमारी जड़ें कहाँ हैं? हम हवा में क्यों लटके हुए हैं?’’

अपने अतीत के आईने में अपनी शक्ल देखिए, उसमें से आपको अपनी कोई शक़्ल नज़र नहीं आती। अपनी खुदाई कीजिए। खोयी हुई ची$जों को तलाश कीजिए। अपनी शक़्ल पहचानिए। कयामत के रोज़ हमारी श$क्लें बदली हुई होंगी।’’

कयामत के रोज क्या होगा?’’

उस रोज हम अपनी माँ के नाम से पुकारे जाएँगे।’’

हमारी माँ कौन है?’’

यह धरती...इसी धरती ने हमें जना है और इसी में हमें लौट के जाना है।’’

                                                                 ---मुनीर अहमद---
                                                              (अनुवाद- शम्भु यादव)

बारिश की रात


आरा शहर। भादों का महीना। कृष्ण पक्ष की अँधेरी रात। ज़ोरों की बारिश। हमेशा की भाँति बिजली का गुल हो जाना। रात के गहराने और सूनेपन को और सघन भयावह बनाती बारिश की तेज़ आवाज़! अंधकार में डूबा शहर तथा अपने घर में सोये-दुबके लोग!

लेकिन सचदेव बाबू की आँखों में नींद नहीं। अपने आलीशान भवन के भीतर अपने शयन-कक्ष में बेहद आरामदायक बिस्तरे पर अपनी पत्नी के साथ लेटे थे वे। पर लेटनेभर से ही तो नींद नहीं आती। नींद के लिए - जैसी निश्चिंतता और बेफ़िक्री की ज़रूरत होती है, वह तो उनसे कोसों दूर थी।

हालाँकि यह स्थिति सिर्फ़ सचदेव बाबू की ही नहीं थी। पूरे शहर पर खौफ़ का यह कहर था। आए दिन चोरी, लूट, हत्या, बलात्कार, राहजनी और अपहरण की घटनाओं ने लोगों को बेतरह भयभीत और असुरक्षित बना दिया था। कभी रातों में गुलज़ार रहनेवाला उनका यह शहर अब शाम गहराते ही शमशानी सन्नाटे में तब्दील होने लगा था। अब रातों में सड़कों और गलियों में नज़र आनेवाले लोग शहर के सामान्य और संभ्रांत नागरिक नहीं, संदिग्ध लोग होते थे। कब किसके यहाँ क्या हो जाए, सब आतंकित थे।

जब इस शहर में अपना यह घर बनवा रहे थे सचदेव बाबू तो बहुत प्रसन्न थे कि महानगरों में दमघोंटू, विषाक्त, अजनबीयत और छल-छद्मी वातावरण से अलग इस शांत-सहज और निश्छल-निर्दोष गँवई शहर में बस रहे हैं। लेकिन अब तो महानगर की अजनबीयत की अपेक्षा यहाँ की भयावहता ने बुरी तरह से त्रस्त और परेशान कर दिया था उन्हें। ये बरसाती रातें तो उन्हें बरबादी और तबाही का साक्षात संकेत जान पड़ती थीं।

इसे दुर्योग कहें या विडंबना कि जिस बात को लेकर आदमी आशंकित बना रहता है, कभी-कभी वह बात घट भी जाती है। इस अंधेरी, तूफ़ानी, बरसाती रात में जिस बात को लेकर डर रहे थे सचदेव बाबू उसका आभास भी अब उन्हें होने लगा था। उन्हें लगा था कि गेट फाँदकर उनके दरवाज़े पर कोई चढ़ आया है। बस, उनके कान खड़े हो गए। वे उस आगंतुक की आहट लेने लगे। उनकी शंका सही थी। अब दरवाज़े पर थपथपाहट की आवाज़ भी आने लगी थी। सचमुच कोई आ धमका था।

सचदेव बाबू की पत्नी ने दबी आवाज़ में उनसे पूछा, "कौन है यह यदु मिस्त्री?"

उन्होंने भी दबी आवाज़ में ही जवाब दिया, "राज मिस्त्री है। इस मकान में काम कर चुका है। ठेकेदार के साथ आनेवाले मिस्त्रियों में एक यह भी था।"

"तो इस समय क्यों आया है। यह सब राज मिस्त्री और मजदूर अच्छे नहीं होते, घर का भेदिया होते हैं। घर के अंदर-बाहर सब कुछ इनका देखा-जाना होता है।" अपनी शंका व्यक्त की उन्होंने।

जवाब में सचदेव बाबू ने भी उनकी शंका को अपनी सहमति प्रदान की, "पिछली चोरी में इस घर के मजदूर-मिस्त्रियों का ही हाथ था। छत से बिना सीढ़ी के आँगन के रास्ते उतरने का तरीका उनके सिवा किसी को ज्ञात नहीं था।"

यदु मिस्त्री की पुकार और थपथपाहट की आवाज़ जारी थी, "सो गए हैं क्या साहब? हाकिम! इंजीनियर साहब! मैं यदु मिस्त्री हूँ, यदु!"

लेकिन सचदेव बाबू व उनकी पत्नी ने पहले ही से तय कर रखा था कि चाहे जो हो, रात में दरवाज़ा नहीं खोलना। वे जानते थे, परिचित आवाज़ में कोई एक दरवाज़ा खुलवाता है और दरवाज़ा खुलने पर उसके साथ छिपकर आए दस लुटेरे भरभराकर अंदर घुस आते हैं।

अब किसी पर विश्वास करने का समय नहीं रहा। मुसीबत और परिचय के नाम पर ही तो सब कुछ होता रहा है। उन्हें यदु की बातों में हरगिज़ नहीं आना है। ठीक इसी समय उनकी पत्नी ने भी कहा, "अपने मित्रों, रिश्तेदारों और पुलिस को फ़ोन क्यों नहीं करते हो? शायद कोई रास्ता निकल आए?"

उन्हें लगा, पत्नी भी उनकी तरह ही सोच रही है। अब वे सक्रिय हो गए। फ़ोन रखने का वास्तविक उपयोग तो ऐसे अवसरों पर ही होता है। लेकिन ये लुटेरे भी कम चतुर नहीं होते। लूट के लिए आने से पूर्व फ़ोन आदि के कनेक्शन काट चुके होते हैं। पर सचदेव बाबू को डूबते को तिनके के सहारे के भाँति फ़ोन का कनेक्शन ठीक मिला। बस, वे डायल घुमा, सजग-सतर्क हो, अपनी इच्छित जगहों पर, तत्क्षण बोल उठे धीमी आवाज़ में, ताकि बाहर यदु को उनकी आवाज़ सुनायी न पड़े। वैसे भी उनके शयन-कक्ष और कमरों की बनावट ऐसी थी कि बंद दरवाज़ों और खिड़कियों के भीतर की आवाज़ बाहर नहीं पहुँच पाती थी।

इधर बाहर दरवाज़ा थपथपा रहा और आवाज़ लगा रहा यदु मिस्त्री बारिश में पूरी तरह भीगा हुआ था। उसके कपड़े बदन से चिपक गये थे और माथे के बेतरतीब बालों से पानी की बूँदें टप-टप चू रहीं थीं। वह कुछ हाँफ भी रहा था। बारिश में भीगते और दौड़ते हुए ही वह यहाँ आया था। अपनी घरवाली को आज ही दोपहर अपने गाँव से यहाँ शहर के अस्पताल में लाया था। उसके पेट के दर्द का एकमात्र इलाज डॉक्टर ने ऑपरेशन बताया था। गाँव से जो पैसे लेकर वह चला था, वह तो चिकित्सक की मोटी फीस और महंगी सुइयों-दवाइयों में तत्क्षण समाप्त हो गए थे। फिलहाल कुछ रुपयों की उसे सख्त आवश्यकता थी। गाँव जाकर रुपये लाने का समय भी तो उसके पास नहीं। इस स्थिति में सहसा उसका ध्यान सचदेव बाबू की ओर चला आया था।

सचदेव बाबू के मकान में लंबे समय तक काम कर चुका था वह। उनके मकान निर्माण के लिए ही उसे गाँव से बुलवाया था ठेकेदार ने। शहर के मिस्त्रियों से ज्यादा काम करता था वह। नींव से लेकर छत ढलाई और प्लास्टर-फिनिशिंग तक इस मकान में कर चुका था। इस घर की एक-एक ईंट से वह परिचित था। कई जगह सचदेव बाबू जैसा चाहते थे, उनकी बात ठेकेदार नहीं समझ पाता था। लेकिन मिस्त्री होने के चलते वह जल्द ही समझ जाता था। यह देख सचदेव बाबू उस पर खुश हो उठते थे और ठेकेदार से कहते थे, "इस मिस्त्री को यहाँ से मत हटाना। इसे काम की अच्छी जानकारी है। और यह परिश्रमी भी है।"

त्योहारों पर तो वे अपनी ओर से उसे अक्सर बख़्शीश भी दिया करते थे और लंच के लिए अपने खाने में से सब्ज़ी और अचार आदि उसे भी प्रदान करते रहते थे। ठेकेदार का काम समाप्त होने पर भी बचे हुए शेष कार्य के लिए उन्होंने उसे अपने यहाँ कायम रखा था। अपने प्रति उनके इस आकर्षण ने ही इस तूफानी रात में उसे यहाँ तक पहुँचा दिया था। उनसे प्रार्थना कर कुछ रुपये माँग लेगा वह। वे ना नहीं करेंगे। फिर गाँव लौटते ही उनके रुपये ला चुकाएगा।

यदु जानता था कि बाहर के गेट से आवाज़ अंदर नहीं पहुँचती, इसीलिए गेट फाँदकर बालकनी में मुख्य दरवाज़े के पास वह आ गया था। चूँकि सचदेव बाबू मिस्त्री-मज़दूरों के बीच बड़े साहब, हाकिम और इंजीनियर साहब के नाम से ही विख्यात थे, इसीलिए उसी नाम से वह आवाज़ भी लगाता जा रहा था। उसकी आवाज़ पहचानने के बाद सचदेव बाबू चुप नहीं रहेंगे ! लेकिन कुछ देर तक जब उनके यहाँ से कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ तो यदु को लगा कि डर गए हैं सचदेव बाबू। यह बात वह जानता था कि परिचित आवाज़ में लूटपाट की घटनाओं से अब किसी को किसी पर भरोसा नहीं रहा। सचदेव बाबू के यहाँ आ रहा था वह तब भी यह शंका उसके मन में थी।

लेकिन अपने प्रति उनके आत्मीय एवं स्नेहपूर्ण व्यवहार को याद कर अपने मन की इस शंका को झटक दिया था उसने, "सचदेव बाबू ऐसे नहीं हो सकते।" अभी भी उसे इस बात का पूरा विश्वास था कि अगर उसकी आवाज़ पहचान लेंगे सचदेव बाबू तो अवश्य दरवाज़ा खोलकर सामने आ जाएँगे और उसकी मदद करेंगे, इसीलिए दरवाज़ा थपथपाते और आवाज़ लगाते हुए वह डटा हुआ था।

बीतते समय के दौरान अचानक तेज रोशनी बिखेरती हुई एक जीप सचदेव बाबू के दरवाज़े आ लगी। यदु को लगा कि या तो सचदेव बाबू के बेटा-पतोह या लड़की-दामाद या कोई अन्य रिश्तेदार आ गए। अच्छा हुआ। अब सचदेव बाबू का दरवाजा खुलेगा और उसका काम भी हो जाएगा। लेकिन यह देखकर आश्चर्य से उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं कि जीप से पुलिस के जवान तेज़ी से उतरे और उसकी तरह ही गेट फांदकर उसकी ओर बढ़ चले। एक क्षण के लिए तो वह भयभीत हो गया। काटो तो उसकी देह में खून नहीं। लेकिन जल्द ही अपने को संयत कर लिया उसने। वह कोई चोर-उचक्का नहीं कि पुलिस को देखकर घबराए या भागे? पुलिस किसी और की खोज में आई होगी या उसे काई सुराग मिला होगा?

ठीक इसी समय सचदेव बाबू दरवाज़ा खोलकर सामने आ गए। अपने गेट के पास आती हुई पुलिस की जीप उन्होंने खिड़की से ही देख ली थी। पुलिस इंस्पेक्टर ने उन्हें देखते ही कहा, "हमने इसे ऐन मौके पर पकड़ लिया इंजीनियर साहब! लेकिन यह कह रहा है कि मैं राज मिस्त्री हूँ। साहब का घर मैंने बनाया है।''

"मैं किसी मिस्त्री-विस्त्री को नहीं जानता!'' - बेतकल्लुफ़ी से कह उठे सचदेव बाबू। यह सुन उनकी ओर मुखातिब होते हुए जोर देकर बोल उठा यदु, "मैं यदु मिस्त्री हूँ बड़े साहब! यदु मिस्त्री! मुसीबत में फँसकर कुछ रुपयों के लिए आपके यहाँ आया हूँ!"

लेकिन उसकी बात को अनसुनी कर दिया सचदेव बाबू ने तथा अपनी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से ताकते इंस्पेक्टर से कह उठे वे, "मैं इसे नहीं जानता!"

उनकी यह बात यदु के कलेजे में तीर-जैसी लगी। कट कर रह गया वह। अपने कानों पर उसे विश्वास नहीं हुआ। उनसे पुन: ऊँची आवाज़ में कहा, "मैं यदु मिस्त्री हूँ, बड़े साहब, आपका चहेता यदु मिस्त्री।"

एक क्षण के लिए सचदेव बाबू के गले में आवाज़ फँसती-सी जान पड़ी। लेकिन फिर जल्द ही गला साफ़ करते हुए उन्होंने इंस्पेक्टर से कहा, "ठेकेदार के साथ आनेवाले मिस्त्रियों को मैं नहीं जानता! उनमें से किसी को भी नहीं पहचानता!"

"तो आप मुझे नहीं पहचानते? मैं मिस्त्री नहीं, चोर हूँ?" इस बार यदु की आवाज़ बदल गई थी और उसका पूरा बदन तन गया था। जवाब में इंस्पेक्टर ने उसे डाँटते हुए कहा, "चुप बदमाश! अकड़ रहा है। इस मुहल्ले में बहुत उत्पात मचा रखा था तूने आज पकड़ में आया।" - और साथ के जवानों को आदेश दिया, "ले चलो इसे !"

लेकिन इंस्पेक्टर की डाँट के बावजूद कन्नी-बसुली चलानेवाले उसके हाथ की मुट्ठियाँ कस गईं तथा आग्नेय नेत्रों से सचदेव बाबू को घूरते हुए गरज उठा वह, "तो आप मुझको नहीं पहचानते? मैं चोर हूँ! तो अब उसी रूप में आऊँगा। अब उसी रूप में पहचानिएगा!"

"साला धमकी देता है। चोरी और सीनाजोरी दोनों!"

इंस्पेक्टर ने कसकर उसे एक हाथ लगाया। वह दर्द से कराह उठा। शायद कुजगहा चोट लगी उसे। लेकिन उसकी बातों से उससे कम दर्द का अनुभव नहीं किया सचदेव बाबू तथा उनकी पत्नी ने। वह कहकर गया है कि अब चोर-लुटेरे के रूप में ही आएगा। उससे कुछ भी तो गोपनीय नहीं। सब कुछ उसका देखा-जाना है। अब क्या होगा? उसे न पहचानकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। लेकिन न चाहते हुए भी उन्हें ऐसा करना पड़ा। उनके भीतर अंतर्द्वंद्व अभी भी बना हुआ था। वे समझ नहीं पा रहे थे कि उन्होंने अच्छा किया या बुरा? हालाँकि उन्हें लग रहा था कि यदु को न पहचानना उनकी आंतरिक इच्छा नहीं, समयगत विवशता थी!

पुलिस द्वारा यदु को पकड़कर ले जाने के बाद दरवाज़ा बंद कर पुन: अपने शयन-कक्ष में आए वे दोनों पति-पत्नी। लेकिन उनकी बेचैनी और घबराहट खतम नहीं हुई। अशांति और उद्विग्नता पूर्ववत बनी रही। अपने मन को शांत-सहज बनाने के लिए बिस्तर पर लेटकर वे पुन: सोने का उपक्रम भी करने लगे। लेकिन शांति और चैन कहाँ? यह ठीक है कि अब अपने दरवाज़े पर वे यदु की दस्तक महसूस नहीं कर रहे थे। लेकिन अब तो उनके मन पर सीधे-सीधे दस्तक दे रहा था यदु, जो दरवाज़े की दस्तक से ज़्यादा भयावह और कष्टदायक थी!

                                                                         ---मिथिलेश्वर---

सोमवार, 4 मार्च 2013

निर्दोष


किस्से कहानियों में चंदगीराम ने पढ़ा था, सुना था कि राजा भी रंक बन जाते हैं। आज हकीकत में महसूस होने लगा कि सच्चाई को स्वीकार कर लेना चाहिए। सहारनपुर में धनी व्यक्तियों की श्रेणी में गिनती होती थी। अच्छा खासा धन था, जो दो तीन पीढ़ियों के आराम से गुजर बसर के लिए काफी समझा जा सकता था। दो तीन वर्षों से व्यापार में आमदनी कम होने लगी और कुछ नुकसान भी हो गया। बढ़ते खर्चों पर नियंत्रण नहीं रखने के कारण जमा पूँजी भी समाप्त हो गई। कर्ज़ के मकड़जाल में फँसने पर संपति बिकने लगी, बड़ी कोठी से छोटे से मकान में आ गए। आर्थिक तंगी के कारण दोनों बच्चों सूरज और सरिता की पढ़ाई भी छूट गई। घर खर्च मुश्किल होने लगा, लेकिन चिंता से कुछ हासिल नहीं होता। रक्षाबंधन के पावन त्यौहार में राखी बाँधने चंपादेवी भाईयों के पास दिल्ली भी न जा सकी। न जाने का सीधा कारण धन की कमी, किस से मदद माँगें। जो राजा की तरह रहते थे, आज किसी के सामने हाथ फैलाते शर्म आने लगी। अपनी द्ररिदता को आखरी लहमे तक छुपाने की भरसक कोशिश की, लेकिन दुनिया सब जान जाती है।

चंपा के माएके में भी बातें होने लगी, कि हालात सही नहीं हैं। चंपा के तीनों भाई इन्दर, सुन्दर और राजिन्दर बहन चंपा के पास हालात का जायजा लेने पहुँचे तो यकीन न कर सके, कि इतनी जल्दी हालात बदल सकते है, पाँच सात महीने पहले तो बहन से मिल कर गये थे और आज तो मकान तक बिक गया। भाई के आगे चंपा रो पड़ी। जीजा चंदगीराम मुंह से तो कुछ बोल नहीं सका, लेकिन मुरझाए चेहरे के साथ आँखे सब अपने आप बोल गई। भाईयों ने यह निर्णय लिया गया कि सूरज मामाओं के साथ दिल्ली जाए और कोई नौकरी करे। मकान बेच कर सरिता का विवाह कर दिया जाए, बिना कामधंधे के थोड़ी जमा पूँजी भी कभी साफ हो सकती है, इसलिए चंदगीराम और चंपादेवी सूरज के साथ दिल्ली रहें।

इन्दर मामा ने सूरज को एक प्राईवेट कंपनी में एक क्लर्क की नौकरी दिलवा दी। सहारनपुर का मकान बेच कर सब दिल्ली रहने आ गए। एक बडी हवेली के बाद छोटे मकान और अब सिर्फ एक छोटा सा कमरा जहाँ चार जनों के परिवार ने रहना भी है और एक कोने में रसोई भी बनानी है। सरिता के विवाह की बात चली। एक बार सरिता ने कहा कि विवाह में जल्दी न करे, वह पढ़ना चाहती है।

"अपने माँ बाप की आर्थिक स्थति देखो, जागीर बिक गई। किराए के छोटे से कमरे में सुबह बैठक बनती हैं और रात को बिस्तर, रसोई तो सूरज की तनख्वाह से चल जाएगी, पढ़ाई और दूसरे खर्च की मत सोच, जो मकान बेच कर रकम मिली है, चुपचाप शादी करले, ताकी मांबाप की एक समस्या तो हल हो।" इन्दर, सुन्दर और राजिन्दर तीनों मामा की इतनी बात सुन कर सरिता सामने अधिक कुछ बोल न पाई।"लड़का हमने देख लिया है, आज शाम को देखने आ रहा है। बहना लड़का हमे पसन्द है, अगर उसे सरिता पसन्द आए तो नानुकुर मत करना। बात तय समझो।"

"लड़का करता क्या है।" चंदगीराम के इतना पूछने पर राजिन्दर थोडा नाराज सा लगा।
"लड़का मोटर मैकेनिक है।"
चंपा का मुंह खुले का खुला रह गया, "क्या मैकेनिक।"
"बहना, आपकी स्थति तो देखो, अमीर घराने के सपने छोड़ दो। जेब में कुछ माल पानी हो, तो इस तरफ सोचना। सडक छाप मैकेनिक नहीं है, वर्कशाप में काम करता है, दो वक्त की रोटी आराम से कमाता है। लड़की भूखी नहीं रहेगी।"

राजिन्दर के तेवर गर्म थे, चंदगीराम ने चंपा के कंधे पर हाथ रख कर कहा, "लड़का देख लेते हैं।"
शाम के समय समीर नाम का लड़का परिवार समेत सरिता को देखने आया। समीर सीधे वर्कशाप से आया था, इसलिए उसके हुलिए को देखकर चंपा निराश हो गई। चंपा के लटके मुंह को देखकर राजिन्दर ने कहा, "बहना, इसको कहते हैं, काम की लगन, सीधे वर्कशाप से आ गया, चाहता तो सजधज के भी आ सकता था, लेकिन उसका क्या फायदा। काम करेगा तभी चूल्हा जलेगा। लड़के की लगन देख बहना। भाई साहब हमें लड़का पसन्द है। आप कहे तो मुंह मीठा किया जाए।" बेचारी चंपा और सरिता सिर झुकाए बैठि रहीं और राजिन्दर ने रिश्ता पक्का कर दिया। रात को खाने के समय चंपा ने चंदगी से जिक्र किया, "अपनी लड़की एक मैकेनिक को देने को दिल नहीं मान रहा है।"
"मजबूरी किसी को न दिखाए। हमारी शादी के समय राजिन्दर तीन चार साल का रहा होगा। नाक बह रही होती थी, कच्छे, बनियान में सारा दिन घूमता था। आज मेरे पास कुछ नहीं है, राजिन्दर ने पैसे अच्छे जमा कर लिए हैं। हमें कुछ नहीं समझ रहा है, सब कुछ अपने आप तय कर लिया। हमारी राय भी लेने को तैयार नहीं है। कभी सोचा नहीं था कि एक मैकेनिक के साथ लड़की का विवाह करना होगा। दिल पर पत्थर रख कर फैसला करना होगा। मेरी मजबूरी देख चंपा।"

"उसी कारण चुप हूँ।"

एक महीने बाद सरिता का समीर के साथ विवाह संपन्न हुआ। विवाह के बाद चंदगीराम और चंपादेवी यह सोच कर संतोष कर गए कि दामाद मेहनती और कमाऊ है, आज वर्कशाप में मैकेनिक है, कल खुद की वर्कशाप भी खोल सकता है। चार महीने बाद सुबह समीर के वर्कशाप जाने के समय सरिता ने कहा, "आज मैं मम्मी के पास जाऊँगी, आप शाम को वहीं आ जाना, रात को खाने के बाद वापिस आयेंगे।" शाम को समीर वर्कशाप से सीधा ससुराल पहुंचा। चंपादेवी ने दामाद समीर का स्वागत किया। समीर को छोटे से कमरे में सरिता नजर नहीं आई तो सास चंपादेवी से प्रश्न किया,
"सरिता नजर नहीं आ रही, कहीं बाहर गई है, क्या।"

"बेटे सरिता तो आज आई नहीं।"
"सुबह मुझसे कहा था, कि यहाँ आएगी और रात को खाना खा कर वापिस जायेगें।"
"शायद प्रोग्राम बदल गया होगा।"
"हो सकता है, कोई बात नही, मैं चलता हूँ।"
"बैठो, नाश्ता करके चले जाना।"

समीर ने चाय नाश्ता करके घर के लिए प्रस्थान किया। सरिता घर पर भी नहीं थी।
माँ से पूछा, तो मालूम हुआ, कि सरिता तो सुबह समीर के वर्कशाप जाने के कुछ समय बाद ही घर से यह कह कर चली गई थी, कि माँ के घर जा रही है।

"वहाँ तो है नही, मैं वहीं से आ रहा हूँ। मुझे कहा था कि माँ के घर जाऊँगी, शाम को वहीं आना, रात का खाना खा कर वापिस आयेंगे। यहाँ नहीं हैं, वहाँ भी नहीं है, फिर कहाँ गई।" किसी आशंका के डर से समीर ने सूरज को फोन पर बात बताई। सूरज ने अपने मामाओं को फोन किया और थोड़ी देर में परिवार के सभी सदस्य एकत्रित हो गए। सलाह मशविरे के बाद सभी जन आस पड़ोस और रिश्तेदारों, बिरादरी से संपर्क करके सरिता की खैरियत पूछने लगे। हर तरफ से निराशा हाथ लगी। दुर्घटना को मद्देनजर सभी अस्पताल छान मारे। हर तरफ से निराशा हाथ लगी। सभी चिन्तित, कि आखिर सरिता कहाँ है। पूरी रात छानबीन होती रही। सुबह थकान से चूर सभी सदस्य एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे, कि क्या किया जाए। सरिता का कहीं पता नहीं चल रहा था। चंदगीराम की सलाह पर सूरज मामा राजिन्दर के साथ सहारनपुर भी चक्कर लगा आए, वहाँ सभी परिचितों, सगे सम्बंधियो और सहेलियों से मिलने के बाद भी निराशा हाथ लगी।

अब पुलिस थाने के अलावा कोई चारा नहीं था। पुलिस ने पूरी जानकारी प्राप्त की। सिपाही रामपाल ने समीर को सम्बोधित करते हुए कहा,"आपकी पत्नी कहाँ गई।"

"आपको सब कुछ बता दिया, हमें कुछ नहीं पता कि वह कहाँ गई या अपहरण हो गया।"
"अपहरण की बात तो भूल जा, जब किसी ने फिरौती की माँग नहीं की, तब मेरी बात गांठ बांध ले, अपहरण कोई नहीं हुआ। और बोल।"

मामा राजिन्दर बीच में बात काटते हुए बोला, "मर भी सकती है, कोई मर्डर भी कर सकता है।"
"देखो मामला गंभीर है, लड़की गायब है। कहाँ गई होगी, कहीं भाग तो नहीं गई। सच सच बताओ, कोई इश्क विश्क का मामला तो नहीं है।"

"नहीं नही हमारी लड़की ऐसी नहीं है।" चंपादेवी ने रोते रोते कहा।
"सब लोग एक बात सुन लो, रोने धोने से कुछ नहीं होने वाला। यह पुलिस स्टेशन है, तुम्हारा घर नहीं है, घर जाकर विलाप करना। दो घंटे हो गए हैं, यहाँ आए। सिवाए रोने धोने के अलावा कुछ बोल ही नहीं रहे। हमारा टाइम खराब कर रहे हो। कभी एक रोता है, को कभी दूसरा शुरू हो जाता है। पहले घर जाकर रोना धोना कर लो, फिर यहाँ आना।"

रामपाल के इतना कहने पर मामा राजिन्दर गर्म हो गया, "लगता है, बड़े अफसर से बात करनी होगी।"
"मामाजी इतने उत्तेजित होने ही बात नहीं है, थाने में इस समय सबसे बड़ा मैं हूँ, मेरे से बड़े कल मिलेंगे, आज तहकीकात में गए हुए हैं।"

"चलो, चलो फिर कल आयेंगे। कोई फायदा नहीं यहाँ टाइम खराब करने से।" राजिन्दर ने कहा।
"शौक से जो दिल कहे, करिए, लेकिन अपनी लड़की के बारे में सच सच बताओ। चलो ठीक है, माँ बाप तो बतायेंगे नहीं, पति से पूछ लेता हूँ। समीर तुम बताओ, तुम्हारी बीबी का चरित्र कैसा था, कोई शक की गुंजाईश थी, कभी शक हुआ हो, कि शादी से पहले कोई चक्कर रहा हो।"

"अइसा कुछ नहीं लगता, "समीर ने कहा तो, मामा राजिन्दर तैश में आ गया, "लगने का तो कोई सवाल ही नहीं है, जब हमारी लड़की गऊ है, जिस खूँटे बांध दिया, मतलब ही नहीं, कहीं और नजर आए। यहाँ तो चरित्र हनन हो रहा है। चलो जीजा, कल बड़े अफसर से मिलना होगा।"

मझले मामा सुन्दर के एक दोस्त की पुलिस मुख्यालय में जान पहचान निकल आई। उस बड़े अफसर के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने तहकीकात शुरू कर दी। गुमशुदा की रिपोर्ट पर कार्यवाही शुरू हुई। समीर के परिवार के हर सदस्य को अलग अलग बुला कर छानबीन की। लेकिन सरिता कहाँ गई, किसी को नहीं मालूम था। नतीजा कुछ नहीं निकला। पुलिस मुख्यालय के दबाव के बाद थाने में समीर के समस्त परिवार को बुला कर सख्ती से पूछताछ की, लेकिन सच्चाई यह थी कि किसी को सरिता के बारे में कुछ नहीं मालूम था। रामपाल ने समीर की पिटाई शुरू कर दी, सख्ती से पूछा, "बता बीबी को कहाँ रखा है।"

"नहीं मालूम साहब।"
बता साले, कह कर और अधिक पिटाई कर दी। लेकिन निर्दोष समीर को कुछ नहीं मालूम था, कि उसकी पत्नी सरिता कहाँ है।
"अइसे नहीं बताएगा, मोटी चमड़ी का है, थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करूँगा, तभी बताएगा, "अउर पलट कर समीर के बाप की पिटाई कर दी। समीर की माँ ने निर्दोष पति और बेटे को पिटता देख कर रामपाल के पैर पकड़ लिए।" साहबजी, हम निर्दोष हैं, हमें कुछ नहीं मालूम।"

"नहीं मालूम, ऐसे बात नहीं बनेगी।" महिला कांस्टेबल से समीर की माँ की भी पिटाई करवा दी। देर रात को जब काफी पिटाई के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ तब वापिस घर भेज दिया।

अगले दिन राजिन्दर ने एस एच ओ रणबीर को थर्ड डिग्री के लिए कहा। थाने बुला कर समीर और उसके माँ बाप पर थर्ड डिग्री का इस्तेमाल कर लिया। नतीजा कुछ नहीं निकला, तो रात के समय रामपाल ने एस एच ओ रणबीर से अनुरोध किया, कि लड़के वाले निर्दोष लगते हैं। इतनी पिटाई के बाद तो भूत भी उगल देते। कहानी कुछ और लगती है, कहीं लड़की भाग तोनहींगई।

"ऐसे कर, छोड़ दे। कुछ दिनों तक इन पर सिर्फ निगरानी रखना। लेकिन ध्यान रहे, ढील मत देना। मुख्यालय से दबाव है। केस पर पूरी नजर रखनी है।"
"आप ठीक कहते हैं जनाब, नजर पूरी रखूँगा, लेकिन मेरा पुलिस में बीस साल का अनुभव यह कहता है, कि लड़के वाले निर्दोष हैं। लड़की भाग गई होगी।"
"हो सकता है, नजर पूरी रखो।"

समीर की नौकरी पुलिस के चक्कर में छूट गई। माँ बाप अलग परेशान। उस पर आग में धी का काम राजिन्दर की हरकतों ने किया। उसने महिला मुक्ति संगठन की महिलाओं से घर के सामने प्रदर्शन करवा दिया। संगठन की महिलाओ ने धर में घुस कर तोड़फोड़ कर दी। दो दिनों तक जम कर हंगामा किया। न्यूज चैनल पर चर्चा होने लगी। परेशान हो कर समीर घर छोड़ कर अपने एक दोस्त के घर चला गया और उसके माँ बाप दूसरे शहर किसी रिश्तेदार के घर रहने चले गए। घर पर ताला। न्यूज चैनल पुलिस की बुराई करने लगे और नाकारा घोषित कर दिया। न्यूज चैनलों से परेशान पुलिस भी, लेकिन करे तो क्या कर। रामपाल ने समीर से संपर्क किया। पुलिस को देखकर समीर कांपने लगा। रामपाल ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "बेटे डर मत, सच बता।"

"मैं कुछ नहीं जानता, हम बिल्कुल निर्दोष हैं।"

"मैं मान सकता हूँ। लेकिन लड़की है कहाँ यह बात गंभीर है और परेशान कर रही है। सबसे अधिक परेशानी न्यूज चैनलों से है। अब तो मंत्री भी केस की रिपोर्ट माँग रहे है। हमारी पोजीशन बहुत ही खराब है। मैं जानता हूँ कि तुम कहाँ हो, अगर मंत्रालय से सख्ती हुई तो न चाहते हुए भी तुम सबको अंदर करना पड़ेगा।" रामपाल चेतावनी देकर चला गया।

आज सरिता को गायब हुए एक महीना हो गया। सूरज ऑफिस में काम कर रहा था। उसके फोन की घंटी बजी। फोन पर अंजान नंबर था।" हेलो।"
"भैया।"
इतना सुनते ही सूरज कुर्सी से उछल पड़ा।" सरिता।।। कहाँ है, कैसी है तू।"
"मैं ठीक हूँ। घर में सब ठीक हैं न।"
"ठीक कहाँ से होंगे। तेरे जाने के बाद कुछ भी ठीक नहीं हैं। तू अपना बता। कहाँ है।"
"मैं ठीक हूँ, बाद में फोन करूँगी। कोई चिन्ता की बात नहीं है।"

फोन सुनने के बाद सूरज ने तुरन्त सबको सूचित किया। सभी परिवार के सदस्य खुशी की लहर में झूम जाते हैं कि सरिता सही सलामत है, लेकिन क्यों गई और कहाँ गई, यह अभी भी रहस्य बना था। पुलिस ने फोन नंबर ट्रेस करवाया। जिस नंबर से फोन आया था, वह हरिद्वार में एक पीसीओ का था। पुलिस टीम के साथ चंदगीराम, राजिन्दर और सूरज रात को ही टैक्सी से हरिद्वार के लिए रवाना हो गए। पौ फटने से पहले ही हरिद्वार पहुंच कर उस टेलिफोन बूथ के पास डेरा लगाया, जहाँ से सरिता ने फोन किया था। बूथ एक बड़ी सी धर्मशाला भाटिया भवन के मेनगेट से सटी दुकान बद्री टी स्टाल के अंदर था। पुलिस सादे लिबास में थी, ताकि कोई पहचान न सके। टी स्टाल बंद था। टैक्सी को थोड़ी दूर बनी पार्किंग में लगाया, और टी स्टाल के बाहर लोहे की चेन से बँधे बेंच पर बैठ कर डेरा जमाया। साढ़े पाँच बजे टी स्टाल का मालिक बद्री प्रसाद गीत गुनगुनाता कंधे पर छोला लटकाए पहुंचा और सबको नमस्ते कह कर दुकान का ताला खोला। ताला खोल कर बद्री ने सबको सम्बोधित करके कहा,

"सैलानी हो, भवन तो छ: बजे खुलेगा, तब तक चाय पी कर तरो ताजा हो जाईये।। कैसी पीजिएगा, ज्यादा मीठा या तेज कड़क चाय।"
कड़कती अवाज में रामपाल ने सरिता की फोटो दिखाते हुए पूछा, "लड़की कहाँ है।"
रणबीर ने रिवोल्वर बद्री की कमर से सटा दी।
कमर से सटी रिवोल्वर और कड़कती आवाज के साथ सर्दी मे बद्री के पसीने छूट गए। काँपती आवाज में धीरे से बोल सका, "कौन की लड़की।"
"आँखे खोल कर ध्यान से फिर देख ले, लड़की की फोटो।"
"आप कौन।"
"पुलिस।"
पुलिस का नाम सुनते ही काँपते हुए बोला, "मेरे घर में कमरा किराए पर ले रखा है।"
"चल घर।"
दो मिनट बाद एक गली में घर की कुंडी खटखटाई।
"भाग्यवान दरवाजा खोल।"
बद्री की पत्नी ने दरवाजा खोलते हुए पूछा।" क्या बात हो गई। वापिस क्यों आ गए, तबीयत तो ठीक हैं न।"
"मरवा दिया उस लौंडिया ने, कल ही कह रहा था। निकाल बाहर कर उसे। अब जान बच जाए तो गनीमत समझ।"

रामपाल ने रिवोल्वर बद्री की घरवाली पर तान दी। वह तो रिवोल्वर देख गश खाकर गिर गई।
"माफ कर दो, जान बक्श दो हमारी। हमने कुछ नहीं किया। हम बेकसूर हैं। हमने तो उसे किराये पर कमरा दे रखा है। हमें तो पिछले हफ्ते ही मालूम हुआ, कि पुलिस में मामला दर्ज हैं। वो तो अपने मर्द के साथ एक महीने से किराये पर रह रही है। न्यूज चैनल में जब खबर आई तो मालूम हुआ। हमें तो उसने कहा था, शादी शुदा है, मर्द उसका ऑटो चलाता है, नई शादी है, हमें शक कैसे होता। जब कल बूथ से फोन किया तब हमे मालूम हुआ।"

कमरे का दरवाजा खटखटाया। थोड़ी देर में एक युवक ने अलसाई हालात, आधी नींद से जाग कर दरवाजा खोल कर सब को देख कर धबरा गया।
कौन।।। क क कौन ही बोल सका। इतने में रामपाल अंदर गया।" राजिन्दर जी देख लो। लड़की यही हैं न सही सलामत।"
सरिता तब तक जाग चुकी थी, अपने कपड़े संभालते हुए सूरज के गले मिल कर रो बैठी।" भैया।"
"कैसी है, मेरी बेटी।" चंदगीराम ने बेटी को गले लगाया।" तू ठीक तो हैं न।"
"हाँ पापा।"
"यह लड़का कौन है।" चंदगीराम ने सरिता से पूछा।
"पापा ये सागर हैं, हम कालेज में एक साथ पड़ते थे। एक दूसरे से प्यार करते थे। अब मैंने सागर से शादी कर ली है।"

क क।।। क्या, इससे अधिक चंदगीराम कुछ न कह सका। शायद सब कुछ समझ गया। दिल पर एक भारी पत्थर सा बोझ लिए नीचे आकर दरवाजा पकड़ कर खड़ा हो गया फिर धीरे धीरे फर्श पर बैठ कर सोच में डूब गया। कब आखों से आँसू टपकने लगे, खुद चंदगीराम को भी नहीं पता चला।
ऊपर कमरे में रामपाल और रणबीर समझ चुके थे कि यह सब प्यार का चक्कर है। सरिता को सम्बोधित करते हुए कहा।" कपड़े बदल कर नीचे आ जा। दिल्ली चलना है। शेष कार्यवाही वहीं होगी।" फिर रणबीर को सम्बोधित करते बोला, "मैं तो पहले ही समझ गया था, कि प्यार श्यार का मामला है। उस निर्दोष समीर पर थर्ड डिग्री करवा दी। कभी उसने मक्खी तक नहीं मारी होगी। राजिन्दर बाबू आप ने तो मर्डर तक सोच लिया था।"

"हमें किया मालूम था अपना सिक्का खोटा निकलेगा।" फिर चंदगीराम पर बरस पड़ा।" जीजे, मेरी इज्ज़त मिट्टी में मिला दी। ऊपर तक पहुंच निकाली थी। नाक कटवा दी। लड़की संभाल नहीं सका। शादी से पहले पूछ तो लेता।"

भरी आँखों से चंदगीराम इतना ही कह सका।" तुमने और चंपा ने मौका ही कहाँ दिया। मुझे याद है। सरिता ने कहा था। शादी में जल्दी न करो, लेकिन जबरदस्ती हाँ करवाई थी।"
कुछ देर तक जब सरिता नीचे नहीं आई तो रामपाल ने कहा, "अरे लड़की को जल्दी लाओ। वापिस भी जाना है। खोदा पहाड़, निकली मरी हुई चुहिया। पूरी तैयारी करके आये थे, किसी गैंग के साथ मुठभेड़ होगी। यहाँ क्या बोलू आपको, ऊपर की सिफारिश न होती, चलो छोड़ो अब। जल्दी करो।"
सरिता ने दो टूक जाने से मना कर दिया।

"भैया, मैं वापिस दिल्ली नहीं जाऊँगी। मैं सागर के साथ रहूँगी। हमने विवाह भी कर लिया है।"
"एक के होते दूसरा विवाह वर्जित है। ऐसा नहीं हो सकता।" सूरज की आवाज में तेजी थी। सुन कर सभी ऊपर कमरे में आ गए।

"मैं कुछ नहीं जानती, समीर से विवाह मेरी इच्छा से नहीं हुआ। राजिन्दर मामा के साथ माँ ने दबाव डाला था। वहाँ मेरा दम घुटता है। मैंने मना भी किया था, लेकिन सभी इस बात पर तुले थे, कि कहीं मकान बेचने पर जो रकम मिली थी, पापा अगर संभाल न पाए तो क्या होगा। उससे पहले मेरी शादी आनन-फानन में कर दी। मैं किसी भी सूरत में नहीं जाऊँगी।"

"कैसे नहीं जायेगी।" राजिन्दर ने सरिता का हाथ पकड़ कर उठाया।

सरिता रो पड़ी।" मामा अगर जबरदस्ती करोगे तो आत्महत्या कर लूँगी। अब नहीं सहूँगी।"
चंदगीराम ने सरिता की यह बात सुन कर हाथ जोड़ कर रणबीर और रामपाल से विनती की।" सरकार मैं कानून नहीं जानता। अगर सरिता नहीं जाना चाहती तो जबरदस्ती न कर।, लड़की ने कुछ कर लिया, तो फिर क्या करेंगें। मैं उसकी गुमशुदा की रिपोर्ट वापिस लेने को तैयार हूँ। लड़की को उसके हाल पर छोड़ दो, वह अपनी जिन्दगी जिए, हम अपनी जी लेंगें। आप मुझे जो सजा देना चाहे, मैं स्वीकार करता हूँ।"

सरिता की जिद और चंदगीराम के अनुरोध के बाद सब बिना सरिता के बैरंग वापिस आ गए। चंदगीराम का मन आत्मग्लानि से भर गया, कि एक निर्दोष को पिटवा दिया और बिना किसी कसूर के थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करवा दिया।

                                                                    ---मनमोहन भाटिया---