शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

पुस्तक मेले के मजे


दिल्ली में किसी भी आयोजन के साथ 'विश्व' शब्द जुड़ने का असर ठीक वैसा ही होता है जैसा किसी फिल्म के साथ मलाईका अरोड़ा या याना गुप्ता अथवा मल्लिका शहरावत के डांस आइटम के जुड़ जाने का होता है। वयस्क और उम्रदराज, सभी बच्चों की तरह ललचते हुए लपक पड़ते हैं। भले ही यह 'विश्व' भारत की सीमा पार के दो चार छोटे-बड़े देशों तक ही सीमित हो।

इस बार भी यही हुआ। विश्व पुस्तक मेले के आयोजन की घोषणा होते ही सारा परिवार बड़े मनोयोग से मेले से जुड़ी छोटी-बड़ी खबरों और सूचनाओं का आपस में आदान-प्रदान और विचार-विमर्श करने में जुट गया। किताबों के पास तक भी नहीं फटकने वाली श्रीमती जी और कोर्स से बाहर की किताबें भी पढ़ते रहने के मेरे अनुरोध को सुना-अनसुना करने वाले छोटे-बड़े बच्चों तक ने घोषणा कर दी कि पुस्तक मेला तो अवश्य देखना है।

कुछ रिश्तेदारों ने भी सूचना दी कि वैसे तो वे दिल्ली किन्हीं और कामों से आने वाले थे परन्तु अब वे अपने पधारने से समय में कुछ फेर-बदल कर पुस्तक मेले के दिनों में ही सपरिवार आने की सोच रहे हैं। कहीं सभी मेहमान साथ न आ धमकें की चिंता के बावजूद लोगों के ऊपर पुस्तक-प्रेम का ऐसा प्रभाव सुखद भी लगा। चलो दुनिया रसातल में जाते-जाते बच गई। वैसे इस विषय में मेरे पिछले अनुभव कोई खास अच्छे नहीं थे।

दिल्ली की विकट से विकट होती आवास समस्या के चलते जब भी मकान बदलना पड़ा तो पुस्तकों के प्रति सारे परिवार की उपेक्षा अपमान की सीमा छूने लगती थी। सबसे पहले तो उन सारी पुस्तकों को 'मेरी किताबों' के खाते में डाल दिया जाता था जो भागवत, मानस, हनुमान चालीसा और अन्य पतली-पतली व्रत-कथाओं जैसी पवित्र पुस्तकों के साथ रखने के अयोग्य होतीं। टेलीफोन डायरेक्टरी से लेकर रेलवे टाइम टेबुल तक वो सारा कुछ जो बच्चों की पाठ्य-पुस्तकों के इतर होता 'मेरी किताबों' के खाते में आता। डैनियल स्टील, सिडनी शैल्डन या मिल्स एंड बून्स जैसी महान परम्पराओं में नहीं आने वाला सारा साहित्य भी 'मेरी किताबों' की संज्ञा से विभूषित कर दिया जाता। ऊपर से आते-जाते धमकी भी प्रसारित होती रहती, 'अपनी किताबें-सिताबें पहले ही सँभालकर रख लेना बेहतर होगा, बाद में इधर-उधर खोजने में परेशान होते रहने से।' मजदूरों तक को किताबों के गट्ठरों से ही सबसे ज्यादा परेशानी होती। 'देखने में छोटे लेकिन उठाने में कितने भारी' जैसी भुनभुनाहटों के बीच ये गट्ठर बेमन से उठाए और बेरहमी से पटके जाते रहे हैं। बीच-बीच में व्यंग्य बाण भी - 'ट्रक वाला पूछ रहा था, क्या रद्दी भी साथ चलेगी?' नए मकान में सब कुछ व्यस्थित ढंग से रखने के बाद बचे हुए खाली कोनों और कुछ भीतर की दीवारों को उदारतापूर्वक किताबों के लिए निर्धारित कर दिया जाता। खैर, यह सब तो इतिहास हो चुका है।

वर्तमान प्रसंग में सबसे पहला अहम प्रश्न था, पुस्तक मेला घूमने के लिए उचित दिन निर्धारित करना। पहला दिन तो इसलिए स्वीकार्य नहीं था कि अधिकतर स्टॉल, विशेषकर विदेशी स्टॉल, उस दिन तक ठीक से लगाए जा रहे होते हैं। दूसरा दिन श्रीमती जी को स्वीकार्य नहीं था क्योंकि बच्चों के मामा सपरिवार उस दिन शाम तक पधारने वाले थे। और बच्चे तीसरे दिन से ज्यादा प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं थे। पुस्तकों के प्रति उनकी यह उतावली मन को अच्छी लगी। यह रहस्य तो बाद में खुला कि इस उतावलेपन का कारण विदेशी स्टॉलों में किताबों के अलावा बिकने वाली अन्य आकर्षक चीजों के समाप्त होने का भय था। तो इस प्रकार तीसरा दिन सर्वसम्मति से चुन लिया गया और मेरे लिए निर्देश जारी कर दिए गए। निर्देशानुसार मुझे उस दिन पुस्तक मेले में केवल परिवार के लिए जाना था। अर्थात उनकी मर्जी के ही स्टॉलों पर घूमना था। ये नहीं कि अपनी पसंद के स्टॉल में घुसे और घंटों लगा दिए या मित्रों के मिलने पर उनसे गपियाने में मगन हो गए।

तीसरे दिन की सुबह आश्चर्यजनक ढंग से अनुशासित और स्फूर्ति से भरी सुबह थी। दस बार जगाने पर जगने वाले और नाश्ते में तरह-तरह के नखरे करने वाले बच्चे समय से जगकर ब्रेड-बटर के नाश्ते से संतुष्ट हो नौ बजते न बजते चलने के लिए प्रस्तुत थे। मामाजी का परिवार भी एकदम चाकचौबन्द नजर आ रहा था। अन्य दिनों विकट लगने वाली समस्याएँ, जैसे बस और मेट्रो की भयंकर भीड़, दूर तक पैदल चलना, टिकट की लंबी कतार आदि, परिवार के सदस्यों के उत्साह और उमंग के समक्ष वैसे ही तिरोहित हो गईं जैसे महँगाई की बाढ़ में किसी मध्यवित्त परिवार का बजट।

मेले में घुसते ही मानो किसी अदृश्य डोर से नियंत्रित सबके कदम अपने आप पुस्तक स्टॉलों की विपरीत दिशा में मुड़कर फूड कोर्ट की तरफ अग्रसर हो गए, जैसे यह सब पहले से तय हो। स्पष्ट था कि उपलब्ध खाद्य-सामग्री के विषय में बड़े मनोयोग से होम-वर्क किया गया था।

खाने के बाद घूमने की बारी आई। सभी एकमत थे विदेशी स्टॉलों को सबसे पहले देखने पर। करीब दो घंटे व्यतीत करने के बाद जब हम लोग बाहर निकले तो सबके हाथों में कुछ न कुछ था तो अवश्य पर वह निश्चित रूप से किताबों से इतर था। अब बच्चों का आग्रह उन स्टॉलों की तरफ चलने का था जहाँ तरह-तरह के गेमों और कॉमिकों की किताबें उपलब्ध थीं। उन्हें मेरे हवाले करते हुए श्रीमती जी अपने भाई-भाभी के साथ ज्योतिष शास्त्र वाले हॉल की तरफ रवाना हुईं। दो-ढाई घंटों के बाद जब दोनों दल मिले तो जहाँ बच्चों के हाथों में कॉमिकों की किताबें, तरह-तरह की रबर-पेंसिलें, पेन और गेम थे वहीं उनके मामा-मामी के पास कितनी तरह के ताबीज, गण्डे, बुरी नजर दूर करने के लिए घरों में इधर-उधर टाँगे-ठोंके जाने वाली खिलौनों से सामग्री और 'अपना भाग्य स्वयं जानें', 'घर को वास्तु के अनुसार कैसे सजाएँ' जैसे विषयों पर कुछ अमूल्य ग्रंथ थे। इस बीच सबकी भूख फिर चमक आई थी और तरह-तरह के खाद्य पदार्थ बेचती दुकानों की तरफ सबके कदमों का मुड़ना परम आवश्यक। भोजनोपरान्त कॉफी की आखिरी घूँट भरते हुए श्रीमती जी ने फरमाया, 'उफ, किताबें देखते-देखते तो मन भर गया, अब दूसरी तरफ चलते हैं।' दूसरी तरफ यानी कपड़े, नकली गहने, जूते, सैंडिल और तरह-तरह की श्रृंगार सामग्री से भरी दुकानें। इनमें घूमते-घूमते जब बच्चों ने संध्या में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों पर विचार विमर्श आरंभ किया तो हमें दिन बीत जाने का आभास हुआ।

और इस तरह सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अवलोकन और रात का भोजन भी मेले में करते हुए परम संतुष्टि के साथ मेरा पुस्तक प्रेमी परिवार विश्व पुस्तक मेले में पिकनिक मना घर लौटा।

                                                                                       ---उपेंद्र कुमार---

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