गुरुवार, 2 मई 2013

एक छात्र नेता का रोजनामचा


पिछली रात वह काफी देर तक नुक्‍कड़ वाली चाय की दुकान पर क्रान्ति करता रहा था। करीब दो बजे तक उसने व्‍यवस्‍था बदलने और नई व्‍यवस्‍था जमाने की बातें की थीं। देश से लेकर विश्‍वविद्यालय तक की सारी समस्‍याओं को हल करके जब वह वापस अपने कमरे में लौटा तो काफी सन्‍तुष्‍ट था। लेकिन इस समय वह सन्‍तोष असन्‍तोष में परिवर्तित हो गया था। अभी सिर्फ नौ बजे थे और ऐसे खुशगवार मौसम में जब कि सोने से बेहतर और कोई काम नहीं हो सकता था, उसे उठना पड़ रहा था। उसने अपनी नेतागीरी को कोसा और फिर सोने लगा। लेकिन उसे याद आया कि विश्‍वविद्यालय के चुनाव करीब हैं और इस समय उसका समय से विश्‍वविद्यालय जाना निहायत जरूरी है। चारपाई पर बैठकर वह सिगरेट पीने लगा ताकि उस क्रिया को सम्‍पादित करने में उसे सुविधा हो जिसे शास्‍त्रों में दैनिक क्रिया कहा गया है। हालाँकि वह क्रान्तिकारी होने के कारण किसी भी दैनिक क्रिया में विश्‍वास नहीं रखता और अक्‍सर ये क्रियाएँ साप्‍ताहिक और मासिक किश्‍तों में करता है; फिर भी चुनाव का मौसम होने के कारण आजकल इन्‍हें नियमित करना पड़ रहा है।

चुनाव में चुस्‍ती बहुत सहायक तत्व है और दुर्भाग्‍य से चुस्‍ती इसी तरह आती है। खरामा-खरामा उसने सभी कार्य सम्‍पादित किए और एक बार फिर उसे व्‍यवस्‍था के इस फूहड़पन पर क्रोध आया। उसके जैसे महत्वपूर्ण व्‍यक्ति को, जिसकी आवाज पर कई हजार लड़के एक साथ विश्‍वविद्यालय छोड़कर सड़कों पर आ जाते हैं, चाय के लिए आधा फर्लांग दूर चाय की दुकान तक जाना पड़ता है। कल रात उसके दल की जिला शाखा के अध्‍यक्ष जब व्‍यवस्‍था के खिलाफ अपना आक्रोश व्‍यक्‍त कर रहे थे तो उसे वे हास्‍यापद लग रहे थे। लेकिन अब उसे उनका क्रोध जेनुइन लगने लगा। उन्‍हें शिकायत थी कि इस व्‍यवस्‍था में जब लोगों को छोटी कार का लाइसेन्‍स आसानी से मिल जाता है तो आखिर क्‍या कारण है कि उन्‍हें चीनी का कोटा नहीं मिल पा रहा है? जरूर इसमें व्‍यवस्‍था का ही कोई षड्यंत्र है। उसे लगा कि उसे वक्‍त पर चाय भी व्‍यवस्‍था के षड्यंत्र के कारण ही नहीं मिल पाती। उसने अपना सिर झटका और स्‍वयं को विश्‍वास दिलाया कि शीघ्र ही उसकी पार्टी देश में समाजवादी व्‍यवस्‍था लाने वाली है। समाजवाद आते ही उसकी पार्टी के जिला अध्‍यक्ष को चीनी का कोटा और उसे बिस्‍तर पर आसानी से चाय उपलब्‍ध हो जाया करेगी।

चाय पीकर वह धीरे-धीरे विश्वविद्यालय कैम्‍पस की ओर बढ़ा। कैम्‍पस के पास पहुँचते ही उसकी सारी सुस्‍ती गायब हो गई थी और वह इस समय पूरी तरह चुस्‍त और चौकन्‍ना हो गया था। सामने से कुछ वोट आ रहे थे। उसने कुछ टूथपेस्‍टी विज्ञापन से अपने दाँत निपोर दिए और हें…हें… करते हुए उनके हालचाल पूछने लगा। इसके बाद जो दाँत निपोरने का सिलसिला चला वह उसके क्‍लास रूम पहुँचने तक जारी रहा। रास्‍ते भर उसके चमचे उसके लगातार पान खाने से मैले पीले दाँतों को देखकर आश्‍वस्‍त होते रहे और उसके विरोधी उन्‍हें तोड़ने के बारे में अपनी शुभ राय व्‍यक्‍त करते रहे।

क्‍लास रूम और उसमें कई पीढ़ियों का वैर था। लेकिन चुनाव के कारण इस समय क्‍लास उसे चुम्‍बक की तरह खींच रही थी। वहाँ जाने से उसे दो फायदे थे। एक तो वह अपने विरोधियों के इस प्रचार का खण्‍डन कर सकेगा कि उसका पढ़ाई से कोई विशेष रिश्‍ता नहीं है और दूसरा इससे कुछ जन सम्‍पर्क भी हो सकेगा।

कक्षा में अध्‍यापक महोदय अभी तक नहीं आए थे। वह दाँत निपोरने की अपनी पुरानी प्रक्रिया में फिर से जुट गया। उसने सभी के हालचाल पूछने के बाद अध्‍यापक के परिवार की महिलाओं के बारे में शिष्‍ट ढंग से कुछ विचार उपस्थित छात्रों के समक्ष प्रस्‍तुत किए और फिर दादा किस्‍म के एक छात्र के साथ कुछ कान्‍फीडेंशल बातचीत करने के लिए कमरे से निकल कर गलियारे में चला गया। वे रहस्‍यमय शब्‍दों से फुसफुसाते रहे। तभी अध्‍यापक उधर से गुजरा। उसने अध्‍यापक पर एक बड़ा धार्मिक किस्‍म का रिमार्क कसा। अध्‍यापक ने घबराकर इधर-उधर देखा और फिर न सुनने का दिखावा करता हुआ कक्षा में घुस गया। वे दोनों अब जोर-जोर से बातें कर रहे थे। अध्‍यापक ने अपने दो दशक पुराने नोट्स निकाले और अपनी घबराई हुई मरियल आवाज में उनकी आवाज से प्रतिस्‍पर्धा करने लगा।

कक्षा की तरफ उपेक्षा भरी निगाह फेंकते हुए वह उस दादा छात्र के साथ पोर्टिको से होते हुए लॉन में चला आया। लॉन में उपस्थि‍त कई छात्रों ने उसे घेर लिया। वे एक स्‍वर में उसके सामने अपने-अपने दुखड़े रोने लगे। उसने कइयों को आश्‍वासन के रस से सराबोर किया। कई लोगों को अपने घर बुलाया और कुछ को लेकर रजिस्‍ट्रार ऑफिस की तरफ बढ़ा। जब वह रजिस्‍ट्रार ऑफिस पहुँचा तो उसके पीछे काफी लोगों का हुजूम इकट्ठा हो चुका था। वे सभी एक स्‍वर से बोल रहे थे और वह भी निष्‍काम भाव से मुस्‍कराते हुए उनके ढेर सारे प्रश्‍नों के उत्तर में एकाध सूक्ति वाक्‍य बोलता जा रहा था। रजिस्‍ट्रार ऑफिस में घुसकर उसने क्‍लर्कों पर अपनी आग्‍नेय दृष्टि फेंकी और इस बात पर दु:ख प्रकट किया कि वे उसकी इस दृष्टि से भस्‍म नहीं हुए। क्‍लर्कों से उसने घरेलू किस्‍म के संबंध स्‍थापित किए और उन्‍हें अपने चमचों के काम करने के बारे में कुछ हिदायतें दीं। उन हिदायतों के बाद वाले हिस्‍से ज्‍यादा महत्वपूर्ण थे जिनमें उसने काम न होने की दशा में कुछ विशेष परिणामों के बारे में क्‍लर्कों को आश्‍वस्‍त कराया था। क्‍लर्कों ने इसी हिस्‍से को मन से सुना और काम पर जुट गए।

रजिस्‍ट्रार ऑफिस से निकलने के बाद वह अश्‍वमेधी घोड़े की भाँति दिग्विजय के लिए पूरे विश्‍वविद्यालय कैम्‍पस में घूमता रहा। रास्‍ते भर में उसे तीन तरह के लोग मिले जिन्‍हें अलग-अलग ढंग से उसने निपटाया। पहली किस्‍म के लोग उसके चमचे थे जिन्‍हें उसने अपने चुनाव जुलूसों में आने की हिदायतें दीं और बदले में उन्‍हें प्रवेश, वजीफों या उपस्थिति की कमी के बारे में निश्चिन्‍त रहने की सलाह दी। दूसरी किस्‍म के वे अध्‍ययनशील छात्र थे जो साल में कम-से-कम दो महीने की हड़ताल चाहते थे जिससे वे अपना कोर्स पूरा कर सकें। क्‍योंकि वे जानते थे कि क्‍लास में कोर्स पूरा करके अध्‍यापकगण विश्‍वविद्यालय की प्रतिष्‍ठा को खतरे में नहीं डाल सकते। उसने उन्‍हें आश्‍वासन दिया कि जीत जाने पर वह दो महीने क्‍या पूरे साल भर विश्‍वविद्यालय बन्‍द रख सकता है। इस पर बहुत-से अध्‍ययनशील छात्रों के चेहरे प्रसन्‍नता से खिल गए और बहुत-से गम्‍भीर चिन्‍ता में डूब गए। गम्‍भीर चिन्‍ता वाले छात्रों के सामने उसने अपने मैले दाँत निपोरे जिससे उन्‍हें लगा कि वह मजाक कर रहा था। इसलिए उन्‍हें विश्‍वास हो गया कि उसमें 'सेंस ऑफ ह्यूमर' नामक पदार्थ भी काफी मात्रा में पाया जाता है। तीसरी कोटि में जरा विकट किस्‍म के लोग आते थे। ये उसके विरोधी थे जो उसके दाँत तोड़ने से लेकर अंग-भंग करने तक के कामों के बारे में गम्‍भीरतापूर्वक बातें कर रहे थे। उन्‍होंने उसे जगह-जगह हूट करने की कोशिशें कीं। लेकिन उसने गीता के कुछ श्‍लोक कोर्स में होने के कारण पढ़ रखे थे और इसलिए निष्‍काम भाव से उनके व्‍यंग्‍य बाणों को झेलते हुए अपने काम में लगा रहा।

विश्‍वविद्यालय कैम्‍पस में दिग्विजय करने के बाद वह अध्‍यापक कॉलोनी की ओर दिग्विजय करने निकला। दो-तीन अध्‍यापकों ने पिछले साल उससे पैम्‍फलेट निकलवाए थे और एतदर्थ चुनाव में मदद करने के लिए कहा था। वह कई मकानों में खाली जेब घुसा और भरी-जेब वापस लौटा। इसके बाद उस 'डीन' के मकान की ओर बढ़ा जो अपने मित्रों से उसे खास आदमी घोषित करते थे। डीन साहब विश्‍वविद्यालय जाने की तैयारी कर रहे थे। उसे देखकर रुक गए। उन्‍होंने उसे सलाह दी कि भगवान ने ऐसे शुभ कामों के लिए रात बनाई है सो हमें उसका उपयोग करना चाहिए।

उसने उनकी आस्तिक सलाह उपेक्षा से सुनी और बताया कि रात में करने के लिए और कई महत्वपूर्ण कार्य हैं। और फिर, उसके लिए रात और दिन सभी बराबर हैं क्‍योंकि वह किसी … से डरता नहीं है। डीन साहब ने उसे अपने मित्र की गाड़ी चुनाव प्रचार के लिए उपलब्‍ध करा देने का वादा किया और कुछ धन देकर उसे विदा किया। इस प्रकार उन्‍होंने गुरु-शिष्‍य के मध्‍य संबंध बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

डीन के बँगले से निकलकर वह फिर कैम्‍पस की ओर बढ़ा। सामने से कुछ सुकन्‍याएँ आ रही थीं। उसने उन्‍हें देखकर खींसें निपोरते हुए हाथ जोड़े और बहनजी के सम्‍बोधन से उनकी सेहत और मौसम के बारे में दो-एक सस्‍ती किस्‍म के शेर सुनाए। बहनजी के संबोधन से जो अवसाद उन सुकन्‍याओं के चेहरे पर आ गया था, वह शेर सुनते ही दूर हो गया। वे चहचहाने लगीं और आगे बढ़ गईं।

उसने चुनाव को कोसा, जिसके कारण इन सुकन्‍याओं को किसी मधुर सम्‍बोधन के स्‍थान पर बहनजी नामक शुष्‍क सम्‍बोधन से सम्‍बोधित करना पड़ा। चुनाव के बाद सब ठीक हो जाएगा - वाले अन्‍दाज में उसने अपना सिर झटका और एक बार फिर कैम्‍पस का चक्‍कर लगाने लगा। काफी देर तक उसका जनसम्‍पर्क जारी रहा और थकने के बाद वह वापस अपने निवास स्‍थान की तरफ लौट आया।

घर पर काफी दु:खी छात्र उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उसके सामने नाना किस्‍म की समस्‍याएँ रखी गईं। विश्‍वविद्यालय में प्रवेश से लेकर किसी लड़की को प्रेमपत्र देने तक की कई बातों को उसने गम्‍भीरतापूर्वक सुना और राष्‍ट्रीय नेताओं के अन्‍दाज में धीरे-धीरे कई अर्थों वाले वाक्‍य बोले। काफी लोग सन्‍तुष्‍ट होकर चले गए। केवल वे ही लोग रह गए जो उसके काफी अंतरंग थे। उनसे वह बड़ी देर तक बातें करता रहा, जिससे उन्‍हें विश्‍वास हो गया कि आज दिन भर कैम्‍पस में उसका जो रूप दिखाई दिया वह सायास था। उसका असली स्‍वरूप तो वही था जिसे वे लोग वर्षों से पहचानते थे। उनसे उसने चुनाव-प्रचार की बातें कीं, पर्चे और पोस्‍टरों की बातें कीं। साथ ही इस विषय पर भी गम्‍भीरतापूर्वक चिन्‍तन किया गया कि यदि विरोधी उम्‍मीदवार की एक टाँग तोड़ दी जाये तो उसके सौंदर्य पर क्‍या असर पड़ेगा।

इस प्रकार नाना प्रकार के चिन्‍तनों में डूबे हुए और नाना प्रकार के कार्यों को सम्‍पादित करते हुए उसने अपना दिन बिताया। रात होते ही वह नुक्‍कड़वाली चाय की दुकान पर क्रान्ति करने चल दिया। वह जानता था कि बिना क्रान्ति किए इस देश में नेतागीरी पुख्‍ता होने वाली नहीं है। हमारे राष्‍ट्रीय नेता संसद और कॉफी हाउस में क्रान्ति की बातें करते हुए अपने को धन्‍य महसूस करते हैं। उसे संसद या कॉफी हाउस उपलब्‍ध नहीं है। इसलिए वह चाय की दुकान पर ही क्रान्ति करता है। वहाँ उसने घंटों 'वर्तमान व्‍यवस्‍था की बुराइयों और नई व्‍यवस्‍था से राष्‍ट्र को होने वाले लाभ' नामक बहुचर्चित विषय पर भाषण दिया जिसे चाय की दुकान पर काम करने वाले छोकरे और दफ्तरों के कुछ फटेहाल बाबू ऊँघते हुए सुनते रहे।

काफी रात बीत जाने पर वह वहाँ से एक और सार्थक दिन बिताने का सन्‍तोष मन में लिए घर आया और चुपचाप सो गया।

                                                                        ---विभूति नारायण राय---

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