जब आँखें रीत जाती हैं
बहाकर सब आँसू, जो बचा रह जाता है
तो वह दुख है;
जो बचता है हृदय में
जब सब भावनाएँ पिरोई जाती हैं
शब्दों और पंक्तियों में
तो वह कविता है
दुख की तरह
कविता अनंत है
जब भी गोली चलती है,
या कोई नन्हा यतीम भूख से बिलखता है,
दुख हृदय से सिर उठाता है
गोली से घायल सैनिक के रक्त की तरह
कविता भी बहती है;
गाढ़ी और सख्त होकर
अंत में जम जाती है
फूल पुष्पित होकर फल बन जाता है;
शुष्क, मुरझाया पंखुड़ीरहित;
इसी तरह खून, सूखकर काला पड़ जाता है,
पपड़ियाँ बनकर खुरचा जाता है
वह फिर बहता है
खामोश अँधेरे की तरह भीतर ही भीतर थक्का बन जाता है,
और उस दर्द से
कोई रक्तपिपासु उत्पन्न होता है
और घाव को चाटने लगता है
पुराना घाव हरा हो जाता है -
रक्तिम और मुलायम,
और फिर बहने लगता है
इस तरह दुख जिंदा रहता है,
जैसे हो कवि का जीना
और मर जाना
समुद्र तट पर रात में
रात की अँधेरी सड़कों पर पाँव चलते हैं
रात के फहराते पंख
इंजन की चिंघाड़
असहाय कदम बढ़ते हुए
आगे ही आगे सड़कें
घिसटती हैं पंखुड़ियों
और पवन का स्पंदन
लहरें आती और जाती हैं, पदप्रक्षालन करती
पाँव तले रेत गुदगुदी करके फिसल जाता है
हाथों की अँजुली में भरा जल
भागते पैरों की आवाज, शायद
नहीं अब कोई आवाज नहीं
थके पेड़ थके और स्तब्ध
भगवान जगन्नाथ का मंदिर, कोणार्क और
मंदिर का नीला बैनर
नर्तकियों के ठहरे हुए आसन
निशांत के आगमन की बेला का अँधेरा
पैर अब उनींदे हैं समुद्री हवा
तट पर पेड़ों और नीले बैनर के
के परे बहती है
--शुभेंदु मुंड--
(अनुवाद : सरिता शर्मा)
इस ब्लॉग का उद्देश्य आप सभी पाठको तक उन महान और सार्थक लेखकों की रचनाओं को पहुँचाना है जिनसे आप समय और रचनाओं की अनुपलब्धता के चलते अभी तक वंचित है.
सोमवार, 11 अगस्त 2014
छोटी सी बात
आसमान में बादल छाए होने के कारण उस समय काफी अँधेरा था। हालाँकि घड़ी में अभी साढ़े चार ही बजे थे, लेकिन इसके बावजूद लग रहा था जैसे शाम के सात बज रहे हों। लेकिन सलिल पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह अपने हाथ में गुलेल लिए सावधानीपूर्वक आगे की ओर बढ़ रहा था। उसे तलाश थी किसी मासूम जीव की, जिसे वह अपना निशाना बना सके। नन्हे जीवों पर अपनी गुलेल का निशाना लगाकर सलिल को बड़ा मजा आता। जब वह जीव गुलेल की चोट से बिलबिला उठता, तो सलिल की प्रसन्नता की कोई सीमा न रहती। वह खुशी के कारण नाच उठता।
अचानक सलिल को लगा कि उसके पीछे कोई चल रहा है। उसने धीरे से मुड़ कर देखा। देखते ही उसके पैरों के नीचे की जमीन निकल गई और वह एकदम से चिल्ला पड़ा। सलिल से लगभग बीस कदम पीछे दो चिंपैंजी चले आ रहे थे। सलिल का शरीर भय से काँप उठा। उसने चाहा कि वह वहाँ से भागे। लेकिन पैरों ने उसका साथ छोड़ दिया। देखते ही देखते दोनों चिंपैंजी उसके पास आ गए। उन्होंने सलिल को पकड़ा और वापस उसी रास्ते पर चल पड़े, जिधर से वे आए थे।
कुछ ही पलों में सलिल ने अपने आप को एक बड़े से चबूतरे के सामने पाया। चबूतरे पर जंगल का राजा सिंह विराजमान था और उसके सामने जंगल के तमाम जानवर लाइन से बैठे हुए थे। सलिल को जमीन पर पटकते हुए एक चिंपैंजी ने राजा को संबोधित कर कहा, 'स्वामी, यही है वह दुष्ट बालक, जो जीवों को अपनी गुलेल से सताता है।'
शेर ने सलिल को घूर कर देखा, 'क्यों मानव पुत्र, तुम ऐसा क्यों करते हो?'
सलिल ने बोलना चाहा, लेकिन उसकी जबान से कोई शब्द न फूटा। वह मन ही मन बड़बड़ाने लगा, 'क्योंकि मैं जानवरों से श्रेष्ठ हूँ।'
'देखा आपने स्वामी?' इस बार बोलने वाला चीता था, 'कितना घमंड है इसे अपने मनुष्य होने का। आप कहें तो मैं अभी इसका सारा घमंड निकाल दूँ?' कहते हुए चीता अपने दाहिने पंजे से जमीन खरोंचने लगा।
सलिल हैरान कि भला इन लोगों को मेरे मन की बात कैसे पता चल गई? लेकिन चीते की बात सुनकर वह भी कहाँ चुप रहने वाला था। वह पूरी ताकत लगाकर बोल ही पड़ा, 'हाँ, मनुष्य तुम सब जीवों से श्रेष्ठ है, महान है। और ये प्रकृति का नियम है कि बड़े लोग हमेशा छोटों को अपनी मर्जी से चलाते हैं।'
तभी आस्ट्रेलियन पक्षी नायजी स्क्रब, जिसकी शक्ल कोयल से मिलती-जुलती है, उड़ता हुआ वहाँ आया और सलिल को डपट कर बोला, 'बहुत नाज है तुम्हें अपनी आवाज पर, क्योंकि अन्य जीव तुम्हारी तरह बोल नहीं सकते। पर इतना जान लो कि सारे संसार में मेरी आवाज का कोई मुकाबला नहीं। दुनिया की किसी भी आवाज की नकल कर सकती हूँ मैं। ...क्या तुम ऐसा कर सकते हो?' सलिल की गर्दन शर्म से झुक गई और नायजी स्क्रब अपने स्थान पर जा बैठी।
सलिल के बगल में स्थित पेड़ की डाल से अपने जाल के सहारे उतरकर एक मकड़ी सलिल के सामने आ गई और फिर उस पर से सलिल की शर्ट पर छलाँग लगाती हुई बोली, 'देखने में छोटी जरूर हूँ, पर अपनी लंबाई से 120 गुना लंबी छलाँग लगा सकती हूँ। क्या तुम मेरा मुकाबला कर सकते हो? कभी नहीं। तुम्हारे अंदर यह क्षमता ही नहीं। पर घमंड जरूर है 120 गुना क्यों?' कहते हुए उसने दूसरी ओर छलाँग मार दी।
तभी गुटरगूँ करता हुआ एक कबूतर सलिल के कंधे पर आ बैठा और अपनी गर्दन को हिलाता हुआ बोला, 'मेरी याददाश्त से तुम लोहा नहीं ले सकते। दुनिया के किसी भी कोने में मुझे ले जाकर छोड़ दो, मैं वापस अपने स्थान पर आ जाता हूँ।'
सलिल सोच में पड़ गया और सर नीचा करके जमीन पर अपना पैर रगड़ने लगा।
'मैं हूँ गरनार्ड मछली। जल, थल, नभ तीनों जगह पर मेरा राज है।' ये स्वर थे पेड़ पर बैठी एक मछली के, 'पानी में तैरती हूँ, आसमान में उड़ती हूँ और जमीन पर चलती हूँ। अच्छा, मुझसे मुकाबला करोगे?'
ठीक उसी क्षण सलिल के कपड़ों से निकल कर एक खटमल सामने आ गया और धीमे स्वर में बोला, 'सहनशक्ति में मनुष्य मुझसे बहुत पीछे है। यदि एक साल भी मुझे भोजन न मिले, तो हवा पीकर जीवित रह सकता हूँ। तुम्हारी तरह नहीं कि एक वक्त का खाना न मिले, तो आसमान सिर पर उठा लो।'
खटमल के चुप होते ही एल्सेशियन नस्ल का कुत्ता सामने आ पहुँचा। वह भौंकते हुए बोला, 'स्वामीभक्ति में मनुष्य मुझसे बहुत पीछे है। पर इतना और जान लो कि मेरी घ्राण शक्ति (सूँघने की क्षमता) भी तुमसे दस लाख गुना बेहतर है।'
पत्ता खटकने की आवाज सुनकर सलिल चौंका और उसने पलटकर पीछे देखा। वहाँ पर बार्न आउल प्रजाति का एक उल्लू बैठा हुआ था। वह घूर कर बोला, 'इस तरह मत देखो घमंडी लड़के, मेरी नजर तुमसे सौ गुना तेज होती है समझे?'
सलिल अब तक जिन्हें हेय और तुच्छ समझ रहा था, आज उन्हीं के आगे अपमानित हो रहा था। अन्य जीवों की खूबियों के आगे वह स्वयं को तुच्छ अनुभव करने लगा था। इससे पहले कि वह कुछ कहता या करता, दौड़ता हुआ एक गिरगिट वहाँ आ पहुँचा और अपनी गर्दन उठाते हुए बोला, 'रंग बदलने की मेरी विशेषता तो तुमने पढ़ी होगी, पर इतना और जान लो कि मैं अपनी आँखों से एक ही समय में अलग-अलग दिशाओं में एक साथ देख सकता हूँ। मगर तुम ऐसा नहीं कर सकते। कभी नहीं कर सकते।'
दोनों चिंपैंजियों के बीच खड़ा सलिल चुपचाप सब कुछ सुनता रहा। भला वह जवाब देता भी तो क्या? उसमें कोई ऐसी खूबी थी भी तो नहीं, जिसे वह बयान करता। वह तो सिर्फ दूसरों को सताने में ही अभी तक आगे रहा था।
तभी चीते की आवाज सुनकर सलिल चौंका। वह कह रहा था, 'खबरदार, भागने की कोशिश मत करना। क्योंकि 112 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार है मेरी। और तुम मुझ से पार पाने के बारे में सपने में भी न सोच सकोगे। क्योंकि तुम्हारी यह औकात ही नहीं है।'
'क्यों नहीं है औकात?' चीते की बात सुनकर सलिल अपना आपा खो बैठा और जोर से बोला, 'मैं तुम सबसे श्रेष्ठ हूँ, क्योंकि मेरे पास अक्ल है। और वह तुममें से किसी के भी पास नहीं है।'
सलिल की बात सुनकर सामने के पेड़ की डाल से लटक रहा चमगादड़ बड़बड़ाया, 'बड़ा घमंड है तुझे अपनी अक्ल पर नकलची मनुष्य। तूने हमेशा हम जीवों की विशेषताओं की नकल करने की कोशिश की है। जब तुम्हें मालूम हुआ कि मैं एक विशेष की प्रकार की अल्ट्रा साउंड तरंगें छोड़ता हूँ, जो सामने पड़ने वाली किसी भी चीज से टकरा कर वापस मेरे पास लौट आती हैं, जिससे मुझे दिशा का ज्ञान होता है, तो मेरी इस विशेषता का चुराकर तुमने रडार बना लिया और अपने आप को बड़ा बुद्धिमान कहने लगे?'
'बहुत तेज है अक्ल तुम्हारी?' इस बार मकड़ी गुर्राई, 'ऐसी बात है तो फिर मेरे जाल जितना महीन व मजबूत तार बनाकर दिखाओ। नहीं बना सकते तुम इतना महीन और मजबूत तार। इस्पात के द्वारा बनाया गया इतना ही महीन तार मेरे जाल से कहीं कमजोर होगा। ...और तुम्हारे सामान्य ज्ञान में वृद्धि के लिए एक बात और बता दूँ कि यदि मेरा एक पौंड वजन का जाल लिया जाए, तो उसे पूरी पृथ्वी के चारों ओर सात बार लपेटा जा सकता है।'
इतने में एक भँवरा भी वहाँ आ पहुँचा और भनभनाते हुए बोला, 'वाह री तुम्हारी अक्ल? जो वायु गतिकी के नियम तुमने बनाए हैं, उनके अनुसार मेरा शरीर उड़ान भरने के लिए फिट नहीं है। लेकिन इसके बावजूद मैं बड़ी शान से उड़ता फिरता हूँ। अब भला सोचो कि कितनी महान है तुम्हारी अक्ल, जो मुझ नन्हें से जीव के उड़ने की परिभाषा भी न कर सकी।'
हँसता हुआ भंवरा पुनः अपनी डाल पर जा बैठा। एक पल के लिए वहाँ सन्नाटा छा गया। सन्नाटे को तोड़ते हुए शेर ने बात आगे बढ़ाई, 'अब तो तुम्हें पता हो गया होगा नादान मनुष्य कि तुम इन जीवों से कितने महान हो? अब जरा तुम अपनी घमंड की चिमनी से उतरने की कोशिश करो और हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि सभी जीवों में कुछ न कुछ मौलिक विशेषताएँ पाई जाती हैं। सभी जीव आपस में बराबर होते हैं। न कोई किसी से छोटा होता है न कोई किसी से बड़ा। समझे?'
'लेकिन इसके बाद भी यदि तुम्हारा स्वभाव नहीं बदला और तुम जीव-जंतुओं को सताते रहे, तो तुम्हें इसकी कठोर से कठोर सजा मिलेगी।' कहते हुए हाथी ने सलिल को अपनी सूँड़ में लपेटा और जोर से ऊपर की ओर उछाल दिया।
सलिल ने डरकर अपनी आँखें बंद कर लीं। लेकिन जब उसने दोबारा अपनी आँखें खोलीं, तो न तो वह जंगल था और न ही वे जानवर। वह अपने बिस्तर पर लेटा हुआ...
'इसका मतलब है कि मैं सपना...' सलिल मन ही मन बड़बड़ाया। उसने अपनी पलकों को बंद कर लिया और करवट बदल ली। हाथी की कही हुई बातें अब भी उसके कानों में गूँज रही थीं।
--ज़ाकिर अली ‘रजनीश’--
सोमवार, 3 फ़रवरी 2014
ग्रीटिंग कार्ड और राशन कार्ड
मेरी टेबिल पर दो कार्ड पड़े हैं - इसी डाक से आया दिवाली ग्रीटिंग कार्ड और दुकान से लौटा राशन कार्ड। ग्रीटिंग कार्ड में किसी ने शुभेच्छा प्रगट की है कि मैं सुख और समृद्धि प्राप्त करूँ। अभी अपने शुभचिंतक बने हुए हैं जो सुख दिए बिना चैन नहीं लेंगे। दिवाली पर कम से कम उन्हें याद तो आती है कि इस आदमी का सुखी होना अभी बकाया है। वे कार्ड भेज देते हैं कि हम तो सुखी हैं ही, अगर तुम भी हो जाओ, तो हमें फिलहाल कोई एतराज नहीं।
मेरा ग्रीटिंग कार्ड मेरे सुख की कामना कर रहा है। मगर राशन कार्ड बताता है कि इस हफ्ते से गेहूँ की मात्रा आधी हो गई है। राशन कार्ड मे ग्रीटिंग कार्ड को काट दिया। ऐसा तमाचा मारा कि खूबसूरत ग्रीटिंग कार्ड जी के कोमल कपोल रक्तिम हो गए। शुरु से ही राशन कार्ड इस ग्रीटिंग कार्ड की ओर गुर्राकर देख रहा था। जैसे ही मैं ग्रीटिंग कार्ड पढ़कर खुश हुआ, राशन कार्ड ने उसकी गर्दन दबाकर कहा - क्यों बे साले, ग्रीटिंग कार्ड के बच्चे, तू इस आदमी को सुखी करना चाहता है? जा, इसका गेहूँ आधा कर दिया गया। बाकी काला-बाजार से खरीदे या भूखा रहे।
बेचारा ग्रीटिंग कार्ड दीनता से मेरी ओर देख रहा है। मैं क्या करूँ? झूठों की रक्षा का ठेका मुझे थोड़े ही मिला है। जिन्हें मिला है उनके सामने हाथ जोड़ो। मेरे राशन कार्ड को तेरी झूठ बर्दाश्त नहीं हुई। इन हालात में सुख का झूठी आशा लेकर तू क्यों आया? ग्रीटिंग कार्ड राष्ट्रसंघ के शांति प्रस्तावों की तरह सुंदर पर प्रभावहीन है। राशन कार्ड खुरदरा और बदसूरत है, पर इसमें अनाज है। मेरे लिए यही सत्य है। और इस रंगीन चिकनाहट में सत्यहीन औपचारिक शुभेच्छा है। ग्रीटिंग कार्ड सत्य होता अगर इसके साथ एक राशन कार्ड भी भेजा गया होता और लिखा होता - हम चाहते हैं कि तुम सुख प्राप्त करो। इस हेतु हम एक मरे हुए आदमी के नाम से जाली राशन कार्ड बनवाकर भेज रहे हैं। जब तक धाँधली चले सस्ता अनाज लेते जाना और सुखी रहना। पकड़े जाने पर हमारा नाम मत बताना। संकट के वक्त शुभचिंतक का नाम भूल जाना चाहिए।
मित्रों से तो मैं कहना चाहता हूँ कि ये कार्ड न भेजें। शुभकामना इस देश में कारगर नहीं हो रही हैं। यहाँ गोरक्षा का जुलूस सात लाख का होता है और मनुष्य रक्षा का सिर्फ एक लाख का। दुनिया भर में शुभकामना बोझ हो गई है। पोप की शुभकामना से एक बम कम नहीं गिरता। मित्रों की ही इच्छा से कोई सफल, सुखी और समृद्ध कैसे हो जाएगा? सफलता के महल का प्रवेश द्वार बंद है। इसमें पीछे के नाबदान से ही घुसा जा सकता है। जिन्हें घुसना है नाक पर रूमाल रखकर घुस जाते हैं। पास ही इत्र सने रूमालों के ठेले खड़े हैं। रूमाल खरीदो, नाक पर रखो और नाबदान में से घुस जाओ सफलता और सुख के महल में। एक आदमी खड़ा देख रहा है। कोई पूछता है - घुसते क्यों नहीं? वह कहता है - एक नाक होती तो घुस जाते। हमारा तो हर रोम एक नाक है। कहाँ-कहाँ रूमाल लपेटें।
एक डर भी है। सफलता, सुख और समृद्धि प्राप्त भी हो जाए, तो पता नहीं कितने लोग बुरा मान जाएँ। संकट में तो शत्रु भी मदद कर देते हैं। मित्रता की सच्ची परीक्षा संकट में नहीं, उत्कर्ष में होती है। जो मित्र के उत्कर्ष को बर्दाश्त कर सके, वही सच्चा मित्र होता है। संकट में तपी हुई मित्रता उत्कर्ष में खोटी निकलती मैंने देखी है। एक बेचारे की चार कविताएँ छप गईं, तो चार मित्र टूट गए। आठ छपने पर पूरे आठ टूट गए। दो कवि सम्मेलनों में जमने से एक स्थानीय कवि के कवि-मित्र रूठ गए। तीसरे कवि सम्मेलन में जब वह 'हूट' हुआ, तब जाकर मित्रता अपनी जगह लौटी।
ग्रीटिंग कार्डों पर अपना भरोसा नहीं। 20 सालों से इस देश को ग्रीटिंग कार्डों के सहारे चलाया गया है। अंबार लग गए हैं। हर त्योहार पर देशवासियों को ग्रीटिंग कार्ड दिए जाते हैं - 15 अगस्त और 26 जनवरी पर, संसद के अधिवेशन पर, पार्टी के सम्मेलन पर। बढ़िया सुनहले रंगों के मीठे शब्दों के ग्रीटिंग्स - देशवासियों, बस इस साल तुम सुखी और समृद्ध हो जाओ। ग्रीटिंग कार्डों के ढेर लगे हैं, मगर राशन कार्ड छोटा होता जाता है।
---हरिशंकर परसाई---
चूहा और मैं
चाहता तो लेख का शीर्षक ''मैं और चूहा'' रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्य आदमी नहीं कर पाता, वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया।
इस घर में एक मोटा चूहा है। जब छोटे भाई की पत्नी थी, तब घर में खाना बनता था। इस बीच पारिवारिक दुर्घटनाओं-बहनोई की मृत्यु आदि के कारण हम लोग बाहर रहे।
इस चूहे ने अपना अधिकार मान लिया था कि मुझे खाने को इसी घर में मिलेगा। ऐसा अधिकार आदमी भी अभी तक नहीं मान पाया। चूहे ने मान लिया है।
लगभग पैंतालिस दिन घर बन्द रहा। मैं तब अकेला लौटा। घर खोला, तो देखा कि चूहे ने काफी क्रॉकरी फर्श पर गिराकर फोड़ डाली है। वह खाने की तलाश में भड़भड़ाता होगा। क्रॉकरी और डिब्बों में खाना तलाशता होगा। उसे खाना नहीं मिलता होगा, तो वह पड़ोस में कहीं कुछ खा लेता होगा और जीवित रहता होगा। पर घर उसने नहीं छोड़ा। उसने इसी घर को अपना घर मान लिया था।
जब मैं घर में घुसा, बिजली जलाई तो मैंने देखा कि वह खुशी से चहकता हुआ यहाँ से वहाँ दौड़ रहा है। वह शायद समझ गया कि अब इस घर में खाना बनेगा, डिब्बे खुलेंगे और उसकी खुराक उसे मिलेगी।
दिन-भर वह आनन्द से सारे घर में घूमता रहा। मैं देख रहा था। उसके उल्लास से मुझे अच्छा ही लगा।
पर घर में खाना बनना शुरू नहीं हुआ। मैं अकेला था। बहन के यहाँ जो पास में ही रहती है, दोपहर को भोजन कर लेता। रात को देर से खाता हूँ, तो बहन डब्बा भेज देती। खाकर मैं डब्बा बन्द करके रख देता। चूहाराम निराश हो रहे थे। सोचते होंगे यह कैसा घर है। आदमी आ गया है। रोशनी भी है। पर खाना नहीं बनता। खाना बनता तो कुछ बिखरे दाने या रोटी के टुकड़े उसे मिल जाते।
मुझे एक नया अनुभव हुआ। रात को चूहा बार-बार आता और सिर की तरफ मच्छरदानी पर चढ़कर कुलबुलाता। रात में कई बार मेरी नींद टूटती मैं उसे भगाता। पर थोड़ी देर बाद वह फिर आ जाता और सिर के पास हलचल करने लगता।
वह भूखा था। मगर उसे सिर और पाँव की समझ कैसे आई? वह मेरे पाँवों की तरफ गड़बड़ नहीं करता था। सीधे सिर की तरफ आता और हलचल करने लगता। एक दिन वह मच्छरदानी में घुस गया।
मैं बड़ा परेशान। क्या करूँ? इसे मारूँ और यह किसी अलमारी के नीचे मर गया, तो सड़ेगा और सारा घर दुर्गन्ध से भर जाएगा। फिर भारी अलमारी हटाकर इसे निकालना पड़ेगा।
चूहा दिन-भर भड़भड़ाता और रात को मुझे तंग करता। मुझे नींद आती, मगर चूहाराम मेरे सिर के पास भड़भड़ाने लगते।
आखिर एक दिन मुझे समझ में आया कि चूहे को खाना चाहिए। उसने इस घर को अपना घर मान लिया है। वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत है। वह रात को मेरे सिरहाने आकर शायद यह कहता है - ''क्यों, बे, तू आ गया है। भर-पेट खा रहा है, मगर मैं भूखा मर रहा हूँ मैं इस घर का सदस्य हूँ। मेरा भी हक है। मैं तेरी नींद हराम कर दूँगा। तब मैंने उसकी माँग पूरी करने की तरकीब निकाली।''
रात को मैंने भोजन का डब्बा खोला, तो पापड़ के कुछ टुकड़े यहाँ-वहाँ डाल दिए। चूहा कहीं से निकला और एक टुकड़ा उठाकर अलमारी के नीचे बैठकर खाने लगा। भोजन पूरा करने के बाद मैंने रोटी के कुछ टुकड़े फर्श पर बिखरा दिए। सुबह देखा कि वह सब खा गया है।
एक दिन बहन ने चावल के पापड़ भेजे। मैंने तीन-चार टुकड़े फर्श पर डाल दिए। चूहा आया, सूँघा और लौट गया। उसे चावल के पापड़ पसन्द नहीं। मैं चूहे की पसन्द से चमत्कृत रह गया। मैंने रोटी के कुछ टुकड़े डाल दिए। वह एक के बाद एक टुकड़ा लेकर जाने लगा।
अब यह रोजमर्रा का काम हो गया। मैं डब्बा खोला, तो चूहा निकलकर देखने लगता। मैं एक-दो टुकड़े डाल देता। वह उठाकर ले जाता। पर इतने से उसकी भूख शान्त नहीं होती थी। मैं भोजन करके रोटी के टुकड़े फर्श पर डाल देता। वह रात को उन्हें खा लेता और सो जाता।
इधर मैं भी चैन की नींद सोता। चूहा मेरे सिर के पास गड़बड़ नहीं करता।
फिर वह कहीं से अपने एक भाई को ले आया। कहा होगा, ''चल रे, मेरे साथ उस घर में। मैंने उस रोटीवाले को तंग करके, डरा के, खाना निकलवा लिया है। चल दोनों खाएँगे। उसका बाप हमें खाने को देगा। वरना हम उसकी नींद हराम कर देंगे। हमारा हक है।''
अब दोनों चूहाराम मजें में खा रहे हैं।
मगर मैं सोचता हूँ - आदमी क्या चूहे से भी बद्तर हो गया है? चूहा तो अपनी रोटी के हक के लिए मेरे सिर पर चढ़ जाता है, मेरी नींद हराम कर देता है।
इस देश का आदमी कब चूहे की तरह आचरण करेगा?
(यह कहानी अँग्रेजी लेखक स्टीन बेक के लघु उपन्यास ऑफ मैन एण्ड माउस से अलग है।)
---हरिशंकर परसाई---
इस घर में एक मोटा चूहा है। जब छोटे भाई की पत्नी थी, तब घर में खाना बनता था। इस बीच पारिवारिक दुर्घटनाओं-बहनोई की मृत्यु आदि के कारण हम लोग बाहर रहे।
इस चूहे ने अपना अधिकार मान लिया था कि मुझे खाने को इसी घर में मिलेगा। ऐसा अधिकार आदमी भी अभी तक नहीं मान पाया। चूहे ने मान लिया है।
लगभग पैंतालिस दिन घर बन्द रहा। मैं तब अकेला लौटा। घर खोला, तो देखा कि चूहे ने काफी क्रॉकरी फर्श पर गिराकर फोड़ डाली है। वह खाने की तलाश में भड़भड़ाता होगा। क्रॉकरी और डिब्बों में खाना तलाशता होगा। उसे खाना नहीं मिलता होगा, तो वह पड़ोस में कहीं कुछ खा लेता होगा और जीवित रहता होगा। पर घर उसने नहीं छोड़ा। उसने इसी घर को अपना घर मान लिया था।
जब मैं घर में घुसा, बिजली जलाई तो मैंने देखा कि वह खुशी से चहकता हुआ यहाँ से वहाँ दौड़ रहा है। वह शायद समझ गया कि अब इस घर में खाना बनेगा, डिब्बे खुलेंगे और उसकी खुराक उसे मिलेगी।
दिन-भर वह आनन्द से सारे घर में घूमता रहा। मैं देख रहा था। उसके उल्लास से मुझे अच्छा ही लगा।
पर घर में खाना बनना शुरू नहीं हुआ। मैं अकेला था। बहन के यहाँ जो पास में ही रहती है, दोपहर को भोजन कर लेता। रात को देर से खाता हूँ, तो बहन डब्बा भेज देती। खाकर मैं डब्बा बन्द करके रख देता। चूहाराम निराश हो रहे थे। सोचते होंगे यह कैसा घर है। आदमी आ गया है। रोशनी भी है। पर खाना नहीं बनता। खाना बनता तो कुछ बिखरे दाने या रोटी के टुकड़े उसे मिल जाते।
मुझे एक नया अनुभव हुआ। रात को चूहा बार-बार आता और सिर की तरफ मच्छरदानी पर चढ़कर कुलबुलाता। रात में कई बार मेरी नींद टूटती मैं उसे भगाता। पर थोड़ी देर बाद वह फिर आ जाता और सिर के पास हलचल करने लगता।
वह भूखा था। मगर उसे सिर और पाँव की समझ कैसे आई? वह मेरे पाँवों की तरफ गड़बड़ नहीं करता था। सीधे सिर की तरफ आता और हलचल करने लगता। एक दिन वह मच्छरदानी में घुस गया।
मैं बड़ा परेशान। क्या करूँ? इसे मारूँ और यह किसी अलमारी के नीचे मर गया, तो सड़ेगा और सारा घर दुर्गन्ध से भर जाएगा। फिर भारी अलमारी हटाकर इसे निकालना पड़ेगा।
चूहा दिन-भर भड़भड़ाता और रात को मुझे तंग करता। मुझे नींद आती, मगर चूहाराम मेरे सिर के पास भड़भड़ाने लगते।
आखिर एक दिन मुझे समझ में आया कि चूहे को खाना चाहिए। उसने इस घर को अपना घर मान लिया है। वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत है। वह रात को मेरे सिरहाने आकर शायद यह कहता है - ''क्यों, बे, तू आ गया है। भर-पेट खा रहा है, मगर मैं भूखा मर रहा हूँ मैं इस घर का सदस्य हूँ। मेरा भी हक है। मैं तेरी नींद हराम कर दूँगा। तब मैंने उसकी माँग पूरी करने की तरकीब निकाली।''
रात को मैंने भोजन का डब्बा खोला, तो पापड़ के कुछ टुकड़े यहाँ-वहाँ डाल दिए। चूहा कहीं से निकला और एक टुकड़ा उठाकर अलमारी के नीचे बैठकर खाने लगा। भोजन पूरा करने के बाद मैंने रोटी के कुछ टुकड़े फर्श पर बिखरा दिए। सुबह देखा कि वह सब खा गया है।
एक दिन बहन ने चावल के पापड़ भेजे। मैंने तीन-चार टुकड़े फर्श पर डाल दिए। चूहा आया, सूँघा और लौट गया। उसे चावल के पापड़ पसन्द नहीं। मैं चूहे की पसन्द से चमत्कृत रह गया। मैंने रोटी के कुछ टुकड़े डाल दिए। वह एक के बाद एक टुकड़ा लेकर जाने लगा।
अब यह रोजमर्रा का काम हो गया। मैं डब्बा खोला, तो चूहा निकलकर देखने लगता। मैं एक-दो टुकड़े डाल देता। वह उठाकर ले जाता। पर इतने से उसकी भूख शान्त नहीं होती थी। मैं भोजन करके रोटी के टुकड़े फर्श पर डाल देता। वह रात को उन्हें खा लेता और सो जाता।
इधर मैं भी चैन की नींद सोता। चूहा मेरे सिर के पास गड़बड़ नहीं करता।
फिर वह कहीं से अपने एक भाई को ले आया। कहा होगा, ''चल रे, मेरे साथ उस घर में। मैंने उस रोटीवाले को तंग करके, डरा के, खाना निकलवा लिया है। चल दोनों खाएँगे। उसका बाप हमें खाने को देगा। वरना हम उसकी नींद हराम कर देंगे। हमारा हक है।''
अब दोनों चूहाराम मजें में खा रहे हैं।
मगर मैं सोचता हूँ - आदमी क्या चूहे से भी बद्तर हो गया है? चूहा तो अपनी रोटी के हक के लिए मेरे सिर पर चढ़ जाता है, मेरी नींद हराम कर देता है।
इस देश का आदमी कब चूहे की तरह आचरण करेगा?
(यह कहानी अँग्रेजी लेखक स्टीन बेक के लघु उपन्यास ऑफ मैन एण्ड माउस से अलग है।)
---हरिशंकर परसाई---
दंत-कथा
एक जमाना था जब दाँतों के बारे में हम हिंदुस्तानियों का जनरल नॉलेज बड़ा सीमित हुआ करता था। तब हम इतना ही जानते थे कि इनसान के बत्तीस दाँत होते हैं और इन्हें साफ-सुथरा रखने के लिए किसी काले, धोले या मुफ्तिया (राख या बबूल के पेड़ की टहनी) मंजन का इस्तेमाल करना चाहिए और यदि कोई तकलीफ हो तो किसी चीनी डॉक्टर से चवन्नी की काड़ी फिरवा लेनी चाहिए। लेकिन भला हो, दिल्ली से निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिकाओं और शहर के सिनेमा थियेटरों के मालिकों का, जिनकी प्रेरणा से हमें क्रमशः पत्रिका पढ़ने के बाद और फिल्म देखने से पहले कुछ सीधे-सादे विज्ञापन देखने को मिले, जिनकी बदौलत हमने जाना कि अच्छे बच्चे बड़ों का कहना मानते हैं और रात को ब्रश करके ही सोते हैं या कुदरत द्वारा बख्शी गई नेमतों में से एक को हमें इतना सहेज कर रखना है कि बुढ़ापे में साबूत अखरोट भी तोड़ सकें और किसी को झट लौंग का तेल न मलना पड़े। तभी से हिंदुस्तानी मिडिल क्लास के घरों में टूथपेस्ट सुबह के अखबार और शाम के टीवी की तरह अपरिहार्य है।
दाँतों की रक्षा का यह फलसफा भले ही विदेशी हो, लेकिन इसका कार्यान्वयन निहायत देशी स्टाइल में होता है। हिंदुस्तानी बड़े पराक्रमी और जल्दी हार न मानने वालों में गिने जाते हैं। ऐसा नहीं कि पेस्ट खत्म हुआ, तो दूसरा ले आए। हम उसे अपने पास ज्यादा से ज्यादा समय तक के लिए रखना चाहते हैं। लिहाजा जब तक ट्यूब में से पेस्ट निकलता रहे, तब तक तो ठीक, लेकिन जब निकलना बंद हो जाए, तो हम उसके पैरों में दबाव बनाते हुए धीरे-धीरे मुँह तक आते हैं और इस प्रकार हम पाते हैं दो अतिरिक्त दिन का पेस्ट। फिर तीसरे दिन हम चटनी पीसने का पत्थर उठा लाते हैं, जो अब मिक्सर के कारण यूँ भी किसी काम का नहीं रह गया है। उस पत्थर की मदद से पेस्ट निकाला जाता है। चौथे दिन पत्थर चलाने पर वह म्यूनिसपल्टी की पाइप लाइन की तरह जर्जर होकर बीच के इलाकों से पेस्ट के कतरे सप्लाय करने लगता है। हम बड़े इत्मिनान से वे कतरे उठा-उठा कर ब्रश पर लगाते हैं। भले ही उस कवर के कुछ कोने हमारी अँगुली में खरोच पैदा कर दें। हिम्मते डिसोजा मददे जिसोजा। खरोंच के लिए डेटॉल हाजिर है, जो बाथरूम में इसीलिए ही रखा जाता है। डेटॉल मलो और सेप्टिक की चिंता से मुक्ति पाओ। वैसे यदि डेटॉल में जान होती, तो वह जरूर हँसता, क्योंकि हर दवा की कोई एक्सपायरी डेट होती है और आमतौर पर यह डेटॉल तभी का होता है, जिस दिन हम इस घर में शिफ्ट हुए थे।
अब जब पेस्ट का आलम यह है, तब ब्रश का तो कहना ही क्या? जिस तरह आदमी कर्जों के दम पर चालीस लाख का फ्लैट खरीदने की हिम्मत तो जुटा लेता है, लेकिन किचन में एक्जास्ट फेन लगाने में उसकी नानी मरती है; उधार में कार खुशी-खुशी ले आए, लेकिन सीटों पर कुशन लगाने के लिए वह अगले ऐरियर का इंतजार करता है, उसी प्रकार पेस्ट तो महीने के सामान के साथ ले आता है, लेकिन ब्रश खरीदने की हिम्मत वह इतनी जल्दी नहीं जुटा पाता। यह क्या, पेस्ट अट्ठाइस रुपए का और ब्रश छप्पन रुपए का। सोने से घड़ावन महँगी। वह ब्रशों के झुंड में से आदतन सबसे सस्ता ब्रश खरीदता है, जिसकी यह विशेषता होती है कि वह तीन दिन में ही इतना चपटा हो जाता है कि कमजोर नजर वाले को संपट ही न पड़े कि वह आखिर ब्रश करे तो कहाँ से करे? तब उसे इसका कारण समझ में आ जाता है कि यह तो सॉफ्ट ब्रश था, इसलिए ऐसा हुआ। वह हार्ड ब्रश लेता है, जिसको सात दिन बाद भी उसी रूप में पाकर उसका चेहरा खिल उठता है, टूथपेस्टी मुस्कान से नहीं विजयी मुस्कान से। वह इससे मुहब्बत करने लगता है, इतनी कि बदलने की इच्छा ही नहीं होती। अंत में वह दिन आता है जब घर का कोई सदस्य गलती से उससे ऐड़ियाँ रगड़ लेता है और इसकी घोषणा भी कर देता है। तब जाकर ब्रश बदला जाता है।
अब तो ब्रश के साथ टंग क्लीनर का भी चलन हो गया है। टंग क्लीनर की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि यह बहुत सस्ता होता है। आपको तय करना है कि तीन रुपए वाला धारदार क्लीनर लीजिएगा कि पाँच रुपए वाला बोठा क्लीनर। धारदारवाला लेंगे तो आह के साथ कराह भी निकल सकती है। इसीलिए कहते हैं कि सस्ता रोए बार-बार महँगा रोए एक बार। वैसे काम तो दोनों एक ही करेंगे। घर भर के लोगों और यदि फ्लैट सिस्टम हुआ तो ऊपर-नीचे की दो-दो मंजिलों के लोगों को "अई-अई या सुकू-सुकू" शैली में यह बताने का काम कि आप उठ चुके हैं और नित्य कर्मों से निवृत होना चाह रहे हैं।
दाँतों की रक्षा नामक इस सीडी का दूसरा पार्ट वॉश बेसिन में नहीं बल्कि राह चलते या बैठे-ठाले बजता है। इसके अंतर्गत भोजन या नाश्ते या पान-गुटखे के बाद दाँतों को कुरेदा जाता है। हालाँकि फैशन वालों ने इसके लिए भी खास मार्क की कुरेदनियाँ बनाई हैं, लेकिन ऐसी लक्जरी हमें रेस्तराओं में ही सुलभ होती हैं, जिन्हें हम हम बिल अदा करते हुए टिप देने या न देने का निर्णय करने से पहले ही झपट्टा मार कर ले आते हैं। लेकिन पुरानी बचत की तरह इनका स्टॉक भी जल्द खत्म हो जाता है और हम मौलिक तरीके ढूँढ़ने लगते हैं। माचिस की तीली का जला हुआ हिस्सा तोड़ कर या अगरबत्ती के ठुड्डे से। ऑफिस में तो आलपिन हैं ही। कुछ भाई लोग तो इतनी इंजीनियरी जानते हैं कि आलपिन खत्म होने पर यू पिन को मोड़ कर उसका आई-पिन बनाते हैं और उसी से काम चलाते हैं। फिर इस दुःसाहस में जब पिन कहीं इधर-उधर घुस जाती है तो डॉक्टर साहब के यहाँ दौड़ लगाते हैं, जो मय अपनी एक्स-रे मशीन के आपका हार्दिक स्वागत करते हैं।
---शशांक दुबे---
मंगलवार, 12 नवंबर 2013
द रॉयल घोस्ट
'...चल-चल आज तो दिखा ही दे, क्या है उस ट्रंक में। मान जा यार।'
पिता बिट्टो बुआ से निवेदन कर रहे थे। बिट्टो बुआ को पता था कि यह निवेदन पहले जिद में और फिर उन्हें धमकाने तक बढ़ेगा। इसका अंत हमेशा की तरह पिता, दोनों बुआओं और चाचा की झुँझलाहट से होगा - 'जाने किस बात का गुरूर है। जब सब कह रहे हैं तो मान भी जाना चाहिए। हम क्या इसके गहने-जेवर चुरा लेंगे जो यह ट्रंक दिखाने के नाम पर हर बार टल्ला लगा जाती है। ऐसा क्या है उसमें?'
पर उसमें कुछ था। बेसाख्ता समय और कुछ बेहद रहस्यमय। खतरनाक पर अलादीन के चिराग की तरह कौतुहल से भरा हुआ। उस ट्रंक की एक कहानी थी।
ऐसे बहुत से ट्रंक दुनिया में थे। वे एक ही जगह से खरीदे गये थे। उनमें से एक इंगलैंड के एक बेहद शक्तिशाली महल में भी था। कहते हैं, आज भी है। हजारों किलोमीटर समुद्र पार कर वे दुनिया के बहुत से हिस्सों में पहुँच गये थे। यह सब लंदन की एक बहुत चर्चित स्ट्रीट से शुरू हुआ, आज से लगभग अस्सी साल पहले।
बुआ का ट्रंक बहुत पुराना था। जहाँ से बचपन की स्मृतियाँ शुरू होती हैं उससे भी पुराना। बड़ा-सा लोहे के टाँकों से भरा एक ताला जो कहते हैं बिट्टो बुआ के ससुर लंदन से लाये थे, ट्रंक पर झूलता रहता। उन दिनों भापवाले पानी के जहाज लंदन से बंबई और बंबई से लंदन आया जाया करते थे। बहुत कम लोग इन जहाजों से जा पाते थे। बड़े शहरों में भी बस इक्का-दुक्का ही लोग थे जो जहाज में बैठकर महीनों की यात्रा करके, अरब सागर, फारस की खाड़ी, स्वेज नहर, भूमध्य सागर, जिब्राल्टर का सँकरा रास्ता और अटलांटिक के आठ दिन पार करके लंदन और इसी तरह वापस आये हों। बुआ के ससुर नजीबाबाद में यह यात्रा करनेवाले अकेले थे और उन्हें इस उपलब्धि के साथ दशकों तक अकेला ही होना था। वे ठहरे नजीबाबाद के पुराने रईस, रजबाड़ों के समय से चली आई दीवानी के उत्तराधिकारी, बड़े दीवान साहब, पर फिर भी भाप के जहाज में लंदन हो आना इससे भी बड़ी बात थी।
पाँच एकड़ में शहर के बीचोंबीच उनकी कोठी थी। कोठी क्या, पूरा आलीशान महल था। इटैलियन कट के शैंडलियर, अखरोट की लकड़ी से बनी विदेशी काँचों से पारदर्शी होकर चमचमाती अलमारियाँ, रजवाड़ों के समय से चले आये खूबसूरत फर्नीचर, पैरिस से मँगवाई गई बेशकीमती पेंटिंग्स, बाहर के खूबसूरत लॉन में लगा संगमरमर का विशाल फव्वारा... कहते हैं आज भी नजीबाबाद की आधी से ज्यादा दुकानें उनकी ही हैं। करोड़ों रुपये की आमदनी।
बुआ के पास सब कुछ था, जो उन दिनों किसी के पास हो सकता था - बेशकीमती ज्वेलरी से लेकर दर्जनों सेवक, सोने और चाँदी के तारों से बने महँगे कपड़े, कीमती खुशबुएँ, ...सबकुछ, शायद सबकुछ से भी ज्यादा। बस कुछ भी माँग लो हाजिर, यहाँ तक कि चाँद और तारे भी। पर बुआ को कभी चैन न आया। वह सारा साल इधर से उधर होती रहती। कभी भी दो-चार महीने से ज्यादा वह ससुराल में नहीं रही। कभी अपनी छोटी बहन के पास दिल्ली, तो कभी बड़ी बहन के पास लखनऊ, तो कभी बड़े भाई के घर याने रायपुर में हमारे यहाँ, तो कभी छोटे भाई यानी चाचा के पास जयपुर। पूरे साल में आधा दिन ससुराल तो आधा दिन बाकी बची दुनिया। बकौल बुआ आधा साल घर और आधा दुनिया।
बुआ जहाँ जहाँ जाती वह ट्रंक भी उनके साथ हो लेता। दो-चार मुश्टंडे कुली मोटे रस्सों से बाँस की काँवड़ पर बाँधकर उसे अपने कंधों पर उठाकर बुआ के पीछे-पीछे चलते। बुआ के आने के साथ ही ट्रंक को घर के भीतर घुसाने और उसे एक साफ-सुथरी बड़ी सी जगह पर रखने की कवायद शुरू हो जाती। जहाँ-जहाँ बुआ जाती, वहाँ-वहाँ के घरों के दरवाजे इतने बड़े कर दिये गये थे कि ट्रंक भीतर आ सके और बुआ की जिद के अनुरूप वह जगह भी तय थी जहाँ उस ट्रंक को रखा जाता। बुआ का ट्रंक उसकी ससुराल की तरह ही था। नजीबाबाद की तरह वह भी खूब लदा-फदा, वजनी और गुरूर से भरा हुआ था। उसकी शान निराली थी। उसका आना कई-कई खुशियों का आना था। वह जहाँ जाता वह जगह जादूलोक में बदल जाती। वह रहस्यमय था, सपनीली चाहतों से भरा रहस्यमय। उसे शायद ही कभी किसी ने खुलते देखा था। वह दुनिया से छिपकर अँधेरे में खुलता और बंद होता। दुनिया जब सो रही होती या खुद में डूबकर मगन होती, बस तभी वह खुलता और अचानक हम पाते कि हमारे बिस्तरों पर तरह-तरह की चीजें एक सिरे से दूसरे सिरे तक रखी हैं - खूबसूरत मालाएँ और मणिक, रत्नजड़ित कंगन, सोने के खूबसूरत कान के बुँदके, बेहद महीन नगों से जड़े नैकलेस, तरह-तरह के जादुई खिलौने, जरीवाले और महँगे तारों से बनी खूबसूरत सिल्क की साड़ियाँ, रंग-बिरंगी किताबें, महँगी क्रॉकरी के सेट, पेंडल और कफलिंग्स, महँगी खुशबुएँ, तरह-तरह की सुंदर घड़ियाँ, रंगीन पेन-पेंसिल, ब्रेसलेट्स... जाने कितना कुछ और हर चीज पर एक पर्ची लगी होती जिस पर घर के किसी सदस्य का नाम लिखा होता। हर एक को पाँच-पाँच, दस-दस। लूट मच जाती। खुशियों का चित्कार होता। बच्चे बिट्टो बुआ से लिपट जाते। माँ उनको गले लगा लेती। पिता मुस्कुराते। लाखों की चीजें बिट्टो बुआ यूँ ही बाँट देती।
इतना सब कुछ बाँटने और उससे हजारों गुना पाने की बात भी बिट्टो बुआ कभी खुश ना होतीं। हर ठाठ के बाद भी अनमनी। हर खुशी के बाद भी बेजार।
बुआ की हर चीज में नुक्स था। हर खूबसूरत और बेशकीमती चीज तमाम कमियों और असंगतताओं से भरी पड़ी थी। बार-बार लोगों के निहारने, छूने, तारीफ करने और विशिष्टता का एहसास दिलाने के बाद भी वे सब चीजें जैसे बरसों से अचीन्ही और तुच्छ रह आयी थीं। इस कमी को पूरा करने बुआ अक्सर कुछ ढूँढ़ती रहती और कभी कुछ मिलता तो उसे उन चीजों की कमियाँ दूर करने के लिए उनमें जोड़ती जातीं। जैसे एक दिन वे सफेद चमकीली सीपियाँ बाजार से ले आईं और उसे एक महँगी साड़ी पर बिखेर कर बताने लगीं कि यह इस पर कितना सुंदर लगता है। सोने के तारों से भी ज्यादा। अगले दिन सोने के तार निकलवा कर सीपियाँ लगवाने के लिए वे वह कपड़ा बाजार में दे आयीं। माँ ने कहा भला सोने के तार निकलवा कर कोई सीपियाँ कढ़वाता है। पिता ने बुरा सा मुँह बनाया। पर बुआ को किसी की बात न जमी। अपनी हर चीज को और बेहतर करने वह अक्सर बाजार में भटकती और मन माफिक चीज ढूँढ़ती। कई बार बेतरह भटकती। अक्सर कोई तुच्छ और रोजमर्रा की चीज ले आती और बहुत खुश होती। उनकी इन हरकतों का हम मजाक बनाते।
बुआ जबर्दस्त जुगाड़ू थीं। हम अक्सर तुच्छ और छोटी चीजों के लिए बुआ को आगे कर देते और वह चहकती, पूरे मनोयोग से उस काम को अंजाम देती। भरी बस में सीट का जुगाड़ करना हो या ठसाठस भरे काउंटर पर फिल्म का टिकिट पाना हो, ऐसे जगहें जहाँ वह अपने जीवन में बहुत कम बार गई थी, चहककर पहुँचती और वह चीज उसकी गिरफ्त में आ जाती। वह बेहद तुच्छ चीजों को बड़े कौतुहल से देखती - देखो भाभी, ऐसी सफेद गोभी देखी है। कितनी झक्क सफेद। ...कभी देखा है, ऐसा सुंदर रंगीन हेयर बैंड...। जो चीज अच्छी लगती उसके लिए वह उतावली हो जाती। उसे लगता कि वह बस किसी तरह धीरे से उस चीज को अपने पास सरका ले। बैग में लाखों रुपयों के बावजूद वह कनखियों से देखकर दुकान से किसी चीज को उठाकर, छिपाकर ले आती। मुझे धीरे-धीरे बड़े होने के साथ यह पता चल गया था कि संसार की हर चीज पैसों से खरीदी जा सकती है। पैसे दो और वह चीज आपकी। चोरी चकारी तो गरीब गुरबे करते हैं। मैं अजीब सी उलझन में था। बुआ तो गरीब नहीं है। फिर चोरी क्यों?
माँ कई बार झल्ला जाती - 'बीवी जी किसी ने अगर कभी पकड़ लिया तो बड़ी हाय होगी। कोई मुँह दिखाने लायक नहीं रहेगा।'
'तो बता भला मैं क्या करूँ। मन हो आता है।'
बुआ चुप्पा होकर कहती। सब खिलखिलाकर हँस देते। बुआ की बात हवा हो जाती।
तो, बुआ के ट्रंक को कभी किसी ने खुलते नहीं देखा था। देखना तो दूर उसके खुलने की आवाज तक नहीं सुनी थी। हमें उस ट्रंक के बारे में ऐसा पता था कि उसमें एक जिन्न है। बड़े दाँत और लंबे नाखूनोंवाला जिन्न, जो काला लबादा ओढ़े रहता है और जिसके पैरों की जगह एक लंबी पूँछ है। वह उड़कर, सरककर, या चलकर कहीं भी, कभी भी पहुँच सकता है। बुआ उस जिन्न से जो माँगती है जिन्न उसे वह सब दे देता है। फिर बुआ उन सब चीजों को बिस्तर पर हमारे लिए सजा देती है। वह जिन्न बुआ का जिन्न है। कोई और उसको देखे तो गप्पा जाये। अपने नाखून उसके पेट में गड़ा दे। अपने दाँत उसकी गर्दन में धँसा दे। बाप रे बाप। रात-बेरात नीचे के कमरों में कहीं कोई खटक या धमक होती तो बिस्तर में लेटे लेटे मेरा कलेजा मुँह को आता। जरूर जिन्न होगा। कभी कोई चीज खड़कती तो मैं रजाई में अपना सिर घुसाकर दुबक जाता। बुआ की साड़ी में ट्रंक की चाबी लटकती रहती। उस चाबी को देखकर अक्सर मैं डर जाता।
तब मैं बहुत छोटा था और किसी ने भी मुझे नहीं बताया था कि बुआ के ससुर लंदन की हार्ले स्ट्रीट की जिस दुकान से वह ट्रंक 1912 में लाये थे, वहीं से कुछ ट्रंक बकिंघम पैलेस और इंग्लैंड में वेल्स स्थित कैनसिंग्टन पैलेस भी गये थे। उन दिनों इंग्लैंड में किसी जॉर्ज पंचम नाम के राजा का राज था। जो ट्रंक कैनसिंग्टन पैलेस गया था वह ठीक बुआ के ट्रंक की तरह ही था। दुनिया से छुपा हुआ। बड़ा और गुरूर से भरा। बेशकीमती सामानों को उगलनेवाला। उसमें भी एक जिन्न था। उस जिन्न की चर्चा पूरे वेल्स में थी। बुआ के जिन्न की तरह वह गुमनाम नहीं था। वेल्स के लोगों के बीच उस जिन्न की कहानियाँ थीं। लोग उसे 'द रॉयल घोस्ट' कहते थे। हार्ले स्ट्रीट की वह दुकान 1951 में बंद हो गई। तब तक हजारों ट्रंक दुनिया के हजारों कोनों में पहुँच चुके थे। सबमें उनकी तरह के जिन्न थे। अपने-अपने रहस्यों, डर और किस्सोंवाले जिन्न। पर 'द रॉयल घोस्ट' के अलावा बाकी सब गुमनाम ही रह आये।
ट्रंक को लेकर बड़ों की उत्सुकता और कहानियाँ अलग तरह की थीं। पिता, बुआएँ और चाचा जब मजाक के मूड में होते तो इस फिराक में रहते कि बिट्टो बुआ एक बार उन्हें वह ट्रंक खोलकर दिखा दें। उन्हें जिन्न के बारे में ठीक-ठीक पता नहीं था। फिर भी एक नंगी उत्सुकता अक्सर उन्हें चहका देती थी। हर कोई एक बार उस ट्रंक को खुलता हुआ देखना चाहता था। एक बार उसमें झाँकना चाहता था। वे सब पिछले 25 सालों से उस ट्रंक और चाबी को देखते आये थे। काँवड़ पर लटककर, मजदूरों के कंधों पर टिका दूर-दूर तक भ्रमण कर आनेवाला और घर के किसी शांत कोने में बड़े शान से टिका ट्रंक अक्सर उन सबको उकसा देता था। जब पिता कहते कि वह ट्रंक लोगों की नजरों से बचकर चुपके से खुलता और बंद होता है तो मैं डरकर माँ से चिपक जाता। मुझे लगता जैसे वह जिन्न मेरी पीठ पर चढ़ आया है और उसने मेरे गाल में अपने नाखून गढ़ा दिये हैं। मैं अक्सर सोचता कि क्या बुआ जादूगरनी हैं? बड़े दाँत और नुकीली टोपीवाली, झाड़ुओं पर बैठकर उड़नेवाली जादूगरनी जो जिन्नों को अपने कंट्रोल में रखती है। मुझे यकीन हो चला था कि बुआ चुड़ैल है। एक छिपी हुई चुड़ैल और वह जिन्न उसका गुलाम है।
बुआ से चाहे कितनी और कैसी भी बात कर लो पर ट्रंक खोलने के नाम पर वह एकदम गोल गाँठ हो जाती। कमर पर लटकी चाबी को मुट्ठी में भींच लेती। बड़े बेहयाई से बहाने बनाती। कहीं चुपचाप सटक लेती। बातों को पलटकर दूसरों को मूर्ख बनाती।
पर उस दिन ऐसा नहीं होना था।
जब सब कुछ शांत हो गया। पिता बाहर जाकर पीछे के दरवाजे से दबे पाँव भीतर आये और निश्चिंत बैठी बुआ की कमर पर जोर का झपट्टा मारा। एक झटके में चाबी पिता की मुट्ठी में आ गयी।
सारे घर में कोहराम मच गया। आगे-आगे हल्ला करते चुहल करते पिता और पीछे दोनों बुआएँ और चाचा। वे उस कमरे की ओर लपके जहाँ ट्रंक रखा था। बच्चे डर गये। जिन्न के भय से डरकर मैं माँ से चिपक गया। छोटी बहन प्रिया सुबकने लगी। मेरे दूसरे सहोदर भाग गये। बिट्टो बुआ चीख पड़ीं। वे दादी से गुहार कर रही थीं कि वे पिता को रोकें। माँ और चाची बिट्टो बुआ को अचरज से घूर रही थीं। बुआ की घुर्राती-सी चीख और घिघियाना पूरे घर में गूँज रहा था। माँ उन्हें कुछ अस्फुट शब्दों में समझा रही थी, पर बुआ पर कोई असर नहीं था। वे दादी से लिपट गयीं। गुहार करने लगीं कि, ट्रंक अगर खुल गया तो कयामत आ जावेगी। दादी बुआ को छाती से लगाये थीं। हतप्रभ और किंकर्तव्यविमूढ़। सारा तमाशा देख छोटे फूफा हँस रहे थे।
पिता, दोनों बुआ और चाचा ने ट्रंकवाले कमरे में घुसकर उसे अंदर से बंद कर लिया। भीतर वे बड़े इत्मिनान से ट्रंक को खोलने लगे। बुआ रुआँसी हो गयी। दादी उन्हें समझाने लगीं। फिर दोनों भीतर के कमरे में चली गयीं। रुआँसी और झल्लाई हुई बुआ बिस्तर पर बेसुध सी होकर उलटी लेट गईं। दादी उनकी पीठ सहलाती रहीं।
बंद कमरे से कोई आवाज नहीं आ रही थी। मैंने सुना था कि जिन्न पहले लोगों को बेहोश करता है। उसके पास खतरनाक धुँआ छोड़ता हुआ रसायन होता है जिसे वह लोगों पर छोड़ देता है। उसके असर से लोग तुरंत बेहोश हो जाते हैं। फिर लोगों की गर्दन में दाँत गड़ाकर वह धीरे-धीरे उनका खून चूसता है। बुआ का जिन्न तो बरसों का भूखा है। निश्चय ही उसने सबका खून पी लिया होगा। मैं डरकर रुआँसा हो गया।
थोड़ी देर बाद 'भड़' से दरवाजा खुला। कमरे की पीली रोशनी आँगन में पसर गई। पहले छोटी बुआ बाहर आईं, मुँह पर अपना हाथ रखे। अवाक् और ठगी हुई। उसके चेहरे का रंग फीका पड़ गया था। पिता बाहर आते ही सर पकड़कर आराम कुर्सी में धम्म से समा गये मानो उन्हें कोई दौरा आया हो। चाचा पैर पटकते और जाने क्या-क्या बुदबुदाते हुए तीर के समान तेजी से हमारे सामने से होकर अपने कमरे में चले गये। बड़ी बुआ भी हड़बड़ाई हुई और अचरज से लबरेज थीं, जैसे एक ही पल में कितना कुछ बता देना चाहती हों पर कुछ सूझ नहीं रहा।
माँ के साथ चिपका-चिपका मैं भी उस कमरे तक पहुँचा। डर के मारे मैंने उँगलियों से अपनी आँखें ढक रखी थीं। फिर अपनी उँगलियों के बीच छोटी सी झिरी बनाकर चारों ओर नजर दौड़ाई। पहले पहल तो मैं सकपका गया। सारा कमरा ऐसा हो रहा था मानो वहाँ कोई तूफान आया हो। हर जगह सामान बिखरा पड़ा था। माँ ने मेरी पीठ पर एक धौल जमाई और खुद से अलग कर दिया - 'चल हट। मर गया तेरा जिन्न।'
मैंने एक तरफ से पूरे कमरे को घूरना शुरू किया। ट्रंक मुँह खोले पड़ा था। बेसुध और लावारिस। लंदनवाला ताला और चाबियाँ फर्श पर गिरी थीं। सारे कमरे में सामान बिखरा हुआ था। बिस्तर पर, स्टूल पर, कुर्सियों पर, मेज पर, कालीन पर... हर जगह।
इनमें से कुछ भी चमकीला, महँगा और हतप्रभ करनेवाला नहीं था। सब तुच्छ और साधारण था। जानी पहचानी चीजें। पिताजी की एक पुरानी अंग्रेजी की किताब 'गोल्डन ट्रेजरी' जिसके सुनहरे पृष्ठों पर खूबसूरत कैलियोग्राफी में वर्डसवर्थ, अलेक्जेंडर पोप, टैनिसन, कॉलरिज, बायरन, कीट्स... आदि की कविताएँ लिखीं थीं और अक्सर मैं बुक शैल्फ से उस किताब को निकाल पर उसके सुनहले पन्नों को छूने की फिराक में रहता था, फर्श पर खुली बेसुध पड़ी थी। वह चिकनी, पुरानी और सपनीली किताब थी। चार साल पहले एक दिन अचानक वह गायब हो गयी थी। पिता परेशान हो उठे थे। मेरे लाख सफाई देने के बाद भी वे यही मानते रहे कि किसी दिन अपने बस्ते में रखकर मैं उसे स्कूल ले गया होऊँगा और वहीं किसी ने मेरे बस्ते से वह किताब निकाल ली होगी।
स्टूल पर काले मोतियोंवाली एक तुच्छ-सी माला थी जो घर की नौकरानी के दुधमुँहे बेटे के गले में होती थी और एक दिन अचानक गुम गई थी। नौकरानी देर तक उस माला को ढूँढ़ती रही थी और जब वह चुपके से गद्दे का कोना उठाकर देखने लगी तो माँ उस पर झल्ला गयी थी - 'तू क्या समझती है, कि हम चोर हैं? तेरी दस रुप्पट्टी की माला चुरायेंगे।' नौकरानी और माँ की खासी बहस हुई थी और फिर नौकरानी पैर पटकते हुए चली गयी थी। मेज पर छोटी बहन के बहुत सारे रंग-बिरंगे रिबन और हेयर बैंड पड़े थे जिनके गायब होने पर उसने कई बार माँ से डाँट खाई थी। फर्श पर काँच के कंचे फैले थे, जो अक्सर गायब हो जाया करते थे और मैं पिता से कुछ पैसे लेकर नये कंचे ले आता था। पर एक दिन पिता ने पैसे देने से इनकार कर दिया था और मैं घर की बालकनी में खड़ा कंचे खेलनेवाले बच्चों को देखकर रुआँसा हो जाता था।
छोटी बुआ के हाथ में प्लास्टिक के सस्ते कंगनों का एक सेट था जो वो बार-बार माँ को दिखा रही थीं - 'देखो भाभी। देखो तो। पालिका के पटरी बाजार से खरीदा था। सिर्फ बीस रुपये में। बताओ भला ...बाप रे।'
कमरे में कितना कुछ बिखरा था जो गायब हो चुका था। कुछ दिन और बीतते तो वह स्मृति से गायब हो जाता।
बिट्टो बुआ बिस्तर पर औंधी लेटी थी और सब उस पर चिल्ला रहे थे -
'माता जी ये चोर है। इसने बच्चों का सामान तक चुराया। छिः।'
'अरे जरूरत थी तो माँग लेती। खरीद लाती।'
'क्या कमी रही है इसको। पैसों में खेलती है फिर भी देखो कैसी नियत है। राम राम।'
'बताओ भला नौकरानी के बच्चे के गले की माला। अरे शर्म भी ना आई तुझे बिट्टो।'
'चोरी। वह भी ऐसी। हे भगवान।'
'हम तो इसे कितना अच्छा समझते थे। कितने-कितने उसूलोंवाली। पर यह तो कुछ और ही है।'
सब बुआ पर गुर्रा रहे थे। तकिये में मुँह धँसाये औंधी लेटी बुआ सुबक रही थी। दादी अचरज में थी उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। क्या कहें। वे बार-बार एक ही बात कह रही थीं कि अब सुबह बात करेंगे।
बिस्तर के किनारे ट्रंक से निकले पेपरों का एक ढेर था जो चाचा के घर से दो साल पहले गायब हुई घड़ी से दबाया गया था। उनमें से कुछ मैं ले आया। मैंने नया नया पढ़ना सीखा था और कागज जिनमें कुछ लिखा होता था, मैं उठा लाता था और इत्मिनान से उनके हिज्जे कर करके पढ़ता था। मुझे कुछ धुँधला याद है जो उन पेपर कटिंगों में लिखा था। अगले दिन सुबह नहाने के बाद दादी के घर की छत पर धूप में बैठकर मैंने थोड़ी कठिनाई और धैर्य के साथ उसे जोर-जोर से पढ़ा था। वे ट्रंक से निकले थे और जिन्न के मरने के बाद भी उनका कौतुहल मेरे पीछे लगा था।
एक टुकड़े पर लिखा था कि भारत के दो बड़े क्रिकेट खिलाड़ी विदेश में एक छोटे और अनाम से रेस्तराँ से दो चम्मच चुराते हुए पकड़े गये थे। वे दोनों करोड़पति थे और नामी भी। एक जगह लिखा था कि चाँदनी चौक के पटरी बाजार से घटिया और सस्ते किस्म के रूमाल चुराते हुए एक औरत को लोगों ने पकड़ लिया था। जब पूछताछ की गयी तो पता चला वह किसी बड़े लखपति अधिकारी की बीवी थी और बेशकीमती कार से वहाँ आई थी। एक खबर बेहद रोचक थी। वह यूँ थी कि भोपाल के बिट्ठल मार्केट की सब्जी-मंडी में सब्जी बेचनेवाले एक अजीब सी बात जानते हैं जिससे वे क्रोधित भी हैं, और अचरज में भी। होता यूँ है कि किसी करोड़पति घर की कोई औरत जो किसी बिजनेसमैन, नेता या अधिकारी की बीवी होती है भरपूर सब्जियाँ खरीदती है पर मौका ताड़कर सब्जी बेचनेवाले की नजरों से बचकर दो-चार आलू, परवल, टमाटर, प्याज या ऐसी ही कोई चीज चुराकर अपने बैग में रख लेती है। वे बड़े घर की औरतें हैं और वे उन पर एकदम से इल्जाम भी नहीं लगा सकते। वे हैरत में हैं। एक खबर यूँ थी कि अमेरिका में कोई जगह है बफैलो। वहाँ के एक पब में एक करोड़पति बिजनेसमैन के लड़के ने महज डेढ़ डॉलर की बीयर की बोतल चुराकर अपनी पेंट में ठूँस ली। पब के मालिक के माँगने पर न तो वह बोतल दे रहा था और ना ही उसके पैसे। जबकि उसके वैलेट में हजारों रुपये थे। उस दिन लगभग एक सी रोचक कहानियों को मैं हिज्जे कर करके पढ़ता रहा था। वे कहानियाँ बरसों से ट्रंक के जिन्न के पास रह आई थीं। वे जिन्न की कहानियाँ थीं।
उन दिनों बहुत से जिन्नों का रहस्य खुल रहा था। बहुत से खत्म हो रहे थे। बहुत से यतीम।
इंग्लैंड के कैनसिंग्टन पैलेस के ट्रंक में रह रहा 'द रॉयल घोस्ट' एक पुराना जिन्न था। कैनसिंग्टन, प्रिंस ऑफ वेल्स का पैलेस है। लोग इस जिन्न को भूलने लगे थे। पर किस्सों और किताबों में रह आया था। उस दिन वेल्स के एक दूरदराज के कस्बे वॉल्टन में एक बूढ़ी औरत अपने पोते को 'द रॉयल घोस्ट' का किस्सा सुना रही थी। वह बच्चा डरकर अपनी माँ से चिपकर सोया था। उसे लगता कि एक दिन अचानक ट्रंक खुल जायेगा। यह सोचकर वह माँ के नाइट गाउन से डरकर चिपक जाता।
अगले दिन मैंने दादी से बतियाती बिट्टो बुआ को सुना था।
'यकीन करो माँ घर जितना भरता है समय उतना ही खाली होता जाता है। इतना खाली, इतना खाली कि उसको भरने के लिए इंसान कुछ भी कर सकता है। चोरी भी। पर यह चोरी नहीं है।'
दादी उसे एकटक घूर रही थी। बिट्टो बुआ दादी का हाथ थामे लगातार कहे जा रही थी।
'कितना खालीपन भरा जा सकता है। बोलो। कितने रंग भर सकते हो। इनका कोई अंत नहीं। एक मिलता है तो हजारों छूट जाते हैं और हजारों मिलते हैं तो लाखों। बाजार में कुछ भी नहीं मिलता। कितना भी पैसा हो मनचाही चीज नहीं खरीदी जा सकती है। मैं कितना भटकती हूँ। तूने तो देखा ही है। रेडियों, बाजारों, पटरियों और सब्जी मंडियों में। बेतरह। वहाँ कभी कुछ नहीं मिला। बेतरह भटककर भी नहीं। पर वह मुझे चाहिए था। ना मिलता तो मैं मर जाती। जब बाजार नहीं देता है तो चोरी करनी पड़ती है।'
दादी अजीब से भाव के साथ बुआ को घूर रही थी। विस्मृत और परेशान। बुआ की आँखों में पानी की एक बूँद उतर आयी थी। उसकी आवाज भर्राने लगी थी।
'मैं हर रोज उस गरीबी को देखती थी जो मेरे घर के लॉकर में करोड़ों रुपयों के नोट और सोना होकर भरी पड़ी थी। कोई कभी मेरे लिए वह सब नहीं लाया जो इतना सस्ता होता कि बिना पैसों के आ जाता। इतना सस्ता जिसकी मुझे जरूरत थी। इतना तुच्छ कि मैं चहक उठती। इतना साधारण कि...।'
'बिट्टो ये तू क्या बोल रही है?'
दादी ने उसके कंधों पर हाथ रखते हुए कहा। बुआ लगातार बोले जा रही थीं।
'मुझे बहुत सी चीजों से महरूम किया गया है माँ। बाजार सिर्फ उन्हीं चीजों से भरे थे जिसकी मुझे कभी दरकार नहीं थी। बाजार बेहद कमीन चीज होता है। वहाँ वह नहीं मिलता जिसे हम खरीदने निकलते हैं। कुछ खरीदने बाजार जाना याने ...याने इससे तकलीफदेह बात कोई और नहीं। फिर भी मैंने नहीं सोचा था, कि एक दिन वह मुझे इस तरह पटक देगा। लगा ही नहीं बाजार जीवन भी खत्म कर सकता है। किसी पैसेवाले का जीवन। मेरा जीवन...।'
दादी ने बुआ का गला और माथा छुआ। बुआ भीगे नेत्रों से दादी को देख रही थी। फिर एक झटके में उसका हाथ अपने गले से हटाकर गरज पड़ी -
'मैं बीमार नहीं हूँ। समझीं तुम। तुम मुझे कभी नहीं समझ सकतीं। कभी नहीं। एक माँ की तरह भी नहीं।'
बुआ झल्लाकर चली गयी।
फिर वह कभी किसी के घर नहीं गई। हर किसी ने उसे ठुकरा दिया। बड़ी और छोटी बुआ उसे चोर मानने लगी। पिता एक लालची खुदगर्ज औरत। चाचा ने उसका चेहरा फिर कभी न देखने की बात कह डाली। वह अपनी ससुराल चली गयी। पूरे समय ससुराल ही रहने लगी। उसका ट्रंक हमेशा के लिए दादी के घर छूट गया। तिक्त और कबाड़ होकर।
चार साल बीत गये।
वॉल्टन के उस बच्चे के लिए 'द रॉयल घोस्ट' अब एक किस्सा भर था। उसकी स्कूल टीचर और सहपाठियों ने बताया था कि वह एक झूठी कहानी है। कि जिन्न-विन्न कुछ नहीं होता। हार्ले स्ट्रीट से खरीदे गये ट्रंकों में कुछ भी नहीं था। वे बस लोहे के बक्से भर थे। उसे कभी पता नहीं चला कि दुनिया के बहुत से हिस्सों में वे बक्से गये थे। एक बक्सा हिंदुस्तान भी आया था। पता चलने का कोई तरीका भी तो नहीं था।
उस दिन सारे टी.वी. चैनलों पर बस वही खबर दिखाई जा रही थी। पिता टकटकी लगाये टी.वी. देख रहे थे। दूरदर्शन से लेकर बीबीसी लंदन तक बस एक ही खबर थी।
पेरिस शहर की एक रोजमर्रा की रोड पोंट-डे-ऐल्मा। एक रोज का तुच्छ दिन। 31 अगस्त 1997। सादा और सस्ता दिन। पटरी बाजारवाली रोड। पर वह साधारण नहीं थी। क्या नहीं था उसके पास? संसार के सबसे बड़े राज परिवार की वह राजकुमारी थी। जहाँ उसके एक इशारे पर सारी दुनिया उसके लिए हाजिर कर दी जाती थी। संसार की सबसे कीमती और खूबसूरत ज्वेलरी और बेशकीमती परिधानों से उसकी अलमारियाँ भरी पड़ी थीं। सब कुछ होते हुए भी अक्सर उसका मन हो आता था कि वह दुनिया की कुछ-कुछ चीजें पा जाये। वह अत्यंत साधारण चीजों के लिए मचल जाती थी। वह सस्ती और घटिया चीजों की दीवानी थी। कुछ लोगों को शक था कि वह एक चोर है। साधारण और तुच्छ चीजों की चोर। यूँ ही निकल जाती थी वह और दुनिया से कुछ रोजमर्रा के धूप से भरे भरे दिन, तारों भरी स्याह रातें, इतने साधारण पल कि उनमें कभी कुछ घटता नहीं था, धूल भरे बेजार रास्ते, बरसों से एक ही जगह टिके होकर उबाऊ हो चुके पहाड़, नदिया और घास के मैदान... और भी जाने कितना कुछ अत्यंत तुच्छ जिसे वह अक्सर दुनिया से चुराती रहती थी। वह कैनसिंग्टन पैलेस में रहती थी। दुनिया से छिपकर वह एक ट्रंक खोलती और बंद करती थी। वह निश्चिंत थी। उसे यकीन था, वह कभी पकड़ी नहीं जायेगी।
पर उस दिन उसकी चोरी पकड़ ली गयी। बहुत से लोगों ने उसे पहचान लिया। वह घबरा गयी। वह चीखी। शायद उसी ने कहा था - 'डोंट डू दिस। प्लीज। फॉर गॉड सेक, प्लीज।' पर किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। वह बहुत तेजी से इस संकट से घबरा कर भाग रही थी। उसकी कार डोलने लगी। जिन लोगों ने उसकी चोरी पकड़ी थी वे उसके पीछे पीछे अपनी कारें दौड़ा रहे थे। बहुत से पैपेराजी कार के बाहर अपनी गर्दन निकालकर उसकी एक फोटो खींच लेना चाहते थे ताकि दुनिया को बताया जा सके कि वह एक चोर है।
वह चीखकर कुछ कहना चाहती थी।
वह क्या कहना चाहती थी?
पेरिस से हजारों मील दूर रायपुर में वह चीख आज भी सुनाई देती है। बचपन के धुर छोर पर दादी के घर की किसी दीवार पर फड़फड़ाती और तार तार होती वह चीख आज भी लौट लौट आती है।
'हर चोरी चोरी तो नहीं है ना माँ। सच माँ मैं बाजार से कभी कुछ खरीद नहीं पाई। पैसों से कहाँ कुछ खरीदा जा सकता है। बाजार मौत है। मौत। यकीन करो माँ बाजार मौत है और चोरी... चोरी जीवन। माँ मैं चोर नहीं। कम से कम तू तो मुझे समझ सकती है ना।'
हर बार दादी उसकी बात सुनते हुए भी अनसुना कर सिर उठाये चली जाती है। वह जार जार रोती है। हर बार दुनिया उससे रुष्ट हो जाती है। हर बार, बार बार वह अकेली छूट जाती है।
एक जोर के धमाके के साथ राजकुमारी की कार दुर्घटनाग्रस्त हो चुकी थी। कई लोग दौड़कर उसकी कार के पास आये थे और उसे चारों ओर से घेरकर लगातार दुर्घटनाग्रस्त कार और मर रही राजकुमारी की फोटो खींच रहे थे। धड़ाधड़ फ्लैश चमक रहे थे। वह मर रही थी। उसका मरना दुनिया के तमाम टी.वी. चैनलों और पेपरों में बिक रहा था। बाजार में उसका मरना करोड़ों डॉलर का आँका गया था।
पिता ने बिट्टो बुआ से कहा था कि वे अब उससे कभी कोई नाता नहीं रखेंगे, क्योंकि वह लालची है। खुदगर्ज और मगरूर भी। चोर तो वो है ही। कि उसने उन्हें और उनके पूरे परिवार को लज्जित किया है। पिछले चार सालों से वे बुआ का भेजा राखी का लिफाफा डस्टबिन में डाल आते थे। घृणा से उस अपनेपन को दुत्कारते रहे थे जिस पर उन्हें कभी नाज था। पर उस दिन जब राजकुमारी डायना की लाश पेरिस की उस अनाम-सी सडक पर से उठाई जा रही थी, उन्हें कुछ हो गया था। टी.वी. देखना छोड़कर, वे बिट्टो बुआ को फोन लगा बैठे थे।
'कितनी बेदर्दी से मैंने बेपर्दा की थीं वे सब चीजें जो तू बड़ी शिद्दत से दुनिया से बटोर लाई थी। मैं ही तो दोषी था ना...।'
पिता का मन भर आया था। टी.वी. पर अब कोई और खबर आ रही थी। पिता बोल रहे थे और बहुत दूर कहीं बुआ सुन रही थी।
'तुझे पता है इस देश में हजारों करोड़पति पैदा हो रहे हैं पर वे जिन चीजों को खरीदने के लिए पैसा इकट्ठा कर रहे हैं वह सब तो बाजार से कब का गायब हो चुका...। कुछ दिन के लिए तो तू आ ही सकती है। तू फिर से वैसा नहीं कर सकती आधा साल घर और आधा साल दुनिया। तेरी बड़ी याद आती है रे।'
बिट्टो बुआ फिर कभी नहीं आयीं। कहते हैं दुनिया में कहीं जाने का सोचकर वह डर जाती थी। वह फिर आ नहीं पाई।
इंग्लैंड को एक नई राजकुमारी मिल गयी। नई प्रिंसेस ऑफ वेल्स। कैनसिंग्टन पैलेस फिर से नई राजकुमारी के लिए बिछ गया। नई राजकुमारी को नहीं पता था कि महल के एक अंदरूनी अँधेरे हिस्से में एक ट्रंक है जिसमें 'द रॉयल घोस्ट' रहता है। ट्रंक की एक चाबी है, जिसे दुनिया से बचाकर उसे अपने पास रखना होगा। कुछ इस तरह कि वह कभी किसी के हाथ ना आये। अपनों के हाथ भी नहीं। उनके भी नहीं जिन्हें वह बेतरह प्यार करती है।
वॉल्टन का वह बच्चा अब वयस्क है। उसे खुद पर शर्म आती है, कि उसने कितने दिनों तक तो 'द रायल घोस्ट' को सच जाना था। ...अस्पतालों और प्रायवेट क्लीनिकों से अटी पड़ी लंदन की हार्ले स्ट्रीट को देखकर यह मानना कितना मुश्किल है, कि यहाँ कभी कोई लोहे के ट्रंक बेचनेवाली दुकान थी, जिसके ट्रंक सारी दुनिया में खरीदे गये, जो दुनिया के बहुत से कोनों में आज भी रखे हैं। हार्ले स्ट्रीट में वह अब उसके बचपन के किस्से की तरह है। दुकान नहीं बस किस्सा। बाजार नहीं, बस शर्म। वहाँ अब ट्रंक बेचनेवाली कोई दुकान नहीं हो सकती है। यह कितनी बेतुकी और बौड़म सी बात है, कि यहाँ अब ऐसी कोई दुकान हो। दुकान में ट्रंक हो। ट्रंक में एक साथ पलते हों, सपने और जिन्न। जो खरीदने को ना हो वह भला हार्ले स्ट्रीट में क्योंकर होगा ...उसने सोचा।
---तरुण भटनागर---
रविवार, 11 अगस्त 2013
मेरा दुश्मन
वह इस समय दूसरे कमरे में बेहोश पड़ा है। आज मैंने उसकी शराब में कोई चीज मिला दी थी कि खाली शराब वह शरबत की तरह गट-गट पी जाता है और उस पर कोई खास असर नहीं होता। आँखों में लाल डोर-से झूलने लगते हैं, माथे की शिकनें पसीने में भीग कर दमक उठती हैं, होंठों का जहर और उजागर हो जाता है, और बस - होशोहवास बदस्तूर कायम रहते हैं।
हैरान हूँ कि यह तरकीब मुझे पहले कभी क्यों नहीं सूझी। शायद सूझी भी हो, और मैंने कुछ सोच कर इसे दबा दिया हो। मैं हमेशा कुछ-न-कुछ सोच कर कई बातों को दबा जाता हूँ। आज भी मुझे अंदेशा तो था कि वह पहले ही घूँट में जायका पहचान कर मेरी चोरी पकड़ लेगा। लेकिन गिलास खत्म होते-होते उसकी आँखें बुझने लगी थीं और मेरा हौसला बढ़ गया था। जी में आया था कि उसी क्षण उसकी गरदन मरोड़ दूँ, लेकिन फिर नतीजों की कल्पना से दिल दहल कर रह गया था। मैं समझता हूँ कि हर बुजदिल आदमी की कल्पना बहुत तेज होती है, हमेशा उसे हर खतरे से बचा ले जाती है। फिर भी हिम्मत बाँध कर मैंने एक बार सीधे उसकी ओर देखा जरूर था। इतना भी क्या कम है कि साधारण हालात में मेरी निगाहें सहमी हुई-सी उसके सामने इधर-उधर फड़फड़ाती रहती हैं। साधारण हालात में मेरी स्थिति उसके सामने बहुत असाधारण रहती है।
खैर, अब उसकी आँखें बंद हो चुकी थीं और सर झूल रहा था। एक ओर लुढ़क कर गिर जाने से पहले उसकी बाँहें दो लदी हुई ढीली टहनियों की सुस्त-सी उठान के साथ मेरी ओर उठ आई थीं। उसे इस तरह लाचार देख कर भ्रम हुआ था कि वह दम तोड़ रहा है।
लेकिन मैं जानता हूँ कि वह मूजी किसी भी क्षण उछल कर खड़ा हो सकता है। होश सँभालने पर वह कुछ कहेगा नहीं। उसकी ताकत उसकी खामोशी में है। बातें वह उस जमाने में भी बहुत कम किया करता था, लेकिन अब तो जैसे बिलकुल गूँगा हो गया हो।
उसकी गूँगी अवहेलना की कल्पना-मात्र से मुझे दहशत हो रही है। कहा न, कि मैं एक बुजदिल इंसान हूँ।
वैसे मैं न जाने कैसे समझ बैठा था कि इतने अर्से की अलहदगी के बाद अब मैं उसके आतंक से पूरी तरह आजाद हो चुका हूँ। इसी खुशफहमी में शायद उस रोज उसे मैं अपने साथ ले आया था। शायद मन में कहीं उस पर रोब गाँठने, उसे नीचा दिखाने की दुराशा भी रही हो। हो सकता है कि मैंने सोचा हो कि वह मेरी जीती-जागती खूबसूरत बीवी, चहकते-मटकते तंदुरुस्त बच्चों और आरास्ता-पैरास्ता अलीशान कोठी को देख कर खुद ही मैदान छोड़ कर भाग जाएगा और हमेशा के लिए मुझे उससे निजात मिल जाएगी। शायद मैं उस पर यह साबित कर दिखाना चाहता था कि उससे पीछा छुड़ा लेने के बाद किस खुशगवार हद तक मैंने अपनी जिंदगी को सँभाल-सँवार लिया है।
लेकिन ये सब लँगड़े बहाने हैं। हकीकत शायद यह है कि उस रोज मैं उसे अपने साथ नहीं लाया था, बल्कि वह खुद ही मेरे साथ चला आया था, जैसे मैं उसे नहीं बल्कि वह मुझे नीचा दिखाना चाहता हो। जाहिर है कि उस समय यह बारीक बात मेरी समझ में नहीं आई होगी। मौके पर ठीक बात मैं कभी नहीं सोच पाता। यही तो मुसीबत है। वैसे मुसीबतें और भी बहुत हैं, लेकिन उन सबका जिक्र यहाँ बेकार होगा।
खैर, माला के सामने उस रोज मैंने इसी किस्म की कोई लँगड़ी सफाई पेश करने की कोशिश की थी और उस पर कोई असर नहीं हुआ था। वह उसे देखते ही बिफर उठी थी। सबसे पहले अपनी बेवकूफी और सारी स्थिति का एहसास शायद मुझे उसी क्षण हुआ था। मुझे उस कमबख्त से वहीं घर से दूर, उस सड़क के किनारे किसी-न-किसी तरह निबट लेना चाहिए था। अगर अपनी उस सहमी हुई खामोशी को तोड़ कर मैंने अपनी तमाम मजबूरियाँ उसके सामने रख दी होतीं, माला का एक खाका-सा खींच दिया होता, साफ-साफ उससे कह दिया होता - देखो गुरु, मुझ पर दया करो और मेरा पीछा छोड़ दो - तो शायद वहीं हम किसी समझौते पर पहुँच जाते। और नहीं तो वह मुझे कुछ मोहलत तो दे ही देता। छूटते ही दो मोरचों को एक साथ सँभालने की दिक्कत तो पेश न आती। कुछ भी हो, मुझे अपने घर नहीं लाना चाहिए था। लेकिन अब यह सारी समझदारी बेकार थी। माला और वह एक-दूसरे को यूँ घूर रहे थे जैसे दो पुराने और जानी दुश्मन हों। एक क्षण के लिए मैं यह सोच कर आश्वस्त हुआ था कि माला सारी स्थिति खुद सँभाल लेगी और फिर दूसरे ही क्षण मैं माला की लानत-मुलामत की कल्पना कर सहम गया था। बात को मजाक में घोल देने की कोशिश में मैंने एक खास गिलगिले लहजे में - जो मेरे पास ऐसे नाजुक मौकों के लिए सुरक्षित रहता है - कहा था, डार्लिंग, जरा रास्ता तो छोड़ो, कि हम बहुत लंबी सैर से लौटे हैं, जरा बैठ जाएँ तो जो सजा जी में आए, दे देना।
वह रास्ते से तो हट गई थी, लेकिन उसके तनाव में कोई कमी नहीं हुई थी, और न ही उसने मुझे बैठने दिया था। साथ ही उस मुरदार ने मेरी तरफ यूँ देखा था जैसे कह रहा हो - तो तुम वाकई इस औरत के गुलाम बन कर रह गए हो। और खुद मैं उन दोनों की तरफ यूँ देख रहा था जैसे एक की नजर बचा कर दूसरे से कोई साजिशी संबंध पैदा कर लेने की ख्वाहिश हो।
फिर माला ने मौका पाते ही मुझे अलग ले जा कर डाँटना-डपटना शुरू कर दिया था - मैं पूछती हूँ कि यह तुम किस आवारागर्द को पकड़ कर साथ ले आए हो? जरूर कोई तुम्हारा पुराना दोस्त होगा? है न? इत्ते बरस शादी को हो चले लेकिन तुम अभी तक वैसे-के-वैसे ही रहे। मेरे बच्चे उसे देख कर क्या कहेंगे? पड़ोसी क्या सेाचेंगे? अब कुछ बोलोगे भी?
मैं हैरान था कि क्या बोलूँ! माला के सामने में बोलता कम हूँ, ज्यादा समय तोलने में ही बीत जाता है और उसका मिजाज और बिगड़ जाता है। वैसे उसका गुस्सा वजा था। उसका गुस्सा हमेशा वजा होता है। हमारी कामयाब शादी की बुनियाद भी इसी पर कायम है - उसकी हर बात हमेशा सही होती है और मैं अपनी हर गलती को चुपचाप और फौरन कबूल कर लेता हूँ। बीच-बीच में महज मुझे खुश कर देने के खयाल से वह इस किस्म की शिकायतें जरूर कर दिया करती है - तुम्हें न जाने हर मामूली-से-मामूली बात पर मेरे खिलाफ डट जाने में क्या मजा आता है? मानती हूँ कि तुम मुझसे कहीं ज्यादा समझदार हो, लेकिन कभी-कभी मेरी बात रखने के लिए ही सही... वगैर-वगैरा।
मुझे उसके ये झूठे उलाहने बहुत पसंद हैं, गो मैं उनसे ज्यादा खुश नहीं हो पाता। फिर भी वह समझती है कि इनसे मेरा भ्रम बना रहता है और मैं जानता हूँ कि बागडोर उसी के हाथ में रहती है और यह ठीक ही है।
तो माला दाँत पीस कर कह रही थी - अब कुछ बोलोगे भी? मेरे बच्चे पार्क से लौट कर इस मनहूस आदमी को बैठक में बैठा देखेंगे, तो क्या कहेंगे? उन पर क्या असर होगा? उफ, इतना गंदा आदमी! सारा घर महक रहा है। बताओ न, मैं अपने बच्चों से क्या कहूँगी?
अब जाहिर है कि माला को कुछ भी नहीं बता सकता था। सो मैं सर झुकाए खड़ा रहा और वह मुँह उठाए बहुत देर तक बरसती रही।
वैसे यहाँ यह साफ कर दूँ कि वे बच्चे माला अपने साथ नहीं लाई थी। वे मेरे भी उतने ही हैं जितने कि उसके, लेकिन ऐसे मौकों पर वह हमेशा 'मेरे बच्चे' कह कर मुझसे उन्हें यूँ अलग कर लिया करती है, जैसे कोई कीचड़ से लाल निकाल रहा हो। कभी-कभी मुझे इस बात पर बहुत दुख भी होता था, लेकिन फिर ठंडे दिल से सोचने पर महसूस होता है कि शारीरिक सचाई कुछ भी हो, रूहानी तौर पर हमारे सभी बच्चे माला के ही है, उनके रंग-ढंग में मेरा हिस्सा बहुत कम है। और यह ठीक ही है, क्योंकि अगर वे मुझ पर जाते तो उन्हें भी मेरी तरह सीधा होने में न जाने कितनी देर लग जाती। मैं खुश हूँ कि उनका कानूनी और शायद जिस्मानी, बाप हूँ, उनके लिए पैसे कमाता हूँ, और दिलोजान से उनकी माँ की सेवा में दिन-रात जुटा रहता हूँ।
खैर! कुछ देर यूँ ही सर नीचा किए खड़े रहने के बाद आखिर मैंने निहायत आजिजाना आवाज में कहना शुरू किया था - अरे भई, मैं तो उस कमबख्त को ठीक तरह से पहचानता भी नहीं, उससे दोस्ती का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। अब अगर रास्ते में कोई आदमी मिल जाए तो...।
न जाने मेरे फिकरे का अंत क्योंकर होता। शायद होता भी कि नहीं, लेकिन माला ने बीच में ही पाँव पटक कर कह दिया - झूठ, सरासर झूठ।
यह कह कर वह अंदर चली गई और मैं कुछ देर तक और वहीं सर नीचा किए खड़ा रहने के बाद वापस उस कमरे में लौट आया, जहाँ बैठा वह बीड़ी पी रहा था और मुस्करा रहा था, जैसे सब जानता हो कि मैं किस मरहले से गुजर कर आ रहा हूँ।
अब हुआ दरअसल यह था कि उस शाम माला से, कुछ दूर अकेला घूम आने की इजाजत माँग कर मैं यूँ ही बिना मतलब घर से बाहर निकल गया था। आम तौर पर वह ऐसी इजाजतें आसानी से नहीं देती और न ही मैं माँगने की हिम्मत कर पाता हूँ। बिना मतलब घूमना उसे बहुत बुरा लगता है। कहीं भी जाना हो, किसी से भी मिलना हो, कुछ भी करना या न करना हो, मतलब का साफ और सही फैसला वह पहले से ही कर लेती है। ठीक ही करती है। मैं उसकी समझदारी की दाद देता हूँ। वैसे घर से दूर अकेला मैं किसी मतलब से भी नहीं आ पाता। माला की सोहबत की कुछ ऐसी आदत-सी पड़ गई है, कि उसके बगैर सब सूना-सूना-सा लगता है। जब वह साथ रहती है तो किसी किस्म का कोई ऊल-जलूल विचार मन में उठ ही नहीं पाता, हर चीज ठोस और बामतलब दिखाई देती है। अंदर की हालत ऐसी रहती है, जैसे माला के हाथों सजाया हुआ कोई कमरा हो, जिसमें हर चीज करीने से पड़ी हो, बेकायदगी की कोई गुंजाइश न हो। और जब वह साथ नहीं होती, तो वही होता है जो उस शाम हुआ, या फिर उसी किस्म का कोई और हादसा, क्योंकि उससे पहले वैसी बात कभी नहीं हुई थी।
तो उस शाम न जाने किस धुन में मैं बहुत देर निकल गया था। आम तौर पर घर से दूर होने पर भी मैं घर ही के बारे में सोचता रहता हूँ - इसलिए नहीं कि घर में किसी किस्म की कोई परेशानी है। गाड़ी न सिर्फ चल रही है, बल्कि खूब चल रही है। बागडोर जब माला-जैसी औरत के हाथ हो, तो चलेगी नहीं तो और करेगी भी क्या? नहीं, घर में कोई परेशानी नहीं - अच्छी तनख्वाह, अच्छी बीवी, अच्छे बच्चे, अच्छे बा-रसूख दोस्त, उनकी बीवियाँ भी खूब हट्टी-कट्टी और अच्छी, अच्छा सरकारी मकान, अच्छा खुशनुमा लॉन, पास-पड़ोस भी अच्छा, महँगाई के बावजूद दोनों वक्त अच्छा खाना, अच्छा बिस्तर और अच्छी बिस्तरी जिंदगी। मैं पूछता हूँ, इस सबके अलावा और चाहिए भी क्या एक अच्छे इंसान को? फिर भी अकेला होने पर घरेलू मामलों को बार-बार उलट-पलट कर देखने से वैसा ही इत्मीनान मिलता है, जैसा किसी भी सेहतमंद आदमी को बार-बार आईने में अपनी सूरत देख कर मिलता होगा। मेरा मतलब है कि वक्त अच्छी तरह से कट जाता है, ऊब नहीं होती। यह भी माला के ही सुप्रभाव का फल है, नहीं तो एक जमाना था कि मैं हरदम ऊब का शिकार रहा करता था।
हो सकता है कि उस शाम दिमाग कुछ देर के लिए उसी गुजरे हुए जमाने की ओर भटक गया हो। कुछ भी हो, मैं घर से बहुत दूर निकल गया था और फिर अचानक वह मेरे सामने आ खड़ा हुआ था।
महसूस हुआ था जैसे मुझे अकेला देख कर घात में बैठे हुए किसी खतरनाक अजनबी ने ही रास्ता रोक लेना चाहा हो। मैं ठिठक कर रुक गया था। उसकी सुती हुई आँखों से फिसल कर मेरी निगाह उसकी मुस्कराहट पर जा टिकी थी, जहाँ अब मुझे उसके साथ बिताए हुए उस सारे गर्द-आलूद जमाने की एक टिमटिमाती हुई-सी झलक दिखाई दे रही थी। महसूस हो रहा था कि बरसों तक रूपोश रहने के बाद फिर मुझे पकड़ कर किसी के सामने पेश कर दिया गया हो। मेरा सर इस पेशी के खयाल से दब कर झुक गया था।
कुछ, या शायद कितनी ही देर हम सड़क के उस नंगे और आवारा अँधेरे में एक-दूसरे के रूबरू खड़े रहे थे। अगर कोई तीसरा उस समय देख रहा होता, तो शायद समझता कि हम किसी लाश के सिरहाने खड़े कोई प्रार्थना कर रहे हैं, या एक-दूसरे पर झपट पड़ने से पहले किसी मंत्र का जाप।
वैसे यह सच है कि उसे पहचानते ही मैंने माला को याद करना शुरू कर दिया था, कि हर संकट में मैं हमेशा उसी का नाम लेता हूँ। साथ ही यहाँ से दुम दबा कर भाग उठने की ख्वाहिश भी मन में उठती रही थी। एक उड़ती हुई-सी तमन्ना यह भी हुई थी कि वापस घर लौटने के बजाय चुपचाप उस कमबख्त के साथ हो लूँ, जहाँ वह ले जाना चाहे चला जाऊँ और माला को खबर तक न हो। इस विचार पर तब भी मैं बहुत चौंका था और अभी तक हैरान हूँ, क्योंकि आखिर उसी से पीछा छुड़ाने के लिए ही तो मैंने माला की गोद में पनाह ली थी। अगर आज से कुछ बरस पहले मैंने उसके खिलाफ बगावत न की होती तो। लेकिन उस भागने को बगावत का नाम दे कर मैं अपने-आपको धोखा दे रहा हूँ, मैंने सोचा था और मेरा मुँह शर्म के मारे जल उठा था।
उस हरामजादे ने जरूर मेरी सारी परेशानी को भाँप लिया होगा। उससे मेरी कोई कमजोरी छिपी नहीं और उससे भाग कर माला की गोद में पनाह लेने की एक बड़ी वजह यही थी। उसकी हँसी मुझे सूखे पत्तों की हैबतनाक खड़खड़ाहट सुनाई दे रही थी और उस खड़खडाहाट में उसके साए में गुजारे हुए जमाने की बेशुमार बातें आपस में टकरा रही थीं। बड़ी ही मुश्किल से आँख उठा कर उसकी ओर देख था। उसका हाथ मेरी तरफ बढ़ा हुआ था। कसे हुए दाँतों से मैंने उसकी आँखों का सामना किया था। अपना हाथ उसके खुरदरे हाथ में देते हुए और उसकी साँसों की बदबूदार हरारत अपने चेहरे पर झेलते हुए मैंने महसूस किया था जैसे इतनी मुद्दत आजाद रह लेने के बाद फिर अपने-आपको उसके हवाले कर दिया हो। अजीब बात है, एहसास से जितनी तकलीफ मुझे होनी चाहिए थी, उतनी हुई नहीं थी। शायद हर भगोड़ा मुजरिम दिल से यही चाहता है कि उसे कोई पकड़ ले।
घर पहुँचने तक कोई बात नहीं हुई थी। अपनी-अपनी खामोशी में लिपटे हुए हम धीमे-धीमे चल रहे थे, जैसे कंधों पर कोई लाश उठाए हुए हों।
सो, जब माला की डाँट-डपट सुन लेने के बाद, मुँह बनाए, मैं वापस बैठक में लौटा, तो वह बदजात मजे में बैठा बीड़ी पी रहा था। एक क्षण के लिए भ्रम हुआ, जैसे वह कमरा उसी का हो। फिर कुछ सँभल कर, उससे नजर मिलाए बगैर, मैंने कमरे की सारी खिड़कियाँ खोल दीं, पंखे को और तेज कर दिया, एक झुँझलाई हुई ठोकर से उसके जूतों को सोफे के नीचे धकेल दिया, रेडियो चलाना ही चाहता था कि उसकी फटी हुई हँसी सुनाई दी और मैं बेबस हो, उससे दूर हट कर चुपचाप बैठ गया।
जी में आया कि हाथ बाँध कर उसके सामने खड़ा हो जाऊँ, सारी हकीकत सुना कर कह दूँ - देखो दोस्त, अब मेरे हाल पर रहम करो और माला के आने से पहले चुपचाप यहाँ से चले जाओ, वरना नतीजा बुरा होगा।
लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं। कहा भी होता तो सिवाय एक और जहरीली हँसी के उसने मेरी अपील का कोई जवाब न दिया होता। वह बहुत जालिम है, हर बात की तह तक पहुँचने का कायल, और भावुकता से उसे सख्त नफरत है।
उसे कमरे का जायजा लेते देख मैंने दबी निगाह से उसकी ओर देखना शुरू कर दिया। टाँगे समेटे वह सोफे पर बैठा हुआ एक जानवर-सा दिखाई दिया। उसकी हालत बहुत खस्ता दिखाई दी, लेकिन उसकी शक्ल अब भी मुझसे कुछ-कुछ मिलती थी। इस विचार से मुझे कोफ्त भी हुई और एक अजीब किस्म की खुशी भी महसूस हुई। एक जमाना था जब वही एक मात्र मेरा आदर्श हुआ करता था, जब हम दोनों घंटों एक साथ घूमा करते थे, जब हमने बार-बार कई नौकरियों से एक साथ इस्तीफे दिए थे, कुछ-एक से एक साथ निकाले भी गए थे, जब हम अपने-आपको उन तमाम लोगों से बेहतर और ऊँचा समझते थे जो पिटी-पिटाई लकीरों पर चलते हुए अपनी सारी जिंदगी एक बदनुमा और रवायती घरौंदे की तामीर में बरबाद कर देते हैं, जिनके दिमाग हमेशा उस घरौंदे की चहारदीवारी में कैद रहते है, जिनके दिल सिर्फ अपने बच्चों की किलकारियों पर ही झूमते हैं, जिनकी बेवकूफ बीवियाँ दिन-रात उन्हें तिगनी का नाच नचाती हैं, और जिन्हें अपनी सफेदपोशी के अलावा और किसी बात का कोई गम नहीं होता। कुछ देर मैं उस जमाने की याद में डूबा रहा। महसूस हुआ, जैसे वह फिर उसी दुनिया से एक पैगाम लाया हो, फिर मुझे उन्हीं रोमानी वीरानों में भटका देने की कोशिश करना चाहता हो, जिनसे भाग कर मैने अपने लिए एक फूलों की सेज सँवार ली है, और जहाँ मैं बहुत सुखी हूँ।
वह मुस्करा रहा था, जैसे उसने मेरे अंदर झाँक लिया हो। उसे इस तरह आसानी से अपने ऊपर काबिज होते देख, मैंने बात बदलने के लिए कहा - कितने रोज यहाँ ठहरोगे?
उसकी हँसी से एक बार फिर हमारे घर की सजी-सँवारी फि़जा दहक गई, और मुझे खतरा हुआ कि माला उसी दम वहाँ पहुँच कर उसका मुँह नोच लेगी। लेकिन यह खतरा इस बात का गवाह है कि इतने बरसों की दासता के बावजूद मैं अभी तक माला को पहचान नहीं पाया। थोड़ी ही देर में वह एक बहुत खूबसूरत साड़ी पहने मुस्कराती-इठलाती हुई हमारे सामने आ खड़ी हुई। हाथ जोड़ कर बड़े दिलफरेब अंदाज में नमस्कार करती हुई बोली, 'आप बहुत थके हुए दिखाई देते हैं, मैंने गरम पानी रखवा दिया है, आप 'वाश' कर लें, तो कुछ पी कर ताजादम हो जाएँ। खाना तो हम लोग देर से ही खाएँगे।'
मैं बहुत खुश हुआ। अब मामला माला ने अपने हाथ में ले लिया था और मैं यूँ ही परेशान हो रहा था। मन हुआ कि उठ कर माला को चूम लूँ, मैंने कनखियों से उस हरामजादे की तरफ देखा। वह वाकई सहमा हुआ-सा दिखाई दिया। मैंने सोचा, अब अगर वह खुद-ब-खुद ही न भाग उठा तो मैं समझूँगा कि माला की सारी समझ-सीख और रंग-रूप बेकार है। कितना लुत्फ आए अगर वह कमबख्त भी भाग खड़ा होने के बजाय माला के दाँव में फँस जाए और फिर मैं उससे पूछूँ - अब बता, साले, अब बात समझ में आई? मैंने आँखें बंद कर लीं और उसे माला के इर्द-गिर्द नचाते हुए, उस पर फिदा होते हुए, उसके साथ लेटे हुए देखा। एक अजीब राहत का एहसास हुआ। आँखें खोलीं तो वह गुसलखाने में जा चुका था और माला झुकी हुई सोफे को ठीक कर रही थी। मैंने उसकी आँखों में आँखें डाल कर मुस्कराने की कोशिश की, लेकिन फिर उसकी तनी हुई सूरत से घबरा कर नजरें झुका लीं। जाहिर था कि उसने अभी मुझे माफ नहीं किया था।
नहा कर वह बाहर निकला, तो उसने मेरे कपड़े पहने हुए थे। इस बीच माला ने बीअर निकाल ली थी और उसका गिलास भरते हुए पूछ रही थी - 'आप खाने में मिर्च कम लेते हैं या ज्यादा?' मैंने बहुत मुश्किल से हँसी पर काबू किया - उस साले को तो खाना ही कब मिलता होता, मैं सोच रहा था और माला की होशियारी पर खुश हो रहा था।
कुछ देर हम बैठे पीते रहे, माला उससे घुल-मिल कर बातें करती रही, उससे छोटे-छोटे सवाल पूछती रही - आपको यह शहर कैसा लगा? बीअर ठंडी तो है न? आप अपना सामान कहाँ छोड़ आए? - और वह बगलें झाँकता रहा। हमारे बच्चों ने आ कर अपने 'अंकल' को ग्रीट किया, बारी-बारी उसके घुटनों पर बैठ कर अपना नाम वगैरा बताया, एक-दो गाने गाए और फिर 'गुड नाइट' कह कर अपने कमरे में चले गए। माला की मीठी बातों से यूँ लग रहा था जैसे हमारे अपने ही हलके का कोई बेतकल्लुफ दोस्त कुछ दिनों के लिए हमारे पास आ ठहरा हो, और उसकी बड़ी-सी गाड़ी हमारे दरवाजे़ के सामने खड़ी हो।
मैं बहुत खुश था और जब माला खाना लगवाने के लिए बाहर गई, तो उस शाम पहली बार मैंने बेधड़क उस कमीने की तरफ देखा। वह तीन-चार गिलास बीअर के पी चुका था और उसके चेहरे की जर्दी कुछ कम हो चुकी थी। लेकिन उसकी मुस्कराहट में माला के बाहर जाते ही फिर वही जहर और चैलेंज आ गया था और मुझे महसूस हुआ जैसे वह कह रहा हो - बीवी तुम्हारी मुझे पसंद है, लेकिन बेटे! उसे खबरदार कर दो, मैं इतना पिलपिला नहीं जितना वह समझती है।
एक क्षण के लिए फिर मेरा जोश कुछ ढीला पड़ गया। लगा जैसे बात इतनी आसानी से सुलझनेवाली नहीं। याद आया कि खूबसूरत और शोख औरतें उस जमाने में भी उसे बहुत पसंद थीं, लेकिन उनका जादू ज्यादा देर तक नहीं चलता था। फिर भी, मैंने सोचा, बात अब मेरे हाथ से निकल गई है और सिवाय इंतजार के मैं और कुछ नहीं कर सकता था।
खाना उस रोज बहुत उम्दा बना था और खाने के बाद माला खुद उसे उसके कमरे तक छोड़ने गई थी। लेकिन उस रात मेरे साथ माला ने कोई बात नहीं की। मैंने कई मजाक किए, कहा - नहा-धो कर वह काफी अच्छा लग रहा था, क्यों? बहुत छेड़-छाड़ की, कई कोशिशें कीं कि सुलहनामा हो जाए, लेकिन उसने मुझे अपने पास फटकने नहीं दिया। नींद उस रात मुझे नहीं आई, फिर भी अंदर से मुझे इत्मीनान था कि किसी-न-किसी तरह माला दूसरे रोज उसे भगा सकने में जरूर कामयाब हो जाएगी।
लेकिन मेरा अंदाजा गलत निकला। माना कि माला बहुत चालाक है, बहुत समझदार है, बहुत मनमोहिनी है, लेकिन उस हरामजादे की ढिठाई का भी कोई मुकाबला नहीं। तीन दिन तक माला उसकी खातिर-तबाजा करती रही। मेरे कपड़ों में वह अब बिलकुल मुझ जैसा हो गया था और नजर यूँ आता था जैसे माला के दो पति हों। मैं तो सुबह-सबेरे गाड़ी ले कर दफ्तर को निकल जाता था, पीछे उन दोनों में न जाने क्या बातें होती थीं। लेकिन जब कभी उसे मौका मिलता वह मुझे अंदर ले जा कर डाँटने लगती -अब यह मुरदार यहाँ से निकलेगा भी कि नहीं। जब तक यह घर में है, हम किसी को न तो बुला सकते हैं, न किसी के यहाँ जा सकते हैं। मेरे बच्चे कहते हैं कि इसे बात करने तक की तमीज नहीं। आखिर यह चाहता क्या है?
मैं उसे क्या बताता कि वह क्या चाहता है? कभी कहता - थोड़ा सब्र और करो अब जाने की सोच रहा होगा। कभी कहता - क्या बताऊँ, मैं तो खु़द शर्मिंदा हूँ। कभी कहता - तुमने खु़द ही तो सर पर चढ़ा लिया है। अगर तुम्हारा बर्ताव रूखा होता तो...
माला ने अपना बर्ताव तो नहीं बदला, लेकिन चौथे रोज अपने बच्चों-सहित घर छोड़ कर अपने भाई के यहाँ चली गई। मैंने बहुतेरा रोका, लेकिन वह नहीं मानी। उस रोज वह कमबख्त बहुत हँसा था, जोर-जोर से, बार-बार।
आज माला को गए पाँच रोज हो गए हैं। मैंने दफ्तर जाना छोड़ दिया है। वह फिर अपने असली रंग में आ गया है। मेरे कपड़े उतार कर उसने फिर अपना वह मैला-सा कुर्ता-पायजामा पहन लिया है। कहता कुछ नहीं, लेकिन मैं जानता हूँ कि क्या चाहता है - वह मौका फिर हाथ नहीं आएगा! वह चली गई है। बेहतर यही है कि उसके लौटने से पहले तुम भी यहाँ से भाग चलो। उसकी चिंता मत करो, वह अपना इंतजाम खुद कर लेगी।
और आज आखिर मैं उसे थोड़ी देर के लिए बेहोश कर देने में कामयाब हो गया हूँ। अब मेरे सामने दो रास्ते हैं। एक यह कि होश आने से पहले मैं उसे जान से मार डालूँ। और दूसरा यह कि अपना जरूरी सामान बाँध कर तैयार हो जाऊँ और ज्यूँ ही उसे होश आए, हम दोनों फिर उसी रास्ते पर चल दें, जिससे भाग कर कुछ बरस पहले मैंने माला की गोद में पनाह ली थी। अगर माला इस समय यहाँ होती तो कोई तीसरा रास्ता भी निकाल लेती। लेकिन वह नहीं है और मैं नहीं जानता कि मैं क्या करूँ?
---कृष्ण बलदेव वैद---
चिकित्सा का चक्कर
मैं बिलकुल हट्टा-कट्टा हूँ। देखने में मुझे कोई भला आदमी रोगी नहीं कह सकता। पर मेरी कहानी किसी भारतीय विधवा से कम करुण नहीं है, यद्यपि मैं विधुर नहीं हूँ। मेरी आयु लगभग पैंतीस साल की है। आज तक कभी बीमार नहीं पड़ा था। लोगों को बीमार देखता था तो मुझे बड़ी इच्छा होती थी कि किसी दिन मैं भी बीमार पड़ता तो अच्छा होता। यह तो न था कि मेरे बीमार होने पर भी दिन में दो बार बुलेटिन निकलते। पर इतना अवश्य था कि मेरे लिए बीमार पड़ने पर हंटले पामर के बिसकुट - जिन्हें साधारण अवस्था में घरवाले खाने नहीं देते - दवा की बात और है - खाने को मिलते। 'यू.डी. कलोन' की शीशियाँ सिर पर कोमल करों से बीवी उड़ेल कर मलती और सबसे बड़ी इच्छा तो यह थी कि दोस्त लोग आकर मेरे सामने बैठते और गंभीर मुद्रा धारण करके पूछते, कहिए किस की दवा हो रही है? कुछ फायदा है? जब कोई इस प्रकार से रोनी सूरत बनाकर ऐसे प्रश्न करता है तब मुझे बड़ा मजा आता है और उस समय मैं आनंद की सीमा के उस पार पहुँच जाता हूँ जब दर्शक लोग उठकर जाना चाहते हैं पर संकोच के मारे जल्दी उठते नहीं। यदि उनके मन की तसवीर कोई चित्रकार खींच दे तो मनोविज्ञान के 'खोजियों' के लिए एक अनोखी वस्तु मिल जाए।
हाँ, तो एक दिन हाकी खेलकर आया। कपड़े उतारे, स्नान किया। शाम को भोजन कर लेने की मेरी आदत है, पर आज मैच में रेफ्रेशमेंट जरा ज्यादा खा गया था इसलिए भूख न थी। श्रीमती जी ने खाने को पूछा। मैंने कह दिया कि आज स्कूल में मिठाई खाकर आया हूँ, कुछ विशेष भूख नहीं है। उन्होंने कहा, 'विशेष न सही, साधारण सही। मुझे आज सिनेमा जाना है। तुम अभी खा लेते तो अच्छा था। संभव है मेरे आने में देर हो।' मैंने फिर इनकार नहीं किया, उस दिन थोड़ा ही खाया। बारह पूरियाँ थीं और वही रोज वाली आध पाव मलाई। मलाई खा चुकने के बाद पता चला कि 'प्रसाद' जी के यहाँ से बाग बाजार का रसगुल्ला आया है। रस तो होगा ही। कल संभव है, कुछ खट्टा हो जाए। छह रसगुल्ले निगलकर मैंने चारपाई पर धरना दिया। रसगुल्ले छायावादी कविताओं की भाँति सूक्ष्म नहीं थे, स्थूल थे। एकाएक तीन बजे रात को नींद खुली। नाभि के नीचे दाहिनी ओर पेट में मालूम पड़ता था, कोई बड़ी-बड़ी सुइयाँ लेकर कोंच रहा है। परंतु मुझे भय नहीं मालूम हुआ, क्योंकि ऐसे ही समय के लिए औषधियों का राजा, रोगों का रामबाण, अमृतधारा की एक शीशी सदा मेरे पास रहती है। मैंने तुरंत उसकी कुछ बूँदें पान कीं। दो बार दवा पी। तिबारा। पीत्वा पीत्वा पुन: पीत्वा की सार्थकता उसी समय मुझे मालूम हुई। प्रात: काल होते-होते शीशी समाप्त हो गई। दर्द में किसी प्रकार कमी न हुई। प्रात: काल एक डाक्टर के यहाँ आदमी भेजना पड़ा।
रायबहादुर डाक्टर विनोद बिहारी मुकर्जी यहाँ के बड़े नाम डाक्टर हैं। पहले जब प्रैक्टिस नहीं चलती थी तब आप लोगों के यहाँ मुफ्त जाते थे। वहाँ से पता चला कि डाक्टर साहब नौ बजे ऊपर से उतरते हैं। इसके पहले वह कहीं जा नहीं सकते। लाचार दूसरे के पास आदमी भेजना पड़ा। दूसरे डाक्टर साहब सरकारी अस्पताल के सब-असिस्टेंट थे। वे एक एक्के पर तशरीफ लाए। सूट तो वे ऐसा ही पहने हुए थे कि मालूम पड़ता था, प्रिंस आफ वेल्स के वेलेटों में हैं। ऐसे सूट वाले का एक्के पर आना वैसा ही मालूम हुआ जैसा लीडरों का मोटर छोड़कर पैदल चलना। मैं अपना पूरा हाल भी न कह पाया था कि आप बोले, 'जनाब, दिखाइए।' प्रेमियों को जो मजा प्रेमिकाओं की आँखें देखने में आता है, शायद वैसा ही डाक्टरों को मरीजों की जीभ में आता है। डाक्टर महोदय मुस्कराए। बोले, 'घबराने की कोई बात नहीं है। दवा पीजिए। दो खुराक पीते-पीते आपका दर्द वैसे ही गायब हो जाएगा, जैसे हिंदुस्तान से सोना गायब हो रहा है।' मैं तो दर्द से बेचैन था। डाक्टर साहब साहित्य का मजा लूट रहे थे। चलते-चलते बोले, 'अभी अस्पताल खुला न होगा नहीं तो आपको दवा मँगानी न पड़ती। खैर, चन्द्रकला फारमेसी से दवा मँगवा लीजिएगा। वहाँ दवाइयाँ ताजा मिलती हैं। बोतल में पानी गर्म करके सेंकिएगा।' दवा पी गई। गर्म बोतलों से सेंक भी आरंभ हुई। सेंकते-सेंकते छाले पड़ गए। पर दर्द में कमी न हुई।
दोपहर हुई, शाम हुई। पर दर्द में कमी न हुई, हटने का नाम तो दूर। लोग देखने के लिए आने लगे। मेरे घर पर मेला लगने लगा। ऐसे ऐसे लोग आए कि कहाँ तक लिखें। हाँ, एक विशेषता थी। जो आता एक न एक नुस्खा अपने साथ लेता आता था। किसी ने कहा, अजी, कुछ नहीं हींग पिला दो, किसी ने कहा, चूना खिला दो। खाने के लिए सिवा जूते के और कोई चीज बाकी नहीं रह गई जिसे लोगों ने न बताई हो। यदि भारतीय सरकार को मालूम हो जाए कि देश में इतने डाक्टर हैं तो निश्चय है कि सारे मेडिकल कॉलेज तोड़ दिए जाएँ। इतने खर्च की आखिर आवश्यकता ही क्या है?
कुछ समझदार लोग भी आते थे, जो इस बात की बहस छेड़ देते थे कि असहयोग-आंदोलन सफल होगा कि नहीं, ब्रिटिश नीति में कितनी सच्चाई है, विश्व आर्थिक सम्मेलन में अमेरिका का भाषण बहुत स्वार्थपूर्ण हुआ इत्यादि। मैं इस समय केवल स्मरण-शक्ति से काम ले रहा हूँ। तीन दिन बीत गए। दर्द में कमी न हुई। कभी-कभी कम हो जाता था; बीच-बीच में जोरों का हमला हो जाता था, मानो चीन-जापान का युद्ध हो रहा हो।
तीसरे दिन तो यह मालूम होता था कि मेरा घर क्लब बन गया है। लोग आते मुझे देखने के लिए, पर चर्चा छिड़ती थी कि पंडित बनारसीदास ने इस बार किसको पछाड़ा, प्रसाद जी का अमुक नाटक स्टेज की दृष्टि से कैसा है, हिंदी के दैनिक पत्रों में बड़ी अशुद्धियाँ रहती हैं, अब देश में अनारकिस्ट नहीं रह गए हैं, लार्ड विलिंगडन अब ब्रुक बांड चाय नहीं पीते, छतारी के नवाब टेढ़ी टोपी क्यों लगाते हैं और राय कृष्णदास हफ्ते में नौ बार दाढ़ी क्यों बनवाते हैं; अर्थात लार्ड विलिंगडन और महात्मा गांधी से लेकर रामजियावन लाल पटवारी तक की आलोचना यहाँ बैठकर लोग करते थे। और यहाँ दर्द की वह दर्दनाक हालत थी कि क्या लिखूँ। मुझे भी कुछ बोलना ही पड़ता था। ऊपर से पान और सिगरेट की चपत अलग। भला दर्द में क्या कमी हो। बीच-बीच में लोग दवा की सलाह और डाक्टर बदलने की सलाह और कौन डाक्टर किस तरह का है, यह बतलाते जाते थे।
आखिर में लोगों ने कहा कि तुम कब तक इस तरह पड़े रहोगे। किसी दूसरे की दवा करो। लोगों की सलाह से डाक्टर चूहानाथ कतरजी को बुलाने की सबकी सलाह हुई। आप लोग डाक्टर साहब का नाम सुनकर हँसेंगे। पर यह मेरा दोष नहीं है। डाक्टर साहब के माँ-बाप का दोष है। यदि मुझे उनका नाम रखना होता तो अवश्य ही कोई साहित्यिक नाम रखता। परंतु ये यथानाम तथागुण। आपकी फीस आठ रुपए थी और मोटर का एक रुपया अलग। आप लंदन के एफ.आर.सी.एस. थे।
कुछ लोगों का सौंदर्य रात में बढ़ जाता है, डाक्टरों की फीस रात में बढ़ जाती है। खैर, डाक्टर साहब बुलाए गए। आते ही हमारे हाल पर रहम किया और बोले, मिनटों में दर्द गायब हुआ जाता है, थोड़ा पानी गरम कराइए, तब तक यह दवा मँगवाइए। एक पुर्जे पर आपने दवा लिखी। पानी गर्म हुआ। दो रुपए की दवा आई। डाक्टर बाबू ने तुरंत एक छोटी-सी पिचकारी निकाली; उसमें एक लंबी सूई लगाई, पिचकारी में दवा भरी और मेरे पेट में वह सूई कोंचकर दवा डाली।
यह कह देना आसान है कि मेरा कलेजा निगाहों के नेजे के घुस जाने से रेजा-रेजा हो गया है, अथवा उनका दिल बरुनी की बरछियों के हमले से टुकड़े-टुकड़े हो गया है, पर अगर सचमुच एक आलपीन भी धँस जाए तो बड़े-बड़े प्रेमियों की नानी याद आ जाए, प्रेमिकाएँ भूल जाएँ। डाक्टर साहब कुछ कहकर और मुझे सांत्वना देकर चले गए। इसके बाद मुझे नींद आ गई और मैं सो गया। मेरी नींद कब खुली कह नहीं सकता, पर दर्द में कमी हो चली थी और दूसरे दिन प्रात:काल पीड़ा रफूचक्कर हो गई थी। कोई दो सप्ताह मुझे पूरा स्वस्थ होने में लगे। बराबर डाक्टर चूहानाथ कतरजी की दवा पीता रहा। अठारह आने की शीशी प्रतिदिन आती रही। दवा के स्वाद का क्या कहना। शायद मुर्दे के मुख में डाल दी जाए तो वह भी तिलमिला उठे। पंद्रह दिन के बाद मैं डाक्टर साहब के घर गया। उन्हें धन्यवाद दिया। मैंने पूछा कि अब तो दवा पीने की कोई आवश्यकता न होगी। वे बोले, 'यह तो आपकी इच्छा पर है। पर यदि आप काफी एहतियात न करेंगे तो आपको 'अपेंडिसाइटीज' हो जाएगा। यह दर्द मामूली नहीं था। असल में आपको 'सीलियो सेंट्रिक कोलाइटीज' हो गया था। और उससे 'डेवेलप' कर 'पेरिकार्डियल हाइड्रेट्यूलिक स्टमकालिस' हो जाता, फिर ब्रह्मा भी कुछ न कर सकते। मालूम होता है कि आपकी श्रीमती बड़ी भाग्यवती हैं। अगर छह घंटे की देर और हो जाती तो उन्हें जिंदगी भर रोना पड़ता। वह तो कहिए कि आपने मुझे बुला लिया। अभी कुछ दिनों आप दवा कीजिए।'
डाक्टर महोदय ने ऐसे-ऐसे मर्जों के नाम सुनाए कि मेरी तबीयत फड़क उठी। भला मुझे ऐसे मर्ज हुए जिनका नाम साधारण क्या बड़े पढ़े-लिखे लोग भी नहीं जानते। मालूम नहीं, ये मर्ज सब डाक्टरों को मालूम हैं कि केवल हमारे डाक्टर चूहानाथ को ही मालूम हैं। खैर, दवा जारी रखी।
अभी एक सप्ताह भी पूरा न हुआ था कि दो बजे एकाएक फिर दर्द रूपी फौज ने मेरे शरीररूपी किले पर हमला कर दिया। डाक्टर साहब ने जिन-जिन भयंकर मर्जों का नाम लिया था उनका स्वरूप मेरी तड़पती हुई आँखों के सामने नृत्य करने लगा। मैं सोचने लगा कि हुआ हमला किसी उन्हीं में से एक मर्ज का। तुरंत डाक्टर साहब के यहाँ आदमी दौड़ाया गया कि इंजेक्शन का सामान लेकर चलिए। वहाँ से आदमी बिना माँगी पत्रिका की भाँति लौटकर आया कि डाक्टर साहब कहीं गए हैं। इधर मेरी हालत क्या थी उसका वर्णन यदि सरस्वती शार्टहैंड से भी लिखें तो संभवत: समाप्त न हो। एयरोप्लेन के पंखे की तेजी के समान करवटें बदल रहा था। इधर मित्रों और घरवालों की कांफ्रेंस हो रही थी कि अब कौन बुलाया जाए, पर 'डिसार्मामेंट कांफ्रेंस' की भाँति कोई न किसी की बात मानता था, न कोई निश्चय ही हो पता था। मालूम नहीं, लोगों में क्या बहस हुई, कौन-कौन प्रस्ताव फेल हुए, कौन-कौन पास। जहाँ मैं पड़ा कराह रहा था उसी के बगल में लोग बहस कर रहे थे। कभी-कभी किसी-किसी की चिल्लाहट सुनाई दे जाती थी। बीमार मैं था, अच्छा-बुरा होना मुझे था, फीस मुझे देनी थी, परंतु लड़ और लोग रहे थे। मालूम होता था कि उन्हीं लोगों में से किसी की जमींदारी कोई जबरदस्ती छीने लिए जा रहा है। अंत में हमारे मकान के बगल में रहने वाले पंडित जी की विजय हुई और आयुर्वेदाचार्य, रसज्ञ-रंजन, चिकित्सा-मार्तंड, प्रमेह-गज-पंचानन, कविराज पंडित सुखड़ी शास्त्री के बुलाने की बात तय हुई। आधा घंटा तो बहस में बीता। खैर, किसी तरह से कुछ तय हुआ। एक सज्जन उन्हें बुलाने के लिए भेजे गए। कोई पैंतालीस मिनट बीत गए, परंतु वहाँ से न वैद्य जी आए, न भेजे गए सज्जन का ही पता चला। एक ओर दर्द इनकम टैक्स की तरह बढ़ता ही चला जा रहा था, दूसरी ओर इन लोगों का भी पता नहीं। और भी बेचैनी बढ़ी। अंत में जो साहब गए थे वे लौटे, वैद्य जी ने बड़े गौर से पत्रा देखा और कहा कि अभी बुद्ध-क्रांति-वृत्त में शनि की स्थिति है, एकतीस पल नौ विपल में शनि बाहर हो जाएगा और डेढ़ घड़ी एकादशी का योग है, उसके समाप्त होने पर मैं चलूँगा। आप आधा घंटा में आइएगा। सुनकर मेरा कलेजा कबाब हो गया। मगर वे कह आए थे, अतएव बुलाना भी आवश्यक था। मैंने फिर उन्हें भेजा। कोई आंधे घंटे बाद वैद्य जी एक पालकी पर तशरीफ लाए। आकर आप मेरे सामने कुर्सी पर बैठ गए। आप धोती पहले हुए थे और कंधे पर एक सफेद दुपट्टा डाले हुए थे। इसके अतिरिक्त शरीर पर सूत के नाम पर केवल जनेऊ था, जिसका रंग देखकर यह शंका होती थी कि कविराज जी कुश्ती लड़कर आ रहे हैं। वैद्य जी ने कुछ और न पूछा - पहले नाड़ी हाथ में ली। पाँच मिनट तक एक हाथ की नाड़ी देखी, फिर दूसरे हाथ की। बोले, 'वायु का प्रकोप है, यकृत से वायु घूमकर पित्ताशय में प्रवेश कर अंत्र में जा पहुँची है। इससे मंदाग्नि का प्रादुर्भाव होता है और इसी कारण जब भोज्य पदार्थ प्रतिहत होता है तब शूल का कारण होता है। संभव है, मूत्राशय में अश्म भी एकत्र हो।' कविराज जी मालूम नहीं क्या बक रहे थे और मेरी तबीयत दर्द और क्रोध से एक दूसरे ही संसार में हो रही थी। आखिर मुझसे रहा न गया। मैंने एक सज्जन से कहा, 'जरा आलमारी में से आप्टे का कोष तो लेते आइए।' यह सुनकर लोग चकराए। कुछ लोगों को संदेह हुआ कि अब मैं अपने होश में नहीं हूँ। मैंने कहा, 'दवा तो पीछे होगी, मैं पहले समझ तो लूँ कि मुझे रोग क्या है?' पंडित जी कहने लगे, 'बाबू साहब, देखिए आजकल के नवीन डाक्टरों को रोगों का निदान तो ठीक मालूम ही नहीं, चिकित्सा क्या करेंगे। अंग्रेजी पढ़े-लिखों का वैद्यक-शास्त्र पर से विश्वास उठ गया है। परंतु हमारे यहाँ ऐसी-ऐसी औषधियाँ हैं कि एक बार मृत्युलोक से भी लौटा लें। मुहूर्त मिल जाना चाहिए। और अच्छा वैद्य मिल जाना चाहिए।' इसके पश्चात वैद्य जी चरक, सुश्रुत, रसनिघंटु, भेषजदीपिका, चिकित्सा-मार्तंड के श्लोक सुनाने लगे। और अंत में कहा, 'देखिए, मैं दवा देता हूँ और अभी आपको लाभ होगा। परंतु इसके पश्चात आपको पर्पटी का सेवन करना होगा। क्योंकि आपका शुक्र मंद पड़ गया है। गोमूत्र में आप पर्पटी का सेवन कीजिए, फिर देखिए दर्द पारद के समान उड़ जाएगा और गंधक के समान भस्म हो जाएगा। लिखा है,
गोमूत्रेण समायुक्ता रसपर्पटिकाशिता।
मासमात्रप्रयोगेण शूलं सर्वे विनाशयेत्।। '
मैंने कहा, 'शुक्र अस्त नहीं हो गया, यही क्या कम है। पंडित जी, गोमूत्र पिलाइए और गोबर भी खिलाइए। शायद आप लोगों के शास्त्र में और कोई भोजन रह ही नहीं गया है। इसी कारण से आप लोगों के दिमाग की बनावट भी विचित्र है।'' खैर, पंडित जी ने दवा दी। कहा कि अदरख के रस में इस औषधि का सेवन करना होग। खैर, साहब, फीस दी गई, किसी प्रकार वैद्य जी से पिंड छूटा। दो दिन दवा की गई। कभी-कभी तो कम अवश्य हो जाता था, पर पूरा दर्द न गया। सी.आई.डी के समान पीछा छोड़ता ही न था। वैद्य जी के यहाँ जब आदमी जाता तब कभी रविवार के कारण, कभी प्रदोष के कारण और कभी त्रिदोष के कारण ठीक समय से दवा ही नहीं देते थे।
अब वैसी बेचैनी नहीं रह गई थी, पर बलहीन होता गया। खाना-पीना भी ठीक मिलता ही न था। चारपाई पर पड़ा रहने लगा। दिन को मित्रों की मंडली आती थी। वह आराम देती थी कम, दिमाग चाटती थी अधिक। कभी-कभी दूर-दूर से रिश्तेदार भी आते थे। और सब लोग डाक्टरों को गाली देकर और मुझे बिना माँगी सलाह देकर चले जाते थे। मैं चारपाई पर 'इंटर्न' था। आखिर मेरा विचार हुआ कि फिर डाक्टर साहब की याद की जाए। जिस समय मैं यह जिक्र कर रहा था एक 'कांग्रेसमैन' बैठे हुए थे। यह सज्जन अभी जेल से लौटे थे। मुझे देखने के लिए तशरीफ लाए थे। बोले, 'साहब, आप लोगों को देश का हर समय ध्यान रखना चाहिए। ये डाक्टर सिवा विलायती दवाओं के ठीकेदार के और कुछ नहीं होते। इनके कारण ही विलायती दवाएँ आती हैं। आप किसी भारतीय हकीम अथवा वैद्य को दिखलाइए।' ऐसी खोपड़ी वालों से मैं क्या बहस करता? मैंने मन में सोचा कि वैद्य महाराज को तो मैंने देख ही लिया। कुछ और रुपयों पर ग्रह आया होगा, हकीम भी सही। एक की सलाह से मसीहुअ हिंद, बुकारते जमाँ, सुकरातुश्शफा जनाब हकीम आलुए बुखारा साहब के यहाँ आदमी भेजा। आप फौरन तशरीफ लाए। इस जमाने में भी जब तेज-से-तेज सवारियों का प्रबंध सभी जगह मौजूद हैं, आप पालकी में चलते हैं। मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि पालकी रख दी जाती है अथवा कहार कंधे पर ले लेता है और हकीम साहब उसमें टहला करते है। मेरा मतलब यह है कि जब किसी के यहाँ आप बुलाए जाते हैं तब पालकी के भीतर बैठकर आप जाते हैं।
हकीम साहब आए। यद्यपि मैं अपनी बीमारी का जिक्र और अपनी बे-बसी का हाल लिखना चाहता हूँ, पर हकीम साहब की पोशाक और उनके रहन-सहन तथा फैशन का जिक्र न करना मुझसे न हो सकेगा। सर्दी बहुत तेज नहीं थी। बनारस में यों भी तेज सर्दी नहीं पड़ती। फिर भी ऊनी कपड़ा पहनने का समय आ गया था। परंतु हकीम साहब चिकन का बंददार अंगा पहने हुए थे। सिर पर बनारसी लोटे की तरह टोपी रखी हुई थी। पाँव में पाजामा ऐसा मालूम होता था कि चूड़ीदार पाजामा बनने वाला था, परंतु दर्जी ईमानदार था। उसने कपड़ा चुराया नहीं, सबका सब लगा दिया; अथवा यह भी हो सकता है कि ढीली मोहरी के लिए कपड़ा दिया गया हो और दर्जी ने कुछ कतर-ब्योंत की हो और चुस्ती दिखाई हो। जूता कामदार दिल्ली वाला था, मोजा नहीं था। रूमाल इतना बड़ा था कि अगर उसमें कसीदा कढ़ा न होता तो मैं समझता कि यह रूमाल मुँह अथवा हाथ पोंछने के लिए नहीं तरकारी बाँधने के लिए है। हकीम साहब की दाढ़ी के बाल ठुड्डी के नोक ही पर इकट्ठे हो गए थे। मालूम होता था कि हजामत बनाने का बुरुश है। हकीम साहब दुबले-पतले इतने थे कि मालूम पड़ता था, अपनी तंदुरुस्ती आपने अपने मरीजों में बाँट दी है। हकीम साहब में नजाकत भी बला की थी। रहते थे बनारस में, मगर कान काटते थे लखनऊ के।
आते ही मैंने सलाम किया, जिसका उत्तर उन्होंने मुस्कुराते हुए बड़े अंदाज से दिया और बोले, 'मिजाज कैसा है?'
मैंने कहा, 'मर रहा हूँ। बस, आपका ही इंतजार था। अब यह जिंदगी आपके ही हाथों में है।'
हकीम साहब ने कहा, 'या रब! आप तो ऐसी बातें करते हैं गोया जिंदगी से बेजार हो गए हैं। भला ऐसी गुफ्तगू भी कोई करता है। मरें आपके दुश्मन। नब्ज तो दिखलाइए। खुदाबंद करीम ने चाहा तो आननफानन में दर्द रफूचक्कर होगा।'
मैंने कहा, 'आपकी दुआ है। आपका नाम बनारस में ही नहीं, हिंदुस्तान में लुकमान की तरह मशहूर है, इसीलिए आपको तकलीफ दी गई है।'
दस मिनट तक हकीम साहब ने नब्ज देखी। फिर बोले, 'मैं यह नुस्खा लिखे देता हूँ। इसे इस वक्त आप पीजिए, इंशा अल्लाह जरूर शफा होगी। मैंने बगौर देख लिया। लेकिन आपका मेदा साफ नहीं है और सारे फसाद की बुनियाद यही है।'
मैंने कहा, 'तो बुनियाद उखाड़ डालिए। किस दिन के लिए छोड़ रहे हैं।'
हकीम आलू बुखारा बोले, 'तो आप मुसहिल ले लीजिए। पाँच रोज तक मुंजिज पीना होगा, इसके बाद मुसहिल। इसके बाद मैं एक माजून लिख दूँगा। उसमें जोफ दिल, जोफ दिमाग, जोफ मेदा, जोफ चश्म, हर एक की रियायत रहेगी।' मुझसे न रहा गया। मैं बोला, 'कई जोफ आप छोड़ गए, इसे कौन अच्छा करेगा।' हकीम साहब ने कहा, 'जब तक मैं हूँ, आप कोई फिक्र न कीजिए।'
एक सज्जन ने उनके हाथों में फीस रखी। हकीम साहब चलने को तैयार हुए। उठे। उठते-उठते बोले, जरा एक बात का खयाल रखिएगा कि आजकल दवाइयाँ लोग बहुत पुरानी रखते हैं। मेरे यहाँ ताजा दवाइयाँ रहती हैं।
मैंने उनकी दवा उस दिन पी। वह कटोरा भर दवा जिसकी महक रामघाट के सिवर से कंपिटीशन के लिए तैयार थी, किसी प्रकार गले के नीचे उतार गया, जैसे अहल्कार लोग अंग्रेजों की डाँट निगल जाते हैं। दूसरे दिन मुंजिज आरंभ हुआ। उसका पीना और भी एक आफत थी। मालूम पड़ता था, भरतपुर के किले पर मोरचा लेना है। मेरी इच्छा हुई कि उठाकर गिलास फेंक दूँ, पर घरवाले जेल के पहरुओं की भाँति सिर पर सवार रहते थे। चौथे दिन मुसहिल की बारी आई। एक बड़े-से मिट्टी के बधने से दवा मुझे पीने को दी गई। शायद दो सेर के लगभग रही होगी। एक घूँट गले के नीचे उतरा होगा कि जान-बूझकर मैंने करवा गिरा दिया। बधना गिरते ही अफसल प्रेमी के हृदय की भाँति चूर-चूर हो गया और दवा होली के रंग के समान सबकी धोतियों पर जा पड़ी। उस दिन के बाद से हकीम साहब की दवा मुझे पिलाने का फिर किसी को साहस न हुआ। खेद इतना ही रह गया कि उसी के साथ हकीम साहब वाला माजून भी जाता रहा।
दर्द फिर कम हो चला। परंतु दुर्बलता बढ़ती जाती थी। कभी-कभी दर्द का दौरा अधिक वेग से हो जाता था। अब लोगों को विशेष चिंता मेरे संबंध में नहीं रहती थी। कहने का मतलब यह है कि लोग देखने-सुनने कम आते थे। वही घनिष्ठ मित्र आते थे। घरवालों को और मुझे भी दर्द के संबंध में विशेष चिंता होने लगी। कोई कहता कि लखनऊ जाओ, कोई एक्स-रे का नाम लेता था। किसी-किसी ने राय दी कि जल-चिकित्सा कीजिए। एक सज्जन ने कहा, यह सब कुछ नहीं, आप होमियोपैथी इलाज शुरू कीजिए, देखिए कितनी शीघ्रता से लाभ होता है। बोले, 'साहब, इन नन्हीं-नन्हीं गोलियों में मालूम नहीं कहाँ का जादू है। साहब, जादू का काम करती है, जादू का।'
एक नेचर-क्योर वाले ने कहा कि आप गीली मिट्टी पेट पर लेपकर धूप में बैठिए, एक हफ्ते में दर्द हवा हो जाएगा। हमारे ससुर साहब एक डाक्टर को लेकर आए। उन्होंने कहा, 'देखिए साहब! आप पढ़े-लिखे आदमी हैं। समझदार हैं...' मैं बीच में बोल उठा, 'समझदार न होता तो भला आपको कैसे यहाँ बुलाता।'
डाक्टर महोदय ने कहा, 'दवा तो नेचर की सहायता करने के लिए होती है। आप कुछ दिनों तक अपना 'डायट' बदल दीजिए। मैंने इसी डायट पर कितने ही रोगियों को अच्छा किया है। मगर हम लोगों की सुनता कौन है। असल में आप में विटेमिन 'एफ' की कमी है। आप नीबू, नारंगी, टमाटो, प्याज, धनिया के रस में सलाद भिगोकर खाया कीजिए। हरी-भरी पत्तियाँ खाया कीजिए।'
मैंने पूछा, 'पत्तियाँ खाने के लिए पेड़ पर चढ़ना होगा। अगर इसके बजाय घास बतला दें तो अच्छा हो। जमीन पर ही मिल जाएगी।'
इसी प्रकार जो आता इतनी हमदर्दी दिखलाता था कि एक डाक्टर, हकीम या वैद्य अपने साथ लेता आता था।
खाने के लिए साबूदाना ही मेरे लिए अब न्यामत थी। ठंडा पानी मिल जाता था, यह परमात्मा की दया थी। तीन बजे एक पंडित जी महाराज आकर एक पोथी में से बड़-बड़ पाठ किया करते थे और मेरा मग्ज खाते थे। शाम को एक पंडित और आकर मेरे हाथ में कुछ धूल रख जाते कि महामृत्युंजय का प्रसाद है। इसी बीच में मेरी नानी की मौसी मुझे देखने आईं। उन्होंने बड़े प्रेम से देखा। देखकर बोलीं, 'मैं तो पहले ही सोच रही थी कि यह कुछ ऊपरी खेल है।' मैंने पूछा, 'यह ऊपरी खेल क्या है, नानीजी।' बोलीं, 'बेटा, सब कुछ किताब में ही थोड़े लिखा रहता है। यह किसी चुड़ैल का फसाद है।' मेरी स्त्री और माता की ओर दिखाकर कहने लगीं, 'देखो न, इसकी बरौनी कैसी खड़ी है। कोई चुड़ैल लगी है। किसी को दिखा देना चाहिए।' मैंने कहा, 'डाक्टर तो मेरी जान के पीछे लग गए हैं! क्या चुड़ैल उनके भी बढ़कर होगी।' जब सब लोग चले गए तब मेरी स्त्री ने कहा, 'तुम लोगों की बात क्यों नहीं मान लिया करते? कुछ हो या न हो, इसमें तुम्हारा हर्ज ही क्या है। कुछ खाने की दवा तो देंगे नहीं। परमात्मा की आज्ञा तो टाली जा सकती है, परंतु अपनी या मैं तो कहूँगी किसी भले आदमी की स्त्री की आज्ञा कोई भला आदमी नहीं टाल सकता।' मैंने कहा, 'तुम लोगों को जो कुछ करना है करो, मगर मेरे पास किसी को मत बुलाना। कोई ओझा या भूत का पचड़ा मेरे पास लेकर आया तो वही सन 2 में मुजफ्फरपुर सम्मेलन में जो चप्पल पहनकर गया था उसी से मैं उठकर मरम्मत करने लगूँगा।' श्रीमती जी बोलीं, 'अजी वह कोई ओझा थोड़े ही हैं। एम.ए. पास हैं। कुछ समझा होगा तभी तो यह काम करते हैं। कितनी स्त्रियाँ रोज उनके पास जाती हैं, कितने पुरुष जाते हैं। बड़े वैज्ञानिक ढंग से उन्होंने इसका अन्वेषण किया है।'
मेरे दर्द में किसी विशेष प्रकार की कमी न हुई। ओझा से तो किसी प्रकार की आशा क्या करता। पर बीच-बीच में दवा भी हो जाती थी। अंत में मेरे साले साहब ने बड़ा जोर दिया कि यह सब झेलना इसीलिए है कि तुम ठीक दवा नहीं करते। हामियोपैथी चिकित्सा शुरू करो, सारी शिकायत गंजों के बाल की तरह गायब हो जाएगी। मैंने भी कहा, 'मुर्दे पर जैसे बीस मन वैसे पचास। ऐसा न हो कि कोई कह दे कि अमुक 'सिस्टम' का इलाज छूट गया।' अब राय होने लगी कि किस होमियोपैथ को बुलाया जाए। हमारे मकान से कुछ दूरी पर होमियोपैथ डाकिया था। दिनभर चिट्ठी बाँटता था, सवेरे और शाम दो पैसे पुड़िया दवा बाँटता था। सैकड़ों मरीज उसके यहाँ जाते। बड़ी प्रैक्टिस थी। एक और होमियोपैथ से चार-छह आने पैदा कर लेते थे। एक मास्टर भी थे जो कहा करते थे कि सच पूछो तो जैसी होमियोपैथी मैंने 'स्टडी' की है, किसी ने नहीं की। कुछ बहस के बाद एक डाक्टर का बुलाना निश्चित हुआ। डाक्टर महोदय आए। आप भी बंगाली थे। आते ही सिर से पाँव तक मुझे तीन-चार बार ऐसे देखा मानो मैं हानोलूलू से पकड़कर लाया गया हूँ और खाट पर लिटा दिया गया हूँ। इसके पश्चात मेडिकल सनातन-धर्म के अनुसार मेरी जीभ देखी। फिर पूछा, 'दर्द ऊपर से उठता है, कि नीचे से, बाएँ से कि दाएँ से, नोचता है कि कोंचता है; चिकोटता है कि बकोटता है; मरोड़ता है कि खरबोटता है।' मैंने कहा कि मैंने तो दर्द की फिल्म तो उतरवाई नहीं है। जो कुछ मालूम होता है, मैंने आपसे कह दिया। डाक्टर महोदय बोले, 'बिना सिमटाम के देखे कैसे दवा देने सकता है। एक-एक दवा का भेरियस सिमटाम होता है।' फिर मालूम नहीं कितने सवाल मुझसे पूछे। इतने सवाल तो आई.सी.एस. 'वाइवावोसी' में भी नहीं पूछे जाते। कुछ प्रश्न यहाँ अवश्य बतला देना चाहता हूँ। मुझसे पूछा, 'तुम्हारे बाप के चेहरे का रंग कैसा था। कै बरस से तुमने सपना नहीं देखा। जब चलते हो तब नाक हिलती है या नहीं। किसी स्त्री के सामने खड़े होते हो तब दिल धड़कता है कि नहीं? जब सोते हो तब दोनों आँखें बंद रहती हैं कि एक। सिर हिलाते हो तो खोपड़ी में खटखट आवा आती है कि नहीं।' मैंने कहा, 'आप एक शार्टहैंड राइटर भी साथ लेकर चलते हैं कि नहीं। इतने प्रश्नों का उत्तर देना मेरे लिए असंभव है।'
फिर डाक्टर बाबू ने पचीसों पुस्तकों का नाम लिया और बोले, 'फेरिंगटन यह कहते हैं, नैश यह कहते हैं, क्लार्क के हिसाब से यह दवा होगी।' डाक्टर साहब पंद्रह-बीस पुस्तकें भी लाए थे। आधे घंटे तक उन्हें देखते रहे। तब दवा दी। आपकी दवा से कुछ लाभ अवश्य हुआ, पर पूरा फायदा न हुआ। मैंने अब पक्का इरादा कर लिया कि लखनऊ जाऊँ। जो बात काशी में नहीं हो सकती, लखनऊ में हो सकती है। वहाँ सभी साधन हैं।
सब तैयारी हो चुकी थी कि इतने में एक और डाक्टर को एक मेहरबान लिवा लाए। उन्होंने देखा, कहा, 'जरा मुँह तो देखूँ।' मैंने कहा, 'मुँह-जीभ जो चाहे देखिए।' देखकर बड़े जोर से हँसे। मैं घबराया। ऐसी हँसी वेवल कवि-सम्मेलन में बेढंगी कविता पढ़ने के समय सुनाई देती है। मैं चकित भी हुआ। डाक्टर बोले, 'किसी डाक्टर को यह सूझी नहीं। तुम्हें 'पाइरिया' है। उसी का जहर पेट में जा रहा है और सब फसाद पैदा कर रहा है।' मैंने कहा, 'तब क्या करूँ?' डाक्टर साहब ने कहा, 'इसमें करना क्या है? किसी डेंटिस्ट के यहाँ जाकर सब दाँत निकलवा दीजिए।' मैंने अपने मन में कहा, 'आपको तो यह कहने में कुछ कठिनाई ही नहीं हुई। गोया दाँत निकलवाने में कोई तकलीफ ही नहीं होती।' खैर, रात भर मैंने सोचा। मैंने भी यही निश्चय किया कि यही डाक्टर ठीक कहता है। डेंटिस्ट के यहाँ से पुछवाया। उसने कहलाया कि तीन रुपए फी दाँत तुड़वाने में लगेंगे। कुल दाँतों के लिए छानबे रुपए लगेंगे। मगर मैं आपके लिए छह रुपए छोड़ दूँगा। इसके अतिरिक्त दाँत बनवाई डेढ़ सौ अलग। यह सुनकर पेट के दर्द के साथ-साथ सिर में भी चक्कर आने लगा। मगर मैंने सोचा कि जान सलामत है तो सब कुछ। इतना और खर्च करो। श्रीमती से मैंने रुपए माँगे। उन्होंने पूछा, 'क्या होगा?' मैंने सारा हाल कह दिया। वे बोलीं, 'तुम्हारी बुद्धि कहीं घास चरने गई है क्या? किसी कवि का तो साथ नहीं हो गया है कि ऐसी बातें सूझने लगी हैं। आज कोई कहता है कि दाँत उखड़वा डालो। कल कोई कहेगा बाल उखड़वा डालो; परसों कोई डाक्टर कहेगा कि नाक नोचवा डालो, आँख निकलवा दो। यह सब फजूल है। तुम सुबह टहला करो, किसी एक भले डाक्टर की दवा करो। खाना ठिकाने से खाओ। पंद्रह दिन में ठीक हो जाओगे। मैंने सबका इलाज भी देख लिया।' मैंने कहा, 'तुम्हें अपनी ही दवा करनी थी तो इतने रुपए क्यों बरबाद कराए?'
कुछ दिन के बाद मैंने समझा कि स्त्रियों में भी बुद्धि होती है। विशेषत: बीस साल की आयु के बाद।
---बेढब बनारसी---
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