रविवार, 11 अगस्त 2013

परमात्मा का कुत्ता

बहुत-से लोग यहाँ-वहाँ सिर लटकाए बैठे थे जैसे किसी का मातम करने आए हों। कुछ लोग अपनी पोटलियाँ खोलकर खाना खा रहे थे। दो-एक व्यक्ति पगडिय़ाँ सिर के नीचे रखकर कम्पाउंड के बाहर सडक़ के किनारे बिखर गये थे। छोले-कुलचे वाले का रोज़गार गरम था, और कमेटी के नल के पास एक छोटा-मोटा क्यू लगा था। नल के पास कुर्सी डालकर बैठा अर्ज़ीनवीस धड़ाधड़ अर्ज़ियाँ टाइप कर रहा था। उसके माथे से बहकर पसीना उसके होंठों पर आ रहा था, लेकिन उसे पोंछने की फुरसत नहीं थी। सफ़ेद दाढिय़ों वाले दो-तीन लम्बे-ऊँचे जाट, अपनी लाठियों पर झुके हुए, उसके खाली होने का इन्तज़ार कर रहे थे। धूप से बचने के लिए अर्ज़ीनवीस ने जो टाट का परदा लगा रखा था, वह हवा से उड़ा जा रहा था। थोड़ी दूर मोढ़े पर बैठा उसका लडक़ा अँग्रेज़ी प्राइमर को रट्‌टा लगा रहा था-सी ए टी कैट-कैट माने बिल्ली; बी ए टी बैट-बैट माने बल्ला; एफ ए टी फैट-फैट माने मोटा...। कमीज़ों के आधे बटन खोले और बगल में फ़ाइलें दबाए कुछ बाबू एक-दूसरे से छेडख़ानी करते, रजिस्ट्रेशन ब्रांच से रिकार्ड ब्रांच की तरफ जा रहे थे। लाल बेल्ट वाला चपरासी, आस-पास की भीड़ से उदासीन, अपने स्टूल पर बैठा मन ही मन कुछ हिसाब कर रहा था। कभी उसके होंठ हिलते थे, और कभी सिर हिल जाता था। सारे कम्पाउंड में सितम्बर की खुली धूप फैली थी। चिडिय़ों के कुछ बच्चे डालों से कूदने और फिर ऊपर को उडऩे का अभ्यास कर रहे थे और कई बड़े-बड़े कौए पोर्च के एक सिरे से दूसरे सिरे तक चहलक़दमी कर रहे थे। एक सत्तर-पचहत्तर की बुढिय़ा, जिसका सिर काँप रहा था और चेहरा झुर्रियों के गुंझल के सिवा कुछ नहीं था, लोगों से पूछ रही थी कि वह अपने लडक़े के मरने के बाद उसके नाम एलाट हुई ज़मीन की हकदार हो जाती है या नहीं...?

अन्दर हॉल कमरे में फ़ाइलें धीरे-धीरे चल रही थीं। दो-चार बाबू बीच की मेज़ के पास जमा होकर चाय पी रहे थे। उनमें से एक दफ़्तरी कागज़ पर लिखी अपनी ताज़ा ग़ज़ल दोस्तों को सुना रहा था और दोस्त इस विश्वास के साथ सुन रहे थे कि वह ग़ज़ल उसने 'शमा' या 'बीसवीं सदी' के किसी पुराने अंक में से उड़ाई है।

"अज़ीज़ साहब, ये शेअर आपने आज ही कहे हैं, या पहले के कहे हुए शेअर आज अचानक याद हो आए हैं?" साँवले चेहरे और घनी मूँछों वाले एक बाबू ने बायीं आँख को ज़रा-सा दबाकर पूछा। आस-पास खड़े सब लोगों के चेहरे खिल गये।

"यह बिल्कुल ताज़ा ग़ज़ल है," अज़ीज़ साहब ने अदालत में खड़े होकर हलफिया बयान देने के लहज़े में कहा, "इससे पहले भी इसी वज़न पर कोई और चीज़ कही हो तो याद नहीं।" और फिर आँखों से सबके चेहरों को टटोलते हुए वे हल्की हँसी के साथ बोले, "अपना दीवान तो कोई रिसर्चदां ही मुरत्तब करेगा...।"

एक फरमायशी कहकहा लगा जिसे 'शी-शी' की आवाज़ों ने बीच में ही दबा दिया। कहकहे पर लगायी गयी इस ब्रेक का मतलब था कि कमिश्नर साहब अपने कमरे में तशरीफ़ ले आये हैं। कुछ देर का वक्फा रहा, जिसमें सुरजीत सिंह वल्द गुरमीत सिंह की फ़ाइल एक मेज़ से एक्शन के लिए दूसरी मेज़ पर पहुँच गयी, सुरजीत सिंह वल्द गुरमीत सिंह मुसकराता हुआ हॉल से बाहर चला गया, और जिस बाबू की मेज़ से फ़ाइल गयी थी, वह पाँच रुपये के नोट को सहलाता हुआ चाय पीने वालों के जमघट में आ शामिल हुआ। अज़ीज़ साहब अब आवाज़ ज़रा धीमी करके ग़ज़ल का अगला शेअर सुनाने लगे।

साहब के कमरे से घंटी हुई। चपरासी मुस्तैदी से उठकर अन्दर गया, और उसी मुस्तैदी से वापस आकर फिर अपने स्टूल पर बैठ गया।

चपरासी से खिड़की का पर्दा ठीक कराकर कमिश्नर साहब ने मेज़ पर रखे ढेर-से काग़ज़ों पर एक साथ दस्तख़त किए और पाइप सुलगाकर 'रीडर्ज़ डाइजेस्ट' का ताज़ा अंक बैग से निकाल लिया। लेटीशिया बाल्ड्रिज का लेख कि उसे इतालवी मर्दों से क्यों प्यार है, वे पढ़ चुके थे। और लेखों में हृदय की शल्य चिकित्सा के सम्बन्ध में जे.डी. रैटक्लिफ का लेख उन्होंने सबसे पहले पढऩे के लिए चुन रखा था। पृष्ठ एक सौ ग्यारह खोलकर वे हृदय के नए ऑपरेशन का ब्यौरा पढऩे लगे।

तभी बाहर से कुछ शोर सुनाई देने लगा।

कम्पाउंड में पेड़ के नीचे बिखरकर बैठे लोगों में चार नए चेहरे आ शामिल हुए थे। एक अधेड़ आदमी था जिसने अपनी पगड़ी ज़मीन पर बिछा ली थी और हाथ पीछे करके तथा टाँगें फैलाकर उस पर बैठ गया था। पगड़ी के सिरे की तरफ़ उससे ज़रा बड़ी उम्र की एक स्त्री और एक जवान लडक़ी बैठी थीं; और उनके पास खड़ा एक दुबला-सा लडक़ा आस-पास की हर चीज़ को घूरती नज़र से देख रहा था, अधेड़ मरद की फैली हुई टाँगें धीरे-धीरे पूरी खुल गयी थीं और आवाज़ इतनी ऊँची हो गयी थी कि कम्पाउंड के बाहर से भी बहुत-से लोगों का ध्यान उसकी तरफ़ खिंच गया था। वह बोलता हुआ साथ अपने घुटने पर हाथ मार रहा था। "सरकार वक़्त ले रही है! दस-पाँच साल में सरकार फ़ैसला करेगी कि अर्ज़ी मं$जूर होनी चाहिए या नहीं। सालो, यमराज भी तो हमारा वक़्त गिन रहा है। उधर वह वक़्त पूरा होगा और इधर तुमसे पता चलेगा कि हमारी अर्ज़ी मं$जूर हो गयी है।"

चपरासी की टाँगें ज़मीन पर पुख़्ता हो गयीं, और वह सीधा खड़ा हो गया। कम्पाउंड में बिखरकर बैठे और लेटे हुए लोग अपनी-अपनी जगह पर कस गये। कई लोग उस पेड़ के पास आ जमा हुए।

"दो साल से अर्ज़ी दे रखी है कि सालो, ज़मीन के नाम पर तुमने मुझे जो गड्ïढा एलाट कर दिया है, उसकी जगह कोई दूसरी ज़मीन दो। मगर दो साल से अर्ज़ी यहाँ के दो कमरे ही पार नहीं कर पायी!" वह आदमी अब जैसे एक मजमे में बैठकर तकरीर करने लगा, "इस कमरे से उस कमरे में अर्ज़ी के जाने में वक़्त लगता है! इस मेज़ से उस मेज़ तक जाने में भी वक़्त लगता है! सरकार वक़्त ले रही है! लो, मैं आ गया हूँ आज यहीं पर अपना सारा घर-बार लेकर। ले लो जितना वक़्त तुम्हें लेना है!...सात साल की भुखमरी के बाद सालों ने ज़मीन दी है मुझे-सौ मरले का गड्ïढा! उसमें क्या मैं बाप-दादों की अस्थियाँ गाड़ूँगा? अर्ज़ी दी थी कि मुझे सौ मरले की जगह पचास मरले दे दी-लेकिन ज़मीन तो दो! मगर अर्ज़ी दो साल से वक़्त ले रही है! मैं भूखा मर रहा हूँ, और अर्ज़ी वक़्त ले रही है!"

चपरासी अपने हथियार लिये हुए आगे आया-माथे पर त्योरियाँ और आँखों में क्रोध। आस-पास की भीड़ को हटाता हुआ वह उसके पास आ गया।

"ए मिस्टर, चल हियां से बाहर!" उसने हथियारों की पूरी चोट के साथ कहा, "चल...उठ...!"

"मिस्टर आज यहाँ से नहीं उठ सकता1" वह आदमी अपनी टाँगें थोड़ी और चौड़ी करके बोला, "मिस्टर आज यहाँ का बादशाह है। पहले मिस्टर देश के बेताज बादशाहों की जय बुलाता था। अब वह किसी की जय नहीं बुलाता। अब वह खुद यहाँ का बादशाह है...बेलाज बादशाह7 उसे कोई लाज-शरम नहीं है। उस पर किसी का हुक्म नहीं चलता। समझे, चपरासी बादशाह!"

"अभी तुझे पता चल जाएगा कि तुझ पर किसी का हुक्म चलता है या नहीं," चपरासी बादशाह और गरम हुआ, "अभी पुलिस के सुपुर्द कर दिया जाएगा तो तेरी सारी बादशाही निकल जाएगी...।"

"हा-हा!" बेलाज बादशाह हँसा। "तेरी पुलिस मेरी बादशाही निकालेगी? तू बुला पुलिस को। मैं पुलिस के सामने नंगा हो जाऊँगा और कहूँगा कि निकालो मेरी बादशाही! हममें से किस-किसकी बादशाही निकालेगी पुलिस? ये मेरे साथ तीन बादशाह और हैं। यह मेरे भाई की बेवा है-उस भाई की जिसे पाकिस्तान में टाँगों से पकडक़र चीर दिया गया था। यह मेरे भाई का लडक़ा है जो अभी से तपेदिक का मरीज़ है। और यह मेरे भाई की लडक़ी है जो अब ब्याहने लायक हो गयी है। इसकी बड़ी कुँवारी बहन आज भी पाकिस्तान में है। आज मैंने इन सबको बादशाही दे दी है। तू ले आ जाकर अपनी पुलिस, कि आकर इन सबकी बादशाही निकाल दे। कुत्ता साला...!"

अन्दर से कई-एक बाबू निकलकर बाहर आ गये थे। 'कुत्ता साला' सुनकर चपरासी आपे से बाहर हो गया। वह तैश में उसे बाँह से पकडक़र घसीटने लगा, "तुझे अभी पता चल जाता है कि कौन साला कुत्ता है! मैं तुझे मार-मारकर..." और उसने उसे अपने टूटे हुए बूट की एक ठोकर दी। स्त्री और लडक़ी सहमकर वहाँ से हट गयीं। लडक़ा एक तरफ़ खड़ा होकर रोने लगा।

बाबू लोग भीड़ को हटाते हुए आगे बढ़ आये और उन्होंने चपरासी को उस आदमी के पास से हटा लिया। चपरासी फिर भी बड़बड़ाता रहा, "कमीना आदमी, दफ़्तर में आकर गाली देता है। मैं अभी तुझे दिखा देता कि..."

"एक तुम्हीं नहीं, यहाँ तुम सबके-सब कुत्ते हो," वह आदमी कहता रहा, "तुम सब भी कुत्ते हो, और मैं भी कुत्ता हूँ। फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि तुम लोग सरकार के कुत्ते हो-हम लोगों की हड्डियाँ चूसते हो और सरकार की तरफ़ से भौंकते हो। मैं परमात्मा का कुत्ता हूँ। उसकी दी हुई हवा खाकर जीता हूँ, और उसकी तरफ़ से भौंकता हूँ। उसका घर इन्साफ़ का घर है। मैं उसके घर की रखवाली करता हूँ। तुम सब उसके इन्साफ़ की दौलत के लुटेरे हो। तुम पर भौंकना मेरा फर्ज़ है, मेरे मालिक का फरमान है। मेरा तुमसे अज़ली बैर है। कुत्ते का बैरी कुत्ता होता है। तुम मेरे दुश्मन हो, मैं तुम्हारा दुश्मन हूँ। मैं अकेला हूँ, इसलिए तुम सब मिलकर मुझे मारो। मुझे यहाँ से निकाल दो। लेकिन मैं फिर भी भौंकता रहूँगा। तुम मेरा भौंकना बन्द नहीं कर सकते। मेरे अन्दर मेरे मालिक का नर है, मेरे वाहगुरु का तेज़ है। मुझे जहाँ बन्द कर दोगे, मैं वहाँ भौंकूँगा, और भौंक-भौंककर तुम सबके कान फाड़ दूँगा। साले,आदमी के कुत्ते, जूठी हड्डी पर मरनेवाले कुत्ते दुम हिला-हिलाकर जीनेवाले कुत्ते...!"

"बाबा जी, बस करो," एक बाबू हाथ जोडक़र बोला, "हम लोगों पर रहम खाओ, और अपनी यह सन्तबानी बन्द करो। बताओ तुम्हारा नाम क्या है, तुम्हारा केस क्या है...?"

"मेरा नाम है बारह सौ छब्बीस बटा सात! मेरे माँ-बाप का दिया हुआ नाम खा लिया कुत्तों ने। अब यही नाम है जो तुम्हारे दफ़्तर का दिया हुआ है। मैं बारह सौ छब्बीस बटा सात हूँ। मेरा और कोई नाम नहीं है। मेरा यह नाम याद कर लो। अपनी डायरी में लिख लो। वाहगुरु का कुत्ता-बारह सौ छब्बीस बटा सात।"

"बाबा जी, आज जाओ, कल या परसों आ जाना। तुम्हारी अर्ज़ी की कार्रवाई तकरीबन-तकरीबन पूरी हो चुकी है...।"

"तकरीबन-तकरीबन पूरी हो चुकी है! और मैं खुद ही तकरीबन-तकरीबन पूरा हो चुका हूँ! अब देखना यह है कि पहले कार्रवाई पूरी होती है, कि पहले मैं पूरा होता हूँ! एक तरफ़ सरकार का हुनर है और दूसरी तरफ़ परमात्मा का हुनर है! तुम्हारा तकरीबन-तकरीबन अभी दफ़्तर में ही रहेगा और मेरा तकरीबन-तकरीबन कफ़न में पहुँच जाएगा। सालों ने सारी पढ़ाई ख़र्च करके दो लफ़्ज ईज़ाद किये हैं-शायद और तकरीबन। 'शायद आपके काग़ज़ ऊपर चले गये हैं-तकरीबन-तकरीबन कार्रवाई पूरी हो चुकी है!' शायद से निकालो और तकरीबन में डाल दो! तकरीबन से निकालो और शायद में गर्क़ कर दो। तकरीबन तीन-चार महीने में तहक़ीक़ात होगी।...शायद महीने-दो महीने में रिपोर्ट आएगी।' मैं आज शायद और तकरीबन दोनों घर पर छोड़ आया हूँ। मैं यहाँ बैठा हूँ और यहीं बैठा रहूँगा। मेरा काम होना है, तो आज ही होगा और अभी होगा। तुम्हारे शायद और तकरीबन के गाहक ये सब खड़े हैं। यह ठगी इनसे करो...।"

बाबू लोग अपनी सद्‌भावना के प्रभाव से निराश होकर एक-एक करके अन्दर लौटने लगे।

"बैठा है, बैठा रहने दो।"

"बकता है, बकने दो।"

"साला बदमाशी से काम निकालना चाहता है।"

"लेट हिम बार्क हिमसेल्फ टु डेथ।"

बाबुओं के साथ चपरासी भी बड़बड़ाता हुआ अपने स्टूल पर लौट गया। "मैं साले के दाँत तोड़ देता। अब बाबू लोग हाक़िम हैं और हाक़िमों का कहा मानना पड़ता है, वरना..."

"अरे बाबा, शान्ति से काम ले। यहाँ मिन्नत चलती है, पैसा चलता है, धौंस नहीं चलती," भीड़ में से कोई उसे समझाने लगा।

वह आदमी उठकर खड़ा हो गया।

"मगर परमात्मा का हुक्म हर जगह चलता है," वह अपनी कमीज़ उतारता हुआ बोला, "और परमात्मा के हुक़्म से आज बेलाज बादशाह नंगा होकर कमिश्नर साहब के कमरे में जाएगा। आज वह नंगी पीठ पर साहब के डंडे खाएगा। आज वह बूटों की ठोकरें खाकर प्रान देगा। लेकिन वह किसी की मिन्नत नहीं करेगा। किसी को पैसा नहीं चढ़ाएगा। किसी की पूजा नहीं करेगा। जो वाहगुरु की पूजा करता है, वह और किसी की पूजा नहीं कर सकता। तो वाहगुरु का नाम लेकर..."

और इससे पहले कि वह अपने कहे को किये में परिणत करता, दो-एक आदमियों ने बढक़र तहमद की गाँठ पर रखे उसके हाथ को पकड़ लिया। बेलाज बादशाह अपना हाथ छुड़ाने के लिए संघर्ष करने लगा।

"मुझे जाकर पूछने दो कि क्या महात्मा गाँधी ने इसीलिए इन्हें आज़ादी दिलाई थी कि ये आज़ादी के साथ इस तरह सम्भोग करें? उसकी मिट्‌टी ख़राब करें? उसके नाम पर कलंक लगाएँ? उसे टके-टके की फ़ाइलों में बाँधकर ज़लील करें? लोगों के दिलों में उसके लिए नफ़रत पैदा करें? इन्सान के तन पर कपड़े देखकर बात इन लोगों की समझ में नहीं आती। शरम तो उसे होती है जो इन्सान हो। मैं तो आप कहता हूँ कि मैं इन्सान नहीं, कुत्ता हूँ...!"

सहसा भीड़ में एक दहशत-सी फैल गयी। कमिश्नर साहब अपने कमरे से बाहर निकल आये थे। वे माथे की त्योरियों और चेहरे की झुर्रियों को गहरा किये भीड़ के बीच में आ गये।

"क्या बात है? क्या चाहते हो तुम?"

"आपसे मिलना चाहता हूँ, साहब," वह आदमी साहब को घूरता हुआ बोला, "सौ मरले का एक गड्ïढा मेरे नाम एलाट हुआ है। वह गड्ïढा आपको वापस करना चाहता हूँ ताकि सरकार उसमें एक तालाब बनवा दे, और अफ़सर लोग शाम को वहाँ जाकर मछलियाँ मारा करें। या उस गड्ढे में सरकार एक तहख़ाना बनवा दे और मेरे जैसे कुत्तों को उसमें बन्द कर दे...।"

"ज़्यादा बक-बक मत करो, और अपना केस लेकर मेरे पास आओ।"

"मेरा केस मेरे पास नहीं है, साहब! दो साल से सरकार के पास है-आपके पास है। मेरे पास अपना शरीर और दो कपड़े हैं। चार दिन बाद ये भी नहीं रहेंगे, इसलिए इन्हें भी आज ही उतारे दे रहा हूँ। इसके बाद बाकी सिर्फ़ बारह सौ छब्बीस बटा सात रह जाएगा। बारह सौ छब्बीस बटा सात को मार-मारकर परमात्मा के हु$जूर में भेज दिया जाएगा...।"

"यह बकवास बन्द करो ओर मेरे साथ अन्दर आओ।"

और कमिश्नर साहब अपने कमरे में वापस चले गये। वह आदमी भी कमीज़ कन्धे पर रखे उस कमरे की तरफ़ चल दिया।

"दो साल चक्कर लगाता रहा, किसी ने बात नहीं सुनी। ख़ुशामदें करता रहा, किसी ने बात नहीं सुनी। वास्ते देता रहा,किसी ने बात नहीं सुनी...।"

चपरासी ने उसके लिए चिक उठा दी और वह कमिश्नर साहब के कमरे में दाख़िल हो गया। घंटी बजी, फ़ाइलें हिलीं,बाबुओं की बुलाहट हुई, और आधे घंटे के बाद बेलाज बादशाह मुस्कराता हुआ बाहर निकल आया। उत्सुक आँखों की भीड़ ने उसे आते देखा, तो वह फिर बोलने लगा, "चूहों की तरह बिटर-बिटर देखने में कुछ नहीं होता। भौंको, भौंको,सबके-सब भौंको। अपने-आप सालों के कान फट जाएँगे। भौंको कुत्तो, भौंको..."

उसकी भौजाई दोनों बच्चों के साथ गेट के पास खड़ी इन्तज़ार कर रही थी। लडक़े और लडक़ी के कन्धों पर हाथ रखते हुए वह सचमुच बादशाह की तरह सडक़ पर चलने लगा।

"हयादार हो, तो सालहा-साल मुँह लटकाए खड़े रहो। अर्ज़ियाँ टाइप कराओ और नल का पानी पियो। सरकार वक़्त ले रही है! नहीं तो बेहया बनो। बेहयाई हज़ार बरकत है।"

वह सहसा रुका और ज़ोर से हँसा।

"यारो, बेहयाई हज़ार बरकत है।"

उसके चले जाने के बाद कम्पाउंड में और आस-पास मातमी वातावरण पहले से और गहरा हो गया। भीड़ धीरे-धीरे बिखरकर अपनी जगहों पर चली गयी। चपरासी की टाँगें फिर स्टूल पर झूलने लगीं। सामने के कैंटीन का लडक़ा बाबुओं के कमरे में एक सेट चाय ले गया। अर्ज़ीनवीस की मशीन चलने लगी और टिक-टिक की आवाज़ के साथ उसका लडक़ा फिर अपना सबक दोहराने लगा। "पी ई एन पेन-पेन माने कलम; एच ई एन हेन-हेन माने मुर्गी; डी ई ऐन डेन-डेन माने अँधेरी गुफा...!"

                                                                      ---मोहन राकेश---

भेड़िये

‘भेड़िया क्या है’, खारू बंजारे ने कहा, ‘मैं अकेला पनेठी से एक भेड़िया मार सकता हूँ।’ मैंने उसका विश्वास कर लिया। खारू किसी चीज से नहीं डर सकता और हालाँकि 70 के आस-पास होने और एक उम्र की गरीबी के सबब से वह बुझा-बुझा सा दिखाई पड़ता था; पर तब भी उसकी ऐसी बातों का उसके कहने के साथ ही यकीन करना पड़ता था। उसका असली नाम शायद इफ्तखार या ऐसा ही कुछ था; पर उसका लघुकरण ‘खारू’ बिलकुल चस्पाँ होता था। उसके चारों ओर ऐसी ही दुरूह और दुर्भेद्य कठिनता थी। उसकी आँखें ठंडी और जमी हुई थीं और घनी सफेद मूँछों के नीचे उसका मुँह इतना ही अमानुषीय और निर्दय था जितना एक चूहेदान।

जीवन से वह निपटारा कर चुका था, मौत उसे नहीं चाहती थी; पर तब भी वह समय के मुँह पर थूककर जीवित था। तुम्हारी भली या बुरी राय की परवा किए बिना भी, वह कभी झूठ नहीं बोलता था और अपने निर्दय कटु सत्य से मानो यह दिखला देता था कि सत्य भी कितना ऊसर और भयानक हो सकता है। खारू ने मुझसे यह कहानी कही उसका वह ठोस तरीका और गहरी बेसरोकारी, जिससे उसने यह कहानी कही, मैं शब्दों में नहीं लिख सकता, पर तब भी मैं यह कहानी सच मानता हूँ - इसका एक-एक लफ्ज।

‘मैं किसी चीज से नहीं डरता, हाँ, सिवा भेड़िये के मैं किस चीज से नहीं डरता।’ खारू ने कहा। एक भेड़िया नहीं, दो-चार नहीं। भेड़ियों का झुंड - 200-300 जो जाड़े की रातों में निकलते हैं और सारी दुनिया की चीजें जिनकी भूख नहीं बुझा सकतीं, उनका - उन शैतानों की फौज का कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता। लोग कहते हैं, अकेला भेड़िया कायर होता है। यह झूठ है। भेड़िया कायर नहीं होता, अकेला भी वह सिर्फ चौकन्ना होता है। तुम कहते हो लोमड़ी चालाक होती है, तो तुम भेड़ियों को जानते ही नहीं। तुमने कभी भेड़िये को शिकार करते देखा है किसी का - बारहसिंगे का? वह शेर की तरह नाटक नहीं करता, भालू की तरह शेखी नहीं दिखाता। एक मर्तबा, सिर्फ एक मर्तबा - गेंद-सा कूदकर उसकी जाँघ में गहरा जख्म कर देता है - बस। फिर पीछे, बहुत पीछे रहकर टपकते हुए खून की लकीर पर चलकर वहाँ पहुँच जाता है। जहाँ वह बारहसिंगा कमजोर होकर गिर पड़ा है। या, उचककर एक क्षण मैं अपने से तिगुने जानवर का पेट चाक कर देता है - और वहीं चिपक जाता है। भेड़िया बला का चालाक और बहादुर जानवर है। वह थकना तो जानता ही नहीं। अच्छे पछैयाँ बैल हमारे बंजारी गड्डों को घोड़ों से तेज ले जाते हैं : और जब उन्हें भेड़िया की बू आती है, तो भागते नहीं, उड़ते हैं। लेकिन भेड़िये से तेज कोई चार पैर का जानवर नहीं दौड़ सकता...

‘सुनो, मैं ग्वालियर के राज से आईन में आ रहा था। अजीब सर्दी थी और भेड़िये गोलों में निकल पड़े थे। हमारा गड्डा काफी भरा था। मैं, मेरा बाप, गिरस्ती और तीन नटनियाँ - 15-15 साल की। हम लोग उन्हें पछाँह लिये जा रहे थे।’

‘किसलिए?’ - मैंने पूछा

‘तुम्हारा क्या खयाल है, मुजरा करने? अरे बेचने के लिए। और वह किस मसरफ की हैं? ग्वालियर की नटनियाँ छोटी-छोटी गदबदी होती हैं और पंजाब में खूब बिक जाती हैं। यह लड़कियाँ होती तो बड़ी चोखी हैं, पर भारी भी खूब होती हैं। हमारे पास एक तेज बंजारी गड्डा था और तीन घोड़ों-से तेज भागनेवाले बैल।

हम लोग तड़के ही चल दिये थे, दिन-ही-दिन में हम आगे जाने वाले साथियों से मिल जाना चाहते थे। वैसे डर के लिए हमारे पास दो कमान और एक टोपीदार बंदूक थी। बैल हौसले से भाग रहे थे और हम लोग 20 मील निकल आए थे कि बड़े मियाँ ने घूमकर कहा - `खारे, भेड़िये हैं?’

मैंने तेजी से कहा - ’क्या कहा? भेड़िये हैं? होते तो बैल न चौंकते?’

बूढ़े ने सर हिलाकर कहा - ’नहीं, भेड़िये जरूर हैं। खैर, वह हमसे दस मील पीछे हैं और हमारे बैल थक चुके हैं; लेकिन हमें पचास मील और जाना है।’ बूढ़े ने कहा - ’और मैं इन भेड़ियों को जानता हूँ, पार साल इन्होंने कुछ कैदियों को खा लिया था और बेड़ियों और सिपाहियों की बंदूकों के सिवा कुछ न बचा। बंदूक भर लो!’

मैंने कमानों की तान के देखा, बंदूक तोड़ी, सब ठीक था।

‘बारूद की नई पोंगली भी निकाल के देख ले।’ मेरे बाप ने कहा।

‘बारूद की पोंगली,’ मैंने कहा, ‘मेरे पास तो पुरानी ही वाली है।’

तब बूढ़े ने मुझे गालियाँ देनी शुरू कीं - ’तू यह है, तू वह है।’

मैंने पूरा गड्डा उलट डाला; पर नई पोंगली कहीं नहीं थी।

मेरे बाप ने भी सब टटोला - ’तू झूठ बोलता है, तू भेड़ियों की औलाद, मैंने तुझे नई पोंगली दी थी!’ पर वह बारूद यहाँ कहीं नहीं थी। मेरे बाप ने मेरी पीठ पर कुहनी मारते हुए कहा, ‘शहर पहुँचकर मैं तेरी खाल उधेड़ दूँगा, शहर पहुँचकर...’ और इसी वक्त अचानक बैल एकदम रुककर पूँछ हिलाकर जोर से भागे। मैंने सुना मीलों दूर एक आवाज आ रही थी, बहुत धीमी जैसे खँडहरों में भी आँधी गुजरने से आती है -

ह्वा आ आ आ आ आ आ आ आ!

‘हवा,’ मैंने सहम के कहा। ‘भेड़िये!’ मेरे बाप ने नफरत से कहा, और बैलों को एक साथ किया। पर उन्हें मार की जरूरत नहीं थी। उन्हें भेड़ियों की बू आ गई थी और वे जी तोड़कर भाग रहे थे। दूर मैं एक छाटे-से काले धब्बे को हरकत करते देख रहा था। उस सैकड़ों मील के चपटे रेगिस्तानी बंजर में तुम मीलों की चीज देख सकते हो। और दूर पर उस काले धब्बे को बादल की तरह आते मैं देख रहा था। बूढ़े ने कहा, जैसे ही वह नजदीक आ जाएँ, मारो। एक भी तीर बेकार खोया तो मैं कलेजा निकाल लूँगा।’ और तब उन तीन लड़कियों ने एक दूसरे से चिपटकर टिसुए (आँसू) बहाना शुरू किया। ‘चुप रहो।’ मैंने उनसे कहा, ‘तुमने आवाज निकाली और मैंने तुम्हें नीचे ढकेला।’

भेड़िये बढ़ते हुए चले आते थे, हम लोग भूरी पथरीली धरती पर उड़ रहे थे, पर भेड़िये! बूढ़े ने लगामें छोड़ दीं और बंदूक सँभालकर बैठा। मैंने कमान सँभाली - मैं अँधेरे में उड़ती हुई मुर्गाबियों का शिकार कर सकता था और मेरा बाप - वह तो जिस चीज पर निशाना ताकता था अल्लाह उसे भूल जाता था। कोई 400 गज पर मेरे बाप ने आगे वाले भेड़िये को गिरा दिया। धाँय! उसने नटों की तरह एक कलाबाजी खाई; और फिर दूसरी बिलकुल नटों की तरह। बैल पागल होकर भाग रहे थे, हवा में उनके मुँह का फेन उड़कर हमारे मुँहों पर मेह की तरह गिरता था; और वे रँभा रहे थे जैसे बंजारिनें ब्यानेवाली भैंसों की नकलें करती हैं। पर भेड़िये नजदीक ही आते जा रहे थे। गिरे हुए भेड़ियों को वे बिना रुके खा लेते थे; वे उनके ऊपर तैर जाते थे। मेरे बाप ने मेरे कन्धे पर बंदूक की नली रख ली थी। धाँय-धाँय ! (मेरी गरदन पर अब तक जले का दाग है।) मैंने भी 16 तीरों से 16 ही भेड़िये गिराये, बूढ़े ने 10 मारे थे, पर तब भी वह गोल बढ़ता ही आता था।

‘ले बंदूक ले!’ उसने कहा, ‘मैं बैलों को देखूँगा।’’

उसका खयाल था कि बैल उससे भी तेज भाग सकते थे, पर यह खयाल गलत था। दुनिया के कोई बैल उससे तेज नहीं भाग सकते थे।

मैं बंदूक का भी निशाना खूब लगाता था, पर वह देशी जंग लगी बंदूक। खैर, वह लड़की उसे 5 मिनट में भर देती थी। बादीं अच्छी लड़की थी, वह बंदूक भरती थी, मैं निशाना मारता था - अचूक। मैंने दस और गिराए - धाँय-धाँय-धाँय! जब सब बारूद खत्म हो गई तो भेड़िये भी कुछ हारे-से मालूम होते थे।

मैंने कहा, ‘अब वे पिछड़ गए।’

बूढ़ा हँसा - ’वह इतनी-सी बात से नहीं पिछड़ सकते। पर मैं मरते-मरते कह चलूँगा कि सात मुल्क के बंजारों में खारे-सा खरा निशानेबाज नहीं है।’

मेरा बाप बुढ़ापे में बड़ा हँसोड़ हो गया था।

हाँ, तो भड़िये कुछ पीछे रह गए थे। उन्हें कुछ खाने को मिल गया था। ‘सप-सप-चट’ बैलों पर कोड़ा बोल रहा था कि पाँच मिनट बाद ही उन्होंने फिर हमारा पीछा शुरू किया। वे हमसे 200 गज पर रह गए होंगे और बढ़ते ही आते थे। मेरे बाप ने कहा, ‘सामान निकालकर फेंको, गड्डा हल्का करो।’

‘एकबारगी ठोकर खाकर गड्डा चरकराकर चला। पूरे बंजारों में यह गड्डा अफसर था, और सब सामान फेंककर हमने उसे फूल-सा हल्का कर दिया था, और कुछ देर तो हम भेड़िये से दूर निकलते मालूम हुए, पर तुरन्त ही वे फिर वापस आ गए।

बड़े मियाँ ने कहा, ‘अब तो, एक बैल खोल दो।’

‘क्या?’ मैंने कहा, ‘दो बैल गड्डा खींच ले जाएँगे?’

उसने कहा, ‘अच्छा, तब एक नटनिया फेंक दो।’ मैंने उन तीन में से मोटी को ही उठाया और गड्डे के बाहर झुलाकर फेंक दिया। हा! ग्वालियर की नटनिया, उसे दाँत लगा दो तो वह भी भेड़ियों का मुकाबला कर ले! पहले तो वह भागी, पर यह जानकर कि भागना बेकार है, घूमकर खड़ी हो गयी और सामनेवाले भेड़िये की टाँगें पकड़ लीं। पर इससे भी क्या फायदा था। एकदम वह नजर से ओझल हो गयी। जैसे किसी कुएँ में गिर पड़ी हो। गड्डा हल्का होकर और आगे बढ़ा, पर भेड़िये फिर लौट आए।

‘दूसरी फेंको’, बड़े मियाँ ने कहा। पर अब की मैंने कहा, ‘आखिर क्या हम लोग सैर करने के लिए मारे-मारे फिरते हैं, एक बैल न खोल दो।’

मैंने एक बैल खोल दिया। वह पीठ पर पूँछ रखकर चिंघाड़ता हुआ भागा और गोल उसके पीछे मुड़ गया।

मेरे बाप की आँखों में आँसू भर आए। ‘बड़ा असील बैल था, बड़ा असील बैल था...,’ वह बुदबुदा रहा था।

‘हम बच तो गए’, मैंने कहा। पर तभी, ह्वा आ आ आ आ आ आ! गोल वापस आ गया था। ‘आज कयामत का दिन है’, मैंने कहा और बैलों को इतना भगाया कि मेरी हथेली में खून छलछला आया।

पर भेड़िये पानी की तरह बढ़ते चले आ रहे थे और हमारे बैल मरके गिरना ही चाहते थे। ‘दूसरी लड़की भी फेंको!’ मेरे बाप ने चीखकर कहा।

इन दोनों में बादीं भारी थी और कुछ सोचकर काँपते हाथों वह अपनी चाँदी की नथनी उतारने लगी थी और मैंने शायद बताया नहीं, मुझे वह कुछ अच्छी भी लगती थी।

इसलिए मैंने दूसरी से कहा, ‘तू निकल!’ पर उसको तो जैसे फालिज मार गया था। मैंने उसे गिरा दिया और वह जैसे गिरी थी, वैसे ही पड़ी रही। गड्डा और हल्का हो गया और तेज दौड़ने लगा। पर पाँच ही मील में भेड़िये फिर वापस आ गए। बड़े मियाँ ने गहरी साँस ली, माथा पीट लिया - हम क्या करें, भीख माँग के खाना बंजारों का दीन है, हम रईस बनने चले थे...

मैंने बादीं की तरफ देखा, उसने मेरी तरफ। मैंने कहा, ‘तुम खुद कूद पड़ोगी कि मैं तुम्हें धकेल दूँ?’ उसने चाँदी की नथ उतारकर मुझे दे दी और बाँहों से आँखें बन्द किए कूद पड़ी। गड्डा बिलकुल हवा-सा उड़ने लगा। वह पूरे बंजारों में गड्डों का अफसर था।

पर हमारे बैल बेहद थक गए और बस्ती तक पहुँचने के लिए अब भी 30 मील बाकी थे। मैं बंदूक के कुन्दे से उन्हें मार रहा था; पर भेड़िये फिर लौट आए थे।

मेरे बाप के मुँह से पसीना टपकने लगा - ’लाओ, दूसरा भी बैल खोल दें।’

मैंने कहा, ‘यह मौत के मुँह में जाना है। हम लोग दोनों मारे जाएँगे, हमें या तुम्हें किसी को तो बचना चाहिए।’

‘तुम ठीक कहते हो।’ उसने कहा, ‘मैं बूढ़ा आदमी हूँ। मेरी जिन्‍दगी खत्म हो गई। मैं कूद पड़ूँगा।’

मैंने कहा, ‘हिरास मत होना। मैं जिन्दा रहा तो एक-एक भेड़िये को काट डालूँगा।’

‘तू मेरा असील बेटा है! मेरे बाप ने कहा और मेरे दोनों गाल चूम लिये। उसने अपने दोनों हाथों में बड़ी-बड़ी छूरियाँ ले लीं और गले में मजबूती से कपड़ा लपेट लिया।

‘रुको,’ उसने कहा - ’मैं नए जूते पहने हूँ, मैं इन्हें दस साल पहनता; पर देखो, तुम इन्हें मत पहनना, मरे हुए आदमियों के जूते नहीं पहने जाते, तुम इन्हें बेच देना।’

उसने जूते खींचकर गड्डे पर फेंक दिए और भेड़ियों के बीचोबीच कूद पड़ा। मैंने पीछे घूमकर नहीं देखा, लेकिन थोड़ी देर मैं उसे चिल्लाते सुनता रहा - यह ले! यह ले! भेड़िये की औलाद! भेड़िये की औलाद! और फिर चट-चट! चट-चट! मैं ही किसी तरह भेड़ियों से बच गया।

खारू ने मेरे डरे हुए चेहरे की तरफ देखा, जोर से हँसा और फिर खखारकर बहुत-सा जमीन पर थूक दिया।

‘मैंने दूसरे ही साल उनमें से साठ भेड़िये और मारे।’ खारू ने फिर हँसकर कहा। पर उसके साथ ही उसकी आँखों में एक अनहोनी कठिनता आ गयी, और वह भूखा, नंगा उठकर सीधा खड़ा हो गया।

                                                                       (हंस - अप्रैल, 1938)
                                                                           ---भुवनेश्वर---

गुरुवार, 2 मई 2013

सड़क


भर्र-भर्र करती हुई एक जीप दुकान के सामने रुकी।

'ओ चायवाले, चार कप चाय बनाना,' - कह कर एक आदमी तीन आदमियों के साथ दुकान के आगे पड़ी खाट पर बैठ गया और वे आपस में बनती हुई इस सड़क के बारे में बातचीत करने लगे।

चायवाले ने कोयले के चूल्‍हे पर खौलते पानी को पतीली में डाल कर अंदाज से उसमें चाय, चीनी और दूध मिला दिया और काँपते हाथों से आँखें नीची किए चार कप चाय तिपाई पर रख आया।

'अरे हो हो, क्‍या वाहियात चाय बनाई है इस बुड्ढे ने,' कह कर उस आदमी ने झटके से प्‍याला सहित चाय नीचे लुढ़का दी। शेष तीनों आदमियों ने उसकी हाँ में हाँ मिलाई, लेकिन चाय सुड़कते रहे।

अब जा कर चायवाले ने आँख उठाई और क्रोध से बड़बड़ाते उस आदमी ने भी चायवाले को देखा और आश्‍चर्य से बोल उठा -

'अरे, आप मास्‍टर साहब।'

और मास्‍टर चंद्रभान पांडे ने देखा कि वह आदमी और कोई नहीं, उसके इलाके के एमएलए जंगबहादुर यादव हैं। उनकी आँखें शर्म से झुक गईं और झुकी हुई आँखें पोर-पोर फटी हुई खादी की धोती के बड़े-बड़े सुराखों में उलझ गईं।

यादव जी ने एक ठहाका लगाया - 'अच्‍छा मास्टर जी, आपने अब यह धंधा भी शुरू कर दिया। ठीक है आदमी को कुछ-न-कुछ करते रहना चाहिए। पैसा बड़ी चीज है। मेरे लायक कोई सेवा हो तो कहिएगा, मास्‍टर जी।' फिर एक ठहाका लगाया और साथ के लोगों ने भी ठहाके का अनुसरण किया। एक ने खुशामद के तौर पर कहा, 'अरे यादव जी, आपकी बदौलत जब इस इलाके में सड़क आ रही है, तो न जाने कितने लोगों का पेट पलेगा।'

यादव जी ने पाँच रुपए का एक नोट निकाला और मास्‍टर साहब की ओर बढ़ा दिया।

'मेरे पास खुले रुपए और पैसे नहीं हैं।' मास्‍टर जी ने कहा।

'अरे तो रखिए न, कौन आपसे पैसे वापस माँग रहा है?'

'नहीं, मैं आपसे वैसे भी पैसे लेने का अधिकारी नहीं हूँ। आपने तो चाय पी ही नहीं।'

'अरे तो चाय के पैसे कौन दे रहा है गुरूजी। इसे गुरु दक्षिणा समझ लीजिए। रख लीजिए, काम आएगा।'

पांडे जी तिलमिला गए। हाथ में पाँच रुपए का नोट पकड़े मर्माहत से रह गए। उनके मन में क्रोध का एक बवंडर उठा। आँखों में हिकारत भर वे यादव जी की ओर बढ़े और पाँच का नोट उनकी ओर फेंक कर चिल्‍लाए - 'यादव जी, ये अपने रुपए लेते जाइए, मैं भीख नहीं माँगता।'

लेकिन यादव जी जीप में बैठ चुके थे। मुस्‍करा कर पांडे जी और उनके द्वारा फेंके गए रुपए को देखा। जीप भर्र-भर्र करके स्‍टार्ट हुई और उसकी धूल भरी हवा में नाचता हुआ नोट थोड़ी दूर जा गिरा।

कुछ देर तक नोट धूल-भरी हवा में छटपटाता रहा और फिर शांत हो गया। पांडे जी उसे देखते रहे, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़े और धूल झाड़ कर नोट उठा लिया। आखिर किया क्‍या जाए।

गोरे बदन, चौड़े माथे, श्‍वेत केशवाले पांडे जी खादी की एक जीण-शीर्ण धोती पहने और उसी का आधा भाग नंगे शरीर पर डाले हुए अपनी झोंपड़ी के आगे पड़ी बेंच पर बैठे-बैठे उदास हो चले थे। उनके चंदन चर्चित ललाट की सिकुड़न भरी रेखाओं में यादव जी की जीप से उड़ी हुई धूप समा गई थी। सोच रहे थे -

यादव उसे अपमानित कर गया। वह पहले ही कहता रहा कि यह काम उससे नहीं होगा। वह ब्राह्मण, पुराना कांग्रेसी, स्‍कूल का शिक्षक। क्‍या बुढ़ौती में छोटी जातियों के लोगों की तरह चाय-पकौड़ी और सुरती बेचना ही उसकी तकदीर में रह गया था। उसने कितना मना किया लेकिन अपनी संतान के आगे किसका वश चलता है। रमेश जिद कर बैठा और कुछ लोगों ने उसकी हाँ-में-हाँ मिला दी।

'पर्र...' पांडे जी उदास हो आए। हाथ लगा कर देखा खादी की धोती चूतड़ पर फिर फट गई थी। धोती क्‍या है। जैसे चीथड़ों का जोड़। खादी उसे बेपर्द करके छोड़ेगी। अब वह क्‍या करे? इसी धोती को वह इधर से उधर और उधर से इधर करके पहनता रहता है। सभी जगह से तो यह फट चुकी है। अब इधर से उधर करने की भी तो जगह नहीं बची। र‍मेश कहता है - 'छोड़िए, खादी-वादी पिताजी। मिल की धोती मजबूत और सस्‍ती होती है। वह इस तरह जगह-बेजगह धोखा नहीं देती।'

वह कब से सुन रहा है रमेश की बात को और सोचता है, ठीक ही तो कहता है रमेश। लेकिन अब क्‍या बदलना? अब तो जिंदगी बीत चली, इस बुढ़ौती में क्‍या नियम भंग करना? ...लेकिन वह कहाँ से खरीदे खादी की धोती। एक मोटी धोती भी तेरह-चौदह रुपए से कम में नहीं आती, फिर उसके साथ कुरता-टोपी, चादर-तौलिया सभी तो लगे हुए हैं। इतने में तो मिल के मोटे कपड़ों के कई कई सेट आ जाएँगे और चलेंगे भी ज्‍यादा। ...फिर भी जी नहीं मानता। जब जीना ही कितने दिन है। ...लेकिन जी के मानने न मानने का ही सवाल तो नहीं है। उसे स्‍कूल से रिटायर हुए पाँच वर्ष हो गए, खेत के नाम पर तीन बीघे खेत - वो भी बाढ़ग्रस्‍त कछार के खेत। छह-सात आदमियों का गुजर- बसर कैसे होगा। महेश तो पढ़-लिख कर परिवार सहित बाहर चला गया नौकरी करने। उसका अपना ही गुजर-बसर मुश्किल से होता है। छोटा लड़का रमेश बहुत ढकेलने पर भी आठवीं पार नहीं कर सका। लिपट गया खेती-बारी में। उसके तीन बच्‍चे हैं, दोनों जून भरपेट खाना तो मिलता नहीं, ये खादी के कपड़े कहाँ से आएँ?

दुकान के सामने की सड़क से लोग आ जा रहे थे। पांडे जी ने झोंपड़ी के पीछे जा कर धोती इधर उधर करने की बहुत कोशिश की लेकिन अब उन्‍हें कोई गुंजाइश नहीं दीखी। उसे क्रोध हो आया कि इस ससुरी धोती को फाड़-फूड़ कर फेंक दे और नंगा हो जाए। ...अरे नंगा तो हो ही गया है। चाय की दुकान खोल कर नंगा हुआ है? हर परिचित आदमी एक व्‍यंग्‍यमयी दृष्टि से उसे देखता है और अजब-अजब सवाल करता है और तिस पर यह यादव का बच्‍चा उसे इतना अपमानित कर गया। उसे इतना क्रोध आया कि इस यादव के बच्‍चे को फिर एक बार बेंच पर खड़ा करके उसके चूतड़ पर बेंत लगाए, लेकिन अब तो वह एमएलए हो गया है, छात्र नहीं रहा। वह अपना क्रोध अपने भीतर ही दबाए सुलगने लगा। लेकिन उसे एक बात से बड़ी राहत मिली कि उसने इस एमएलए के बच्‍चे को स्‍कूल में कई बार बेंच पर खड़ा कर बेंत से पीटा है। अब भी उसके चूतड़ पर बेंत के निशान होंगे। धीरे-धीरे स्‍कूल के दिन उसके सामने सरक आए। तब कौन जानता था कि यह जंगली आगे चल कर जंगबहादुर यादव, एमएलए बन जाएगा। क्‍लास में सबसे बोदा लड़का यही था। इसे हर रोज मार पिटती थी। कई बार तो इसने लड़कों के चाकू, दावात, पेंसिलें चुरा ली थीं और उसने इसे बेंच पर खड़ा करके बहुत पीटा था। एक बार तो इसने गांधी जी की तसवीर दूसरे लड़के की किताब से फाड़ ली थी और उस पर पेशाब कर दिया था। फिर तो उसने इसे स्‍कूल से ही निकाल दिया था। बाद में लोगों के कहने-सुनने पर वापस ले लिया था... अब वह बड़ा नेता बन गया है। पता नहीं, इस देश में कैसे इतने बड़े-बड़े चमत्‍कार हो जाते हैं। ...उसे लगता है कि लोग कहाँ से कहाँ पहुँच गए और वह खादी की फटी धोती पकड़े हुए बैठा है।

शाम को रमेश आया और दोनों आदमी दुकान उठा कर घर ले गए।

'मुझसे यह नहीं होगा, रमेश।' पांडे जी थके-थके से बोले।

'क्‍यों पिताजी?'

'लोग मुझे बहुत छोटी नजर से देख रहे थे आज। मैं लोगों की निगाह नहीं झेल पा रहा था।'

'हाँ पिताजी, भूख से भारी लोगों की निगाहें ही होती हैं न। तो ठीक है, हम लोगों की निगाहें क्‍यों झेलें, भूख ही झेलें।'

बीच में एक चुप्‍पी पसर गई।

'बैठने को तो मैं बैठता, देखता - कौन साला मेरा अपमान करता है, लेकिन फिर खेती-बारी चौपट हो जाएगी।'

पांडे जी कुछ नहीं बोले।

'कुछ मिला, बाबू जी?'

'हाँ, दो रुपए कमाई के और पाँच रुपए गुरु-दक्षिणा के।'

'गुरु-दक्षिणा कैसी?'

पांडे जी ने यादव की कहानी सुना दी।

'अरे तो इसमें इतना आहत होने की कौन-सी बात है, बाबू जी। सौ हम लोगों से खाता है, पाँच दे ही गया तो क्‍या हो गया?'

पांडे जी ने रमेश को मार खाई हुई दृष्टि से देखा। रमेश हँस रहा था।

रात को पांडे जी लेटे तो बड़ी बेचैनी अनुभव कर रहे थे। वे अपने से ही पूछ रहे थे - क्‍यों भाई आदर्शवादी कांग्रेसी, तपे हुए शिक्षक, नशाखोरी के दुश्‍मन। तुम्‍हारी यही परिणति होनी थी। जिन्‍हें तुमने जीवन-भर ज्ञान पिलाया, क्‍या उन्‍हें अब चाय-पकौड़ी खिलाओ-पिलाओगे? जिनके सामने नशे के विरुद्ध बोलते रहे, उन्‍हीं के लिए सुरती तौलोगे? नहीं-नहीं, यह नहीं होगा।

वह कब से सोच रहा था कि काश, इस पिछड़े हुए कछार में एक सड़क आती। लेकिन सारी-की-सारी सरकारें तो सोई हुई हैं इस कछार की ओर से आँख फेर कर। सड़कें तो दुनिया में कितनी हैं लेकिन अपने जवार में सड़क आने का और उस पर यात्रा करने का सुख कुछ और ही होगा। कितना प्‍यारा होगा नदियों-नालों, खंदकों-खाइयों के ऊपर से भागती सड़क का यात्री होने का। कितनी सुविधाएँ बढ़ जाएँगी। लेकिन तब उसने कहाँ सोचा था कि सड़क के आने का कोई और मतलब भी हो सकता है।

और जब कच्‍ची सड़क पक्‍की सड़क बनने लगी तो रमेश ने कहा, 'बाबू जी, कच्‍ची सड़क पक्‍की सड़क बन रही है - यह बहुत अच्‍छा हुआ। अपना एक खेत सड़क के किनारे ही है और उसी के पास बस अड्डा भी बननेवाला है। हम क्‍यों न वहाँ कोई दुकान खोल दें? शुरू में चाय की दुकान खोली जाए और कुछ सुरती की गाँठें वहाँ रख दी जाएँ। रास्‍ता तो चालू है ही, अब सड़क बन रही है, वह और चालू हो जाएगी और बहुत से मजदूर काम पर लगेंगे।'

'अच्‍छा, देखा जाएगा।' टालने की गरज से पांडे जी ने कहा।

'देखा नहीं जाएगा, अभी शायद किसी के दिमाग में यह चीज आई नहीं है, बाद में तो सभी भरभरा कर दुकानें खोल देंगे। हमें सबसे पहले अपनी दुकान जमा लेनी चाहिए।'

एक चुप्‍पी छाई रही।

'इस बुढ़ौती में आपको खेती-बारी के काम करने पड़ते हैं, इससे अच्‍छा होगा कि आप दुकान पर बैठें। आराम से आपके दिन भी कट जाएँगे और चार पैसे की आमदनी भी हो जाएगी।'

'क्‍या कहते हो - अब मैं दुकानदारी करूँगा?' वह तैश में उठा था तो उसकी धोती फट गई थी।

और जब रोज-रोज रमेश के विचार उसके दिमाग से टकराने लगे तो एक दिन दुखी मन से स्‍वीकृति दे दी। बनती हुई सड़क के पासवाले खेत में एक झोंपड़ी पड़ गई, कुछ सुरती के पत्ते तथा चाय के सामान रख दिए गए। वह आज पहली बार दुकान पर बैठा था।

लेकिन नहीं, वह कल दुकान पर नहीं जाएगा। उसका रोम-रोम परिताप से सुलग रहा है, गरीब हुआ तो क्‍या - इस बुढ़ौती में अपनी आबरू बेचेगा। करवट ली तो धोती फिर पर्र से बोल गई। अब नंगा हो कर घर तो रह सकता है लेकिन क्‍या दुकान पर भी जाएगा इसी रूप में?

सुबह हुई तो रमेश दुकान का सामान लिए हाजिर हो गया। पांडे जी अधनंगे लेटे रहे।

'बाबू जी, दुकान नहीं जाइएगा?'

पांडे जी की इच्‍छा तो हुई कि कह दें - नहीं जाऊँगा। लेकिन कह नहीं सके। दर्द-भरी आवाज में बोले, 'नंगा ही जाऊँ क्‍या?'

सामान नीचे रखते हुए रमेश भारी मन से बोला, 'अब क्‍या कहा जाए। कुछ रुपए इकट्ठे हो जाएँ तो आपके लिए खादी की एक धोती ला दूँ। खादी भी कितनी महँगी हो गई।'

पांडे जी ने देखा कि रमेश के बच्‍चे फटे-पुराने नेकर पहने उसके सामने से स्‍कूल चले गए। उन्‍हें एक चोट-सी लगी - क्‍या वह इतनी महँगी खादी की धोती पहन कर बच्‍चों को नंगा रखेगा? आज तक तो उसने यही किया। उसे क्‍यों नहीं मालूम हुआ कि खादी-खादी में भेद होता है। एक खादी उसकी है, एक यादव जी की। यादव ही खादी पहनने का हकदार है क्‍योंकि उसके शरीर पर खादी का विकास हुआ है और वह? वह नहीं, उसके शरीर पर तो खादी फटती ही चली गई है।

रमेश सामान लिए अंदर जा रहा था कि पांडे जी ने पुकारा

'रमेश!'

'हाँ, बाबू जी।'

'तुम्‍हारे पास एक के अलावा कोई साबुत धोती है?'

'हाँ, है बाबू जी।'

'लाना तो बेटे।'

रमेश ने व्‍यथा, आश्‍चर्य और प्रसन्‍नतामिश्रित आँखों से पिता को देखा। पिता ने दूसरी ओर मुँह फेर लिया था।

                                                                 ---रामदरश मिश्र---

आदमी के बारे में सोचते लोग


यार लोग तीन-तीन पैग गले से नीचे उतार चुके थे। यों शुरू से ही वे चुप बैठे हों, ऐसा नहीं था, लेकिन तब उनकी बातों का केंद्र बोतल में कैद लाल परी थी, सिर्फ लाल परी। उसे पेट में उतार लेने के बाद उन्हें लगा कि पीने-पिलाने को ले कर हुई सारी बातें और बहसें बहुत छोटे और ओछे लोगों जैसी थीं। अब कुछ बातें बड़े और ऊँचे दर्जे के दार्शनिकों जैसी की जानी चाहिए। 
कमरे की एक दीवार पर एक मशहूर शराब-कंपनी का फुल-लेंथ कैलेंडर लटका था, जिसमें छपी मॉडल की मुद्रा उत्तेजक तो थी ही, धर्म का मुखौटा चढ़ा कर घूमनेवाले पंचसितारा सामाजिकों के लिए इतनी अश्लील भी थी कि उसे मुद्दा बना कर अच्छा-खासा बवाल मचाया जा सके। कैलेंडर के सामनेवाली दीवार पर तीन फ्रेम फिक्स्ड थे - नीचे से देखो तो चढ़ते क्रम में और ऊपर से देखो तो उतरते क्रम में सीढ़ीनुमा। सिवा कुछ रंगों के, बुद्धिमान-से-बुद्धिमान आदमी के लिए उनमें से किसी भी फ्रेम के बारे में यह बता पाना असंभव था कि आकृति की दृष्टि से उसमें बना क्या है? और इन दोनों के बीचवाली दीवार पर एक फुल-साइज एलसीडी चस्पाँ था। कोने में रखी मेज पर म्यूजिक-सिस्टम था, बहुत ही धीमे वॉल्यूम में मादक धुन बिखेरता हुआ। ट्यूब्स ऑफ थीं और सीलिंग में जड़े एलईडी बल्बों में से दो को ऑन कर के कमरे को हल्के नीले प्रकाश से भरा हुआ था। सीलिंग फैन नहीं था, एसी था जिसको ऑन रहना ही था। 
'मुझे लगता है...ऽ... कि यह दे...ऽ...श एक बार फिर टूटेगा... आजकल के नेताओं से...ऽ... सँभल नहीं पा रहा है।' संदीप ने बात छेड़ी। 
'सँभल नहीं पा रहा है?' संजू ने चौंक कर कहा, 'अबे...ऽ... देश में नेता ऐसा कोई बचा ही कहाँ है जो देश को सँभालने की चिंता पालता हो? ...साले दल्ले हैं ज्यादातर।' 
राजेश को क्योंकि पढ़ने का बहुत शौक था, इसलिए बोलने को उसके पास बाकी दोस्तों के मुकाबले ज्यादा और व्यापक बातें रहती थीं। उससे रहा नहीं गया। बोला, 'या...ऽ...र, मेरी बात को तुम लिख कर रख लो - जब तक समाजवाद को नहीं अपनाया जाएगा, तब तक न देश का भला होगा और न दुनिया का।' 
'ऐ...ऽ... ऐसी बात है...ऽ... तो सबसे पहले हमीं... क्यों न उसे अपनाएँ!' गिर-गिर जाती गरदन को कंधे पर टिकाए रखने की कोशिश करते राजीव ने अटक-अटक कर कहा, 'दुनिया के लिए न सही... देश के लिए तो हमारी... कुछ न कुछ जिम्मेदारी... है...ऽ... ही।' 
'यार, मेरा खयाल है...ऽ... कि किसी चीज को...ऽ... जाने-समझे बिना अपना लेना...ऽ... बाल-बराबर भी...ऽ... ठीक नहीं है।' संदीप ने टोका। उसकी गरदन तो काबू में थी लेकिन पलकें साथ नहीं दे रही थीं। किसी तरह उन्हें झपकने से रोकते हुए बोला, 'जब तक समाजवाद के मतलब मेरी समझ में साफ नहीं हो जाते, तब तक कम से कम मैं तो...ऽ...।' 
'मतलब मैं समझाता हूँ तुझे...!' उसके कंधे को थपक कर तेजिंदर ने कहा और चौथा पैग तैयार कर रहे संजू से बोला, 'मेरावाला थोड़ा लाइट ही रखना... बस इतना... ठीक। हाँ, तो समाजवाद उस खूबसूरत दुनिया को देखने का सपना है मेरे बच्चे, जिसमें घोड़ियाँ बकरों के साथ, बकरियाँ ऊँटों के साथ, ऊँटनियाँ कुत्तों के और कुत्तियाँ घोड़ों के साथ यों-यों कर सकेंगी।' अपनी बात के आखिरी शब्दों को कहते हुए उसने दाएँ हाथ की मुट्ठी को मेज के समांतर हवा में चलाया - आगे-पीछे। पैग बना कर संजू ने इस बीच गिलास को उसके आगे सरका दिया था। उसने गिलास उठाया और सिप करते ही कड़वा-सा मुँह बना कर संजू से बोला, 'अभी भी हैवी है यार, थोड़ा पानी और डाल।' पानी डलवा कर उसने एक बार फिर सिप किया। बोला, 'अब ठीक है।' 
समाजवाद की उसकी इस व्याख्या पर राजेश के अलावा सभी हँस पड़े। 
'क्या सही समझाया है...' संदीप हँसते-हँसते बोला, 'मान गए!' 
'आज मैं अपना दिमाग खजूर के पेड़ पर लटका न छोड़ कर साथ बाँध लाया हूँ न, इसलिए।' अपनी पगड़ी पर थपकी दे कर तेजिंदर बोला। इस बात पर एक और ठहाका लगा। राजेश इस बार भी नहीं हँसा। बाहर से झुलसा हुआ आदमी एकबारगी मुस्करा सकता है, लेकिन भीतर से झुलसे हुए आदमी का मुस्कराना मुमकिन नहीं। यों भी, जो लोग अपने आसपास से थोड़ा ज्यादा पढ़ या गुन जाते हैं उनके बीच हजारों में से कोई एक ही ऐसा निकलता है जो अपने आसपास की दुनिया से पटरी बिठाए रखने में यकीन करता है और वैसा करने में कामयाब भी रहता है। 
'जो लोग चाँदी का चम्मच मुँह में ले कर पैदा होते हैं, समाजवाद उनकी समझ में आनेवाला सिद्धांत नहीं है।' सब ठहाका लगा चुके तो झुलसे हुए राजेश ने बोलना शुरू किया, 'जिनके पेट भरे हुए हैं, गरीबी और भुखमरी से जूझने की उनकी बातें वोट बटोरनेवाली राजनीति के अलावा कुछ और सिद्ध हुई हैं आज तक? इस एसी रूम में इंगलिश वाइन डकार कर समाजवाद पर चिंतन चला रहे हैं - वाह! पेट भरा हो तो आदमी को आदमी - आदमी नहीं कुत्ता नजर आता है, साँप-बिच्छू-नाली का कीड़ा नजर आता है। पेट भरने के लिए जब रोटी बेस्वाद लगने लगे और जीभ रह-रह कर डोमिनो के पीजा'ज की ओर लपलपाने लगे तब आदमी के बारे में सोचते हुए हमें डर लगने लगता है...।' मेज पर पेग रखते हुए उसने हिच्च की और नजरें दोस्तों पर गड़ाईं। 
यार लोगों को उससे शायद ऐसे ही किसी वक्तव्य की उम्मीद थी, इसलिए सब-के-सब दम साधे उसका बयान सुनते रहे। जहाँ तक उसका सवाल था - या तो उसका काम तीसरे पैग में ही तमाम हो गया था या फिर चौथा कुछ हैवी हो गया था; क्योंकि जैसे-जैसे वह उसे खत्म करता जा रहा था वैसे-वैसे उसकी आवाज में भारीपन आता जा रहा था। 
'एक तरफ हम हैं... हम, जो अंग्रेजी शराब के इस महँगे ब्रांड का पहला-दूसरा या तीसरा नहीं, चौथा पैग चढ़ा रहे हैं...।' मेज पर रखी वाइन की बोतल को हाथ में उठा कर दिखाता हुआ वह बोला, 'कहाँ तो बाहर चल रही लू से बचने की जुगत में किसी नीम या पीपल के साए में बैठ कर ठर्रे के साथ लोग उँगली से नमक चाट-चाट कर काम चला रहे हैं, और कहाँ हम - जो नमकीन के नाम पर तले हुए मसालेदार काजुओं की प्लेट बीच में रखे हुए इस एसी रूम में बैठे हैं। एक तरफ मेहनत कर-कर के हर तरह से थके और हारे वो लोग हैं जिन्हें शाम को भरपेट भात भी मयस्सर नहीं। वे अगर शराब भी पीते हैं तो पाँच-सात-दस रुपए में काँच का एक छोटा गिलास भर - कच्ची...जिसे पीने के बाद उन्हें इतने गजब का नशा होता है कि गिरने के बाद वे कभी उठ भी पाएँगे या नहीं, वे नहीं जानते... और दूसरी ओर...।' 
'इस आदमी के साथ यार यही खराबी है।' उसकी बात को बीच में ही काट कर तेजिंदर तुनक कर बोला, 'ये बातें कम करता है भाषण ज्यादा झाड़ता है... उतार के रख देता है सारी की सारी...।' कहते-कहते वह राजेश की ओर घूमा और व्यंग्यपूर्वक बोला, 'इस साले पर मसीहा बनने का जुनून सवार है। अबे...ऽ... वाइन के दौर चल रहे है, छत में सितारे जगमगा रहे हैं, सामने अप्सरा पड़ी है...' कैलेंडर की ओर इशारा करते हुए उसने बात को जारी रखा, 'और तू है कि फिलॉसफी झाड़ने को बैठ गया! ओए, तू क्या चाहता है कि भूखे-नंगों को भी मैक्डोवेल मिलने लगे?' 
'तुम लोग इस थ्योरी को समझ ही नहीं पाओगे।' तेजिंदर की ओर ताकते हुए राजेश क्षुब्ध स्वर में बोला, '...और तू तो कभी भी नहीं।' 
'ओए थ्योरी गई तेल लेने...' तेजिंदर आँखों को पूरी खोल कर उस पर गुर्राया,' और मेरी समझ में वो क्यों नहीं आएगी, मैं सरदार हूँ इसलिए?' 
'बात को मजाक में उड़ाने की कोशिश मत कर।' राजेश गंभीरतापूर्वक बोला, 'तू अच्छी तरह जानता है कि मैं सरदार और मोना नहीं मानता... और ना ही ऊँच और नीच!' 
'फिर?' तेजिंदर ने पूर्व अंदाज में ही पूछा। 
'फिर यह... कि तेरा पेट भरा है और भेजा खाली है...।' 
'अभी-अभी तो तू कह रहा था कि तू सरदार और मोना नहीं मानता... और अभी-अभी तू मेरा यानी कि एक सरदार का भेजा खाली बता कर उसका मजाक बना रहा है?' तेजिंदर तड़का। 
उसकी इस बात पर राजेश ने दोनों हाथों में अपना सिर थाम लिया। बोला, 'ओए, कोई इसे चुप रहने को कहो यार। यह अगर इसी तरह बेसिर-पैर की हाँकता रहा तो...।' 'अब - 'बेसिर-पैर' ...देख, तू लगातार मुझे 'सरदार'वाली गालियाँ दे रहा है...' इस बार आवेश के कारण वह कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया, 'देख, दोस्ती दोस्ती की जगह है और इज्जत इज्जत की जगह... अब अगर एक बार भी सरदारोंवाला कमेंट मुँह से निकाला तो ठीक नहीं होगा, बताए देता हूँ...' 
तेजिंदर की इस मुद्रा पर सब-के-सब गंभीर हो गए। अच्छा-खासा ठंडक-भरा माहौल एकदम से इस कदर उबाल खा जाएगा, किसी ने सोचा नहीं था। राजेश हथेलियों में सिर को थामे जस-का-तस बैठा रहा। चारों ओर सन्नाटा पसर गया... साँस तक लेने की आवाज सुनाई देने लगी! 
कुछेक पल इसी तरह गुजरे। फिर एकदम-से जैसे बम फटा हो - तेजिंदर ने जोर का ठहाका लगाया - हा-हा-हा-हा...ऽ...! 
'इन साले भरे-भेजेवालों की शक्लें देख लो...।' ठहाका लगाते-लगाते ही वह बोला, 'ऐसे बैठे हैं, जैसे मुर्दा फूँकने आए हों मादर...। अबे, मेरे एक छोटे-से मजाक को तुम नहीं समझ सकते तो मुझे किस मुँह से बेअकल बता रहे हो खोतो?' 
'ओ छोड़ ओए।' राजीव लगभग गुस्से में बोला, 'ये भी कोई मजाक था? डरा ही दिया हम सबको...।' 
'ओए डरानेवाली तो कोई हरकत मैंने की ही नहीं!' तेजिंदर बोला। 
'अबे डराने के लिए तुझे अलग से कोई हरकत करने की जरूरत नहीं होती।' राजीव बोला, 'तू सरदार है और तेरा गुस्से में खड़े हो जाना ही हमें डराने के लिए काफी होता है।' 
'और अगर बिना गुस्से के खड़ा हो जाए तो... तब तो नहीं न डरोगे?' तेजिंदर ने तुरंत पूछा। 
'ओए तेरी तो...' उसकी इस बात पर राजीव ने उस पर झपट्टा मारा, लेकिन तेजिंदर खुद को बचा गया। 
'ओए ये हुड़दंगबाजी छोड़ो, काम की बात पर आ जाओ यार।' संजू उन्हें रोकता हुआ बोला, 'इस राजेश की सारी बात मेरी समझ में आ गई। इसके कहने का मतलब ये है कि समाजवाद सिर्फ उसकी समझ में आ सकता है, जिसका पेट भले ही खाली हो, लेकिन दिमाग खाली न हो !' 
'बिल्कुल ठीक।' राजीव बोला। राजेश चुप बैठा रहा, जला-भुना सा। 
'हाँ, उसमें चाहे गोबर ही क्यों न भरा हो।' तेजिंदर ने फिर चुटकी ली। उसकी लगातार की चुटकियों से राजेश इस बार उखड़ ही गया। 
'तुझ हरामजादे के कमरे पर आना और फिर साथ बैठ कर पीना... लानत है मुझ पर!' खाली गिलास को मेज पर पटक कर वह उठ खड़ा हुआ। 
'यह बात तो तू हमारे साथवाली हर मीटिंग में कहता है।' तेजिंदर होठों और आँखों में मुस्कराता उससे बोला, 'आनेवाली मीटिंग में भी तू यही कहेगा।' 
'माँ की... स्साली आनेवाली मीटिंग की... धत्...' क्रोधपूर्वक खड़े हो कर राजेश ने अपनी कुर्सी पीछे को फेंक दी और तेजी के साथ कमरे से बाहर निकल गया। 
उसके निकलते ही तेजिंदर बनावटी तौर पर मुँह लटका कर संजीदा आवाज में संजू से बोला, 'समाजवाद तो उठ कर चला गया... अब हमारा क्या होगा कालिया?' 
उसकी इस हरकत पर बहुत तेज एक और ठहाका उन रईसजादों के कंठ से निकल कर कमरे में गूँज उठा। इतना तेज कि कमरे की एक-एक चीज हिल गई, पारदर्शी साड़ी के एक छोर से नितंबों को ढके उल्टी लेटी अप्सरा भी। 
'एक बात बताऊँ?' संदीप बोला, 'मैंने जानबूझ कर छेड़ी थी देश और नेताओंवाली बात।' 
'वह तो मैं तेरे बात छेड़ते ही समझ गया था।' राजीव बोला। 
'अबे मैं ड्रामे ना करता तो उसे अभी और बोर करना था हमें।' तेजिंदर बोला, 'मैंने भी तो सोच-समझ कर ही माहौल क्रिएट किया उसे भगाने का। ...ला, एक-एक हल्का-सा फाइनल पैग और बना।' 
संजू ने पेग बनाए। सबने फाइनल दौर के अपने-अपने गिलास उठाए, चियर्स किया और गले में उड़ेल गए। उसके बाद उन्होंने अपने-अपने सिर कुर्सियों पर पीछे की ओर टिकाए, टाँगें मेज पर पसारीं और आँखें मूँद कर संगीत की धुन पर पाँवों के पंजे हिलाने शुरू कर दिए - ला...ऽ...ला-ला-ला...ऽ...लालला...ऽ...लालला...ऽ...।

                                                                        ---बलराम अग्रवाल---

अंतिम बातचीत


'ख, मैंने तुम्हारी एक तसवीर बनाई है। इसे देखकर तुम चकित हो जाओगे। इस तसवीर में तुम इतने प्यारे लगते हो कि बस्स! तुम्हारे चेहरे में जो खामियाँ हैं, उन सबको हटा दिया है मैंने इस तसवीर में।'

'क, मैंने भी तुम्हारी एक तसवीर बनाई है और मैं दावे से कहता हूँ, इस तसवीर में तुम जितने खूबसूरत दिखाई देते हो, उतने खूबसूरत, वास्तव में तुम कभी नजर नहीं आए।'

'क्या सचमुच? वाकई तुमने भी मेरी तसवीर बनाई है! लेकिन तुम तो तसवीर बनाना जानते ही नहीं। यह काम तो मेरा है।' - क' ने कहा।

'नहीं, मैंने जो तसवीर बनाई है तुम्हारी, वह कागज पर नहीं, मेरे मन में है।'

'खैर, दिखाओ।'

'नहीं, पहले तुम।'

'ठीक है। यह देखो। लगते हो न हम सबकी तरह।'

'लेकिन मेरी दाढ़ी?'

'दोस्त, यही तो वह चीज है, जिसके कारण तुम अजीब और किसी हद तक क्रूर दिखाई देते हो, इसलिए मैंने इसे हटा दिया।'

'पर मैंने तो तुम्हारे जिस चेहरे की कल्पना की है, उसमें तुम भी दाढ़ी वाले ही हो।' - 'ख' ने खिन्न होकर कहा।

इस बातचीत के बाद 'क' और 'ख' कभी दोस्तों की तरह नहीं मिल सके।

                                                                          ---रघुनंदन त्रिवेदी---

तीसमार खाँ


नगरपालिका बनी तो सरकार ने प्रशासनिक अधिकारी भेजा। अधिकारी युवा था। लंबे बाल रखता था और गजलें गाता था। बोलता कम था। उसकी आँखों का भाव अच्छा नहीं था। जब से यहाँ नगरपालिका बनी है, बस्ती भर के महत्वाकांक्षी लोग वार्ड मेंबर और चेअरमैन बनने के सपने देख रहे हैं। मगर महादेव महाराज सपने से बहुत आगे निकल गए हैं। उन्हें लोग और वे खुद भी चेअरमैन कहते हैं। उनका एक नाम एम.पी. शायर भी है। वे तत्क्षण बना-बना कर गजलें गाते हैं। उनकी पकड़ में जो भी शब्द आ जाए, उसे गा देते हैं।

नगरपालिका के नए प्रशासनिक अधिकारी ने पहले महीने में बस्ती के लोगों से कोई वास्ता नहीं रखा। गंभीरता अख्तियार कर ली। धीरे-धीरे लोगों को उसकी गंभीरता से चिंता होने लगी। ऐसा न हो कि कुछ उल्टा-सीधा करने लगे। आढ़तियों को विशेष चिंता हुई। वजनकसी का बारह लाख रुपया नगरपालिका को इन आढ़तियों से लेना है। नगरपालिका अधिकारी यदि अपनी पर आ जाए तो खड़े-खड़े वसूली कर ले। लिहाजा आढ़तियों ने अधिकारी के आगे-पीछे घूम के ईओसा-ईओसाब करके उसे मिलनसार बनाया। फिर तो दो-चार महीनों में ये हालत हो गई कि बस्ती के बड़े व्यापारी, ठेकेदार और गुंडे ईओसाब के खास दोस्त बन गए। चूँकि ईओसाब का गला अच्छा था और वे गा भी लेते थे इसलिए स्थानीय रसिक और गवैए भी उनके साथ उठने-बैठने लगे। आठ महीने के भीतर-भीतर उच्चस्तरीय संपर्कों का ताना-बाना बहुत मजबूत हो गया।

सेठों के लड़के, ढोरों और मनुष्यों के सरकारी डॉक्टर, खाद्य निगम के अधिकारी, इंटर कॉलेज के युवा अध्यापक, वकील, बैंक मैनेजर, नेता और भूतपूर्व राज परिवार के युवजन, ईओ साहब की मेजोरिटी बन गए यानी सोसायटी की टीम संगठित हो गई। ये लोग पार्टियाँ करने लगे, जिनमें जम के शराब पी जाती, मुर्गा कटता और आधी-आधी रात तक आढ़तियों की बगिया में जलसा चलता। हफ्ते में एक पार्टी हो जाना मामूली बात थी। इन पार्टियों में कभी-कभी थानेदार भी शरीक हो जाता। सहज ही प्रश्न उठता है कि ईओ साहब को धुरी बना कर इतने आकार-प्रकारवाले लोग क्यों इकट्ठा हो गए? बस्ती में ऐसा ग्रुप इससे पहले क्यों नहीं बना? ये प्रश्न कुछ लोगों के मन में उठे ही थे कि उत्तर भी मिलने लगे। तंबाकूवाले सेठ के लड़कों ने सड़कों की मरम्मत का ठेका लिया। नेता कुंदनलाल हरिजन मोहल्ले की गलियों में मुरम डालने का ठेका ले भागे। आढ़तियों की दुकानें सड़क की तरफ पैर पसारने लगीं। मकानों में बाहर की तरफ टट्टियाँ बनने लगीं। वजनकसी का मामला बुरी तरह दब गया। पार्टियाँ और भी खर्चीली होने लगीं। जमीनों और मकानों के जो मामले नगरपालिका में विचाराधीन थे, उन पर ऐसे निर्णय लिए जाने लगे कि बड़े लोगों को संतोष का अनुभव होने लगा। सड़कों और गलियों की मरम्मत के बाद पैदल चलना और भी दूभर हो उठा। दफ्तरों, बैंक, अस्पताल और थाने में मेजोरिटी की तूती बोलने लगी। सरकारी नौकरों को जनता का कोई संकोच नहीं रह गया।

सुखी और संतुष्ट, लोभी और उद्दंड, पाखंडी और हिंसक लोगों की यह मित्र मंडली उस छोटी-सी बस्ती पर छा गई। बाजार और बस स्टैंड पर शाम को ये लोग मँडराते रहते। किसी रपटा होटल में बैठ जाते और हँसी-ठट्ठा, गाना-बजाना और चुटकुलेबाजी करते रहते। कभी ट्रक में भर कर आसपास के देहातों में चले जाते और रात भर बेड़नियों का नाच देखते। कभी शहर चल देते सिनेमा देखने और कभी कोई फड़कती आर्केस्ट्रा पार्टी को बुलवा कर बड़ा ही उत्तेजक कार्यक्रम करवा डालते। उन लोगों में ऐसे शिकारी भी थे, जो बस्ती के दरिद्र कोनों में से स्त्री पदार्थ का शिकार कर लाते और बाँट लेते। मगर रासरंग में वे इतने भी नहीं डूब गए थे कि जेबें भरने का समय न निकाल पाते। वे दिन भर पैसा कमाते। पारस्परिकता के कारण उन्हें आसान रास्तों से भरपूर पैसा मिल जाता। और बस्ती इतनी मुर्दा कि उस मंडली के उन्माद से आक्रांत भी रहती और उसके आगे दाँत भी निपोरती रहती। देश में पाई जानेवाली विभिन्न रूप-रंगोंवाली राजनीतिक पार्टियों की शाखाएँ यद्यपि वहाँ थीं, मगर उनमें ज्यादातर वही लोग थे जो इस मंडली के प्रादुर्भाव से बहुत प्रसन्न हुए थे। कुछ नेतागण मंडली में शामिल भी थे। इसलिए मंडली के कारगुजारियों पर उँगली उठानेवाला कोई न था, एक महादेव महाराज को छोड़ कर। लेकिन उसे पागल करारा जा चुका था। लोग उससे मजाक करते। उसकी बातें बनावटी गंभीरता से सुन कर हँसी में उड़ा देते। उसे उठाईगिरा, बदमाश, नाकारा, नरोलची और इसलिए अविश्वसनीय मानते।

बच्चों से ले कर बूढ़े तक उसे देख कर चंचल हो जाते। कोई उससे कहता - फड़कती गजल सुनाओ, कोई कहता फाग सुनाओ, मन से बना कर सुनाओ, मान लो तुम देश के राष्ट्रपति हो गए हो और जनता को संदेश दे रहे हो, मान लो तुम जज हो गए हो और पिछले सालवाले हरिजन-हत्याकांड पर बीस पेज लंबा फैसला पढ़ रहे हो, मान लो तुम भगवान कृष्ण हो और गोपियों से घिर गए हो और घिर कर उनके अंगों का खुलासा कर रहे हो। मान लो तुम... यानी जिसके मन में जो आता फरमाइश कर डालता और महादेव महाराज फौरन शुरू हो जाते। उसे सब आता था, पक्का गाना, कच्चा गाना, गजल बनाना, फागेगारियाँ बनाना, और सब कुछ फौरन बनाना, भाषण देना, कव्वाली गाना, नाचना। बस्ती में न सिनेमा-थिएटर था न मनोरंजन का कोई और जरिया इसलिए महादेव महाराज पर काफी बोझ आ पड़ा। वह सुबह जो घर से निकलता तो फिर रात एक-दो बजे से पहले न लौटता। बीच में खाना खाने पहुँच गया तो पहुँच गया। घर में सिर्फ माँ थी। पिता मर चुके थे और दो भाई बाहर नौकरियाँ करते थे। पाँच-सात बीघा जमीन थी। उस पर माँ हाड़ तोड़ती और कभी-कभी महादेव भी पसीना बहा आता। आय का यही एक जरिया था। महादेव एक बार में पंद्रह-बीस रोटियाँ खाता था जबकि अनाज की हमेशा कमी बनी रहती थी। इसलिए आए दिन वह अधपेट रह जाता और खूब पानी पीता रहता। फिर भी वह तंदुरुस्त था। उसकी आवाज भारी और तेज थी ठीक पिता की तरह। उसके पिता गायक थे और इलाके भर में संगीत-सभाओं में जाते थे। उनका आलाप आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में गूँजता है। महादेव भी कभी-कभी अपने पिता की तरह आलाप लेता है। मगर गाँजे और बीड़ी के कारण उसकी साँस जवाब दे जाती है।

पिछले चार महीने से महादेव महाराज नगरपालिका का चेअरमैन है। सचमुच का चेअरमैन नहीं। हँसी-मजाक का। एक दिन बस्ती के कुछ खुड़पेंचियों ने महादेव महाराज को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वह चेअरमैन है। लोगों ने उसे लोकप्रियता की दुहाइयाँ दीं और एक अच्छे चेअरमैन की आवश्यकता पर जोर दिया। महादेव ने तमक कर स्वीकृति दे दी। वह उठ खड़ा हुआ और हुंकार भर के बोला - 'ठीक है, यदि ऐसा है तो यही सही। मैं हूँ चेअरमैन इस नगरपालिका का। अब सँभल जाओ ईओ साब!'

लोगों ने उसे मालाएँ पहनाईं, ढोलवाले को बुलाया और बस्ती भर में महादेव महाराज को लिए-लिए घूमे। महादेव मालाएँ पहने ढोलवाले के पीछे चला आ रहा है। दुकानदारों और राहगीरों का हाथ जोड-ज़ोड़ कर अभिवादन कर रहा है। उसके चेहरे पर यथोचित गर्व और उत्तरदायित्व की भावना है। उसके पीछे खुड़पेंचियों का झुंड है जो चेअरमैन महादेव की जयजयकार कर रहा है। लोग हँस रहे हैं। बस्ती एक नया तमाशा देख पुलकित हो रही है।

लोगों के लिए भले ही यह मजाक रहा हो मगर महादेव के लिए सच था। वह पूरी गंभीरता से स्वयं को चेअरमैन अनुभव करने लगा। बस्ती भर के लिए पितृत्व की भावना से उसका हृदय भर उठा। वह टूटी-फूटी सड़कों, गिरे-अधगिरे मकानों, मलबों, घूरों और पीड़ित- प्रताड़ित लोगों को चिंता से देखने लगा। अब घर से निकलता तो उसके बाल खूब तेलिया और कायदे से ओंछे हुए होते। उसका फटा और तंग कुरता-पाजामा धुला हुआ होता। वह मंथर और बोझिल चाल से चलता। लोगों से बड़प्पन भरी आत्मीयता से मुस्करा कर नमस्ते करता - दोनों हाथ जोड़ कर।

एक दिन ईओ साब को बाजार में रोक कर बोला, 'मैं कुछ कहता नहीं हूँ इसका यह मतलब नहीं कि आप काला-पीला कुछ भी करते रहें। शेर की माँद में तो शेर भी कायदे से घुसता है, आप तो लगते कहाँ है।'

जो लोग सुन रहे थे सब ठहाका मार कर हँस पड़े। ईओ साब ने हाथ जोड़ लिए, बोले, 'कोई गलती हुई क्या इस सेवक से चेअरमैन साहब।' - कह कर ईओ साब भी हँस पड़े।

महादेव का पारा चढ़ गया। उसने त्योरियाँ चढ़ाईं, आँखें निकालीं और चिल्ला पड़ा, 'मजाक करते हो मुझसे। मैं डेढ़ मिनट में ठंडा कर दूँगा। हरामखोर कहीं के।'

यह बात ईओ साब को अखर गई। वे दो कदम बढ़ कर बोले, 'आप होते कौन हैं मुझसे बकवास करनेवाले।'

'मैं? मैं चेअरमैन हूँ समझे। जनता जनार्दन ने मुझे चेअरमैन बनाया है।' महादेव गरजा।

'बनाया होगा, मुझे तो सिर्फ इतना पता है कि आज अव्वल दरजे के हरामी हैं।'

'सुन बे ईओ, तू हरामी, तेरा बाप हरामी और सुन तेरी औलाद हरामी और सुन मैं तुझे अभी खड़े-खड़े जिंदा गाड़ दूँगा, साले।'

महादेव महाराज का इतना कहना था कि लगै लगै, लोग जुट पड़े। ईओ साब हालाँकि मना करते रहे। मगर उनके खैरख्वाह न माने। वह शायद पहला मौका था जब महादेव महाराज पिटा हो। वह भौंचक रह गया। उसे मारनेवाले वे ही लोग थे जो उसके पास घंटों बैठे उसका मजाक उड़ाते रहते थे, उससे गाना सुनते रहते थे और उसे अपनी पार्टियों-महफिलों में आमंत्रित करते थे। जो उसे पूरी बस्ती की तरह चेअरमैन कहते और मानते थे। उन्होंने मारा। महादेव को बहुत धक्का लगा। वह नहीं पिटा था, उसके भेष में, उसके शरीर में आखिर बस्ती का चेअरमैन पिटा था। चेअरमैन भूख हड़ताल पर बैठेगा। मन में संकल्प आया और महादेव वहीं सड़क के किनारे पालथी मार कर प्रतिकार की गंभीर मुद्रा में अड़ कर बैठ गया।

ईओ साब अपने साथियों सहित चले गए। और वहाँ अच्छा-खासा ठठ्ठा लग गया। जो सुनता कि महादेव महाराज पिट गया और भूख हड़ताल पर बैठा है, वही तमाशा देखने भागा चला आता। देखते न देखते पूरी सड़क लोगों से भर गई।

महादेव महाराज लोगों को देख कर भाव विह्वल हो गया। आखिर चेअरमैन पिटा है, कोई और नहीं। मैं नहीं पिटा हूँ इन लोगों की भावना पिटी है, ऐसा विचार मन में आते ही महादेव उठ खड़ा हुआ और बिना खँखारे जोर से बोला, 'सज्जनो, आप लोगों ने भावना में पड़ कर मुझे चेअरमैन बनाया। मैं अयोग्य था मगर आप लोगों की भावना की इज्जत करता था, इसलिए मैं चेअरमैन बन गया। जब बन गया तो मुझ पर नगर को अच्छा बनाने का भार आ गया। अब जहाँ देखो वहाँ लूट मची है। जितने सरकारी लोग हैं, उनने सेठों और गुंडों से साँठगाँठ कर ली है और जनता को लूट रहे हैं। आढ़तिए नगरपालिका का पंद्रह लाख रुपए दबाए हैं। अब अगर ये पैसा मिल जाता तो जनता का कितना काम निकलता। और सोचो ये वजनकसी का पैसा, ये बनिए किसानों से तभी ले लेते हैं जब उनसे माल खरीदते हैं। यह जो ईओ यहाँ आया है, बनियों से माहवारी पाता है। इसने जनता जनार्दन के पंद्रह लाख रुपयों का सौदा कर लिया है। सड़कें देखिए, ठेका हो गया, कागजों पे सुधर गईं और देखो तो पहले से ज्यादा बुरी हो गईं। इस ईओ के जमाने में कितने गरीबों के मकान-जमीन सेठों ने दबा लिए हैं, सबको पता है। अस्पताल में बड़ों के लिए सब कुछ है और छोटों के लिए कुछ नहीं। थाने में अलग धंधा चल रहा है। स्कूल में अलग चल रहा है। ईओ ने जो टीम बनाई है वह क्या-क्या कहर ढा रही है इस जनता पर, सब जानते हैं। मैं चेअरमैन हूँ, यह सब देखा नहीं जाता...।'

लोगों ने हो-हो किया फिर भगदड़ मच गई। पुलिस के चार सिपाही भगदड़ से बने रास्ते हो कर महादेव के पास पहुँचे और उसे धकेलते हुए थाने की तरफ ले चले। पीछे-पीछे चलते लोग हो-हो करते, कभी चेअरमैन जिंदाबाद के नारे लगाते और हँस पड़ते।

इस घटना के कुछ ही दिन बाद जनार्दन छुट्टियों में घर गया। बस से उतर कर वह लल्लू होटल में बस्ती के हालचाल पूछने के बाद ही घर जाता है। होटल में लल्लू मक्खियाँ उड़ा रहा था। उसे देखते ही सम्मान से खड़ा हो गया और शिकायती चेहरे से हँसते हुए बोला, 'इस बार इतने दिनों बाद आए भैया।'

जनार्दन ने उसके कंधे पर हाथ रखा और हँस पड़ा - 'और यहाँ के क्या हालचाल रहे।' लल्लू ने ईओ मंडल का बखान किया, फिर चेअरमैन की पिटाई की घटना सुनाई।

'महादेव महाराज थाने में भी पिटा। लेकिन एक बात माननी पड़ेगी, दूसरे दिन से वह ईओ साब के पीछे पड़ गया। रोज कच्चा चिट्ठा खोलता फिरता है। गाना छोड़ दिया है। कहता है अब गाना तभी होगा जब इस कलंक को मिटा दूँगा। चेअरमैन हूँ। पहले बस्ती को सँभालना है, फिर गाना-कव्वाली देखी जाएगी।'

जनार्दन यह सुन कर दुखी हो गया। महादेव महाराज को सार्वजनिक करने का काम जनार्दन ने ही किया था और वह भी औरों की तरह महादेव को मनोरंजन का साधन बनाए हुए था मगर उससे लगाव भी था। महादेव के भीतर कलाकार और एक ईमानदार और सहज मनुष्य का अनुभव उसे था। वह औरों की तरह घृणित नहीं मानता था। और न ही उसे यह डर रहता था कि महादेव कभी पैसा न माँग बैठे। उसे पता था कि वह पैसा कभी माँग ही नहीं सकता। महादेव लोगों से प्यार चाहता था और उसके बदले में वह कुछ भी कहने-करने के लिए तैयार रहता था। वह लोगों के शब्दों के पीछे ताक-झाँक किए बिना ही यह मान बैठता कि वह चेअरमैन है, वह देश का सबसे बड़ा शायर है, तानसेन से बड़ा गायक है, उसके पास करोड़ों रुपया है, एक बहुत बड़े मंत्री की लड़की उससे शादी करने की जिद ढाती है। इसी तरह की ढेर असंभव बातें। महादेव पर जो थोप दिया जाए वह उसी को अपनी निधि, अपनी वास्तविकता मान लेता था। लोग उसे और-और अजूबा बनाते रहने के लिए उस पर कुछ भी पोत देते, फेंक देते, लपेट देते और वह सब कुछ स्वीकार करता जाता। और कैसी विडंबना है कि वह कपोल कल्पित बातों को अपने विश्वास में अंगीकृत करता जाता। उसकी इसी अंधी गंभीरता, इसी बुद्धिहीन भावलीला को देख कर लोगों के पेट में बल पड़ जाते। वे उससे खेलते जाते और विकृत से विकृत नए खेल ईजाद करते जाते। जनार्दन ही ऐसे खेलों का प्रथम संयोजक था। उसने छह माह में महादेव को बस्ती के कोने-कोने में गवा-नचा दिया। रपटों की बैठकों का उसे जरूरी हिस्सा बना दिया। उसे यह विश्वास दिलाया कि वह मामूली आदमी नहीं है और वह कुछ करने के लिए पैदा हुआ है, लोगों को उससे बहुत उम्मीदें हैं। उसी महादेव की पिटाई का सुन कर जनार्दन को बहुत बुरा लगा। उसने खुद को इसके लिए दोषी अनुभव किया और उसका यह विश्वास भी टूट गया कि महादेव से लोग सचमुच प्यार करने लगे हैं। वह पिटता रहा और लोगों ने कुछ नहीं किया। जबकि वह खुद को लोगों की भावना का चेअरमैन मान कर उनके लिए पिट रहा था।

जनार्दन क्षुब्ध हो गया। घर की ओर जाते हुए उसे बस्ती के लोगों को देख कर क्रोध आता रहा। वह किसी जगह नहीं रुका। लोगों से फिर मिलने का कह कर सीधा घर पहुँचा। माँ ने जल्दी ही पानी गरम कर दिया। उसने खूब नहाया। मन कुछ हल्का हुआ। खाने का मन नहीं था मगर माँ की जिद से उसने थोड़ा-सा खाया और माँ से बातें करने लगा। माँ हँस पड़ी। उसकी अन्यमनस्कता का कारण उसे पता था, बोली, 'दीपक के घर जाने का मन है और मन लगा रहे हो यहाँ बातों में। जाओ पहले हो आओ।'

वह सचमुच दीपक से मिलने की बेकरारी में बैठा था। माँ की उदारता से पुलकित हो कर वह उठ खड़ा हुआ। दीपक का घर पास ही था। और चूँकि दोपहर का समय था, इसलिए तय था कि वह फैक्ट्री में नहीं, घर में ही होगा। दीपक के यहाँ हैंडलूम का अच्छा-खासा काम था। हर साल खड्डियाँ बढ़ती ही जाती थीं। उसका पिता और वह स्वयं भी मेहनती था। झगड़ों-झाँसों से दूर वे अपने धंधे में मन लगाए हुए थे। दीपक का एक ही दोस्त था जनार्दन और जनार्दन को भी उस बस्ती में दीपक के अलावा किसी से वैसा नहीं था। हालाँकि दोनों ही बस्ती भर में फैले हुए थे। खूब बड़ा उन लोगों का दायरा था। अभी दो साल से जब से जनार्दन नौकरी पर गया तो दीपक का अपना एक नया दायरा बन गया। वह ईओ मंडल का बड़ा ही सम्मानित सदस्य है। चूँकि वह ईओ से या किसी दूसरे सरकारी आदमी से कोई लाभ नहीं लेता तथा उसका घर बहुत ही सुसंस्कृत और सत्कारी है, इसलिए उसका विशिष्ट बेदाग स्थान उस मंडल में है। सब उसकी इज्जत करते हैं और उसकी बुद्धि का लोहा मानते हैं।

उसे पीने का शौक है। पार्टियों में शामिल हो कर अपनी धाक जमाने का नशा भी उसे है। धंधे के और घर के अंदरूनी दुख के तनाव से वह इसी तरह मुक्त हो सकता था इसलिए न जाने वह कैसे उस मंडल में शामिल हो गया। जनार्दन जब पिछली बार आया था तब दीपक के संबंध ईओ साब से बने ही बने थे और दो-एक पार्टियों में वह अंधाधुंध पी चुका था। जनार्दन ने उसे धिक्कारते हुए कहा था, 'ये लोग इस लायक नहीं हैं कि तुम इनके साथ पियो-खाओ। मेरी समझ में नहीं आता तुम क्यों इन लोगों को इतनी लिफ्ट दे रहे हो। होगा साला ईओ फीओ।'

यही इस बार हुआ। दोस्त से मिलते ही जनार्दन ने महादेव की पिटाई को ले कर ईओ को गाली दी। दीपक ने ईओ का पक्ष लिया। जनार्दन तिलमिला गया। वह बोला, 'दीपक, तुम्हारा पतन शुरू हो गया है।'

'मैं उस टुच्चे महादेव का पक्ष नहीं ले रहा हूँ इसलिए मेरा तो पतन हो गया है और तुम ईओ को गाली दे कर बड़ा ऊँचा काम कर रहे हो। तुम्हें मालूम है महादेव चेअरमैन बना फिरता है और चाहता है ईओ उसके अंडर में काम करें। है न मजाक। ऐसे आदमी को पागलखाने में डाल देना चाहिए। लेकिन जब तक यह नहीं होता वह गली-गली जूते खाएगा ही। चाहे फिर तुम्हें बुरा ही क्यों न लगे।'

दीपक का यह दो टूक लहजा जनार्दन को बहुत बुरा लगा। उसे आश्चर्य हुआ कि ये दीपक के विचार हैं। हालाँकि महादेव से वह हमेशा चिढ़ता रहा मगर ईओ जैसे लोगों का पक्ष लेना उसने हाल में ही शुरू किया होगा। जनार्दन नहीं चाहता था कि शुरुआत कटुता से हो। इसलिए उसने ठंडेपन से एक सवाल पूछा, 'दीपक, क्या तुम्हें यह नहीं लगता कि सरकारी लोग बस्ती में मुअज्जिसों और गुंडों से संबंध बना कर लोगों को लूटते है। वे बस्ती की ताकत को अपनी ताकत बना लेते हैं। और फिर बस्ती का कचूमर बना देते हैं। इसलिए समझदार लोगों को इनका कवच और हथियार बनने से बचना चाहिए। तुम्हारी इस बारे में क्या राय है?'

जनार्दन की बात सुन कर दीपक मुस्कराया। और उसने उसी गंभीरता से कहा - 'जनार्दन, बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। यह तुम्हें पता ही होगा। और यह भी पता होगा, जो जहाँ है वहाँ लूट रहा है। महादेव अपनी माँ को लूट रहा है। वह जमीन तोड़ती है और माँगती है तब महादेव का कुआँ भरता है। दरअसल तुम्हें यह पता नहीं है कि लोग जानवर हैं। एक से दिखनेवाले अलग-अलग किस्म के जानवर। ताकतवर जानवर भोग कर रहे हैं। ताकतवर रहना पड़ेगा। या मर जाना चाहिए। तुम्हारा इस बारे में क्या खयाल है?'

जनार्दन उसकी बात सुन कर तिलमिला गया। यह उसका दोस्त कैसी बातें कर रहा है। क्या यह स्वयं को भी पशु मान चुका होगा। और क्या मुझे भी ऐसा ही मानता होगा। यह जो चारों तरफ हो रहा है, इसे ले कर क्या इसमें जरा भी बेचैनी नहीं होती होगी।

'दीपक, तुमने जो कुछ कहा, यदि यह सही भी है, यदि ताकत जीत रही है और यह जीत मनुष्य को पशुता की तरफ धकेल रही है तो हमारा तुम्हारा क्या फर्ज बनता है, मैं यह पूछ रहा था।'

'अच्छा... जहाँ तक फर्ज का सवाल है मैं यह सोचता हूँ कि यह एक किस्म से खुद को धोखा देनेवाली चीज है। जीतना ताकत की भूख है और जीत कर भोगने में है। ताकत को नहीं रोका जा सकता।'

जनार्दन तमतमा गया - 'कैसे नहीं रोका जा सकता? लेकिन सिर्फ तब जब इस ताकत में नहीं, इसके विरुद्ध एक नई ताकत में खुद को दे दिया जाए।'

'एक बहुत ही अच्छी किताबी बात तुम कह रहे हो।' दीपक ने ताली बजाई और फिर जनार्दन को एक धौल जमाते हुए बोला, 'ये ऊँची बातें रहने दो। अपना दिमाग नहीं चलता। कुछ और सुनाओ।'

मगर जनार्दन खोया रहा। दीपक के तर्क उसे बहुत ही भयानक लग रहे थे। उसे लग रहा था जैसे उसकी कोई बहुत ही पवित्र चीज दुश्मनों की हो कर उसे चिढ़ा रही हो। दीपक यह सब समझ रहा था। आखिर उसने उमड़ते हुए कहा, 'भाड़ में जाएँ ईओ और महादेव और सब। साला अपन क्यों अपना दिमाग खराब करें। तुम यदि ये चाहते हो कि मैं ईओ मंडल में न रहूँ तो नहीं रहूँगा। मगर ये तुम्हारी खामखयाली है कि वहाँ मेरे न रहने से जनता का कोई बड़ा भला हो जाएगा। लेकिन तुम्हें लगता है कि मेरा वहाँ रहना ठीक नहीं है तो हटाओ सालों को, इधर क्या।'

दीपक ने यह बात बड़ी भावना से की थी। जनार्दन खुश हो गया, बोला 'ये तर्क तुम यों ही कर रहे थे न।'

दीपक कुछ देर सोच कर बोला 'हाँ... तर्क मैं यों ही कर रहा था। मगर तुम्हारा ये महादेव को ले कर जो पागलपन है वह मुझे बेतुका लगता है।'

दोनों मित्रों ने हल्के हो कर अभी बातें शुरू की ही थीं कि ईओ साब चौरसिया और ठाकुर के साथ दीपक के यहाँ पहुँच गए। जनार्दन को तीनों ने विशेष सम्मान दे कर प्रसन्नता व्यक्त की कि 'अच्छे मौके पर आए।'

ईओ साब को देखते ही दीपक को याद आ गया कि आज पार्टी है। ईओ साब के लड़के का पहला जन्मदिन है। पार्टी गुप्ता की बगिया में है। दीपक बोला 'आप क्या मुझे याद दिलाने आए है?'

'नहीं, आपको क्या याद दिलाना। पता चला कि जनार्दन भाई आए हैं। सोचा रिक्वेस्ट करता चलूँ।' फिर जनार्दन की तरफ देख कर बोला, 'जनार्दन भाई, दीपक के साथ आप को भी आना है। आप नहीं आए तो मैं समझूँगा आप मुझसे नाराज हैं।'

जनार्दन विचलित-सा हो गया। ईओ से पहले कभी भेंट नहीं हुई थी। यह पहली मुलाकात थी। ईओ की विनम्रता और आत्मीयता उसे बहुत सहज लगी। वह एकदम युवा था। उसके बाल लंबे और कद मझोला था। उसकी आँखों का भाव यद्यपि बुरा था मगर उनमें चंचलता नहीं थी। ईओ चला गया तो जनार्दन की ओर देख कर दीपक हँस पड़ा - अब?

जनार्दन थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला, 'अब क्या। तुम जाना मेरा तो सवाल ही नहीं उठता।'

'तो यह तुम्हें उसी से कहना चाहिए था।'

'तुम कह देना।'

'मैं क्यों कह दूँ? अपनी बात खुद बोलनी चाहिए।'

'खुद तो मैं बहुत कुछ बोल सकता हूँ।'

दीपक ने स्थिर हो जनार्दन की आँखों में देखा और बोला, 'जनार्दन तुम अब नहीं बोल सकते। जब वह आया था सिर्फ तभी बोल सकते थे।'

जनार्दन बोला, 'तुम न जाने यार कहाँ की तोप समझते हो उस ईओ को। मैं अपनी में आ जाऊँ तो अभी पता चल जाएगा।'

दीपक चुप रह गया। जनार्दन उत्तेजित और आहत हो कर बकने लगता है। और ऐसा करते समय वह ओछा-सा लगता है, क्षुद्र-सा। दीपक को अच्छा नहीं लगता। इसलिए वह ऐसे मौकों को टाल जाना चाहता है - 'अच्छा ठीक है मत जाना। मैं भी नहीं जाऊँगा,' कह कर दीपक ने जनार्दन का हाथ पकड़ कर उसे उठाया, 'जनार्दन, तुम दो चार दिन के लिए आए हो, अब ये फालतू की बातें अपन छोड़ें। एंजाय करें। तुम्हारे आने को सेलिब्रेट करें।'

इसी बीच दीपक को बुलाने नौकर आ गया। फैक्ट्री में कोई नहीं था। पिताजी बाहर गए थे। दीपक ने जनार्दन को बहुत मनाया कि फैक्ट्री चले मगर वह नहीं माना। उसे बस्ती में घूम-फिर कर और लोगों से मिलने की इच्छा हो रही थी।

जनार्दन बाजार में कहीं इस दुकान में खड़ा हो जाता, कहीं उस चबूतरे पर बैठ जाता। जो उसे देखता वही या तो राम-राम करता या उसके पास रुक जाता। थोड़ी देर बातें करता। बस स्टैंड पर वह इंटर कालेज के मास्टरों के झुंड से मिल कर लल्लू होटल की ओर बढ़ ही रहा था कि महादेव महाराज ने उसे पुकारा - 'जनार्दन भाई।' और आ कर महादेव उससे लिपट गया। उसे अटपटा लग रहा था। क्योंकि इससे पहले महादेव कभी उससे लिपटा-विपटा नहीं था। मगर उसने उसकी पीठ थपथपाई।

'जनार्दन भाई, आपका यह महादेव अब यहाँ का चेअरमैन है।' महादेव ने उचित ही गर्व किया और बोला, 'आपको पता चला होगा कि मैंने गाना छोड़ दिया है। मगर आप आए हैं तो आज गाऊँगा। और ऐसा गाऊँगा कि तानसेन भी घबड़ा जाए।'

दो-चार लोग जो खड़े थे हँस पडे। महादेव को कोई फर्क नहीं पड़ा।

'जनार्दन भाई, आपको सड़क पर चलने में परेशानी हो रही होगी। यह मेरे लिए शर्म की बात है। मैंने कहीं-कहीं कोशिश की है अपने हाथ से ठीक करने की मगर कहाँ तक ठीक करूँ। ये ईओ कागजों में दो बार ठीक करवा चुका है। लेकिन मैं उसे छोड़ूँगा नहीं।'

जनार्दन उसके साथ लल्लू होटल में बैठ गया। कुछ और लोग भी आ बैठे। महादेव की लनतरानियाँ शुरू हो गईं। उसने चेअरमैन के रूप में अपनी प्रतिष्ठा के कई किस्से सुनाए। बस्ती के बड़े लोगों के कर्मों का रोजनामचा खोला। ईओ मंडल की गतिविधियों का भीषण दृश्य खींचा और अंत में जनार्दन से बोला, 'जनार्दन भाई, एक लेख लिख दो इस सब पर, छपवा मैं लूँगा। अखबार का टंटा भी करना पड़ेगा।'

जनार्दन ने लिखने का वादा किया। महादेव ने विदा होते समय यह वादा किया कि शाम को यहीं लल्लू होटल में बैठा मिलेगा और जम के गाएगा।

जनार्दन घर जा कर माँ के पास बैठ गया। उसका मन बुरी तरह उलझ चुका था। इसलिए बातों का कोई सिलसिला ही ढंग से नहीं बन पाया। आखिर माँ ने खाट बिछा दी और बोली, 'थोड़ी देर सो लो।'

जनार्दन आँखें भींचे पड़ा रहा। थोड़ी देर झपकी भी ली। उतने में ही अजीब-सा बदमजा सपना आया। सपना तो वह भूल गया। लेकिन सपने के प्रभाव से वह और भी उखड़ गया। सपने को याद करने की कोशिश करता वह पड़ा था, तभी दीपक आ पहुँचा। वह भी खाट पर पसर गया।

जनार्दन ने आँखें खोल कर अपने जागने का संकेत दिया और फिर बंद कर लीं।

माँ ने चाय रख कर दोनों को पुकारा, 'उठो शाम को भी सोया जाता है।' दोनों उठ बैठे और चाय पीने लगे। जनार्दन और दीपक साथ हों और इतनी देर तक चुप रहें, माँ को यह बड़ा ही अटपटा लग रहा था। फिर जनार्दन जब से आया था तभी से उखड़ा-उखड़ा था। बच्चों की बातें और अपने दफ्तर के लतीफे भी उसने नहीं सुनाए थे। दीपक भी अपने स्वभाव के विपरीत चुपचाप-सा था। माँ को आशंका हुई कहीं दोनों लड़ तो नहीं पड़े।

'तुम दोनों में झगड़ा हो गया है क्या?' माँ से न रहा गया तो वह पूछ बैठी।

'हम दोनों में झगड़ा!' जनार्दन बोला, 'हम दोनों में क्यों झगड़ा होने लगा।'

दीपक हँसने लगा, फीकी हँसी। जनार्दन ने उसकी हँसी देखी और समझ गया अब यह चुप रहना चाहेगा।

चाय पी कर वे बाहर निकल गए। बाजार की तरफ थोड़ा चले फिर लौट कर दीपक के घर चले गए। घर के बाहर मैदान में कुर्सियाँ डाल कर बैठ गए। दोनों चुप। आखिर जनार्दन बोला, 'दीपक, तुम्हें मेरी कोई बात बुरी लग गई है।' दीपक के पास कहने के लिए कुछ नहीं था। जनार्दन उत्तर की प्रतीक्षा में उसे देखे जा रहा था। दीपक देर तक कुछ नहीं बोला। 'दीपक कुछ बोलो या मैं चला जाऊँ।'

दीपक ने जनार्दन की ओर देखा और मुस्करा कर बोला, 'मुझे तुम्हारी कोई बात बुरी नहीं लगी। तुमने ऐसा कहा भी क्या है। बस यूँ ही मन खराब है।'

'फिर भी कोई बात तो होगी जिससे मन खराब हुआ होगा।'

'कोई भी बात नहीं। न जाने क्यों ऐसा लग रहा है जैसे अब मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ। मेरा पतन हो गया है।' कह कर दीपक ने करीब आते लोगों को देखा और कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। पाँच-सात लोगों ने आते ही दीपक को उलाहना देना शुरू कर दिया। वे सब नौकरीपेशा लोग थे। दो डाक्टर और तीन मंडी समिति वगैरह के लोग।

'आप यहाँ बैठे हैं और वहाँ आपके बिना गिलास सूखे पड़े है। चलिए फौरन। और जनार्दन भाई आप भी। इनके बिना तो चल ही जाएगा। आपके बिना पार्टी ही नहीं होगी, ईओ साब ने कहा है।'

दीपक और जनार्दन एक-दूसरे को देखने लगे। डाक्टर ने, जिसके बाएँ गाल पर मस्सा था, उत्साह में भर कर कहा, 'चलिए तो आप लोग, देखिए कैसा ऊँचा मामला है। जितनी जिसे पीनी हो पिए।'

दीपक बोला, 'हम लोग नहीं जा सकेंगे।'

पाँचों एक साथ चौंक कर बोले, 'क्या... नहीं जा सकेंगे?' फिर डाक्टर बोला - 'पता है आपको इस पार्टी को ले कर ईओ कितना सेंटीमेंटल है। फील कर जाएगा भाई।'

दीपक बोला, 'बताया न, हम लोग नहीं जा सकेंगे।' जनार्दन भी अब कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और बोला, 'दीपक, तुम जाओ। मेरी तबीयत ठीक होती तो मैं भी चलता। आप लोग इसे ले जाइए।' इतना कह कर जनार्दन तेजी से अपने घर की ओर चल दिया। दीपक उसके पीछे भागा। थोड़ा आगे उसे रोक कर बोला, 'तुम नहीं जाओगे तो मैं भी नहीं जाऊँगा।'

जनार्दन ने दबी लेकिन भीषण आवाज में कहा, 'तुम नहीं गए तो अभी शहर वापस चला जाऊँगा समझे। चुपचाप चले जाओ।'

जनार्दन ने पलट कर देखा और जाते-जाते ताकीद कर गया 'जाओगे नहीं तो ठीक नहीं होगा।'

वे पाँचों कुछ भी न समझ सके कि मामला क्या है। दीपक को साथ ले कर वे चले गए।

जनार्दन घर जा कर एक अलमारी से जूझने लगा। उसमें उसकी किताबें और कागजात रखे थे। उन सब को उसने नीचे पटक दिया और फिर पलट-पलट कर देखने लगा। मगर उसका मन कहीं और ही था। कल जब ईओ पूछेगा कि क्यों नहीं आए तब क्या वह असली कारण बता पाएगा? और यदि नहीं बता पाएगा तो क्या कह कर उसकी आत्मीयता का उत्तर देगा। उसने कैसे अपनत्व से कहा था। और किस तरह उसने लोगों को यह कह कर भेजा कि जनार्दन भाई नहीं पहुँचे तो पार्टी नहीं होगी।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। सामने ईओ खड़ा था - 'आपको लेने आया हूँ। सभी लोग आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।'

जनार्दन बिना कुछ बोले बाहर निकल आया। ईओ के साथ यंत्रवत चल पड़ा। चलते-चलते बोला, 'दरअसल मेरी तबीयत ठीक नहीं थी...।'

'वो सब ठीक हो जाएगी वहाँ। आप समझ नहीं सकते कि आपसे मिलने को सब लोग कितने बेकरार हैं। आपके बारे में दीपक बताता रहता है। इसी से सबको आपके साथ बैठने की बड़ी उत्सुकता है।' ईओ बोला।

जनार्दन चलता रहा। बाजार आ गया। और बाजार की अंतिम दुकानें भी आ गईं। फिर बस स्टैंड और लल्लू का होटल। वहाँ पहुँचते ही जनार्दन को याद आया महादेव महाराज प्रतीक्षा कर रहा होगा। और वाकई लल्लू होटल में हजम्मा जुड़ा था। महादेव बाहर खड़ा पानी के कुल्ले कर रहा था। उसने जनार्दन को देखते ही हाथ हिलाया। जनार्दन ने हाथ हिला कर उत्तर दिया और सीधा चलता रहा। महादेव को अजीब लगा। ईओ के साथ चले जा रहे हैं जनार्दन भाई। और अब तो सचमुच चले ही गए। जब तक वे दोनों मुड़ नहीं गए, महादेव महाराज सकते की हालत में उन्हें देखते ही रहे।

जनार्दन अब तेज कदम बढ़ रहा था। वह जल्दी से जल्दी वहाँ पहुँच कर पी लेना चाहता था। वरना उसका माथा फट जाता।

बगिया में गैस की चार-पाँच लालटेनें पेड़ों पर टँगी थीं। उनके प्रकाश में कई कुर्सियाँ, बेंचें, तखत और खाटें पड़ी थीं। बीच में एक तखत पर ढेर गिलास रखे थे। बड़ी-बड़ी प्लेटों में सलाद भरा पड़ा था। चार बोतलें रखी थीं। एक ओर ईंटों के चूल्हे पर डेग चढ़ी थी। चूल्हे के आसपास तीन-चार पल्लेदार काम में लगे थे। करीब बीस-पच्चीस लोग, जिन्हें ईओ मंडल के नाम से जाना जाता था, कुर्सियों पर बैठे, खाटों पर लेटे यहाँ-वहाँ टहलते उन दोनों की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके पहुँचते ही उत्साह का संचार हो गया। ओमी ने बोतल खोली और गिलासों में ढालना शुरू कर दिया। लोगों ने सिगरेटें सुलगा लीं। जनार्दन का एक-एक से परिचय कराया जाने लगा। अधिकांश लोग उसे जानते ही थे। वे उससे मिल कर और उसे पार्टी में पा कर बहुत प्रसन्न हुए। इस बीच गिलास हाथों में आ गए और पीना शुरू हो गया।

जनार्दन को दीपक ने अपने पास बिठा लिया। जनार्दन के दाईं तरफ कुँअर साहब बैठे थे। उन्होंने एक साँस में गिलास खाली कर दिया। जनार्दन ने भी जल्दी ही निबटा कर दूसरी बार ले ली और एकदम पी गया। लोग चुटकलों, गजलों के मूड में आ गए। बेहद गंदे चुटकुले चलने लगे।

जनार्दन कुँअर साहब की और मुखातिब हो कर बोला, 'कुँअर साहब, सुना है आप कांग्रेस आई में हैं।'

कुँअर साहब ने हामी में सिर हिलाया।

'आप जैसे आदमी को जब मैं इस पार्टी में देखता हूँ तो मुझे बहुत दुख होता है। आप जैसे दमदार लोगों को तो किसी क्रांतिकारी पार्टी में होना चाहिए। आखिर राजा साब आजादी की लड़ाई में शामिल हुए थे न।' कुँअर साहब इतने गंभीर वार्तालाप के लिए शायद तैयार न थे। टालते हुए बोले, 'हाँ, मगर अब जो है सो ठीक है।'

'ठीक कैसे है कुँअर साहब। गरीब आदमी की तरफ से आप जैसे लोग नहीं लड़ेंगे तो कौन लड़ेगा।'

दीपक ने हस्तक्षेप किया, 'इस मुद्दे पर अपन बाद में बात करेंगे। पहले उन लोगों की बात सुनो, वे तुमसे कविताएँ सुनना चाहते हैं।'

मस्सेवाला डाक्टर बोला, 'हम लोग महीनों से आपके इंतजार में हैं। सुनाइए।'

फिर सब लोग उसके पीछे ही पड़ गए। जनार्दन को नशा चढ़ गया था इसलिए सारा दृश्य नजर आ रहा था और लोगों की आवाजें धीमी लग रही थीं। उसने गिलास बढ़ा दिया। लोगों ने उत्साह में खूब डाल दी। वह नीट ही पी गया। फिर सिगरेट सुलगा कर बोला, 'अगर आप लोग कविता सुनना चाहते हैं, अपनी तो याद नहीं है। एक बहुत बड़े कवि को सुनाता हूँ।'

लोग उत्सुक हो उसकी ओर देखने लगे। जनार्दन का सिर चकराने लगा। उसे लल्लू होटल दिखा। महादेव महाराज देख कर सकते में उसे देखता। जनार्दन गों गों करते कुछ बोला। लोग हँस पड़े। तो उसने तैश में गरदन झटकी। दीपक ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा और बोला, 'सुनाओ जनार्दन।'

जनार्दन बोला 'सुनो -

ओ मेरे आदर्शवादी मन

ओ मेरे सिद्धांतवादी मन

अब तक क्या किया

जीवन क्या जिया

उदरंभरि बन... '

यहाँ तक आते-आते जनार्दन की जीभ ऐंठ गई। दूसरे ही क्षण उसने उल्टी कर दी। वह कुर्सी पर गिर पड़ा। फिर कुर्सी जमीन पर गिर पड़ी। वह धूल में औंधा पड़ा ओंकने लगा।

                                                                         ---नवीन सागर---

सपनों का सच


बहुत-सी अटकलें, बहुत-सी गप्पें आपने सुनी होंगी, सुनाई होंगी। मैं जो सुना रहा हूँ वह सचमुच गप्प नहीं है। दिक्कत यह है कि मेरे पास ऐसा प्रमाण भी नहीं है कि आपके सामने रख सकूँ कि जो कुछ मैं कह रहा हूँ वह एकदम सच है। मैं झूठमूठ प्रमाण जुटा भी लूँ तो आप यकीन कर लेंगे, इसका कम से कम मुझे यकीन नहीं है।

लीजिए, मैं प्रमाण दे रहा हूँ। मैं यानी इस गाथा का लेखक। सीधे-सीधे मैं यह कथा सुना रहा हूँ इसलिए मैं अपने जीवन से ही प्रमाण दूँगा। अप्रैल 1990 में मुझे सोवियत देश की एक संस्था से बुलावा आया। अब वह केवल रूस भर रह गया है। यानी यह सच है कि 1990 में सोवियत संघ था। यह जरूर है कि जब हम लोग उस देश में पहुँचे तो हमने लोगों में नए बदलाव के लिए जबर्दस्त आकर्षण देखा। अब लोग खुल्लमखुल्ला अपने नेताओं की, व्यवस्था और कम्युनिस्टों की आलोचना करने लगे थे। यह सब बहैसियत प्रमाण आपके सामने जुटा रहा हूँ। आप चाहें तो मेरी छुट्टी का रिकार्ड भी पलट सकते हैं कि मैं अपने दफ्तर से उन दिनों छुट्टी पर था।

प्रमाणों का एक प्रकरण अभी शेष है। मेरे साथ कुछ भारतीय लेखक भी गए थे। खैर, जब आप लेखक शब्द पढ़ेंगे तो आप अविश्वास से भर उठेंगे। हमारे दौर में लेखकों ने पाठकों से अपना विश्वास खोया ही है... फिर भी आप जो थोड़े बहुत पाठक बच गए हैं कभी-कभी लेखकों की बचकानी कहानियों पर हँसते होंगे। मैं एक ऐसी पाठिका से मिला था जिसने कहा था, आप सब लेखक लोग झूठे होते हैं। प्रेम ओर समर्पण की ऐसी भावुकता-भरी बातें लिखते हैं कि सही जीवन में वैसा कर पाना न केवल असंभव होता है बल्कि कभी-कभी तो बचकाना और फिजूल लगता है। तो माफ करें अब मैं लेखकों की सूची आपके सामने नहीं रखूँगा।

तो उस कान्फ्रेंस में दुनिया भर से लेखक इकट्ठा हुए थे और क्रीमिया जलडमरूमध्य के सिमफेरोपोल शहर में सम्मेलन का उद्घाटन हुआ था। वहीं मुझे एक ऐसे लेखक का परिचय मिला था जो तब के सोवियत संघ के अस्त्राखान इलाके का रहने वाला था और पेशे से वास्तु कलाकार था। वह हमेशा अपने हाथ में एक लंबी-सी फाइल रखता था और अक्सर चुप्पा-सा किसी दूसरी ही दुनिया में खोया रहता था। पहली बार उसे देखकर लगता था कि आप इस आदमी से कभी भी दुबारा नहीं मिलना चाहेंगे। उसका चेहरा डरावना नहीं था। वह आक्रामक ढंग की बातें भी नहीं करता था। बस, उसकी आँखों में एक अजीब-सी खोजीपने की प्रखरता थी। आप सीधे उससे आँखें मिलाएँ तो एक पल भी टिकाए नहीं रख सकते थे। उससे मेरा परिचय हुआ और बस मैं लेखकों की भीड़ के रेले में इधर-उधर हो गया। मैं अस्त्राखान के उस लेखक को भूल ही जाता कि दूसरे दिन सुबह वह मेरे कमरे के बाहर दस्तक देते-देते मुझे पुकार रहा था।

शिष्टाचार के नाते मैं उसे अपने कमरे में ले आया।

'माफ करना,' वह बोला, 'आपको तकलीफ दी। पर यह बहुत जरूरी भी था। मैं आपको कुछ रहस्यपूर्ण बातें बताना चाहता हूँ।'

'अवश्य,' मैं अचंभे में होते हुए भी सामान्य बनने की कोशिश में था। मैं सोच रहा था कि यह भी उन पागलों में एक होगा जो हर भारतीय को तांत्रिक

और ज्योतिषी मानता है। 'पर यहाँ नहीं...' वह बोला, 'क्या आप कुछ देर के लिए मेरे साथ नदी तट पर घूमना पसंद करेंगे?'

मैं असमंजस में था। अभी मैंने दातौन भी नहीं की थी। और कायदे से मैं तैयार भी नहीं था। 'लेकिन... देखिए न...'

मैं जो बोलना चाहता था जैसे वह भाँप गया।

'ठीक है। आप इतनी देर में तैयार हो लें मैं नाश्ता डिब्बों में बँधवा लाता हूँ। कहीं नदी किनारे ही नाश्ता कर लेंगे।'

वह अपने प्रस्ताव पर अमल करने के लिए उठ खड़ा हुआ। केवल शिष्टाचार के नाते मैं उसे 'ना' नहीं कर सका। अन्यथा आज यानी उस दिन, छुट्टी के दिन मेरे पास इतना अधिक लिखने-पढ़ने का काम था कि मैं सारा दिन अपने आप में ही व्यस्त रहकर बिता सकता था। अभी ये सारी बातें मैं आपको प्रमाण के तौर पर बता रहा हूँ। आप सिमफेरोपोल के उस एकमात्र बड़े होटल के अप्रैल के पहले रविवार के दिन होटल की हिसाब वाली किताब में दो नाश्तों के डिब्बे बंद होने की तसदीक कर सकते हैं। याद रहे उस किताब में हम दोनों के नाम और कमरों के नंबर भी दर्ज हैं।

होटल से बाहर हल्की-सी ठंड का बड़ा जादुई असर हुआ। वह तनाव जो एक फालतू किस्म के आमंत्रण को कुछ ज्यादा ही फालतू मान लेने के अनुमान से पैदा हुआ था, एकदम काफूर हो गया था। होटल के पास ही नदी तट था। और दूर-दूर तक जहाँ तक देखा जा सकता था चेरी के फूल लदे बेहद खूबसूरत पेड़ थे। सचमुच वह एक दिव्य दृश्य था। उसे देखकर हिमालय के बर्फ लदे पहाड़ याद आने लगे थे।

'बिल्कुल परियों की कहानी में पढ़े विवरणों जैसा है यह दृश्य,' वह बोला।

मैंने दृश्य पर मोहित होते हुए अपना सिर हिलाया।

'हुआ यह कि रात में मुझे सपना-सा आया कि नदी तट के सभी पेड़ों पर फूल लद आए हैं।'

हम तट की तरफ एकदम नदी जल की कल-कल सुनते आगे बढ़े जा रहे थे। पानी का झाग सुबह के सूरज की रोशनी में कुछ ज्यादा ही चमक रहा था। पानी में घरों से फेंके गए कागज, खाली डिब्बे और पेड़ों से टूटी टहनियों के छोटे-छोटे गुच्छे बहे जा रहे थे। अनिर्दिष्ट-सी किसी दिशा की ओर...।
'आप कल्पना भी नहीं कर सकेंगे कि मैंने आपको क्यों तकलीफ दी? मैं जो आपको बताना चाहता हूँ उस पर आप यकीन कर लेंगे - मुझे भरोसा नहीं। पर जैसे आप यह छोटी-सी बहती नदी देख रहे हैं - चेरी के ये पेड़ देख रहे हैं - ठीक वैसी ही मेरी बातें हैं। हम आपस में एक दूसरे की बातों पर यकीन तभी करते हैं न कि हमें ऐसे विश्वसनीय आदमी के जरिए मिल रही हैं जिसे हमारा विश्वास प्राप्त है।'

मैं सहमति में सिर हिलाए जा रहा था।

'थोड़ी देर हम कहीं बैठ न लें...' उसने कहा, सड़क के उपर चेरी के पेड़ों के नीचे चबूतरे से बने हुए थे। पर उन पर ज्यादातर जोड़ेनुमा युवक-युवतियाँ बैठे हुए थे और अपने देश में बोलने की आजादी का उपयोग वे एक दूसरे के चुंबन लेते कर रहे थे। थोड़ी ही दूर पर नदी किनारे ही चेरी पेड़ के गिर्द बड़े-बड़े पत्थरों से बना एक चबूतरा था। हम वहीं बैठ गए। उसने अपनी बड़ी फाइल खोलनी शुरू की। उसमें विचित्र से डिजाइनों वाले कागज ठुँसे थे। वह उन्हें एक-एक कर पलट रहा था।

'मैंने अपने 'ड्राइंग्स' सब इसी में रखे हुए हैं। असल में मैं एक ऐसे घर का निर्माण करना चाहता था, जिसमें आदमी नीरोग जी सके।'

उसकी बात समझने के लिए मैं केवल प्रतीक्षा कर रहा था कि कोई सूत्र हाथ लगे। 'असल में बहुत दिन हुए हमारे घर में मुझे और मेरे भाई को कुछ विचित्र से अनुभवों का सामना करना पड़ा। सही तथ्य यह है कि मेरे भाई के दूसरे लोकों के आदमियों से संबंध स्थापित हो गए।'

'क्या कहा - दूसरे लोक... यानी कि आप भी यकीन रखते हैं कि कहीं कोई अन्य लोक है। इस तरह की, एक जैसी कथाएँ मैंने भी अखबारों के

माध्यम से पढ़ी हैं। पर वे घोर निराश करती हैं। उनमें कोरी गप्प के अलावा शायद कुछ होता ही नहीं।'

'पहले मैं भी ऐसे ही सोचता था।'

'मुझे लगता है साम्यवाद की पकड़ ढीली होने के बाद आपके देशवासी भी इस तरह के अंधविश्वासों के शिकार होने लगे हैं।'

'आप मेरी बात तो सुनें। मेरे छोटे भाई का संपर्क उन लोगों से बीस बरस पूर्व हो गया था। तब दुनिया के अखबारों में विचित्र मानों की ही खबरें छपती थीं।'

'बस,' मैं कहना चाहता था कि बस कहकर मैंने उसे रोक दिया।

'अगर मैं आपकी जगह होता तो मुझमें भी अविश्वास जागता। आप हैरान होंगे, शुरू-शुरू में मेरे छोटे भाई ने जब मुझसे इस तरह की बातों का जिक्र करना शुरू किया तो मुझे लगा उसका दिमाग फिर गया है... कब कैसे उसे यह अनुभव आए - यह तो पुराना किस्सा है, और लंबा भी। मैं तो एक लंबी किताब इन अनुभवों पर बनाने वाला हूँ...।'

मैं चेरी के फूल देखने लगा। मुझे उकताहट ने आ घेरा था। मुझे फूलों के तथ्य अब जैसे मोहित करने में असमर्थ हो गए थे।

'मैं शुरू-शुरू के अपने अनुभव सुनाऊँ।' उसने मुझे चुप देखकर कहा, 'शायद इसमें आपकी दिलचस्पी न हो...'

'नहीं... नहीं... क्या बात कर रहे हैं आप!' मैंने उसे दिलासा देते हुए कहा, 'आप कहिए न?'

'अस्त्राखान भी अजब जगह है। वहाँ ज्यादातर लोग इस्लाम को मानने वाले हैं। मेरी बहन एक बार ईश्वर की प्रार्थना कर रही थी कि उसे कुछ ऐसा अहसास हुआ जैसे कोई लंबे चोगे वाला आदमी आसपास आया हो। अब हालाँकि उसकी शादी हो गई, वह मुझसे कुछ ही बड़ी थी। एक ऐसी राजदार कि मैं सोचता हूँ उसे मेरी हर बात पता है और मैं... मैं उसकी हर बात जानता हूँ।'

'वह अब भी वहीं अस्त्राखान में रहती है?'

'नहीं! मध्य एशिया में उसका पति कहीं काम करता है। बहुत दिनों से मुझे उसकी खबर नहीं मिली।'

'लेकिन आप तो मुझे कुछ बताने वाले थे?'

'हाँ... हाँ,' उसने जैसे कुछ याद करते हुए कहा, 'वही तो बता रहा हूँ। मेरे छोटे भाई ने सहसा एक दिन मुझे बताया कि वह पारलौकिक लोगों के संपर्क में है। सामान्य रूप से जैसा इस अवसर पर कहते हैं वही मैंने भी कहा कि तुम अपना इलाज करवा लो। पर वह इतना दृढ़ था कि उसने मुझे आश्वस्त किया कि एक दिन मुझे सत्य का परिचय करा कर ही रहेगा।'

'तो क्या आपको...'

'वही तो कह रहा हूँ। एक सुबह उसने मुझे उठाया और अपना हाथ मेरे मुँह पर रखकर कुछ भी कहने से वर्जित करते हुए खिड़की की ओर इशारा किया। बस वही क्षण था कि उसके हाथ की गर्मी जैसे मेरे शरीर में प्रवेश कर गई... पर यह जादू-सा भी तो हो सकता था...।'

'क्या महसूस हुआ आपको?'

'मुझे लगा उसके हाथों में बहुत गर्मी है। कुछ ही पल बाद मुझे खिड़की के पर्दे पर कोई आकृति उभरती दिखाई दी...।'

'तमाम वृत्तांतों में, जो भी आपने अखबारों में पढ़े होंगे - यही कुछ कहा जाता है। इसमें कुछ नया नहीं है।'

'शायद आप ठीक ही कहते हों। लेकिन मेरा अनुभव...' उसकी आँखों में विचित्र-सी चमक आ गई।

'मेरा खयाल है, जब भी हम अपनी बातों को पुष्ट करना चाहते हैं तो हम प्रमाणों का सहारा लेते हैं।'

'प्रमाणों का सहारा - आपका मतलब... आखिर आप कहना क्या चाहते हैं?'

'यही कि जिस बात को आप कर रहे हैं मैं उसे वैज्ञानिक गल्पों पर आधारित फिल्मों में देख चुका हूँ।'

वह हँसा। मेरी ओर उसने बेचैनी से देखा।

'देखिए, अब अगर मैं कहूँ कि रात में ही मुझे दूसरे लोक से संकेत मिला है कि मेरे रहस्यों को जानने की यदि किसी में पात्रता है तो वह उस भारतीय में है...'

और 'उस भारतीय' कहते हुए उसने मेरा नाम जोड़ा। एक ऐसी स्थिति थी कि मैं उसमें फँस गया था। हम लोग वहाँ से उठे और नदी तट पर उसके उद्गम की ओर चलने लगे। सिमफेरोपोल एक बेहद खूबसूरत जगह है। नदी किनारे घरों की सुंदरता देखने लायक चीज थी। कहीं-कहीं छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे थे। कहीं सुंदर महिलाएँ अपनी सखियों से बतिया रही थीं। और कहीं-कहीं श्वेत पाखियों के झुंड आसमान में - नीले, सघन नीले आसमान में घूम रहे थे...

'आपको मैं बताना चाहता हूँ कि जब मेरा संपर्क दूसरे लोक के लोगों से हो गया तो उन्होंने मुझे अपना काम करने से बरजा। उन्होंने कहा कि मुझे ऐसा घर नहीं बनाना चाहिए जिसमें नीरोग जीवन हो...'

'कितने लोग मिले आपको... और उनका क्या अधिकार कि वे आपको अपना काम करने से रोकें!'

उसने फाइल में से एक लंबा कागज निकाला जिसमें एक विशाल भवन का नक्शा था। वहाँ अनेक गुंबदों के बीच एक बड़े गुंबद का चित्र था।

'मैंने इसे 'मॉडल' के रूप में भी बनाया था। पर मॉडल के बीचोबीच पिरामिडनुमा एक तिकोनाकार गुंबद उस लोक के लोग उठा ले गए। वे लोग सुदूर आकाश के शून्य में से आते हैं। उनका कहना है कि 'हाड़-मांस' की आकृतियों में बने मनुष्यों को बहुत कष्ट सहने पड़ते हैं।'

'तो क्या उनके लोक में कष्ट नहीं हैं?'

'कुछ ऐसा ही समझ लीजिए। एक बार मैंने उनमें से एक आकृति से प्रार्थना की कि वह मुझे अपने लोक का दर्शन करा डाले। उसने कहा, संभव नहीं है यह। फिर भी मैं जिद करता रहा। वह समझिए एक ऐसी आकृति थी जो झिल्ली के पतले परदे से ढकी थी। अंत में वह मेरी बात मान गया, बोला, रात में सपने में तुम हमारी बस्ती देखना, उसके बाद जरूरी हुआ तो तुम्हें अपने लोक में ले जाएँगे।'

'तो क्या वे ले गए?'

'पहले सपने की बात तो सुनिए। उस रात मैंने सपना देखा कि एक पूरा शहर है जहाँ घर हैं पर घरों की दीवारें नहीं हैं, पेड़ हैं पर पेड़ों की जड़ें नहीं हैं, लोग हैं पर लोगों के चेहरों पर दुख नहीं... ऐसी अविश्वसनीय दुनिया देखकर मेरी नींद जल्दी ही उचट गई... यह सपना बराबर अनेक दिनों तक मेरा पीछा करता रहा... पर मैं उसे पूरा नहीं देख पाया... मैंने फिर उस लोक के लोगों से मिलने का प्रयत्न किया और जब मैं मिला तो वे बोले कि तुम सपना पूरा देख ही नहीं रहे हो...'

'उनमें से दो लोग थे जो एक नली जैसे अंतरिक्ष यान में बैठकर आए थे और दो लोग खुद जैसे उभर आए थे...'

'वाह... अवतारी पुरुष थे वे...।' उसे गुस्सा आ गया, 'आप अविश्वास करिए पर तिरस्कार न करिए। मैंने जिद की तो उन्होंने वहीं बैठे-बैठे मुझे अपनी दुनिया दिखाई।' 'कैसे?'

'वही तो मुझे यकीन नहीं हो रहा है। बैठे-बैठे मेरी आँखों के सामने एक हरी-भरी घाटी दिखाई दी। घाटी में वैसे ही मकान थे... वैसे ही लोग... वे लोग बहुत सुखी थे... वे एक दूसरे की सहायता कर रहे थे... एक दूसरे के प्रति आभार व्यक्त कर रहे थे... वे सुखी थे... मैंने उनसे प्रार्थना की... अनुरोध किया कि क्या वे ऐसे लोक का एक टुकड़ा, एक छोटा-सा टुकड़ा हमारी धरती को नहीं दे सकते...'

मैं क्रीमिया जलडमरूमध्य के शहर सिमफेरोपोल को दुबारा देखने लगा था। 'क्या इतना ही खूबसूरत इलाका आपने देखा?'

'वह दृश्य दिव्य था... पर मेरे पास तो असंख्य सूचनाएँ हैं। उस लोक के आदमियों ने बताया कि बस बरस-दो बरस में और भी कहर बरसने वाला है...'
अब मैं क्या कहता। मैं खुद उसके सपने में जैसे शामिल हो गया था। मैं भी देखने लगा कि उस सपनों के देश में लोग सुखी हैं... काश, हम वैसा ही कुछ यहाँ ले आते...

प्रिय पाठक, अस्त्राखान का आदमी झूठ भी बोल सकता है... हम सब सच की दुनिया से झूठ की दुनिया की तलाश में हैं। कितने बरस बीत गए हैं अस्त्राखान के आदमी को मिले हुए... तब से अब तक मैं लगातार वह सपना देख रहा हूँ... मैं सोचता हूँ, यह जीवन उलट होता। जो कुछ इस ओर दिखाई दे रहा है वह सपना होता और जो कुछ उस ओर दिखाई दे रहा है वह सच होता... मैं फिर किसी दिन बताऊँगा, वह कब होगा... और कब उस लोक के लोग अपनी धरती का एक टुकड़ा हमें देंगे... कभी-कभी मुझे खयाल आता है, सपने में सही... सपनों में तो वह टुकड़ा हमें हासिल कराया हुआ है... बस अस्त्राखान के वास्तुकार के उस भवन का इंतजार है। सपनों में ही सही... कुछ दिन हमारी दुनिया के लोग वहाँ रह लें...।

                                                                    ---गंगा प्रसाद विमल---